लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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मनोज ज्वाला
भारतीय साहित्य ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ के वैचारिक-सांस्कृतिक अधिष्ठान पर खडा है । यह सत्य से सराबोर है , समस्त विश्व-वसुधा का कल्याण इसका उद्देश्य है तथा इसका स्वरुप सतत सुंदर है ; इस कारण यह सार्वकालिक व सार्वदेशिक ही नहीं , समस्त मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण एवं विविध विषयक चिन्तन-मनन से युक्त है । यह समस्त चराचर जीव-जगत के लिए मंगलकारी व अमंगलहारी है । यहां ईश्वर के इकलौते पुत्र अथवा अल्लाह के एकमात्र पैगम्बर के बनाए-बताए पथ पर चलने की बौद्धिक कूपमण्डुकता नहीं रही है , बल्कि नित नये-नये पथों के अन्वेषण की उन्मुक्तता सदैव रही है ; किन्तु सबका पाथेय एक ही रहा है सत्यम् शिवम् सुन्दरम् । यहां साहित्य में ही नहीं, अपितु अध्यात्म में भी एक वामपंथ की परम्परा कायम रही है । किन्तु , आज आम तौर पर जिस वामपंथ को लोग जानते हैं और यहां जिस वामपंथ की हम चर्चा करने वाले हैं वह पश्चिम से आया हुआ, पूंजीवाद की कोख से जन्मा हुआ एवं साम्राज्यवाद की वैसाखी से विस्तृत हुआ एक ऐसा वाद है ,जो पूरी दुनिया को उसी तर्ज पर लाल झण्डे के नीचे लाना चाहता है , जिस तर्ज पर ईसाई विस्तारवाद सम्पूर्ण विश्व को क्रूस के अधीन कर लेने को उतावला है । दूसरों को अपने अधीन कर लेने की ऐसी मंशा रखने वाला कोई भी वाद कल्याणकारी व शांति-प्रदायक तो हो ही नहीं सकता ; किन्तु आतंक अत्याचार हिंसा व्याभिचार का जन्म इसी तरह के वाद से होता है, इन्हें पोषण संरक्षण भी यही देता है ।
आज सारी दुनिया की सबसे बडी समस्या जो आतंकवाद है उसकी जननी व जनक ईसाइयत व इस्लाम है, तो पालक पोषक यह वामपंथ ही है । आतंकवाद के सारे कारक-विस्तारक तत्व इन तीनों में ही भरे पडे हैं । “ हम ही सही हैं , हम सदैव सही हैं , दूसरे तो सही हो ही नहीं सकते हैं , दुनिया में जो भी बेहतर है सो सब हमारा ही है ; हमारी मानिए , हमें स्वीकार कीजिए , नहीं तो हम आपको मिटा देंगे ” ऐसी सोच व ऐसी उग्र धारणा ही आतंक की उत्पत्ति-व्याप्ति का मूल कारक है , जिसकी वजह से बहुविध अन्याय-अत्याचार बढ रहे हैं, हिंसा व्याप रही है, मानवीय खून बह रहा है , शांति भंग हो रही है और तमाम तरह की अवांछनीयतायें सिर उठा रही हैं । ऐसी सोच व धारणा को वैचारिक सम्बल प्रदान करने वाला यह वामपंथ ही है , जिसने ‘आतंक’ को भी एक ‘वाद’ बना कर बौद्धिक धरातल पर स्थापित कर दिया है । जाहिर है , पूरी दुनिया को एक ही मजहबी झण्डे के नीचे लाने के बावत खून बहाते रहने वाले ईसाइयत और इस्लाम की तरह कोई धार्मिक मजहब नहीं होने के बावजूद यह राजनीतिक वामपंथ भी अन्तर्राष्ट्रीयतावाद नामक साम्राज्यवाद का पोषक और राष्ट्रवाद का शत्रु है । इन तीनों के अन्तर्राष्ट्रीय विस्तारवाद के निशाने पर भारत की