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भारत की आजादी की आंच को तेज करने में भगिनी निवेदिता का था बहुत योगदान।

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28 अक्टूबर को जन्मदिन पर विषेष

डाॅ मनोज जैन

बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी चमक उठी सन 57 में जो तलवार पुरानी थी, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए उक्त पंक्तियां सुभद्रा कुमारी चैहान ने लिखी थी तो कुछ ऐसा ही रासबिहारी बोस ने भगिनी निवेदिता के बारे में कहा था, कि भगिनी निवेदिता के कारण भारत की सूखी हड्डियों में हरकत दिखाई दे रही थी। इससे हम समझ सकते हैं कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में भगिनी निवेदिता का क्या योगदान रहा होगा। भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 के 10 साल बाद 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड में जन्मी निवेदिता का नाम था- मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल। उनका पालन-पोषण इस ढंग से हुआ था कि उनकी मां ने उनको जन्म से पूर्व ही प्रभु ईसा की सेवा में समर्पित कर दिया था। पिता सैम्युअल 32 साल की आयु में ही चल बसे थे, इसलिए परिवार की जिम्मेदारी निवेदिता के कंधों पर आ गई और वह इंग्लैंड में जाकर टीचर बन गई। कुछ समय बाद ही उन्होंने विंबलडन में रस्किन स्कूल नाम से अपना विद्यालय प्रारंभ किया। धर्म को लेकर उनकी तार्किक वृत्ती उन्हें शांत नहीं बैठने देती थी। चर्च की चर्चा से उनके प्रश्नों को समाधान न मिलने से उनकी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। उन्हीं दोनों उन्होंने स्वामी विवेकानंद को सुना और मानों उनके जीवन में आशा की किरण चमक उठी।

एक सभा में स्वामी विवेकानंद बोले आज विश्व को आवश्यकता है कुछ लोगों की जो रास्ते पर खड़े होकर कहें हमारे पास ईश्वर के सिवा कुछ नहीं है बोलो कितने लोग तैयार हैं? यह आवाहन मार्गरेट के मन को छू गया और वह स्वामी विवेकानंद की शिष्या बनने को तैयार हो गई। स्वामी विवेकानंद ने उनको भारत की सेवा का कार्य सौंपा और नाम दिया निवेदिता यानी ईश्वर को निवेदित। स्वामी विवेकानंद ने उनको मिशन देकर कहा बेटी आपके यहां आने का उद्देश्य सेवा और दूसरों की उन्नति करना है उन्हें उपदेश देना नहीं । ज्ञान और बुद्धि में मैं आपसे श्रेष्ठ हूं यह आभास कभी नहीं कराना पश्चिम से प्रभावित अपने विचार उन पर लादना नहीं जिस परिस्थिति में उन्हें रहना है उसे पूरी तरह से अवगत करा देना। सेवा में संलग्न निवेदिता झोपड़ियां तक पहुंचती थी छोटी-छोटी बातों की जानकारी प्राप्त करती थी गुरुदेव रवींद्रनाथ ने पूछा इतनी गहराई में जाकर क्या करना है, उनका उत्तर था स्वदेश की हर बात आत्मसात किए बिना सच्ची देशभक्ति कैसे होगी। गुरुदेव रविंद्रनाथ ठाकुर ने अपनी छोटी बेटी को उनके हाथ में सौंपते हुए कहा इसे अंग्रेजी सिखाओ! बिजली जैसे चमककर निवेदिता बोली क्या आप इसे मैडम बनाना चाहते हैं? इसे एक श्रेष्ठ भारतीय स्त्री बनने दो अपरिपक्व अवस्था में अंग्रेजी सिखा कर उसे बिगाड़ो मत। भारतीयों का भविष्य भारतीयों के हाथों में ही है।

बंग भंग विरोधी आंदोलन में श्री अरविंद घोष को उन्होंने ही प्रेरित किया। प्रखर होकर उन्होंने श्री अरविंद को बंगाल के तत्कालीन हालत बताते हुए कहा आपका जन्म प्राध्यापक की नौकरी करने के लिए नहीं हुआ है बंगाल आप की जन्मभूमि आपको बुला रही है वह बोले मुझे सहयोगी चाहिए। मैं हूं आपकी सहयोगी, इतना ही नहीं जी जान से उनके साथ काम भी किया और अरविंद बाबू के जेल जाने के बाद उनका कर्मयोगिन समाचार पत्र भी समर्थता से चलाया। क्रांतिकारियों की अनुशीलन समिति में उनको जॉन ऑफ आर्क कहा जाता था। उन दिनों देश के गुलाम होने के कारण भारतीय वैज्ञानिकों को भी बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। उन्होंने आचार्य जगदीश चंद्र बसु को उनके शोध प्रबंध के लेखन, प्रकाशन में आर्थिक और वैचारिक मदद की। अंग्रेजो द्वारा उनके अपमान से वह बहुत दुखी भी होती थी। अद्भुत कला प्रेमी होने के कारण प्राचीन भारतीय कलाओं का पुनरुद्धार और पुण्य जीवन उनकी अपार रुचि का विषय था।

श्री अवनींद्र नाथ ठाकुर श्री नंदलाल बसु जैसे कलाकारों को अजंता एलोरा की कला का अध्ययन तथा कला के अंगो का मूल्यांकन करने के लिए उन्होंने ही प्रेरित किया। भगिनी निवेदिता विचारक लेखक और एक्टिविस्ट तीनों ही भूमिका में स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रही थी भारत भूमि को उन्होंने अपनी मातृभूमि कर्मभूमि देवता स्वीकार कर लिया था उनके प्रयासों से बंगाल में स्वदेशी आंदोलन खड़ा हुआ श्री सुरेंद्र बाबू झा उपेंद्र दत्त उनके विशेष सहयोगी थे। उन्हौनें न केवल बंगाल अपितु मद्रास मुंबई पुणे पटना लखनऊ वाराणसी नागपुर आदि स्थानों पर अपने भाषणों से स्वदेशी और राष्ट्रप्रेम की भावना से लोगों को जागरूक किया वह न केवल गरम दल के नेता लोकमान्य तिलक जी के साथ सहयोग करती थी अपितु नरम दल के नेता गोपाल कृष्ण गोखले महात्मा गांधी के साथ ही उतना ही सहयोग करती थी।

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