सावधान! राष्ट्र करवट ले रहा है

मनोज ज्वाला
भारत की संसद से नागरिकता (संशोधन) विधेयक- 2019 पारित हो जाना और अब उसका कानून बन जाना कोई सामान्य घटना नहीं है। यह दुनिया के एक सनातन राष्ट्र के इतिहास की राजनीतिक अधोगति और चिर-पुरातन देश के भूगोल की ऐतिहासिक त्रासदी को सुधारने का राष्ट्रीय सरंजाम है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और कांग्रेस की विभाजनकारी दुरभिसंधि ने भारत-भूमि की सभ्यता के इतिहास को भूगोल में परिवर्तित कर देने तथा इस देश के भूगोल को रक्तरंजित इतिहास बनाकर  करोड़ों भारतीयों को भारत की नागरिकता से वंचित कर देने का जो दुष्कर्म किया था, उसका पाप अब इस विधेयक से धुलता हुआ प्रतीत हो रहा है। भारत के कृत्रिम विखण्डन को अंजाम देने से उन भारतीय भू-भागों पर आज दो पृथक इस्लामी देश का आकार खड़ा दिख रहा है, जहां के अधिकतर क्षेत्रों में विभाजन या पाकिस्तान-सृजन की मांग उठी ही नहीं थी। इसी तरह से आज के पाकिस्तान में वहां के इस्लामी शासन के क्रूर कारनामों से मरते-मिटते, बचे-खुचे जिन लाखों हिन्दुओं का आज वहां जीवन दूभर हो गया है, उनके पूर्वजों को उनकी जन्मजात भारतीय नागरिकता से वंचित कर उन्हें रातोंरात पाकिस्तान का नागरिक बना देने का गर्हित काम भी कांग्रेस ने ही किया था।देश-विभाजन के दौरान दोनों देशों की आबादी के स्थानान्तरण का विकल्प ठुकराते हुए कांग्रेस के नेताओं ने उन तमाम लोगों को पकिस्तान की सीमा से बाहर निकलने अर्थात भारत आने से मना करते हुए यह आश्वस्त किया था कि जो जहां है, वहीं रहे। कहीं की भी सरकार किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगी। सबको समान सुरक्षा व समान अधिकार प्राप्त होंगे। उधर, पाकिस्तान में भी उसके जनक जिन्ना की ओर से यह घोषणा की गई थी कि धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर किसी भी समुदाय के साथ किसी भी तरह का कोई शासनिक भेदभाव नहीं किया जाएगा। फलतः जो लोग मजहबी आकार ले चुके उस नवसृजित राष्ट्र की सीमा से बाहर निकल भारत आना चाहते थे, वह लोग जिन्ना-जवाहर की बातों पर भरोसा कर वहीं रह गए।जिन्ना द्वारा जोगेन्द्र नाथ मण्डल को पाकिस्तान का पहला कानून मंत्री बनाये जाने के बाद लोगों का वह भरोसा थोड़ा पुष्ट भी हुआ था। हालांकि उन्हें यह बात जरूर साल रही थी कि जब आबादी का स्थानान्तरण होना ही नहीं और देश-विभाजन की मांग उनकी ओर से हुई ही नहीं, तब पाकिस्तान बनाया ही क्यों? किन्तु जिन्ना के मरते ही लीगियों ने हिन्दुओं पर हमले कर कायदे आजम की उपरोक्त घोषणा की धज्जियां उड़ानी शुरू कर दी। हालात ऐसे हिन्दू-विरोधी हो गए कि कानून मंत्री जोगेन्द्र नाथ मण्डल को भी मंत्रीपद से इस्तीफा देकर भारत में शरण लेनी पड़ी।बीतते समय के साथ भारत में मुसलमानों की राजनीतिक स्थिति बेहतर होती गई। उधर पाकिस्तान में हिन्दुओं की हालात बद से बदत्तर होती रही। उनके धर्म पर मुसलमानों का आतंक-अत्याचार इस कदर बढ़ता गया कि उस मुल्क में हिन्दू रह कर जीना और मरना दोनों दुश्वार हो गया। उन्हें जीवन-यापन की मूलभूत सुविधाओं व मानवाधिकारों तक से वंचित किया जाने लगा। मृत्यु, श्राद्ध, सम्बन्धी उनके धार्मिक संस्कारों पर भी पाबंदी लगायी जाती रही। हिन्दू और मुस्लिम दोनों के लिए अलग-अलग विभेदकारी कानून लागू किये गए कि हिन्दू होना ही अपराध-सा हो गया।