लेखक परिचय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मीणा-आदिवासी परिवार में जन्म। तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष बाल-मजदूर एवं बाल-कृषक। निर्दोष होकर भी 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे। जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! 20 वर्ष 09 माह 05 दिन रेलवे में मजदूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, नक्सलवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म, दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक उत्पीड़न सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्लेषक, टिप्पणीकार, कवि, शायर और शोधार्थी! छोटे बच्चों, वंचित वर्गों और औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (BAAS), राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स एसोसिएशन (JMWA), पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा/जजा संगठनों का अ.भा. परिसंघ, पूर्व अध्यक्ष-अ.भा. भील-मीणा संघर्ष मोर्चा एवं पूर्व प्रकाशक तथा सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)।

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-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

इस समय भाजपा अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है। इसलिये अब हम भारतीयों को चाहिये कि धर्म का मुखौटा पहनकर देश को तोडने वाली भाजपा, संघ, विश्व हिन्दू परिषद आदि के नाटकीय बहकावे में नहीं आना है और मुसलमानों को इनके उकसावे में आकर अपना धैर्य नहीं खोना है। अन्यथा ये धर्मविरोधी संगठन 24 सितम्बर को इस देश के सौहार्द को बिगाडने में कोई कोर कसर नहीं छोडेंगे। विश्वास करें, इनके साथ केवल देश के 1 प्रतिशत लोग भी नहीं हैं। शेष लोगों को तो ये मूर्ख बनाकर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकरकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं! अत: हमें भाजपा को नहीं, बल्कि हर हाल में भारत को और भारतीयों को बचाना है।

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जब-जब भी और जहाँ-जहाँ पर भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता में रही हैं। उसके नेतृत्व ने देश और समाज को मूर्ख बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी है। केवल इतना ही नहीं, इनके गुर्गे (मन्त्री भी) जो संघ एवं विश्वहिन्दू परिषद से आदेश प्राप्त करते हैं, हिन्दुत्व के नाम पर हिन्दू समाज की पिछडी और छोटी जाति के लोगों को मुसमानों के सामने करके अपनी लडाई लडते रहते हैं, जबकि मोदी, तोगड़िया और आडवाणी जैसे तो वातानुकूलित कमरों में आराम फरमाते रहते हैं।

इस बात को तो देश-विदेश के सभी लोग जानते हैं कि गुजरात में हिन्दुओं के हाथों मुसलमानों का कत्लेआम करवाया गया, लेकिन इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि जिन हिन्दुओं के हाथों मुसलमानों का कत्लेआम करवाया गया, वे कौन थे और उनकी वर्तमान दशा क्या है? गुजरात के दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी एवं पिछडी जाति के लोगों के घरों में स्वयं भगवा ब्रिगेड के लोगों द्वारा आग लगाई गयी थी। अनेकों हिन्दुओं को इस आग के हवाले कर दिया गया और बतलाया गया कि मुसलमानों ने हिन्दुओं को जला दिया है। जिससे आक्रोशित होकर इन भोले-भाले अशिक्षित हिन्दुओं ने अनेक निर्दोष मुसलमानों के घरों में आग लगा दी। अनेकों को मौत के घाट उतार दिया।

आज ये गरीब और बहकावे में आने वाले आदिवासी हिन्दू या तो जेल में बन्द हैं या जमानत मिलने के बाद कोर्ट में पेशियाँ दर पेशियाँ भुगतते फिर रहे हैं। इन्हें हिन्दुत्व के नाम पर मुसलमानों के विरुद्ध भडकाने वाले कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आते हैं।

हिन्दुत्व के नाम पर संघ शाखाओं में हाथियारों के संचालन का प्रशिक्षण प्रदान करके सरेआम आतंकवाद को बढावा दिया जा रहा है। तोगड़िया त्रिशूल और भाला बांट रहे हैं। संघ से जुडे अनेक लोग अनेक आतंकवादी घटनाओं में पकडे जा चुके हैं। जिन्हें बचाने के लिये संघ एवं भाजवा वाले इसे सोनिया सरकार की चाल बतला रहे हैं।

बस यात्रा के बहाने पाकिस्तान से दोस्ती का नाटक खेलने वाले पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की अदूरदर्शिता एवं देश विरोधी नीति के चलते हजारों सैनिकों को कारगिल में मरवा दिया। हजारों सैनिकों को हमारी ही धरती पर मारगिराने वाले पाकिस्तानियों को वापस पाकिस्तान में सुरक्षित चले जाने की लिये वाजपेयी सरकार ने वाकायदा सेना को चुप रहने एवं पाकिस्तानियों पर आक्रमण नहीं करने का आदेश दिया था। इसके बाद लम्बे समय तक आर-पास की लडाई की बात का नाटक करके हिमालय की ऊँची बर्फीली की चोटियो पर हमारे सैनिकों को तैनात करके अनेक सैनिकों को बेमौत गल-गल कर मर जाने को विवश कर दिया।

इसके बाद भी भाजपा, संघ और विहिप द्वारा बेशर्मी से प्रचारित किया गया कि वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने कारगिल में पाकिस्तान पर विजय प्राप्त की। इसी प्रकार से हजारों करोड डालरों से भरे बक्सों के साथ कन्धार में दुर्दान्त आतंकियों को छोडकर आने वाले वाजपेयी सरकार के विदेश मन्त्री जसवन्त सिंह को जिन्ना का गुणगान करने पर पहले तो बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन जैसे ही पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शैखावत का निधन हुआ तो राजपूत वोटों को लुभाने के लिये बिना शर्त वापस बुला लिया गया।

मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री हर साल पांच सितम्बर को शिक्षकों के पैर पखारते (धोते) हैं और इस बात का नाटक करते हैं कि भाजपा के राज में गुरुओं का सर्वाधिक सम्मान होता है। जबकि सच्चाई को जानना है तो गत शिक्षक दिवस से ठीक पूर्व वेतन नहीं मिलने के चलते शिक्षक की मौत के लिये जिम्मेदार मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री की असली तस्वीर को ब्लॉग लेखक श्री अजीत ठाकुर के निम्न समाचार से समझा जा सकता है।

“होशंगाबाद जिले की पिपरिया तहसील के ग्राम मटकुली में एक व्यक्ति की मौत हो गई। ये कोई साधारण मौत नहीं है, ये मौत करारा तमाचा है, हमारे शिक्षातंत्र पर और हमारी व्यवस्था की भयानकतम असंवेदनशीलता का नमूना, ये एक शिक्षक की मौत है। चार महीने से वेतन नहीं मिल पाने की वजह से बीमार सहायक अध्यापक हरिकिशन ठाकुर ने बेहतर इलाज के अभाव में दम तोड दिया। इनकी मौत के 6 दिन बाद ही इनका परिवार भूखे मरने की नौबत में है। ये उस देश में हुआ है, जहाँ गुरु को गोविन्द से बडा बताया गया है, जहाँ पर एक दिन अर्थात् 5 सितम्बर शिक्षक दिवस शिक्षको को समर्पित है। ये उस प्रदेश में हुआ जहाँ के माननीय मुख्यमंत्री जी (शिवराज सिंह चौहान) शिक्षक दिवस पर शिक्षको के पैर धोकर उनका सम्मान करते हैं। इस असंवेदनहीन व्यवस्था में हम कैसे किसी द्रोण या चाणक्य (के पैदा होने) की उम्मीद कर सकते हैं और जब द्रोण और चाणक्य नहीं होंगे तो अर्जुन और चन्द्रगुप्त की उम्मीद तो बेमानी है।”

केवल इतना ही नहीं देश के लोगों को इस बात को भी ठीक से समझ लेना चाहिये कि-

कश्मीर की वर्तमान दु:खद स्थिति के लिये भी प्राथमिक तौर पर ये ही कथित हिन्दुत्ववादी आतंकी ताकतें ही हर प्रकार से जिम्मेदार हैं।

तत्कालीन कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले के लिये भी इन्हीं के विचार जिम्मेदार थे।

इन ताकतों को इस बात से बखूबी पहचाना जा सकता है कि पहले तो इन्होने भारत में कश्मीर के विलय का ही विरोध किया था और तत्कालीन कश्मीर सरकार पर नेहरू के कूटनीतिक दबाव कारण विलय सम्भव हो भी गया तो इनको विलय का तरीका ही नहीं सुहाया और कश्मीर में साम्प्रदायिकता की नफरत का बीज बोने के लिये इनके नेताओं ने तरह-तरह के नाटक किये गये। जिनके कारण कश्मीर से हजारों पण्डित बेघर हो गये और इस पर भी तुर्रा ये कि ये अपने आपको राष्ट्रवादी कहते हैं। अखण्ड भारत की बात करते हैं।

देश को तोडने के लिये कुटिल चालें चलने में माहिर ये अनीश्वरवादी हिन्दुत्व के ठेकेदार, ईश्वर के नाम पर 1947 से भारत के भोले-भाले हिन्दुओं को लगातार बहकाने और उकसाने के अपराध में संलिप्त हैं।

भाजपा की पूर्व मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे ने राजस्थान में शराब, शबाब और जमीन बेचकर भ्रष्टाचार को बढावा देने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी थी और राजस्थान को कई दशक पीछे धकेल दिया। हर राज्य में इनकी करनी और कथनी में धरती आसमान का अन्तर स्पष्ट नजर आता है। इनका एक मात्र कार्य है किसी भी प्रकार से समाज में अमन-शान्ति और भाईचारा बिगडा रहे, जिससे ये अपनी राजनीति की रोटियाँ सेकते रहें।

यह है असली चेहरा-भाजपा और संघ के संस्कृति और राष्ट्रवादी चरित्र का।

अब जबकि 24 सितम्बर को अयोध्या-बाबरी भूमि विवाद पर मालिकाना हक का निर्णय सुनाये जाने की तारीख घोषित हो चुकी है तो भाजपा, आरएसएस एवं विश्व हिन्दू परिषद तथा इनके अनुसांगिक संगठनों की ओर से हिन्दुत्व के नाम पर समाज को साम्प्रदायिकता की आग में धकेलने की पूरी तैयारी शुरू की जा चुकी है। मोबाईल पर मैसेज के जरिये लोगों को उद्वेलित करके भडाया जा रहा है और जैसे ही मौका मिलेगा, ये देश के माहौल को बिगाडने के लिये कुछ भी करने को तैयार बैठे हैं।

