लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

महज तेरह दिनों के लिए आयोजित राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए भारत गणराज्य की सरकार पैसे को पानी की तरह बहाने से नहीं चूक रही है। भारत पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि उसके राज में भारत गणराज्य की जनता किस कदर बेहाल हो चुकी है।

कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के राज में मंहगाई आसमान छू रही है और देश के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी मंहगाई के बढने के कारणों को गिनाकर अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। इतना ही नहीं देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पर तीसरी मर्तबा राज करने वाली शीला दीक्षित के राज में मंहगाई ने सारे रिकार्ड तोड दिए हैं, उनके पुत्र सांसद संदीप दीक्षित संसद में संप्रग और राजग सरकार के कार्यकाल में मंहगाई की तुलना कर कांग्रेस की पीठ थपथपाने से नहीं चूकते कि कांग्रेस ने कम मात्रा में मंहगाई को बढने दिया है।

भारत गणराज्य के पूर्व खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने इस मामले में अपना मुंह खोला और कामन वेल्थ गेम्स को सफल न बनाने के लिए कमर कस ली। मणिशंकर अय्यर ने यहां तक कह दिया कि इस तरह के खेलों में हो रही पैसों की बर्बादी दुखद है और कामन वेल्थ गेम्स की सफलता की कामना तो शैतान ही कर सकता है। भारत पर राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का ही एक खेल मंत्री अपने ही साथियों को अगर कटघरे में खडा कर रहा हो तो फिर इस बात में कोई शक शुबहा नहीं रह जाता है कि देश की नाक का सवाल बन चुके कामन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार का घुन लग चुका है और पैसों की बरबादी साफ तौर पर हो रही है।

भारत ने इसकी मेजबानी 2003 में हासिल कर ली थी। कहा जा रहा है कि कनाडा इस खेल को हासिल करने वाला सबसे शक्तिशाली दावेदार था। कनाडा ने कामन वेल्थ गेम्स के लिए अपने शहर हेमिल्टन में प्रस्तावित तैयारियों का खाका बनाकर ही पेश किया था, किन्तु पैसे की ताकत थी कि इसे हिन्दुस्तान की गोद में डाल दिया गया।

खबरों के अनुसार भारत में इस आयोजन को हासिल करने के लिए अपने देश की जनता का पेट काटकर खजाना विदेशी खिलाडियों पर लुटाने में कोई कसर नहीं रखी। कामन वेल्थ गेम्स पाने के लिए दिए गए प्रलोभन में यह बात कही गई थी सभी खिलाडियों को विलासितापूर्ण लग्जरी होटल में ठहराकर उन्हें शानदार शोफर ड्रिवन कार मुहैया करवाई जाएंगी। इसमें भारत की ओर से जो पक्ष रखा गया उसमें कहा गया था कि पांच हजार दो सौ खिलाडियों और अठ्ठारह सौ अधिकारियों इस तरह कुल सात हजार लोगों को यात्रा के लिए 48 करोड रूपए का ग्रांट दिया जाएगा। इस वादे के करने से भारत को बोली के दौरान ही 137 करोड रूपए देने पडे थे।

भारत में खेलों की स्थिति क्या है यह बात किसी से छिपी नहीं है, पर पता नहीं क्यों भारत सरकार ने इस आयोजन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। भारत सरकार ने अपने देश में खिलाडियों को प्रोत्साहित करने के बजाए इस आयोजन में प्रतिभागी छः दर्जन देशों में प्रत्येक देश के खिलाडी को 33 करोड 12 लाख रूपए की राशि महज एथलीट ट्रेनिंग की मद में ही मुहैया करवा दी थी। इनमें एसे देशों का भी शुमार है जिनसे महज तीन या चार खिलाडियों के ही आने की उम्मीद है।