राष्ट्रीयता और सनातन धर्म ही है , क्योंकि यही इनके मार्ग में सबसे बडा अवरोधक है । भारतीय साहित्य में जो वामपंथ है सो इसी पृष्ठभूमि पर स्थापित एक तरह का आतंकवाद ही है , जो भारत की सभ्यता-संस्कृति-इतिहास-परम्परा -राष्ट्रीयता-एकता-अखण्डता के मूलोच्छेदन और तत्सम्बन्धी अपनी वैचारिकी को जबरिया स्थापित करने के साधन के तौर पर यहां के साहित्य का अपहरण करने में लगा हुआ है । इस हेतु यह भारतीय साहित्य के आधार वेद-पुराण-पनिषद-रामायण-महाभारत को ही नहीं , भाषा-विज्ञान व व्याकरण के साथ-साथ साहित्यिक लेखन व पठन-पाठन तक को अपने हिसाब से झूठे तथ्य व मित्थ्या सत्य के सहारे विश्लेषित , निर्धारित व स्थापित करते रहता है । खूनी आतंक और हिंसक जेहाद का सफेद झूठ के सहारे समर्थन करने वाला यह वामपंथ ‘सफेद आतंक’ है । यह तथ्य मेरी पुस्तक “ सफेद आतंक ; ह्यूम से माइनों तक” में बडे कायदे से सत्य प्रमाणित हुआ है ।
उल्लेखनीय है कि मुट्ठी भर अंग्रेज इंग्लैण्ड से कई गुणा विशाल भारत पर शासन करने में इसी कारण सफल हो पाए , क्योंकि उनकी सेना और पुलिस में नब्बे प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय ही थे । छल-छद्म की रीति व कुटिल कूटनीति से भारतीय राजाओं-रजवाडों का सहयोग-समर्थन और अंग्रेजी पढे-लिखे लोगों के अंग्रेज-परस्त प्रशिक्षण से निर्मित जन-मन में अंग्रेज-नस्ल की श्रेठता का भाव भर कर यहां शासन व विभाजन करने में सफल रहे वे लोग अब आजाद भारत को भी अपनी उसी नीति से शासित व विभाजित करने में लगे हुए हैं । अब उनके साधन बदल गए हैं । अब वे औपनिवेशिक सेना-पुलिस के भारतीय जवानों का नहीं , बल्कि असैनिक साहित्यिक-अकादमिक संस्थानों के भारतीय ‘बौद्धिक बहादुरों’ का इस्तेमाल कर रहे हैं ।
भारत के प्राचीन शास्त्रों-ग्रन्थों के ईसाई-हितपोषक औपनिवेशिक अनुवाद हों , या आर्यों के पश्चिमी-विदेशी मूल के होने का बेसुरा-बेतुका राग ; नस्ल-विज्ञान का गोरी चमडी की कपोल-कल्पित श्रेठता-विषयक प्रतिपादन हो या संस्कृत को ग्रीक व लैटीन से निकली भाषा बताने वाले भाषा-विज्ञान का अनर्गल प्रलाप ; इन सब प्रायोजित अवधारणाओं को भारतीय जन-मानस पर थोपने और इससे अपना उल्लू सीधा करने में वेटिकन चर्च के पश्चिमी रणनीतिकार भारत के बुद्धिजीवियों का खूब इस्तेमाल करते आ रहे हैं । इसी तरह से लोकतंत्र , समता , स्वतंत्रता , मानवाधिकार , धर्म , सहिष्णुता , असहिष्णुता , आस्था-विश्वास आदि तमाम विषयों को स्वयं के हित-साधन और भारत के विखण्डन की कूटनीति से परिभाषित करने और फिर उस परिभाषा के अनुसार अपनी योजनाओं को हमारे ऊपर थोपने के लिए भी उननें भारतीय बौद्धिक-बहादुरों की ही फौज कायम कर रखी है ।