जबकि आम लोगों को इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि भाजपा एवं इसके समर्थक जिस हिन्दुत्व को मानते हैं, उसमें ईश्वर को ही नकारा गया है। इनके आदर्श हैं सावरकर जो ईश्वर की सत्ता में कतई भी विश्वास नहीं करते, तब ही तो इनके लिये निरीह गाँधी का वध गर्व की बात है।

इस समय भाजपा अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है। इसलिये अब हम भारतीयों को चाहिये कि धर्म का मुखौटा पहनकर देश को तोडने वाली भाजपा, संघ, विश्व हिन्दू परिषद आदि के नाटकीय बहकावे में नहीं आना है और मुसलमानों को इनके उकसावे में आकर अपना धैर्य नहीं खोना है। अन्यथा ये धर्मविरोधी संगठन 24 सितम्बर को इस देश के सौहार्द को बिगाडने में कोई कोर कसर नहीं छोडेंगे। विश्वास करें, इनके साथ केवल देश के 1 प्रतिशत लोग भी नहीं हैं। शेष लोगों को तो ये मूर्ख बनाकर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकरकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं! अत: हमें भाजपा को नहीं, बल्कि हर हाल में भारत को और भारतीयों को बचाना है।

51 Responses to “भाजपा को नहीं, भारत को बचाना है!”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    – विनम्रता से बोला झूठ सच नहीं हो जाता.
    – विनम्रता से फैलाया घृणा और विद्वेष प्रशंसनीय नहीं हो जाता.
    – देश और समाज में विघटन के बीज विनम्रता से बोने वाला व्यक्ती सज्जन नहीं हो जाता.
    ** डा. मीना जी हिन्दू हित में काम करने वाले हर संगठन और व्यक्ती के प्रति अत्यधिक घृणा और विद्वेष से भरे हुए हैं. हज़ारों ‘अजा’ और ‘अजजा’ के लोगों को बराबरी का और आदर पूर्ण व्यवहार मिलते मैंने संघ में स्वयं अपनी आँखों से देखा है.
    ** अनेक वर्षों के अनुभव और अध्ययन से जाना है की संघ के लोगों ने प्राकृतिक आपदाओं से उजड़े हज़ारों मुस्लिमों, ईसाईयों के लिए भी मकान, तम्बू, भोजन, वस्त्र और अन्य सहायता उसी प्रकार दी जिस प्रकार से हिन्दुओं को.
    ** जातिवाद या छुआ-छूत के पक्ष में एक शब्द भी कभी किसी संघी को बोलते नहीं सुना. किसी संघी को किसी के साथ अस्पृश्यता का व्यवहार करते नहीं देखा.
    ## एक बाल्मिकी स्वयंसेवक का १८-२० साल बाद मुझे पता चला की वह
    बाल्मिकी है. उसके साथ सभी संघी समानता का व्यवहार करते देखे.
    ** जो लोग भारत के विरुद्ध प्रचार और काम करते हैं, केवल उन्हीं के विरोध में संघ वालों को बोलते और काम करते मैनें देखा है.
    ### ऐसे में डा. मीना जी संघ के बारे में जो विष वमन करते रहते हैं, क्या उससे नहीं लगता की वे किसी ख़ास ”मिशन” के अंतर्गत ऐसा कर रहे हैं? प्रो. मधुसुदन जी उनसे अनेकों बार कह चुके हैं की वे संघ के बारे में तथ्यों को जानें. पर वे शायद सच को जानते हैं पर उन्हें ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ‘ को बदनाम करने के अपने अजेंडे पर काम करना ही है. या यूँ कहें की उन्हें समाज में घृणा और विद्वेष के बीज बोकर अपने किन्ही गुप्त उद्देश्यों की पूर्ती करनी है.
    यदि ऐसा नहीं तो वे सी.आई.ए. के आसानी से एजेंट बनाने वालों( नियोगे कमीशन रपट), आतंकवाद फैलाने वालों, देश की सेनाओं पर गोली चालाने वालों के विरुद्ध क्यों एक शब्द नहीं बोलते और समाज को जोड़ने के लिए काम करने वाले संगठनों के विरुद्ध बहुत बोलते हैं. तो कुछ दाल में काला है न ?
    * अतः ऐसे प्रयासों से और ऐसे लोगों से सावधान रहने की ज़रूरत है.
    *** सम्पादक महोदय से मेरा निवेदन है कि किसी के दबाव में आकर मेरी टिप्पणी को हटाने से पहले ‘ संघ’ जैसे प्रखर देशभक्त संगठन को बदनाम करने वालों की तिप्पन्नियों को हटायें और उन्हें खेद प्रकाश के लिए कहें ***

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    • डॉ. महेश सिन्‍हा

      डॉ महेश सिन्हा

      राजेश जी दाल में काला नहीं पूरी दाल ही काली है , इनने तो प्रवक्ता पर इल्जाम और धौंस लगाने में भी देर नहीं की । इन का कहना है की एक लेख ये दस जगह छापते हैं । पता नहीं इस बात पर प्रवक्ता का ध्यान गया या नहीं ।
      सविधान के ज्ञानी पुरुष कल आए फैसले पर भी अपने विचार प्रकट करें । इनहोने तो हिन्दू आस्था और मान्यताओं को ही नकारा है । हिन्दू धर्म में ही इतनी सहिष्णुता है जो ऐसे लोगों को भी अपने बीच का मानती है ।
      इनके विचारों के लिए एक ही शब्द उचित है – “मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग”

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  2. निरंकुश आवाज़

    आरदणीय श्री सुनील पटेल जी ने अपनी टिप्पणी में श्री श्रीराम तिवारी जी को कुछ स्पष्टकीरण दिया है, जिसकी अन्तिम पंक्ति पर मैं श्री पेटल जी से संवाद स्थापित करने का आग्रह करते हुए विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि बन्धु जिन संघियों के कारण हिन्दू ही, हिन्दू धर्म को त्यागने को विवश हो रहे हैं, वे किसी गैरधर्मी को हिन्दू बनाने की सोच भी कैसे सकते हैं।

    आज यदि कोई हिन्दू अपने धर्म को त्यागकर अन्य धर्म को स्वीकार करता है तो उसके पीछे 99 प्रतिशत कारण हिन्दुत्व की अवधारणा को लोगों पर जबरन थोपने वाले आतंकियों के अत्याचार होते हैं।

    अत: आदरणीय श्री पटेल जी यह तर्क ही अपने आप में बेमानी है कि क्या किसी संघी ने किसी अन्य धर्मावलम्बी को कभी हिन्दू बनाया?

    और भी बहुत सी बातें हैं, जिन पर समय आने पर आपसे संवाद करने की इच्छा है। आशा है कि आप और प्रवक्ता की ओर से अवसर मिलेगा।

    शुभकामनाओं सहित
    डॉ. पुरुषोत्तम मीना निरंकुश

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  3. Ashwani Garg

    Purushottam Meena, a self declared judge, seems to know of internal strategies of BJP, VHP and RSS which others don’t. He either has an insights that others lack or is a mind reader.

    I am yet to come across a more useless article than this one. Writer seems to have no knowledge of how social institutions work. This article is not even worth publishing. I don’t know how Pravakta published this article which is completely devoid of any logic.

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  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    बंधु श्री. डॉ. मीणा जी, आप के आदरयुक्त वचनों के लिए धन्यवाद। उसके योग्य कुछ करने के लिए मैं विश्वास दिलाता हूं।
    (१) १५ से १९ सितंबर तक मैं एक सम्मेलन में सक्रिय रूपसे व्यस्त हूं। वहांसे लौटने के बाद आपसे विचार-विमर्श करूंगा।
    (२)उपर उपर से ही पढने पर मैं कहता हूं; कि, विचारणीय बिंदुओं से युक्त आपका प्रत्युत्तर पढकर, उसपर कुछ मेरी जानकारी और संपर्क के आधारपर कार्यवाही करनेका मन बनाया है।
    (३) मैं निश्चित रूपसे कह सकता हूं, और संघके विकास के इतिहाससे जानता भी हूं, और मेरा गत १५-२० वर्षॊंका अधयन भी जिसको सत्यापित करता है, वह सत्य यह है; == कि “संघ एक वर्धिष्णु संगठन है।”=== और सच्चे अर्थ में राष्ट्र का सर्व स्पर्शी, सर्व समन्वयी कल्याण चाहता है।=== साथ में, उसने समय समय पर उत्क्रांतिशील, और व्यवहार्य निर्णयभी लिए हैं। संघके आयाम भी विस्तरित होते रहे हैं।
    आपके विचार भी किसी भी स्तर तक पहुंचाने की यंत्रणा से भी अनभिज्ञ नहीं हूं।