सबसे अधिक आश्चर्य का विषय तो यह है कि हजारों करोड रूपयों में इस तरह सरेराह आग लगाई जा रही है और विपक्ष में बैठी भाजपा के साथ ही साथ बात बात पर लाल झंडा उठाने वाले वाम दल बस हल्की सी चिल्लाहट कर ही विरोध जता रहे हैं। विपक्षी दलों का कमजोर विरोध इस ओर इशारा कर रहा है कि वे भी प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इस भ्रष्टाचार की गंगा में तबियत से डुबकी लगा रहे हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य का खेल मंत्री यह स्वीकार कर रहा है कि कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर बहुत कुछ गडबड हुआ है। भारत गणराज्य में राजनैतिक गतिविधियों के केंद्र के साथ ही साथ केंद्र सरकार का मुख्यालय भी दिल्ली ही है। दिल्ली में ही हो रहे हैं कामन वेल्थ गेम्स। जब सब कुछ दिल्ली में हो रहा है फिर कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों में पिछले तीन चार सालों से गफलत चल रही है, और गेम्स के एन दो माह पहले देश के खेल मंत्री अपनी लाचारगी जाहिर करते हुए कहें कि अब कुछ नहीं हो सकता है, किन्तु इसमें घालमेल तो जमकर हुआ है।

भारत के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और पर्दे के पीछे से कठपुतली नचाने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के लिए यह शर्म की ही बात कही जा सकती है कि कामन वेल्थ गेम्स अभी आरंभ नहीं हुए हैं, और जो तैयारियां उनकी नाक के नीचे हो रही थीं, उन तैयारियों की जांच सीबीआई के हवाले है। इतना ही नहीं खेल मंत्री एम.एस.गिल स्वयं इन तैयारियों की जांच के लिए सीएजी से भी गति बढाने का आग्रह कर रहे हैं।

क्या इस आयोजन समिति के कोषाध्यक्ष अनिल खन्ना का त्यागपत्र ही पर्याप्त आधार नहीं है कि विपक्ष इस मामले में संसद में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को कटघरे में खडा कर दे। देश भर में आंदोलन इस बात को लेकर चलाए कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के नेतृत्व में देश का तीस हजार करोड रूपए से अधिक का धन फालतू ही जाया करवा दिया गया है। खन्ना पर आरोप था कि उन्होंने अपने पुत्र को सिंथेटिक सरफेस का ठेका दिया था। विपक्ष की खामोशी से मिली जुली नूरा कुश्ती की बू ही आती है।

वैसे एक बात अब तक स्थापित हो चुकी है कि खेल चाहे जो भी हों, इनके आयोजन में देश को हमेशा ही घाटा उठाना पडा है। मामला चाहे एशियाड का हो, ओलंपिक या कानमनवेल्थ का हर बार देश को नुकसान ही झेलना पडा है। भारत की सरकारें वैश्विक छवि बनाने के लिए आवाम ए हिन्द के मुंह से निवाले छीनकर इसे विलासिता भरा भोजन में तब्दील कर सोने की थाली में इसे विदेशियों के सामने परोसने से नहीं चूकती है, पर देश की अधनंगी भूखी जनता के हिस्से में आखिर आता क्या है?

अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने जब इस आयोजन को हासिल किया था तब इसके लिए प्रथक से बजट 1899 करोड रूपए का रखा गया था, जो अब सरकारी तौर पर लगभग पांच गुना बढ गया है, किन्तु अगर संपूर्ण आहूति के साथ देखा जाए तो यह बजट तीस हजार करोड रूपए से अधिक होने का अनुमान लगाया जा रहा है। किसे सच माना जाए किसे झूठ यह बात समझ से ही परे है।

दिल्ली राज्य के मुख्य सचिव कहते हैं कि अब तक निर्माण पर महज 13 हजार 350 करोड रूपए ही खर्च किए गए हैं। वहीं दूसरी ओर सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि दिल्ली सरकार के वित्त मंत्री 2006 में घोषणा कर चुके हैं कि कामन वेल्थ गेम्स के निर्माण पर 2006 तक 26 हजार 808 करोड़ रूपए फूंके जा चुके हैं। 2003 में कहा गया था कि स्टेडियम निर्माण में महज डेढ सौ करोड रूपयों का खर्च ही प्रस्तावित है, किन्तु अब तक इस मद में लगभग चार हजार करोड रूपयों में आग लगाई जा चुकी है।