‘दलित फ्रीडम नेटवर्क’ से सम्बद्ध ऐसे ही एक बौद्धिक-बहादुर का नाम है- ‘कांचा इलाइया’ , जो भारत में मानवाधिकारों की वकालत करते हैं और भारत की प्राचीन भाषा-साहित्य को दलित-अधिकारों के मार्ग में सबसे बडा बाधक बताते हुए ‘संस्कृत’ की हत्या कर देने का हास्यास्पद बौद्धिक प्रलाप उगलते रहे हैं । ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष-२००१ में मानवाधिकार पर आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए संस्कृत की हत्या कर देने के अपने कार्यक्रम का एलान कर चुके कांचा इलाइया नामक यह बुद्धिबाज सनातन वैदिक धर्म को भारत की समस्त समस्याओं का कारण बताने का अभियान चलाते रहा है । वेटिकन चर्च के प्रचार-तंत्र से बहुप्रचारित इसकी पुस्तक- “ ह्वाई आई एम नाट ए हिन्दू ” में हिन्दू धर्म की ऐसी ही अनर्गल व्याख्या की गई है । इस पुस्तक पर कांचा को डी०एन०एफ० ने ‘पोस्ट डाक्टोरल फेलोशिप’ प्रदान किया है, तो भारत में राजीव गांधी फाऊण्डेशन द्वारा इसे प्रायोजित किया गया है । इस पुस्तक में कांचा इलाइया के द्वारा हिन्दू धर्म की तुलना जर्मनी के नाजीवाद से की गई है और इसे आध्यात्मिक फासीवाद के रूप में वर्णित किया गया है । हिटलर की तानाशाही के लिए भी हिन्दू धर्म को जिम्मेवार ठहराया गया है , क्योंकि वह जर्मन तानाशाह बडे शौक से हिन्दू-धर्म के एक प्रतीक-चिह्न (स्वास्तिक) का इस्तेमाल किया करता था और स्वयं को ‘आर्य’ कहा करता था । ‘पोस्ट हिन्दू इण्डिया’ नामक अपनी पुस्तक में कांचा ने हिन्दू धर्म के विरुद्ध एक नस्लवादी सिद्धांत गढते हुए लिखा है कि “ हिन्दू समाज में ब्राह्मण पशुओं से भी बदतर हैं , क्योंकि उनके मामले में पशु-वृति भी अल्प-विकसित है ” । इतना ही नहीं , यह बौद्धिक बहादुर वेटिकन चर्च-पोषित अपनी बौद्धिकता के बूते भारत के बहुसंख्यक समाज में सामुदायिक घृणा का विष-वमन करते हुए दलितों को गृह-युद्ध के लिए भडकाता है और कहता है- “ ऐतिहासिक रूप से अगडी जतियों ने पिछडी जाति के लोगों को हथियारों के बल पर दबाया है , जैसा कि हिन्दू-देवी-देवताओं का स्रोत हथियारों के उपयोग की संस्कृति में जड जमाये हुए है । भारत में गृह-युद्ध की अगुवाई करने की क्षमता दलितों में है , जिन्हें ईसाइयों का भी साथ मिलेगा ; क्योंकि भारतीय दलित ईसा मसिह को सर्वाधिक शक्तिशाली मुक्ति-दाता के रूप में पाते हैं ” । भारत में गृह-युद्ध की परिस्थितियां निर्मित करने और इसके आन्तरिक मामलों में युरोप-अमेरिका के हस्तक्षेप का आधार व औचित्य गढने के बावत वेटिकन-चर्च-पोषित संस्थाओं से दौलत-शोहरत हासिल करते रहने की कीमत पर अपनी बौद्धिकता का डंडा भांजने वालों और सहिष्णुता-असहिष्णुता को उसी ड्ण्डे से मापने वालों में और भी कई नाम हैं ।
रोमिला थापर ऐसा ही एक बहुचर्चित नाम हैं , जिन्हें चर्च- पोषित पश्चिमी संस्थाओं ने परस्पर दुरभिसंधि कर इतिहासकार बना दिया है । वह तथाकथित इतिहासकार बडे जोरदार तरीके से यह लिखती-कहती है कि सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता और भारतीय राज्य-व्यवस्था दबदबा रखने वाले जातीय समूहों द्वारा नियंत्रित दमनकारी उपकरणों के अतिरिक्त कुछ नहीं है , जिन्हें ध्वस्त कर देने की आवश्यकता है ।
