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    भली लगे या बुरी कुर्बानी का जज़्बा कहां है मियां?

    bakra1इक़बाल हिन्दुस्तानी

    कुर्बानी का अगर कोई सही नमूना देखना हो तो यूपी के गोंडा में देखा जा सकता है। कुर्बानी के त्यौहार को वहां के मुसलमानों ने ‘प्यार बांटते चलो‘ नारे के साथ मनाने का फैसला किया है। उन्होंने वहां अपनी 100 साल पुरानी ईदगाह हिंदू भाइयों की धार्मिक भावना का सम्मान करने को छोड़ने का फैसला किया है।

    ईद उल जु़हा का मतलब कुर्बानी का त्यौहार होता है। इस दिन मुसलमान भाई भैंस बकरा और दुंबा वगैरा की कुर्बानी करते हैं। यानी इन जानवरों को ख़रीदकर या कुछ समय पहले से पालकर ज़िबह करते हैं। हालांकि यह आस्था का मामला है। इसलिये इस पर बहस या तार्किक चर्चा की गुंजाइश नहीं है। लेकिन पिछले दिनों हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गयी थी। इस याचिका मे मांग की गयी है कि अकीदे के नाम पर इस तरह से थोक में पशुओं की हत्या पर रोक लगाई जाये। अभी इस याचिका पर न तो सुनवाई हुयी है और न ही इसको स्वीकारने से मना किया गया है। लगता यही है कि कोर्ट इस पर सुनवाई कर भी लेगा तो शायद रोक लगाने से यह कहकर बचे कि यह धर्म का मामला है।

    जहां तक परंपरा का सवाल है तो कोर्ट ने तमिलनाडू के जलिकट्टू और गणेश पूजा के दौरान मटकी फोड़ने की उूंचाई तय कर दी है। अभी कोर्ट के सामने तीन तलाक और मुस्लिम मर्दों की चार शादियों का मामला भी विचाराधीन है। इसमें द्वंद्व यह है कि एक तरफ कोर्ट को कानून यानी संविधान की रोश्नी में फैसला करना होता है। तो दूसरी तरफ इसमें धार्मिक आस्था की दुहाई देकर तर्कसंगत और न्यायसंगत फैसलों को रोकने को दकियानूसी और यथास्थितिवादी तत्व भरपूर जोर लगाते हैं। अकसर उनकी जीत भी हो जाती है। सवाल यह है कि हज़रत इब्राहीम ने अपने बेटे की कुर्बानी क्यों दी थी? यह अलग बात है कि खुदा ने खुश होकर उनके बेटे की जगह की एक दुंबा ज़िबह करा दिया था।

    हज़रत इब्राहीम ने अपनी आंखों पर इसलिये पट्टी बांध ली थी कि कहीं अपने बेटे के गले पर छुरी चलाते हुए उनके हाथ पुत्रमोह में लरज़ न जायें। यह एक चमत्कार और करिश्मा ही था। लेकिन उस दिन से मुसलमानों ने जानवरों की कुर्बानी की रस्म अपना ली। वे यह भूल गये कि इसके पीछे जो त्याग और बलिदान की भावना थी वह कहां गुम हो गयी? मेरे विचार से सिर्फ जानवर काटना उसको बांटना और खा जाने से कुर्बानी का पूरा फ़र्ज़ अदा नहीं हो जाता। हज़रत इब्राहीम से अल्लाह ने यह भी पूछा था कि अगर मेरी रज़ा यानी खुशी के लिये आप से कोई चीज़ कुर्बान करने की मांग की जाये तो क्या आप कर दोगे?

    हज़रत इब्राहीम ने अपने बेटे की कुर्बानी देने की तैयारी करके यह साबित किया था कि वह अपनी सबसे अज़ीज़ और क़ीमती चीज़ भी अल्लाह की राह में कुर्बान कर सकते हैं। क्या आज का मुसलमान अल्लाह के नाम की दुहाई देने पर अपनी कोई चीज़ कुर्बान करने को तैयार है? अगर उसने वाकई कुर्बानी का असली मतलब और भावना समझ ली होती तो छोटी छोटी चीज़ों के लिये झगड़े फसाद और दंगे नहीं होते। कुर्बानी का अगर कोई सही नमूना देखना हो तो यूपी के गोंडा में देखा जा सकता है। कुर्बानी के त्यौहार को वहां के मुसलमानों ने ‘प्यार बांटते चलो‘ नारे के साथ मनाने का फैसला किया है। उन्होंने वहां अपनी 100 साल पुरानी ईदगाह हिंदू भाइयों की धार्मिक भावना का सम्मान करने को छोड़ने का फैसला किया है।

    दरअसल ईदगाह से पीपल का एक पेड़ लगा है। जिसको ब्रहमबाबा के तौर हिंदू भाई पूजते हैं। यह पेड़ बढ़ते बढ़ते ईदगाह की दीवार तक आ गया है। ईदगाह की दीवार पेड़ के दबाव से कभी भी गिर सकती है। हिंदू भाई इसे पीपल में आस्था के कारण काटने को तैयार नहीं हैं। अब मुस्लिम भाइयों ने अपनी ईदगाह वहां से थोड़ी दूरी पर बनाने पर रज़ामंदी दे दी है। बदले में आपसी मुहब्बत बढ़ाने को हिंदू भाई नई ईदगाह खुद अपने खर्च पर ही बनवा रहे हैं।
    चांद से फूल से या मेरी जुबां से सुनिये
    हर तरफ आपका किस्सा है जहां से सुनिये।

    इक़बाल हिंदुस्तानी
    इक़बाल हिंदुस्तानी
    लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

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