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    बिहार : गांवों को चमकाने की क़वायद या लूट खसोट की ?

    निर्मल रानी


                                            बिहार के सन्दर्भ में पिछले दिनों समाचार पत्रों में एक ख़बर इस शीर्षक के साथ प्रकाशित हुई कि ‘अब बिहार के गांव भी बनेंगे वी आई पी’। बिहार के पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी के हवाले से प्रकाशित इस समाचार में बिहार के लगभग आठ हज़ार तीन सौ गांव (पंचायतों) के विकास व उनके सौंदर्यीकरण के लिए एक विस्तृत रूप रेखा पेश की गयी है। इसमें पूरे राज्य की प्रत्येक पंचायतों में पार्क बनाने,खेल के मैदान बनाने,सुरक्षा के दृष्टिगत गांव गांव में सी सी टी वी कैमरे लगाने,छठ घाट विकसित करने व उनका सौंदर्यीकरण करने तथा सामुदायिक शौचालय बनाने जैसी और भी कई योजनाओं को लागू करने की बात की गयी है। मंत्री सम्राट चौधरी ने यह भी बताया कि पन्द्रहवें वित्त आयोग की अनुशंसा के अंतर्गत केंद्र सरकार ने बक़ाया एक हज़ार दो सौ चौवन करोड़ रूपये पंचायती राज विभाग को भेज दिए हैं जबकि तीन हज़ार सात सौ त्रेसठ करोड़ रूपये की धनराशि पहले ही भेजी जा चुकी है। निश्चित रूप से यह समाचार उन लोगों को संभवतः ज़रूर प्रभावित करेगा जिन्होंने अब तक बिहार के गावों के दर्शन नहीं किये हैं। परन्तु मेरे जैसे वे लोग जो बिहार से जुड़े हैं और प्रायः बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में आते जाते रहते हैं उनके लिए यह ख़बर किसी ख़ास उत्साह का कारक नहीं हो सकती। बजाए इसके यह ख़बर ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और सौंदर्यीकरण की कम और लूट खसोट व बंदर बांट के लिए गढ़ी जाने वाली योजना संबंधी ख़बर ज़्यादा प्रतीत होती है।
                                           जिन गांवों को ‘वी आई पी गांव’ बनाने की बात कही जा रही है उनकी वर्तमान  समय में क्या स्थिति है इसका जायज़ा लेना ज़रूरी है। गांव की तो छोड़िये आप बिहार के शहरों की यहां तक कि राजधानी पटना की बात करें तो यहां अनेक इलाक़े ऐसे हैं जिधर से आप का मुंह पर रूमाल रखे या नाक बंद किये बिना गुज़र पाना भी संभव नहीं है। अभी गत वर्ष की ही तो बात है जब पटना की जल  निकासी व्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो गयी थी। लोगों के घरों में पानी घुस गया था। यहां तक कि राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी घुटने घुटने पानी में सपरिवार सहायतार्थ सड़क पर खड़े नज़र आए थे। बस यह उदाहरण ही यह सोचने के लिए पर्याप्त है कि जब राज्य का इतना बड़े नेता व राज्य की राजधानी पटना की वी वी आई पी कॉलोनी का यह हाल है तो राज्य के गावों का वर्तमान में क्या हाल होगा ? आज बिहार के अधिकांश गांव बदहाली के दौर से गुज़र रहे हैं। संभवतः राज्य के किसी भी गांव में जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। हां अनेक गांवों में नालियां व नाले बने ज़रूर देखे जा सकते हैं परन्तु आज या तो वे टूटे फूटे पड़े हैं या उनमें कूड़ा पटा पड़ा है। यानि जिस मक़सद से यह नाले नालियां बनाए गए थे वह क़तई पूरा नहीं हो रहा।