इसी तरह से मीरा नन्दा नामक बौद्धिक वीरांगना महिला बायो-टेक्नोलाजिस्ट है , जो प्राचीन भारतीय सभ्यता-संस्कृति, अर्थात सनातन वैदिक धर्म की निराधार निन्दा करने में अपने जैव-प्रौद्योगिकीय ज्ञान का इस्तेमाल करती हुई प्रचारित करती है कि भारतीय संस्कृति विज्ञान-विरोधी है । टेम्पलटन फाऊण्डेशन से दौलत और शोहरत दोनों हासिल करते रहने के एवज में सनातन वैदिक धर्म को येन-केन-प्रकारेन विज्ञान-विरोधी सिद्ध करने का ठेका चला रही यह महिला जब वेदों की वैज्ञानिकता का मुकाबला नहीं कर पाती तब ‘कालिंग इण्डियाज फ्री थिंकर्स’ (भारत के मुक्ति-चेताओं को बुलावा) नामक पुस्तक लिख कर उसमें स्वामी विवेकाननद और दयानन्द पर यह आरोप लगाती है कि उनने हिन्दू-वैदिक धर्म को विज्ञान-सम्मत प्रतिपादित करने का ‘आधारभूत पाप’ किया है ।
भारतीय धर्म-दर्शन-संस्कृति-प्रदर्शक संस्थानों से जुडे हुए भारतीय बुद्धिजीवियों को भी भारत-विरोधी पश्चिमी षड्यंत्रकारी संस्थाओं ने एक तरह से ऊंचे दामों पर खरीद लिया है , जो ‘रंगे सियारों’ की तरह दिखते कुछ हैं और बोलते-लिखते कुछ हैं । महर्षि अरविन्द के भारतीय दर्शन को प्रोत्साहित करने के निमित्त अमेरिका के सैन-फ्रान्सिस्कों-स्थित ‘कैलिफोर्निया इंस्टिच्युट आफ इण्टेग्रल स्टडिज’ में स्थापित एक संकाय से सम्बद्ध अंगना चटर्जी की बौद्धिकता ऐसी ही बिकाऊ माल है , जो भारत की सनातन वैदिक संस्कृति के किसी भी तथ्य को दलितों के दमन का षड्यंत्र प्रमाणित करने और भारत की सरकारी मिशनरियों एवं हिन्दू-संगठनों को अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हननकर्ता सिद्ध करने के लिए अपना ज्ञान बघारते रहती है ।
इस तरह की बौद्धिक जोर-जबर्दस्ती से भारत के आंतरिक मामलों का अनुचित-अवांछित विश्लेषण एक अभियान का रूप लेता जा रहा है , जिसमें भारत की नयी पीढी के विद्यार्थियों और साहित्य के अध्येताओं को भी शामिल किया जा रहा है । विदेशों में पढने वाले भारतीय विद्यार्थियों को इस अभियान में शामिल करने के बावत अमेरिका-स्थित हार्टफोर्ड के ट्रिनिटी कालेज के अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन संकाय निदेशक- विजय प्रसाद काफी सक्रिय हैं , जो अपने कार्यों से यह प्रमाणित करने में लगे हुए हैं कि भारत के दलित-अछूत-आदिवासी अफ्रीका मूल के हैं और सनातन-वैदिक-हिन्दू धर्म फासीवादी व नस्लवादी है, इस कारण भारत में धार्मिक स्वतंत्रता व मानवाधिकार संकटग्रस्त है ।
विदेशी पैसों पर पल रहे इन बौद्धिक बहादुरों की फेहरिस्त में सेंड्रिक प्रकाश , टिमोथी शाह , जान प्रभुदोष , राम पुनयानी , जान दयाल , सीलिया डुग्गर , तिस्ता सितलवाड आदि अनेक नाम हैं , जो जैसे-तैसे यह प्रमाणित करने में लगे हुए हैं कि भारतीय सनातन वैदिक हिन्दू धर्म विषयक साहित्य के कारण भारत में दलितों व अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता तथा उनके मानवाधिकार और लोकतंत्र खतरे में हैं , जिनकी रक्षा के लिए दुनिया की हवलदारी करने वाले अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तक्षेप करना चाहिए ।