    शेष मैं आपको २० सितम्बर को वापस आने पर लिखूंगा।

    Reply
  5. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    यहां मीणा सहाब ने २१ बिन्दू दिये है अगर ये खुद एनके दिमाग की उपज होते तो मै सभी का बिन्दु वार खण्डन कर देता,लेकिन ये सारे के सारे इन्हौंने एधर उधर के कम्युनिष्ट और देश विघातियो लेखको के लेख से लेकर केवल टाएप किये है जैसे पहले पुरा लेख छापा था,तब ही मेने दुसरे लेख को कोपी किया था,इन सहाब को वास्त्विक जिग्यासा होति संघ के बारे में तो जाकर ये शाखा जरुर देखते,इनके घर के ५०० मीटर दायरे मे लगती होगी,लेकिन इन्हौने सारे विचार अपने पुर्वागर्ह से और अपनी दुकानदारी चलाने के लिये रख छोडे है,उसका कोयी क्या कर सकता है??विलियम जोण्स नामक एक विदेशि ने “आर्य” परिवार की भाषा की अवधारणा को जन्म दिया था,जिसे बाद मे मैक्स मुलर ने “आर्य जाती” का बनाया जिस पर आधारित होकर जर्मनी के हिटलर ने जमर्न जाती को आर्य सिध करने के लिये हत्याये की थी अब ये सहाब यहुदियो और आर्य को एक साथ जोड कर क्या सिध करना चाहते वो तो ये ही जाने पर सत्य यह ही है जब यहुदी के बाप भी नंगे घुमते तब भारत मे विशाल और समर्ध समाज जीवित था जिसको जितने के लिये दल के दल बर्बर जातिया आयी थी.
    अपने आप को ९८% हिन्दुओ का नेता मानकर फ़तेवे जारी करने वाले इन सहाब को मै जरा थोडि गणित बताता हुं,गौर से सुनियेगा,संघ के स्वंयसेवको की संख्या भारत मे ८० लाख है अभी{सकिर्य} अगर निश्किर्य हो चुके स्वंय्सेवको को जोडे तो ये संख्या पहूचति है १.५ करॊड केवल स्वयंसेवक,फ़िर एतने सारे संघठन उनको जोडा जाये तो ३ करॊड ज्यदा,कुल हुवे ४.५ करॊड,अब उनके परिवारो को जोडो तो,सम्ख्या पहुचती है १० करॊड अब संघ से सहानुभुती रखने वाले प्रत्यक्ष जुडे हुवे गैर कार्य्कर्ता होते है ५ करोड और,अब सहाब गिनति करो,5+४.५+१०=19.5 करॊड,अभि तो मेने सामन्य जनता का नाम भी नही लिया है जो संघ को बहुत ज्यदा समर्थन करती है,तब सहाब ये २% का फ़िगौरे कहा से लाये??१० जन पथ से??या पोलित ब्युरो से??
    संघ केवल एक जाती को मानता है और वो है हिन्दु जाती,बाकि सब बातें जाननि हो तो संघ की शाखा आयिये चार-पांच साल देखिये फ़िर चाहे तो अपनि जो धारणा रखे,लेकिन असत्य का प्रचार करना अपने आप मे भी एक अपराध ही है,शेष सभी बाते बकवास है जिनका जवाब देना भी आपके उस मकसद को पुरा करता है जिस मकसद से आपने ये छापा है,यानी कि अपनी गोटि फ़िट करना………………………………

    Reply
  6. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    यहां मीणा सहाब ने २१ बिन्दू दिये है अगर ये खुद एनके दिमाग की उपज होते तो मै सभी का बिन्दु वार खण्डन कर देता,लेकिन ये सारे के सारे इन्हौंने एधर उधर के कम्युनिष्ट और देश विघातियो लेखको के लेख से लेकर केवल टाएप किये है जैसे पहले पुरा लेख छापा था,तब ही मेने दुसरे लेख को कोपी किया था,इन सहाब को वास्त्विक जिग्यासा होति संघ के बारे में तो जाकर ये शाखा जरुर देखते,इनके घर के ५०० मीटर दायरे मे लगती होगी,लेकिन इन्हौने सारे विचार अपने पुर्वागर्ह से और अपनी दुकानदारी चलाने के लिये रख छोडे है,उसका कोयी क्या कर सकता है??विलियम जोण्स नामक एक विदेशि ने “आर्य” परिवार की भाषा की अवधारणा को जन्म दिया था,जिसे बाद मे मैक्स मुलर ने “आर्य जाती” का बनाया जिस पर आधारित होकर जर्मनी के हिटलर ने जमर्न जाती को आर्य सिध करने के लिये हत्याये की थी अब ये सहाब यहुदियो और आर्य को एक साथ जोड कर क्या सिध करना चाहते वो तो ये ही जाने पर सत्य यह ही है जब यहुदी के बाप भी नंगे घुमते तब भारत मे विशाल और समर्ध समाज जीवित था जिसको जितने के लिये दल के दल बर्बर जातिया आयी थी.
    अपने आप को ९८% हिन्दुओ का नेता मानकर फ़तेवे जारी करने वाले इन सहाब को मै जरा थोडि गणित बताता हुं,गौर से सुनियेगा,संघ के स्वंयसेवको की संख्या भारत मे ८० लाख है अभी{सकिर्य} अगर निश्किर्य हो चुके स्वंय्सेवको को जोडे तो ये संख्या पहूचति है १.५ करॊड केवल स्वयंसेवक,फ़िर एतने सारे संघठन उनको जोडा जाये तो ३ करॊड ज्यदा,कुल हुवे ४.५ करॊड,अब उनके परिवारो को जोडो तो,सम्ख्या पहुचती है १० करॊड अब संघ से सहानुभुती रखने वाले प्रत्यक्ष जुडे हुवे गैर कार्य्कर्ता होते है ५ करोड और,अब सहाब गिनति करो,१.५+३+४.५+१०=१९ करॊड,अभि तो मेने सामन्य जनता का नाम भी नही लिया है जो संघ को बहुत ज्यदा समर्थन करती है,तब सहाब ये २% का फ़िगौरे कहा से लाये??१० जन पथ से??या पोलित ब्युरो से??
    संघ केवल एक जाती को मानता है और वो है हिन्दु जाती,बाकि सब बातें जाननि हो तो संघ की शाखा आयिये चार-पांच साल देखिये फ़िर चाहे तो अपनि जो धारणा रखे,लेकिन असत्य का प्रचार करना अपने आप मे भी एक अपराध ही है,शेष सभी बाते बकवास है जिनका जवाब देना भी आपके उस मकसद को पुरा करता है जिस मकसद से आपने ये छापा है,यानी कि अपनी गोटि फ़िट करना………………………………

    Reply
  7. निरंकुश आवाज़

    डॉ. मधुसूदन जी जैसे सुलझे हुए बन्धु
    98 प्रतिशत हिन्दुओं की आवाज सुनें
    ========================

    आदरणीय श्री डॉ. मधुसूदन जी जैसे सुलझे हुए बन्धुओं को सादर प्रणाम करते हुए निवेदन है कि संघ की हकीकत के बारे में अभी भी बहुत कुछ है, लेकिन इससे हासिल कुछ नहीं होने वाला है। मैंने पहले भी लिखा है कि संघी या उनके समर्थक बन्धु केवल दो प्रतिशत आर्यों के शोषक एवं विभेदकारी हिन्दुत्व को ही क्यों हिन्दू धर्म मानते हैं। देश के 98 प्रतिशत हिन्दुओं की दृष्टि से हिन्दू धर्म को लागू क्यों नहीं करते?

    यहूदी-आर्यों के वंशजों की कुटिल नीतियों को छोडकर, इस देश के आदिनिवासियों के हितों को ध्यान में रखें। आदिवासियों, दलितों, पिछ‹डों और क्षत्रियों को बर्बाद करना बन्द करें और स्त्रियों सहित सभी को सभी क्षेत्रों समानुपातिक भागीदारी की बात को खुले दिल से स्वीकार करें।

    इसके लिये देश का माहौल सकारात्मक बनाया जावे तो हमारे समाज एवं धर्म के बीच की दूरियाँ कम हो सकती हैं। मैंने इस दिशा में पहल करके एक लेख लिखा था-

    “हिन्दू क्यों नहीं चाहते, हिन्दूवादी सरकार?”-

    इस लेख से डॉ. राजेश कपूर जी जैसे लोगों ने दूरी बना ली। यदि सच्चे हिन्दू हैं तो इस बारे में की गयी पहल पर प्रतिउत्तर देते बात को कुछ सुधार के साथ आगे बढाते। यदि ये वास्तव में उदारवादी और हिन्दू धर्म के शुचिन्तक हैं तो की गयी पहल पर बिना किसी पूर्वाग्रह के कुछ कदम तो बढाते।

    अपनी बात नहीं मानने वाले लोगों को विदेशों का ऐजेण्ट, किश्चन, धर्मविरोधी, देशद्रोही आदि कहने मात्र से समस्याओं के समधान नहीं होते हैं। वास्तव में डॉ. राजेश कूपर जी एवं श्री अभिषेक पुरोहित जी जैसे लोग समस्या की असल जड हैं। इनके जैसी सोच के लोग ही समवेत स्वर का सृजन नहीं होने देते हैं। जिन्हे भद्दी और घटिया भाषा का उपयोग करने और बाद में माफी मांगने की आदत है। ऐसे लोगों के कारण माहौल खराब होता है।

    हालांकि श्री अभिषेक पुरोहित जी का खुले हृदय से अपनी गलती को स्वीकार कर लेना इस बात को प्रमाणित करता है कि ये सम्भवत: अन्दर से अच्छे इंसान हैं, लेकिन लगता है कि तमोगुण की प्रबलता है। जिसके चलते अपना संयम खो देते हैं। प्रशिद्ध ब्राह्मणों के मौलिक गुणों में केवल परशराम से ही इनके गुण मेल खाते हैं, जिनका आज के समय में कोई सकारात्मक उपयोग नहीं है।

    आपने (डॉ. मधुसूदन जी) अनेक बार अनेक विष्लेश्णात्मक विवेचनाएँ प्रस्तुत करके इस बात का प्रमाण दिया है कि आप सुनने-समझने और बदलने को तैयार हैं, लेकिन चूँकि आप संघ या हिन्दुत्ववादी कुटिलताओं के नीति-नियन्ता नहीं हैं और वहाँ पर डॉ. राजेश कपूर एवं श्री अभिषेक पुरोहित जी जैसों का वर्चस्व है। ऐसे में किसी भी प्रकार के सुधार की सम्भावना नहीं है।

    सबसे बडी और महत्वूपर्ण बात यही है कि देश की सभी जातियों और सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में देश के सभी संसाधनों एवं सभी सरकारी सेवाओं (सण्डास व नालियों की सफाई करनेवाले कर्मियों, फौज के नीचे से उच्चतम पदों, उच्च न्यायपालिका सहित और विधायिका) में समान भागीदारी के बिना किसी भी प्रकार की हिन्दू समरसता की बात करना अपने आप में बेमानी है।

    बेशक इन कार्यों के लिये जैसा कि आपने सुझाव दिया है, सघन और गहन प्रशिक्षण की अनिवार्यता को कठोरता से लागू किया जा सकता है। परन्तु 2 प्रतिशत लोगों के 70-75 प्रतिशत सरकारी पदों पर काबिज रहते देश में हिन्दू एकता कदापि सम्भव नहीं है।

    बेशक हम कुछ भी करते रहें! बात बिगडने की ही अधिक सम्भावना है। कटु भाषा का कोई भी इस्तेमाल करे, उससे बात सुधरने के बजाय दूरी बढती है। आशा है कि मेरे शब्दों में व्यक्त 98 प्रतिशत हिन्दुओं की इस आवाज को आप और आपके साथी समझने का प्रयास करेंगे। मार्गदर्शन की अपेक्षा के साथ शुभकामनाओं सहित!