इस्लामी शासन के संरक्षण में होते रहे चौतरफा दमन के कारण वहां की हिन्दू आबादी घटती-मिटती 24 फीसदी से सिमटकर महज 2 फीसदी हो गई। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम और मानवाधिकार कानूनों की वकालत करते रहने वाली शक्तियों की कौन कहे, अपने देश की पूर्ववर्ती सरकारें भी भारत के ही उन ‘स्वाभाविक नागरिकों’ की जो सन 1947 में रातों-रात पाकिस्तानी नागरिक बना दिए गए थे, उनकी सुध लेने से कतराती रहीं। प्रायः सभी गैर-भाजपाई पार्टियां और उनकी सरकारें पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिन्दुओं की ही नहीं, बल्कि भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समाज की भी उपेक्षा करते हुए अपना-अपना वोट-बैंक बनाने-भुनाने के लिए मुसलमानों का तुष्टिकरण करने में लगी रहीं। आतंक बरपाने की जिहादी योजना से भारत आते रहे पाकिस्तानी मुसलमानों को तो भारतीय नागरिकता जैसे-तैसे दी जाती रही, किन्तु पाकिस्तानी आतंक-अत्याचार का शिकार होकर शरण लेने भारत आने वाले उन हिन्दुओं को, जिनके पूर्वजों ने पाकिस्तान की मांग कभी की ही नहीं थी, उन्हें शरणार्थी का दर्जा देने से भी हमारी सरकारें इनकार करती रही थीं। हैरत है कि जिस कांग्रेस ने सन 1947 में जिन करोड़ों हिन्दुओं को जबरन पाकिस्तानी बनाकर संकटों में डाल दिया, अब उसे ही उन पीड़ित-प्रताड़ित अभागे लोगों को उनकी भारतीय नागरिकता का उनका स्वाभाविक अधिकार लौटाने वाला नागरिकता (संशोधन) कानून मंजूर नहीं है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का यह रुख भारत की राष्ट्रीयता के विरुद्ध है। क्योंकि, सनातन धर्म ही भारत की राष्ट्रीयता है। दुनिया के तमाम मजहबों का जन्म होने के पहले से ही भारत एक सनातनधर्मी राष्ट्र रहा है। इस नाते इसे धारण करने वाले हिन्दू भारत के मूल नागरिक हैं। इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है कि कांग्रेस ने धर्म व मजहब के आधार पर देश का विभाजन कराया। इसलिए पाकिस्तान या उससे विखण्डित होकर बने बांग्लादेश में में अल्पसंख्यक बने हिन्दू, सिख, जैन, पारसी और ईसाई भारत के स्वाभाविक नागरिक हैं। यह एक प्राकृतिक सत्य है। भारतीय राष्ट्रीयता की इस सच्चाई को कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष समाज द्वारा आज तक झुठलाया जाता रहा है। किन्तु, इस झूठ के दिन अब लद चुके हैं। महज शासनिक सत्ता पाने के लिए देश का विभाजन कर देने की गुनहगार कांग्रेस को उनके किये कर्मों का आईना भारत की वर्तमान सरकार अगर दिखा रही है तो इसमें बुरा क्या है? नागरिकता (संशोधन) कानून लागू हो जाने से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वर्षों से सोयी हुई या यों कहिए कि सुलायी गई भारतीय राष्ट्रीयता अब स्वतंत्रता आन्दोलन के ऋषियों-मनीषियों महर्षि अरविन्द व श्रीराम शर्मा आचार्य की भविष्योक्तियों के अनुसार निर्दिष्ट समय पर जाग उठी है और यह सनातन राष्ट्र अब करवट फेर रहा है। ऐसे में भारतीय नागरिकता की मौलिकता को विस्तारित करने एवं भारतीय राष्ट्रीयता की सनातनता को पुनर्स्थापित करने वाले इस कानून के विरोधियों को सावधान हो जाना चाहिए। उन्हें गम्भीरतापूर्वक यह सोचना चाहिए कि आखिर वे चाहते क्या हैं? अगर भारत के लोगों (हिन्दुओं) को भारतीय नागरिकता नहीं मिलेगी तो किसको मिलेगी? अस्तु, सरकार का यह कदम स्वागतयोग्य है।  

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