अंग्रेजों के ईसाई-विस्तारवाद और नये औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के इस संयुक्त षड्यंत्र का क्रियान्वयन करने वाली फौज में शामिल ‘अभारतीय’ सोच वाले इन साहित्यिक बौद्धिक बहादुरों के ऐसे काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा मेरी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक- “भारत के विरूद्ध पश्चिम के बौद्धिक षड्यंत्र” में विस्तार से दर्ज है ।

One Response to “भारतीय साहित्य में मार्क्सवादी वामपंथ,अर्थात ‘सफेद आतंक’”

  1. ANKUR

    अगर वामपंथ सफ़ेद आतंकवाद है तो आरएसएस भी भविष्य का आतंकवादी संगठन है/ आप उस सहित्य की वकालता कर रहे जिसने हिन्दू धर्म को चार वर्णों में विभाजन जन्म के अधर पर करता हैं/ कोई उनमे से रजा की तरह जीवन जिए और कोई गुलाम और बंधुआ बनके, इसमें कहाँ पर आपको विश्व वसुधा का कल्याण दिख रहा है/ अगर संवेदनाओ से परिपूर्ण है तो कहा चली जाती हैं संवेदनाये जब दलितों और जनजातियों पर अत्याचार होता है ,उस समय चुप्पी क्यों साध ली जाति है / सबसे पहले जरुरत है कि कथनी और करनी में समानताएं हों/ ये आपके गौरक्षक क्या हैं इन्हें आतंकवादी क्यों नहीं कहते आप/आतंकवाद की जननी न इस्लाम हैं ना इसाइयात इसकी जननी है सामाजिक और आर्थिक असमानता और् भेदभाव ये जहा भी रहेगा वहां आतंकवाद पनपेगा / आज छत्तीसगढ़ में लोग हतियार क्यों उठा लिए हैं क्यों की उनके अधिकारों और जमीनों पर सरकार ने पूंजीपतियों के हाथ में बेंच दिया हैं/ आज ओड़िसा की पोंडा जनजाति अपने निवास स्थान को क्यां छोड़ने पर मजबूर हो गई हैं /अगर वाम पंथ ठीक नहीं है तो आप बताएं हमारी समस्यायों की जननी कौन हैं उत्तर होगा द्क्षिन्पंथ विचारधारा जिसने समाज को बाट रखा है/ आप के हिस्साब से मानवाधिकारों की रिपोर्टें क्या गलत हैं / गलत तो होंगी हो क्यों की आप जो अखबार या न्यूज़ चैनल जिससे ये खबरे देखतें हैं वो बिका हुआ है/
    आप लोगों की नजर में जो लोग दमित और शोषितों और वंचितों की बात करता है वो या तो वामपंथी या देशद्रोही साबित हो जाता हैं\
    गृह युद्ध के लिए लोगों को आपका सामाजिक दृष्टिकोण उकसाता हैं, क्यों नहीं आपके पंथ में लोगो को बराबरी के साथ जीने का अधिकार क्यों नहीं है, इन सबको पोषित करता है दक्षिणपंथ/ अभी आपने किसी गाँव में गुजारा किया हैं आपको क्या पता एक और भारत है जो गाँव में बस्ता है/ आप लोगो के बोये जातिवाद के जगहर के कारण मेरे भाई के मर्डर केस में कार्यवाही केवल इसलिए नहीं होती है क्यों की मारने वाला ठाकुर था और केस को पैसे के बल पर दबा दिया जाता है/ पहले सामाजिक न्याय की बात करो फिर आतंकवाद की/

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