    आप सभी का शुभाकांक्षी
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

      बंधु श्री. डॉ. मीणा जी, आप के आदरयुक्त वचनों के लिए धन्यवाद। उसके योग्य कुछ करने के लिए मैं विश्वास दिलाता हूं।

      (१) १५ से १९ सितंबर तक मैं एक सम्मेलन में सक्रिय रूपसे व्यस्त हूं। वहांसे लौटने के बाद आपसे विचार-विमर्श करूंगा।
      (२)उपर उपर से ही पढने पर मैं कहता हूं; कि, विचारणीय बिंदुओं से युक्त आपका प्रत्युत्तर पढकर, उसपर कुछ मेरी जानकारी और संपर्क के आधारपर कार्यवाही करनेका मन बनाया है।
      (३) मैं निश्चित रूपसे कह सकता हूं, और संघके विकास के इतिहाससे जानता भी हूं, और मेरा गत १५-२० वर्षॊंका अधयन भी जिसको सत्यापित करता है, वह सत्य यह है; == कि “संघ एक वर्धिष्णु संगठन है।”=== और सच्चे अर्थ में राष्ट्र का सर्व स्पर्शी, सर्व समन्वयी कल्याण चाहता है।=== साथ में, उसने समय समय पर उत्क्रांतिशील, और व्यवहार्य निर्णयभी लिए हैं। संघके आयाम भी विस्तरित होते रहे हैं।
      आपके विचार भी किसी भी स्तर तक पहुंचाने की यंत्रणा से भी अनभिज्ञ नहीं हूं।

      शेष मैं आपको २० सितम्बर को वापस आने पर लिखूंगा।

      Reply
  8. निरंकुश आवाज़

    आदरणीय सम्पादक जी,
    संघ के बारे में 21 बिन्दु
    मैं जानता हूँ कि संघ के प्रति आपके मन में गहरी आस्था है, लेकिन यह आपका व्यक्तिगत मामला है। पाठकों को आपकी आस्थाओं से कोई सरोकार नहीं है। हाँ मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूँ, सो जानता हूँ कि आस्था पर चोट होती है, तो उसे सहना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन आप बार-बार ऐसा प्रदर्शित करते रहे हैं कि प्रवक्ता पर आप सभी के विचारों को निष्प्क्षतापूर्वक स्थान एवं सम्मान देते हैं। इसलिये संघ के काले कारनामों को भी स्थान देंगे, ऐसी आशा की जाती रही है। हालांकि संघ का पर्दाफास करने वाले दूसरे लेखकों के आलेखों को प्रवक्ता पर टिप्पणी के रूप में प्रदर्शित करना आपकी नीति से मेल नहीं खाता, जबकि विषय की पाठकों को गहराई से बहुपक्षीय जानकारी हेतु ऐसा करना प्रत्येक निष्पक्ष सम्पादक के लिये बडा अवसर माना जाता है। ठीक इसके विपरीत संघ के समर्थन में आलेखों को प्रदर्शित करना आपकी नीति से मेल खाता रहा है। ऐसे विरोधाभाषी हालतों में भी इंसाफ की आशा करना कोई अपराध नहीं है। अत: संघ के बारे में, उपलब्ध एवं संग्रहित विश्वसनीय जानकारी को सम्पादित करके मैं स्वयं यहाँ पर टिप्पणी लिख रहा हूँ, लेकिन जहाँ पर जरूरी होगा, वहाँ पर सन्दर्भ अवश्य दूँगा। मुझे उम्मीद है कि संघ के प्रति अपनी निष्ठा को दरकिनार करते हुए आप इंसाफ एवं निष्प्क्षता का परिचय देते हुए इन बिन्दुओं को मनमाने तरीके से मनगढन्थ नहीं ठहरायेंगे और इन्हें प्रदर्शित करके अपना सम्पादकीय दायित्व जरूर निभायेंगे। क्या करूँ श्री संजीव जी मुझे ऐसा लिखने के लिये आपने ही बाध्य किया है।

    जब कोई व्यक्ति अपनी निष्ठाओं को सही ठहराते हुए न्याय करने का नाटक करता है, तो उसका मुखौटा सबके सामने आ जाता है। अब तो संघ के मामले में आप स्वयं भी एक पक्षकार हैं। ऐसे में हमारे जैसे लोगों के लिये संघ के बारे में सच्चाई कहना बहुत मुश्किल हो गया है। आपके संघ के प्रति अति-अनुराग को दर्शाने वाले एक निर्णय ने प्रवक्ता डॉट कॉम की निष्पक्षता को हमेशा के लिये धराशाही कर दिया है। फिर भी आपको अवसर है कि आप प्रवक्ता डॉट कॉम की निष्प्क्षता को फिर से स्थापित कर सकें।
    ============== संघ के बारे में 21 बिन्दु ============
    1. संघ के दृष्टिकोंण में जो भारत राष्ट्र है, उस राष्ट्र में केवल हिन्दूत्ववादी ही शामिल हैं, लेकिन हिन्दू भी सारे नहीं, बल्कि संघ के हिन्दू राष्ट्र में केवल उच्च जाति के हिन्दू पुरुष ही शामिल हैं, स्त्रियाँ भी हिन्दू राष्ट्र की नागरिक नहीं हो सकती। यहाँ तक कि सर्वधर्म समभाव एवं धर्मनिरपेक्षता में आस्था रखने वाले उच्च जातीय ब्राह्मण भी उनके हिन्दू राष्ट्र के सम्मानित नागरिक नहीं हो सकता। केवल वही उच्च जातीय हिन्दू संघियों के राष्ट्र में शामिल है, जो मनु एवं ब्रह्मा की भेदभावपूर्ण व्यवस्था में आँख बन्द करके विश्वास करता हो। यहाँ तक कि वे क्षत्रिय भी संघियों के राष्ट्र में सम्मान के हकदार नहीं हैं, जो दलित, आदिवासियों और पिछडी जातियों पर शराब पीकर अत्याचार करने से इनकार कर दें।

    2. सर्वविदित है कि संघी स्त्रियों को अपने राष्ट्र की नागरिक नहीं मानते उनको वोट देने का अधिकार नहीं देना चाहते। स्त्रियों को पुरुष के समान अधिकारों का, अधिकारी नहीं मानते, बल्कि हिटलर और मुसोलिनी की भांति स्त्री को केवल पुरुष की दासी और बच्चे पैदा करने की मशीन के सिवा कुछ नहीं मानते।

    3. संघियों के हिन्दू राष्ट्र का सिद्धान्त है कि हर कोई जन्म से मनु द्वारा निर्धारित जाति एवं धर्म के अनुसार अपना-अपना ‘कर्म’ करे। जहाँ जिस घर में, जिस परिवार में जन्मे आपको वैसा ही कर्म करना है। या फिर उसको वह सब करना है, जैसा संघ के हिन्दू राष्ट्र, धर्म और जाति के स्वयंभू नेता उससे करने को कहें!

    4. संघियों के हिन्दू राष्ट्र में नागरिकों की असहमति, विरोध और प्रश्न करना राष्ट्रद्रोह है! उनके धर्मग्रन्थों की ओलाचना करने वाले को नर्क की व्यवस्था की गयी है, बेशक संघी स्वयं ईश्वर में आस्था नहीं रखते और सावरकर के नास्तिकतावाद में आस्था रखते हैं। तभी तो आडवाणी की पुत्रवधु को हिन्दू धर्म के अनुसार पूजा नहीं करने दी जाती है।

    5. संघ और भाजपा के लिए राष्ट्र का अर्थ है घूसखोर अफसरों, कमीशनखोर दलालों, पूँजीपतियों, दुकानदारों का मुनाफा। संघ के अनुसार जब ये सब चोर-उचक्के मुनाफाखोर और कमीशनखोर तरक्की करते हैं और मुनाफा कमाते हैं तो ही संघ के अनुसार हिन्दू राष्ट्र तरक्की होती है।

    6. सभी जानते हैं कि आर.एस.एस. ने अंग्रेजों के विरुद्ध किसी भी स्वतन्त्रता संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया और फिर भी आजादी का संघर्ष करने वाले हिन्दू बलिदानियों एवं शहीदों अपने हिंदुत्व के ढांचे में ढालने का कुप्रयास करके उनपर संघ बेशर्मी से अपना हक जमाता है।

    7. संघ हमेशा से ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के साथ तालमेल करने, उनके मनमाने आदशों और शोषण को समर्थन देने के लिए तैयार रहता था।

    8. यह बताने की जरूरत नहीं है कि संघ को संघ के विचारों का समर्थन नहीं करने वालों के प्रति कोई आदरभाव नहीं है। अत: संघ का निशाना शुरू से ही मुसलमान, कम्युनिस्ट, स्त्रियाँ, दलित, आदिवासी, पिछडे और ईसाई रहे हैं और आज भी हैं। यह संघ का घ्रणित अमानवीय चेहरा है।

    9. जो संघी आज देशभक्ति की बात करते हैं, उन संधियों के निशाने पर ब्रिटिश शोषक शासक कभी भी नहीं थे। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान संघियों ने अंग्रेजों की कभी भी खिलाफत नहीं की।

    10. ‘भारत छोडो आन्दोलन’ में संघ शामिल नहीं हुआ था। बल्कि संघ ने इस आन्दोलन का बहिष्कार एवं खुलकर विरोध किया। केवल इतना ही नहीं, बल्कि संघ ने ‘भारत छोडो आन्दोलन’ को कुचलने एवं असफल करने के लिये अंग्रेजों का साथ दिया था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बंगाल में अंग्रेजों के पक्ष में खुलकर बोलना इसका एक बहुत बडा ऐतिहासिक अकाट्य उदाहरण है।