                                          कूड़ा निस्तारण की कोई योजना पूरे राज्य के किसी गांव में नहीं है। परिणाम स्वरूप लगभग हर घर के सामने कूड़े का ढेर लगा है जो बदबू फैलाता रहता है। इन्हीं गंदगी के चलते हर गांव में मक्खी मच्छरों की भरमार है। आज भी गांव के तमाम लोग सड़कों के किनारे खुले में शौच करते हैं। जिसके चलते राहगीरों का गुज़रना तो मुश्किल हो ही जाता है साथ ही दुर्गन्ध के साथ बीमारी फैलने की भी संभावना बानी रहती है। गत वर्ष वर्षा ऋतू में दरभंगा ज़िले व आस पास के कई इलाक़ों में बाढ़ व बारिश का जो पानी गावों में घुस गया था वह आजतक कई ठिकानों पर रुका हुआ है। परिणाम स्वरूप वहां दुर्गन्ध व मच्छर मक्खियों का तो साम्राज्य है ही,साथ साथ ऐसे स्थानों में आम के पेड़ों सहित और भी सभी पेड़ लगातार पानी लगे रहने के कारण सूख चुके हैं। मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने अपने पिछले शासनकाल में ‘हर घर नल जल योजना’ की शुरुआत की थी। यह योजना दरअसल जनहितकारी योजना तो कम भ्रष्टाचार में डूबा हुआ एक तमाशा ज़रूर साबित हुई। इसके अंतर्गत गांव गांव में पानी की प्लास्टिक की वह टंकियां रखी गयीं हैं जो प्रायः लोग अपने मकानों पर जल भंडारण के लिए रखवाते हैं। इसके अलावा प्लास्टिक (फ़ाइबर ) के पाइप बिछाए गए। जो लगने के साथ साथ क्षति ग्रस्त होते जा रहे थे। इन टंकियों में मोटर द्वारा भूमिगत जल  भरा जाता था और उसी की आपूर्ति की जाती थी। आज यह योजना लगभग असफल हो चुकी है। क्योंकि या तो प्लास्टिक पाइप क्षतिग्रस्त हैं या ज़मीन के नीचे से पानी खींचने वाली मोटर्स जल गयी हैं।                                       ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह की योजनाएं जनता की सुविधा के लिए नहीं बल्कि जनता के कर के पैसों की लूट खसोट के लिए ही बनाई जाती हैं। इसी लिए संदेह पैदा हो रहा है कि राज्य के गांवों को चमकाने व उन्हें वी आई पी’ बनाने की जो नई क़वायद एक बार फिर शुरू होने जा रही है वह वास्तव में धरातल पर दिखाई भी देगी या यह भी नेताओं,पंचायत प्रतिनिधियों व अधिकारियों के बीच लूट खसोट का साधन बनकर रह जाएंगी ? सी सी टी वी कैमरे व पार्क बनाने से ज़्यादा ज़रूरी ही कि सुचारु रूप से चलने वाले नाले नालियां बनाए जाएं और जो क्षतिग्रस्त हैं उन्हें ठीक किया जाए। प्रत्येक गांव में कूड़ा निस्तारण की यथोचित व्यवस्था की जाए।  ‘हर घर नल जल योजना’ की पुनः समीक्षा की जाए और इनके पाइप बदल कर लोहे के पाइप बिछाए जाएं तथा जलशोधन के बाद जलापूर्ति की जाए। इसके लिए प्लास्टिक की टंकियां पर्याप्त नहीं बल्कि बड़ी सीमेंटेड टंकियां बनवाई जाएं। और इन सबसे भी अधिक ज़रूरी है कि इन सभी योजनाओं को भ्रष्टाचार से मुक्त रखा जाए और जो भी अधिकारी,जनप्रतिनिधि या ठेकेदार इन जनहितकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार में संलिप्त मिले उसे फ़ौरन जेल भेजा जाए। इसके साथ गांव के लोगों को भी जागरूक किया जाए तथा उन्हें भी गंदगी व सफ़ाई के बीच के अंतर को समझाने के लिए जनसंपर्क अभियान चलाया जाए। यदि धरातलीय स्तर पर यह कार्य नहीं किये गए तो यही समझा जाएगा कि बिहार के गांव को वी आई पी’ बनाने की क़वायद भी दरअसल पिछली योजनाओं की ही तरह लूट खसोट और बन्दर बाँट की ही क़वायद है।   

    निर्मल रानी
    निर्मल रानी
    अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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