केंद्रीय खेल मंत्रालय चाहे जो कहे पर इन गेम्स के लिए वह भी अपनी पोटलियों के मुंह तबियत से खोल रहा है। खेल मंत्रालय ने 2005 – 2006 के वित्तीय वर्ष मंे इस आयोजन मद में साढे पेंतालीस करोड रूपए की राशि आवंटित की थी। यह रकम पिछले वित्तीय वर्ष में छः हजार दो सौ पेंतीस गुना बढकर 2 हजार 883 करोड रूपए हो गई। रही केंद्र सरकार की बात तो केंद्र सरकार ने इस साल कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों की मद में दो हजार 69 करोड रूपयों का आवंटन दिया है। दिल्ली सरकार ने खेलों के लिए दो हजार एक सौ पांच करोड रूपए का आवंटन दिया है।

सरकार और जनता को भटकाने के लिए आयोजन समिति का कहना है कि महज तेरह दिनों के इस आयोजन में आयोजन समिति को सत्रह सौ अस्सी करोड रूपए की आय होना अनुमानित है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) आयोजन समिति की इस राय से इत्तेफाक कतई नहीं रख रहा है। सीएजी का कहना है कि यह आंकडा बढा चढा कर बताया गया है। आवंटन और व्यय मे ंसरकारी आंकडों में असमानता ही साफ तौर पर जाहिर करती है कि खेल खेल में पैसों का तबियत से खेल किया गया है।

खेल के नाम पर अंधाधुंध पैसा बहाकर विश्व स्तर पर अपनी छवि बनाने का काम सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है जिसने भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज किया है। इसके साथ ही साथ कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर एक दशक से अधिक समय से विराजमान सोनिया गांधी ही एसा जादू दिखा सकतीं हैं कि भारत गणराज्य में जनता अधनंगी, भूखी, प्यासी तरसे और खेलों के नाम पर कांग्रेस से नेताओं और उनसे जुडे कारिंदे करोडों कमाकर मौज उडाएं और भारत गणराज्य का कानून उन्हें अपनी जद में लेने में असहज महसूस करे। देश की पुलिस इन भ्रष्टाचारी, दुराचारियों को सलाम ठोके और गरीब गुरबों को हवालात और जेल की हवा खिलाए।

One Response to “खेल खेल में अरबों का खेल”

  1. thanthanpal

    भ्रष्ट्राचार का भांडा-फोड़ होनेके बाद भी सरकार घर पर बारात आई देश की बदनामी मत करो ये बेशर्मिसे
    कह रही है ये शर्म की बात है
    आज सामान्य नागरिक के खिलाफ बहोत सारे Non-Bailable Warrants के कानून बना रही है !डोक्टर पर हमला कीया , पेपर वाले पर हमला किय तो उन्हें कुछ नही मगर COMMON MAN को नॉन बेलेबल कानून के तहत जेल में डाला जाता है! मगर नेहरू के जमानेसे भ्रष्ट्राचार के खिलाफ सिर्फ चर्चा की जाती है! कोईभी सरकार चाहे वो कांग्रेस या भाजपा भ्रष्ट्राचार, भूखंड माफिया , बेईमानी रिश्वतखोरी इन मामालो के खिलाफ गेर जमानती कानून Non-Bailable Warrants क्यों नही बनाना चाहती. मेरे ख्याल से सरकार को कांही ये डर तो नही की यदि यह कानून बना तो सब राजकीय नेता जेल जायेंगे तो सरकार कोन चलाएगी . सम्पादकजी में आपसे विनंती करता हूँ की आप जनमत का दबाब सरकार पर डालके भ्रष्ट्राचार के खिलाफ Non-Bailable Warrants बनाने का काम करे

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