    11. इतिहास गवाह है कि आजादी के संघर्ष के दौरान यदि गलती से भी कोई संघ का व्यक्ति अंग्रेजों द्वारा पकडा गया या गिरफ्तार किया गया तो हर बार उसने अंग्रेजों को माफीनामा लिखते हुए ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी वफादारी को दोहराया और हमेशा वफादार रहने का वायदा किया। स्वयं पूर्व प्रधानमन्त्री अटलबिहारी वाजपेयी ने भी यह कायराना काम किया था।

    12. यही नहीं ऐसे संघियों के कायराना कर्मों की फेहरिस्त भी काफी लम्बी है, जो माफीनामे लिख-लिखकर ब्रिटिश जेलों से बाहर आये और जिन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता -संग्राम सेनानियों के खिलाफ अंग्रेजों की मुखबिरी करने का घिनौना काम तक किया। ऐसे संघियों को भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, सुभाशचन्द्र बोस जैसे देशभक्तों को अपने विचारों का बताने का कोई नैतिक हक नहीं है।

    13. अंग्रेजों का साथ देने वाला संघी आज चाहे कितना भी राष्ट्रवादी बने, लेकिन वह स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल नहीं होने और देशभक्तों के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ देने का काला दाग अपने माथे कभी नहीं मिटा सकते।

    14. संघ एवं उसके समर्थकों द्वारा इतिहास को फिर से लिखने पीछे की मुख्य वजह यही है। क्योंकि उन्हें अपने काले कारनामों से भरे पडे इतिहास से डर लगता है। वे जानते हैं कि उनका इतिहास गद्दारियों, कायरताओं और देशद्रोह के काले कारनामों का ऐसा काला इतिहास रहा है, जिससे हर किसी का सिर शर्म से झुक सकता है, लेकिन जिन्होंने शर्म ही बेच खायी हो, उन्हें किस बात की शर्म?

    15. संघी कभी किसी जनान्दोलन में शामिल नहीं हुए हैं और उनमें किसी दमन को झेलने की ताकत नहीं, न आज उनमें ऐसी ताकत है। इसीलिये वे हमेशा से सामूहिक हिंसा एवं दंगा फसादों से प्रेम करते हैं या दूसरों को बरगलाकर उनसे अपराध करवाते हैं, जैसा कि प्रज्ञा सिंह आदि से करवाया जा रहा है या इतिहास में क्षत्रियों के हाथों निम्न तबके पर अत्याचार करवाये गये थे।

    16. ब्रिटिश उपनिवेशवादी राज्य ने भी संघ की इसी भारत विरोधी और अंग्रेजों के प्रति वफादारी का बदला चुकाया और हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवादियों को कभी भी अपने शोषण एवं आक्रमण का निशाना नहीं बनाया।

    17. सभी जानते हैं कि आर.एस.एस. ने तो खुले तौर पर जर्मनी में नात्सियों द्वारा यहूदियों के कत्ले-आम का समर्थन किया था।

    18. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्डङ्क और बाद में प्रकाशित हुई ‘बंच ऑफ थॉट्सङ्क में जर्मनी में नात्सियों द्वारा उठाये गये कदमों का खुलकर अनुमोदन किया था। सभी जानते हैं कि गोलवलकर आर.एस.एस. के सर्वाधिक समय तक सबसे बडे अधिनायक सुप्रीमो रहे हैं।

    19. गोलवलकर के नेतृत्व में ही आर.एस.एस. के वे सभी संगठन अस्तित्व में आये जिन्हें आज हम जानते हैं। विश्व हिन्दू परिषद जैसे आर.एस.एस. के आनुषंगिक संगठन इसी दौरान बने। गोलवलकर ने ही आर.एस.एस. की फासीवादी विचारधारा को एक सुव्यवस्थित रूप दिया।

    21. संघ का पूरा आन्तरिक ढाँचा हिटलर और मुसोलिनी की पार्टियों से हूबहू मेल खाता है। हर सदस्य यह शपथ लेता है कि वह सरसंघचालक के हर आदेश का बिना सवाल किये पालन करेगा। संघ में सरसंघचालक सबसे ऊपर होता है। अपना उत्तराधिकारी भी सरसंघचालक स्वयं चुनता है। जिससे पता चलता है कि संघ को लोकतन्त्र में कोई आस्था या विश्वास नहीं है। निचले तबके के लोगों को संघ का सर्वोच्च नेतृत्व करने का तब तक कोई अवसर नहीं, जब तक कि वे सरसंघचालक के द्वारा इस योग्य नहीं समझे जावें।

    आप सभी का शुभाकांक्षी
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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    • Ramesh Kumar

      Bhai Yah khuth kyon likh rahe ho. Apne ap ko vidwan batate ho aur is tarah ke jhth likh rahe ho.

      Reply
  9. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    प्रवक्ता छापे, ना छापे, काटे सभी स्वीकार है।
    प्रवक्ता से प्रार्थना, कि अंग्रेज़ीमें कहावत है “If you keep your mind sufficiently open, people will throw, trash into it”—“यदि आप अपना मस्तिष्क पर्याप्त खुला रखेंगे तो लोग उसमें कचरा-कूडा फेंकेंगे।” और जैसे प्रवक्ता आगे बढेगा, साथ एक बडे उत्तरदायित्व के लिए उसे अधिक कार्यकर्ता जुटाने पडेंगे; पर, इस प्रगति के साथ साथ, (Byproducts of Progress) प्रगति के अतिरिक्त परिणाम भी जो, विकसित होते चलते हैं, उन्हें पहलेसे सोचकर तैय्यारी करनी पडेगी। अन्यथा प्रवक्ता विफल होगा।मेरी जानकारी में, प्रवक्ता (एकमेव) मिडीया का उपकरण है, जो बहुमूल्य सेवा कर रहा है।
    लेखकी स्वीकृति के लिए कुछ निकष नीति/सूचि बनाई जाए। जिससे जो मीणा जी के लेख के कारण हुआ, उसे टाला जा सके। प्रारंभकी स्पष्टता किंचित कटु हो, तो भी पश्चात की “कटुता” कि अपेक्षा सह्य होती है।
    मैं संवाद में विश्वास करता हूं। वाद नहीं, विवाद नहीं, पर संवाद जो सच्चाई ढूंढनेके लिए, सुलझाव, या जानकारी के लिए किया जाता हो।तो, कार्य के दो प्रकार ।
    (१) बोलने/ लिखने का और (२) दूसरा कार्य प्रत्यक्ष कृतिका
    (१) केवल लिखकर के, आवाज़ बुलंद कर के, जैसे ढपोल शंख करता है, कुछ प्राप्ति नहीं। सारी गीता अर्जुनको कर्म करने के उद्देश्यसे कही गई है।
    (२) कार्य -रचनात्मक कार्य, विधायक कार्य, सकारत्मक कार्य — देशको प्रगति की दिशामें ले जा सकता है।
    सकारत्मक कार्य ही जनताका जीवन अंशतः सुधारेगा।
    (१) बोलनेका =>वाक्‍पटुता, शब्दपटुता, बढते बढते फिर शब्द-कटुता में परिणत हो जाती है।
    और, शब्दों के अकारण कुटिल प्रयोगसे प्रतिपक्षको नीचा दिखाने की हीन प्रवृत्ति झलकती है।
    इसमें समस्या का सकारात्मक, रचनात्मक, या विधायक सुलझाव निकालने की प्रवृत्ति नहीं होती ऐसी चर्चा, लेख, टिप्पणी हमें कोई प्रगति नहीं करवाती। मेरा सुझाव है ऐसे लेखन/प्रकाशन से प्रवक्ता दूर रहे।
    कुछ परिवर्तन करके कहता हूं।
    अकर्मण्येषु वाचालेषु निरर्थक संवादम्‌ -शिरसी, मा लिख मा लिख मा लिख।
    अकर्मण्य वाचालों से निरर्थक संवाद -मेरे भाग्यमें (प्रभु) ना लिखे, ना लिखे, ना लिखे।

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  10. निरंकुश आवाज़

    प्रवक्ता के सम्पादक श्री संजीव कुमार जी का कहना है कि किसी आलेख को पूरा का पूरा प्रस्तुत करना उनकी राय में न्याय संगत नहीं है। कोई बात नहीं भाई संजीव जी हम यहाँ पर आपकी नीति के अनुसार दूसरो के विचारों को कोट (उद्धरित) कर देते हैं। सुप्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक एवं धर्मनिरपेक्ष लेखक श्री अमलेन्दु उपाध्याय जी-“हिन्दुत्व की अवधारणा ही आतंकी है”-शीर्षक से लिखे अपने आलेख में लिखते हैं कि-

    “जिस आतंकवाद की तरफ चिदंबरम ने इशारा किया उसकी आमद तो आजादी के तुरंत बाद हो गई थी और इस आतंकवाद ने सबसे पहली बलि महात्मा गांधी की ली। उसके बाद भी यह धीरे धीरे बढ़ता रहा और 6 दिसम्बर 1992 को इसका विशाल रूप सामने आया।”

    “हाल ही में जब साध्वी प्रज्ञा, दयानन्द पाण्डेय और कर्नल पुरोहित नाम के दुर्दान्त आतंकवादी पकड़े गए तब यह फिर साबित हो गया कि ऐसा आतंकवाद काफी जड़ें जमा चुका है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी का चिदंबरम के बयान पर हो- हल्ला मचाना ‘चोर की दाड़ी में तिनका’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है।”

    श्री अमेलन्दु उपाध्याय जी का आगे लिखते है कि-

    “……….हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता और आतंकवादी गतिविधियों में जो आतंकवादी पकड़े गए हैं या अभी पकड़ से बाहर हैं वह किसी भी हाल में हिन्दू नहीं हो सकते वह तो ‘हिन्दुत्व’ की शाखा के हैं। दरअसल ‘हिन्दुत्व’ की अवधारणा ही आतंकी है और उसका हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं है। कोई भी धर्मग्रंथ, वेद, पुराण, गीता रामायण हिन्दुत्व की बात नहीं करता न किसी भी धर्मग्रंथ में ‘हिन्दुत्व’ शब्द का प्रयोग किया गया है।”
    श्री अमेलन्दु उपाध्याय जी का आगे लिखते है कि-

    “हिन्दुत्व एक राजनीतिक विचार धारा है जिसकी बुनियाद फिरकापरस्त, देशद्रोही और अमानवीय है। आज हमारे संधी जिस हिन्दुत्व के अलम्बरदार बन रहे हैं, इन्होंने भी इस हिन्दुत्व को विनायक दामोदर सावरकर से चुराया है। जो अहम बात है कि सावरकर का हिन्दुत्व नास्तिक है और उसकी ईश्वर में कोई आस्था नहीं है। जबकि हिन्दू धर्म पूर्णत: आस्तिक है। उसकी विभिन्न शाखाएं तो हैं लेकिन ईश्वर में सभी हिन्दुओ की आस्था है। लिहाजा ईश्वर के बन्दे आतंकी तो नहीं हो सकते पर जिनकी ईश्वर में आस्था नहीं है वही आतंकी हो सकते हैं।”

    श्री अमेलन्दु उपाध्याय जी का आगे लिखते है कि-

    “भारत में भी जिसे भगवा आतंकवाद कहा जा रहा है वस्तुत: यह ‘हिन्दुत्ववादी आतंकवाद’ है, जिसे आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन पालते पोसते रहे हैं। संघ की शाखाओं में बाकायदा आतंकवादी प्रशिक्षित किए जाते हैं जहां उन्हें लाठी- भाला चलाना और आग्नेयास्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। दशहरे वाले दिन आतंकवादी अपने हथियारों की शस्त्र पूजा करते हैं।”

    उपरोक्त विचार एक ईमानदार, देशभक्त और निष्पक्ष नागरिक के हैं, जो आदिवासी या दलित नहीं बल्कि न्यायप्रिय ब्राह्मन है.

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  11. sunil patel

    आदरणीय डॉ. मीना जी, आप चिकित्सक के साथ साथ मानव व्यवहारशास्त्री, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता है.

    इस बार आपके लेख में तथ्य नहीं दिख रहे है, हिन्दू संगठनो के बार में पूर्वाग्रह ज्यादा दिख रहा है. आपके अनुसार हिन्दू संगठन आतंकवाद को बढ़ावा देते है. यह तो सरासर गलत है.
    * आप विधि के जानकर भी है. किसी एक खिलाडी के प्रदर्शन से उसकी अन्य खिलाडियो से तुलना नहीं की जा सकती है जब तक की सभी खिलाडियों के प्रदर्शन की तुलना नहीं की जाय.
    * देश में कितने धार्मिक (सभी धर्मो के) संगठन है, उनमे से कितने आतंकवाद गतिविधियों में कितनी बार और कितना शामिल रहे है. निष्कर्ष तुलनात्मक अध्यन के बाद ही लगाया जा सकता है.
    * आपने होशंगाबाद जिले की पिपरिया तहसील के ग्राम मटकुली की दुखद घटना के बारे में बताया. वाकई शर्मनाक घटना है. बड़ा दुःख हुआ जानकर. मटकुली गाँव पचमढ़ी (म.प्र. का एकमात्र हिल स्टेशन ) से २५ KM दूर स्थित है) जहाँ हर माह कलेक्टर, एस.डीएम, तहसीलदार और, राज्य सचिवो अन्य नेताओ का आना जाना लगा रहता है. दो माह पूर्व ही मुख्यमंत्री जी और श्री आडवानी जी दो दिवसीय दौर पर आये थी. किसी के भी संज्ञान में नहीं आई, लाइ गई आश्चर्य है. ऐसे घट्नाय सासन, जनता के बीच में हम सभी को लानी चाइये ताकि भविष्य में ऐसी पुनार्वत्ति नहीं हो सके.
    * रही बात त्रिशूल और भले की तो – यह तो धार्मिक चिन्ह है. सभी धर्मो को अपने धार्मिक चिन्ह रखने का अधिकार है. हाँ सासन ने कुछ तय नाप स्थाफित किये है. कुछ इंच से ज्यादा बड़े चाकू, नुकीले हतियार घर में नहीं रख सकते है. आदिवासी समाज में (जो जंगल में रहते है) हर घर में भाला होता है. किन्तु आज कोई भी शिकार नहीं करता है. अरुणाचल और कुछ पूर्वोतर राज्यों में वहां के निवासियों को भाला, खुकरी, चाप और तलवार रखने का अधिकार भी है. समारोह में उपहार स्वरुप भी दिए जाते है.
    * कारगिल युद्ध – श्री आडवानी जी ने तो वोही किया तो भारत की निति रही है. सभी पड़ोसियों से अच्छे सम्बन्ध. हाँ जब हमला हुआ तो जमकर करार जवाब दिया गया. यहाँ एक भूल पुरे देश से हुई की इस युद्ध में हमारा जो ४० से ५० हजार करोड़ खर्च हुआ उसे पाकिस्तान से वसूल करने के लिए किसी भी नेता, बुद्धिजीवी ने एक भी आवाज नहीं उठाई. बात पैसे के नहीं है, युद्ध उसूल की है, बात हमारे एक सबक एक चेतावेनी देने की है की कोई देश कैसे हम पर हमला करने के जुर्रत कर सकता है.
    * भ्रष्टाचार – सभी सरकारे इसके आकंठ में डूबी रही है. अंधे से काना अच्छा. कांग्रेस और भाजपा सर्कार के हर भ्रष्टाचार का ग्राफ बनाया जाय तो किसकी लकीर आड़ी रहेगी और किसकी लकीर ऊपर निकल जाएगी सभी जानते है. जब चुनाब की बरी आती है तो ज्यादा बुरे से कम बुरा सर्वदा श्रेष्ठ होता है.
    * जम्मू और कश्मीर का सच पूरी दुनिया जानती है. कई लेख तो प्रवक्ता.कॉम में भी प्रकाशित हो चुके है.
    * भारत तो सदा से बचा रहा है, बचा रहेगा. कांग्रेस और भाजपा के भविष्य का फैसला तो अगले चुनाव में हो जायेगा (अगर इलेक्ट्रिक वोटिंग मशीन उपयोग नहीं होगी तो क्योंकि एक कंप्यूटर के जानकर होने के नाते मैं इतना जनता हूँ की तकनीक से बहुत फायदा होता है, और कुछ भी कराया जा सकता है, कुछ भी संभव है).
    * धन्यवाद.

    Reply
  12. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    सम्पादक जि मेरे सारे कोपि पेस्ट किये हुवे रिपलयि क्यो हटा दिये???चलो कोयी बात नही,जिन्हे अपनि गलत्फ़हमि दुर करनी है वो सम्बंधित विषयो के लिये क्रिपया गुगल पर टाइप करके स्वयं ढुढंले,मेने सेव भई नहि किया था वरना उन सभी के लिन्क दे देता.वैसे अब मुझे लगता है कि यहा तर्क और तथ्य कि कोयी गुण्जाईस नही बची है केस करनी की धमकिया दी जा रही है ये अपने आप मे बताने के लिये पर्याप्त है कि कितना घटिया बौधिक चिन्तन है……………………तर्क करना आता नही कोयी प्रश्न पुछे तो एसटि का केस करने की धमकी और उपर से,वाह मेरा देश………………………….

    Reply
  13. प्रवक्‍ता ब्यूरो

    प्रवक्‍ता ब्यूरो

    पुरूषोत्तमजी और अभिषेकजी से निवेदन कि अनावश्‍यक रूप से दूसरों के लेख टिप्‍पणी के रूप में पोस्‍ट न करें। अपने विचार लिखें। जरूरी हो तो दूसरों को कोट करें लेकिन किसी और के लेख का पूरा पाठ टिप्‍पणी के रूप में पोस्‍ट न करें। बहस को सार्थक दिशा दें। आप दोनों द्वारा प्रस्‍तुत इसी प्रकार की अनेक टिप्‍पणियों को मैं डिलीट कर रहा हूं।

    संजीव, संपादक, प्रवक्‍ता

    Reply
    • निरंकुश आवाज़

      स्वयं सम्पादक श्री संजीव जी के संघ के बारे में निम्न विचार हैं तो संघ के बारे में कडवी सच्चाई जनता के सामने कैसे लाने दे सकते हैं?

      “संघ की दिनोंदिन बढ़ती ताकत और सर्वस्वीकार्यता देखकर उसके विरोधी मनगढ़ंत आरोप लगाकर संघ की छवि को विकृत करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन हमें स्वामी विवेकानंद का वचन अच्छी तरह याद है: ‘हर एक बड़े काम को चार अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है: उपेक्षा, उपहास, विरोध और अंत में विजय।’ इसी विजय को अपनी नियति मानकर संघ समाज-कार्य में जुटा हुआ है।”

      इसलिये श्री अभिषेक पुरोहित जी की अंग्रेजी में लिखी गयी बेतुकी बातों के बहाने मेरी ओर से प्रस्तुत उन तथ्यों को हटा दिया गया है, जिनसे संघ एवं हिन्दुत्ववादी आतंकियों का काला चेहरा सबके समक्ष उपस्थित हो रहा था, जबकि इस प्रकार के पूरे आलेख अनेक अन्य संघवादी लेखकों की ओर से पूर्व में प्रस्तुत किये जाते रहे हैं, जिनपर सम्पादक की तलवार आज तक नहीं चली। क्योंकि उनसे संघ की नीतियों को बढावा मिलता है। इससे श्री संजीव जी की इंसाफ एवं निष्पक्षता के प्रति निष्ठा स्वत: प्रमाणित होती है।

      Reply
  14. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    आदरणीय मीणा जी आपकी यह टिप्पणी पढने पर शुरूं से ही लग रहा था की में बोल रहा हूँ आप लिख रहे हैं .आपने अंत में साभार का खुलासा कर अपनी स्वाभाविक ईमानदारी का भी परिचय देकर अपने आप को ही नहीं बल्कि देश की सदियों से शोषित पीड़ित जन -जन की आवाज को बुलंद किया है .आपको बहुत बहुत धन्यवाद .आपकी इस टिप्पणी का प्रत्येक शब्द पत्थर की लकीर है .आपने फासीवाद का चेहरा लोंच डाला है नाजीवाद को गटर के हवाले कर दिया और वर्ग संघर्ष में सर्वहारा का मार्ग प्र्शष्ट किया .आपको क्रन्तिकारी अभिवादन .

    Reply
    • निरंकुश आवाज़

      लेकिन संपादक ने सच्चाई का गला घोंट दिया है.

      Reply
      • श्रीराम तिवारी

        shriram tiwari

        आदरणीय मीणा जी

        मुझे तो पहले से ही प्रवक्ता .कॉम के वैचारिक दिग्भ्रम का अहसास था .यह एक वैयक्तिक साईट नहीं लगती यह पूरे तामझाम के साथ अपने पवित्र {?}उद्देश्य के हेतु से सोच समझकर एक विशेष पवित्र {?}मिशन का अनुषंगी मात्र है .संजीव जैसे उत्साही युवाओं की आड़ में कतिपय दुर्धर्ष तत्व अपने कुत्सित विचारों को अमली जामा पहनाने में जुटे है .इन तत्वों को यह ज्ञात नहीं की कोई भी कांग्रेसी या वामपंथी जानबूझकर क्यों इनकी हलकट हरकतों का संज्ञान नहीं लेता ..ये लोग हर उस व्यक्ति को जो इनसे सहमत नहीं -कांग्रेसी .वामपंथी .कम्म्युनिस्ट ;मुस्लिम ;दलित ;या कोई अन्य संघ विरोधी समझकर हिकारत की नजर से देखते हैं .उनकी इस नकारात्मकता से देश को कुछ भी हासिल नहीं हो रहा है .ये नक्कारखाने में टूटी की आवाज है .-इनका नारा है संघम शरणम गच्छामि -ये हिदू -हिंदी और हिन्दुस्तान का रंचमात्र भला नहीं कर सकते .aapke tathypoorn aalekhon को sahitiyik wad pratiwad के एक saarthak smbad sthapit karne की jagah kukarhaav में ही iske karndhaaron को aanand milta है .

        Reply
        • sunil patel

          आदरणीय तिवारी जी, आप प्रवक्ता के ऊपर संदेह कर रहे है. मेरे ख्याल से स्वतंत्र भारत का यह एक मात्र खुला मंच है जहाँ लोग (बड़े से बड़ा लेखक और आम से आम व्यक्ति) विचारो का आदान प्रदान कर सकते है जो की सालो सालो पहले शास्त्रार्थ में होता था. विद्वान से लेकर क्लर्क, गरीब से आमिर लोग सभी लेख पढ़ रहे है और टिपण्णी कर रहे है.

          पिछले डेड से दो सालो में प्रवक्ता में हजारो लेख छप चुके है और आज तक इस पर किसी ने संदेह नहीं किया है. कही से भी नहीं लगता है की प्रवक्ता संघ का समर्थन करता है. जो सच है लोग व्यक्त करते है. कुछ लोग विरोध में व्यक्त कर रहे है और छप रहा है. मैं न तो भाजपा से जुड़ा हूँ न ही संघ से. फिर संघ जैसे अनुशाषित राष्ट्रीय संस्था पर गलत आरोप लगते है तो मन आहात होता है. यहाँ बड़ी बात यह ये है की अधिकतर लोग संघ पर लगे गलत आरोपों का विरोध कर रहे है.

          दुसरे संगठन हिन्दू संगठनो पर आरोप लगाएं तो सकरात्मक हिन्दू संगठन विरोध करे तो नकारात्मकत. हर संगठन अपनी संख्या, बल बढ़ने का प्रयास करता ही. संघ करे तो क्या गलत. हमने तो आज तक कही नहीं सुना की किसी संघी ने किसी अन्य धर्मो के किसी भी व्यक्ति को हिन्दू बनाया.

          Reply
          • श्रीराम तिवारी

            shriram tiwari

            dyanywad sunil patel ji
            aapke asahmati vykt karne ke adhikar ka men samman karta hun .aapki pratiwadi tippni bhi bhashayee sanskrutik seemaon men hone se vaicharikta ka saarthak vimarsh smbhav hai ,kintu isi oravakta .com par ek do gandi machhliyan rss ke samrthan men poore talab ko ganda krtee rhtee hain pahle in bigdelon ko to control karo .aapka yh aarop sahi nahin hai ki jo log hindu saamprdaayikta pr aarop lagate hain we anya samprdaayon pr hastkshep nahn karte .aap peoples democracy parhen .loklahar ya naya path adhikansh dharmnirpeksh saahity men har kism ke kattarwadiyon ko niyantrit kiye jane ki mansha nihit hai .

          • Ravindra Nath

            तिवारी जी जिस प्रकार के संतुलित टिप्पणी पा कर गद गद हो रहे हैं क्या स्वयं उस प्रकार की भाषा प्रयोग कभी करेंगे?

          • निरंकुश आवाज़

            आरदणीय श्री सुनील पटेल जी,
            नमस्कार।

            आपकी अनेक टिप्पणियाँ सन्तुलित होती हैं और अनेक भावावेश में अतिरंजित प्रतीत होती है, लेकिन अधिकतर टिप्पणियों में आप भाषायी मर्यादा का ध्यान रखते हैं। जिसे आपके पारिवारिक संस्कारों का एवं श्रेष्ठ माता-पिता तथा गुरुजनों के आशीष का ही परिणाम माना जा सकता है।

            आपने अपनी टिप्पणी में श्री श्रीराम तिवारी जी को कुछ स्पष्टकीरण दिया है, जिसकी अन्तिम पंक्ति पर मैं आपसे संवाद स्थापित करने का आग्रह करते हुए विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि बन्धु जिन संघियों के कारण हिन्दू ही, हिन्दू धर्म को त्यागने को विवश हो रहे हैं, वे किसी गैरधर्मी को हिन्दू बनाने की सोच भी कैसे सकते हैं।

            आज यदि कोई हिन्दू अपने धर्म को त्यागकर अन्य धर्म को स्वीकार करता है तो उसके पीछे 99 प्रतिशत कारण हिन्दुत्व की अवधारणा को लोगों पर जबरन थोपने वाले आतंकियों के अत्याचार होते हैं।

            अत: आदरणीय श्री पटेल जी यह तर्क ही अपने आप में बेमानी है कि क्या किसी संघी ने किसी अन्य धर्मावलम्बी को कभी हिन्दू बनाया?

            और भी बहुत सी बातें हैं, जिन पर समय आने पर आपसे संवाद करने की इच्छा है।

            आशा है कि आपकी और प्रवक्ता की ओर से अवसर मिलेगा।

            शुभकामनओं सहित
            डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

  15. प्रवक्‍ता ब्यूरो

    संजीव, संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

    आदरणीय मीणाजी, नमस्‍कार। पिछले सप्‍ताह मैं बिहार प्रवास पर था। 6 सितम्‍बर को मैं दिल्‍ली लौटा। इस दौरान इनबॉक्‍स में करीब पचास लेख जमा हो गए थे। लेखों को प्रकाशित करने में समय लग रहा था। 9 सितंबर को आपने यह लेख भेजा। बाद में इस लेख के प्रकाशन के संबंध में हमारा ध्‍यान आकृष्‍ट कराया। प्रवक्‍ता पर यह लेख 11 सितंबर को प्रकाशित हुआ। प्रकाशन के तुरंत बाद ही इस लेख के विरोध में अधिकांश पाठकों ने टिप्‍पणियां की। कई लोगों के फोन भी आए कि इस तरह के लेख प्रवक्‍ता पर मत छापो।

    आपने सम्‍पादकीय न्‍याय की बात कहते हुए क्रॉस की गयी पंक्तियों पर प्रश्‍नचिन्‍ह खड़ा किया है। आपके लेख में हमने मुख्‍यत: तीन बातों पर आपत्ति प्रकट की है-
    (क) गुजरात में भगवा ब्रिगेड ने आदिवासियों और पिछड़ी जाति के घरों में आग लगाई।
    (ख) तत्‍कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने हजारों करोड़ डॉलरों से भरे बक्‍सों के साथ कंधार में दुर्दान्‍त आतंकियों को छोड़ा।
    (ग) भाजपा की पूर्व मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे ने राजस्‍थान में शराब, शबाब और जमीन बेचकर भ्रष्‍टाचार को बढ़ावा दिया।

    क्‍या आपको नहीं लगता कि उपर्युक्‍त पंक्तियां निराधार, मनगढंत और महिलाविरोधी है?

    हमने अनेक बार यह स्‍पष्‍ट किया है कि प्रवक्‍ता लोकतांत्रिक विमर्शों का मंच है, जो राष्‍ट्रवाद और लोकतंत्र में विश्‍वास करता है। प्रवक्‍ता के पाठक भलीभांति जानते हैं कि हमने सभी विचारधाराओं के लेखकों की रचनाएं प्रकाशित की है। यह सच है कि निराधार, मनगढंत तथा महिला-दलित-आदिवासीविरोधी लेखों के लिए प्रवक्‍ता पर कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि प्रवक्‍ता आज हिंदी के श्रेष्‍ठ वेबसाइटों में शुमार है और प्रतिदिन 15 हजार हिट्स प्रवक्‍ता को मिल रही है।

    टिप्‍पणी के रूप में आपने प्रवक्‍ता की पक्षधरता पर भी सवाल उठाये हैं कि हम हिंदुत्‍ववादी आतंकियों को प्रसन्‍न करना चाहते हैं। यह प्रवक्‍ता के साथ अन्‍याय है। बेहतर होगा कि प्रवक्‍ता पर प्रकाशित लेखों को एक बार ध्‍यान से देख‍ लीजिए और फिर कोई निर्णय दीजिए। कुछ लेख आपके लिए यहां प्रस्‍तुत है-

    http://www.pravakta.com/?p=10863
    सोनियाःअब सहानुभूति नहीं, बड़ी उम्मीदें
    http://www.pravakta.com/?p=12981
    ‘भोले’ राहुल गांधी की मीठी-मीठी बातें
    http://www.pravakta.com/?p=13007
    आरएसएस और अमेरिका भाई-भाई
    http://www.pravakta.com/?p=7314
    संघ परिवार का संविधान विरोधी खेल
    http://www.pravakta.com/?p=10703
    पहले भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हस्तक्षेप बंद हो
    http://www.pravakta.com/?p=12507
    भाजपा का वंशवाद : पर उपदेश कुशल बहुतेरे
    http://www.pravakta.com/?p=12715
    वामपंथियों और एवेंजेलिस्ट ईसाईयों को सबक सिखाती, केरल की बर्बर घटना…
    http://www.pravakta.com/?p=11310
    नक्सलवादी या उनके समर्थक – सुकारू के हत्यारे कौन?
    http://www.pravakta.com/?p=9794
    नक्सली और उनके बौद्धिक मददगार

    आपने कहा है कि भविष्‍य में प्रवक्‍ता को कभी कोई लेख नहीं भेजूंगा। यह आपका फैसला। कोई क्‍या कर सकता है? प्रवक्‍ता पर आपके दो-तीन लेख ही प्रकाशित नहीं हुए अन्‍यथा अब तक आपके कुल 35 लेख प्रकाशित हो चुके हैं।

    संजीव, संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

    Reply
    • निरंकुश आवाज़

      आदरणीय सम्पादक जी,
      नमस्कार।

      आपके निर्णय को पढने के उपरान्त भी मैं इस बात से कतई भी सहमत नहीं हूँ कि मेरे आलेख की आपके द्वारा क्रांस की गयी टिप्पणियाँ मनगढन्थ और महिला विरोधी हैं। लेकिन सम्पादक के निर्णय के विरुद्ध अपील की कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिये सम्पादक के निर्णय को मानना पाठकों के लिये बाध्यता है।

      मेरा यही कहना है कि केवल निर्णय नहीं किया जाना चाहिये, बल्कि न्याय होना चाहिये और न्याय होते हुए दिखना भी चाहिये।

      मेरा यह आलेख प्रवक्ता के अलावा कम से कम दस साईटों पर प्रदर्शित हो रहा है, किसी भी सम्पादक को इसमें मनगढन्थता/महिला विरोधता प्रतीत नहीं हुई।

      अपनी-अपनी सोच है। अपना-अपना नजरिया है।

      आपको भी अपने निर्णय को सही सिद्ध करने का उतना ही हक है, जितना कि अन्य किसी को, इसलिये आपको अपने तर्कों पर कायम रहना ठीक ही लग रहा होगा, फिर भी मैं पहली बार सम्पादक के रूप में आपके निर्णय से पूरी तरह से असहमत हूँ, जो मेरा भी अधिकार है।

      आपने अपने निर्णय में लिखा है कि आप महिला, दलित, आदिवासियों के विरुद्ध लेखों को प्रवक्ता पर कोई जगह नहीं देते हैं। जबकि आपके सम्मानित पाठक श्री अभिषेक पुरोहित जी की टिप्पणियाँ (१२.०९.१०/०२.५५), एवं श्री डॉ. राजेश कपूर जी (१२.०९.१०/१०.१४) न मात्र आदिवासी वर्ग विरोधी हैं, बल्कि जातिगत अपमानकारी, व्यक्तिगत मानहानिकारी एवं आक्षेपकारी होते हुए भी शान से प्रदर्शित हो रही हैं।

      जो अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, १९८९ के तहत ०५ वर्ष के कारवास से दण्डनीय अपराध है। साथ ही भा. द. सं. की धारा ५०० के तहत मानहानि का अपराधिक कृत्य भी निरूपित करती हैं।

      किसी आदिवासी को विदेशों का एजेण्ट कहना शायद आपकी नजर में आदिवासी अपमान नहीं है।

      किसी जाति का अपमान आपकी नजर में शायद अपमान नहीं है।

      यही नहीं प्रवक्ता पर मैडम सोनिया गाँधी के अपमान में ढेरों कथित राष्ट्रवादी लेखकों की टिप्पणी और आलेख शान से प्रकाशित होते रहते हैं जो शायद आपकी नजर में महिला का अपमान नहीं है।

      इसके उपरान्त भी मैं इस विवाद को बढाने के पक्ष में नहीं हूँ, अन्यथा ढेरों उदाहरण गिना सकता हूँ, लेकिन मैं प्रवक्ता एवं आपका हृदय से सम्मान करता हूँ।

      मैं जो कुछ भी आपकी नीतियों या निर्णयों के बारे में लिखता हूँ, उसका मकसद अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना है, न कि प्रवक्ता या आपकी व्यक्तिगत मंसा पर सवाल उठाना जो हर किसी को उठाने का हक होना ही चाहिये।

      मुझे मेरे आलेखों के प्रकाशन का कोई दु:ख नहीं है, क्योंकि यह आपका सम्प्रभु अधिकार है, लेकिन जैसा कि मैंने पूर्व में कहा है कि समान परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न व्यवहार क्षोभकारक होता है।

      आपका शुभाकांक्षी
      डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

      Reply
    • डॉ. महेश सिन्‍हा

      डॉ महेश सिन्हा

      काश ये अपनी कही बात पर स्थिर रह पाते की अब कोई लेख प्रवक्ता में नहीं लिखेंगे.
      अब नया रास्ता निकल लिए दूसरों के विचार यहाँ चिपका रहे हैं .

      Reply
      • डॉ. महेश सिन्‍हा

        डॉ महेश सिन्हा

        “मेरा यह आलेख प्रवक्ता के अलावा कम से कम दस साईटों पर प्रदर्शित हो रहा है,”
        एक सोची समझी मुहीम चला रहे हैं जिसका अजेंडा अभी सामने नहीं है .

        Reply
  16. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    डॉ पुरषोत्तम जी मीणा जैसे महान चिंतकों की शान निराली है ,जो कहेंगे ,सच कहेंगे ,सच के सिवा …
    देश में बुने जा रहे कपट जाल का उच्छेदन करने वाले ऐसे उत्तम =पुरुष के लिए अर्ज है -हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है ,बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा -आपके आलेख से भारत के ९५ प्रतिशत लोग सहमत हैं .इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की कुछ अक्ल के अंधों को इस साम्प्रदायिकता की धधकती ज्वाला के परिणाम नहीं दिख रहे हैं .
    हम मानते हैं की सभी भाजपाई या संघी भाई इस वैमनस्यता को फ़ैलाने के षड्यंत्र में शामिल नहीं हैं किन्तु ये थोड़े से भटके हुए या पाखंडी तत्व उन सीधे साधे स्वय्म्सेव्कों को नाहक ही मौत के मुह में धकेल रहे हैं ..भाजपा का असली चेहरा देखना हो तो झारखण्ड देखो .उधर कांग्रेस के युवराज भी अब माओवादियों की भाषा
    बोलने लगे हैं .भाजपा से ज्यादा धर्मांध कांग्रेस में हैं ,और इतिहास साक्षी है की राम मंदिर जैसे मुद्दे कांग्रेस ने ही अपनी राजनेतिक विवशता के कारन देश पर थोपे हैं .कांग्रेस और भाजपा दोनों ही घोर पूंजीवादी -अमरीका परस्त और भृष्ट हैं . कांग्रेस करेला है और भाजपा नीम छड़ी अमरवेल .दोनों सापनाथ -नागनाथ .
    प्रवक्ता .कॉम को बधाई की इस साईट पर मीणा जी जैसे बुद्धिजीवी अपने विचार प्रस्तुत करते हैं .जहां तक काट छाट का प्रश्न है उसमें यही कहूँगा की पलड़ा झूंठ और पाखंड के पक्ष में झुका हुआ है .

    Reply
  17. Vinay Dewan

    इसका जवाब चुनाव मैं मिलेगा की किसके साथ कितने आदमी हैं अपनी बिकी हुयी अभिव्यक्ति को यंहा तो जगह मिल गयी लेकिन ऐसे लेख लिखते रहे तो शायद भारतीय आपको और बर्दास्त नहीं कर पाएंगे.

    Reply
  18. डॉ. महेश सिन्‍हा

    डॉ महेश सिन्हा

    अब तो प्रवक्ता और उसके संपादकीय निर्णय पर भी उंगली उठा दी गयी है । श्रीमान मीणा जी बताएँगे की क्या उनकी परिकल्पना है देश को चलाने के लिए क्योंकि इनहोने दोनों बड़ी पार्टियों को नकार दिया है । नकसलवाद का जो कारण इनहोने बताया है उससे तो यही लगता है की इन का झुकाव क्षद्म धर्म निरपेक्षी तथाकथित मानवधिकारवादी की तरफ लगता है , जो नक्सलवाद को बढ़ावा दे रहे हैं ।

    Reply
  19. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    एक तो झुठ उपर से नौटंकि ओर.कौन है आदिवासि????आदिवासि का अर्थ होता है जो प्रारम्भ से रहता आया हो,क्या हम नहि रहते है जहा???ये नोटंकि नही चलेगि,एस देश का सभी हिन्दु आदिवासि है ना कि केवल वो जो एक संवैधानिकि खामि का मजा लुट रहे है.
    ना जाने कितने ही शोधो से ये सिध हो चुका है कि हिन्दु यहि का निवासि है,वर्तमान कि शोध जो जीन आधारित पधति पर है कहति है कि कम से कम ५० हजार साल से भारत एक समाज के रुप मे रह रहा है,एस पधति को समझना इन सहाब की बोधिक योग्यता के बहार की चिज है.
    जैसा कि मेने पहले लिखा था कि ये लोग हमेशा से संघ से बैर खाते है क्योकि हिन्दु कि बात आने पर इनकि जातिवादि दुकान्दारि बण्द हो जाति है,और ये बात ये सहाब बार बार खुद को आदिवासि बता कर प्रोव कर ही रहे है.
    ………………………

    Reply
    • अभिषेक पुरोहित

      abhishek purohit

      हा एक बात और मेरा यहा किसि को आदिवासि कहना कोयी जातिगत विचार के कारण नही है बल्कि उस मानसिकता पर है जो बार बार समाज को जातिवादि वैमनस्य मे धकेलति है,प्रश्न पुछने पर प्रश्न्कर्ता को हि गालिया बकती है……………एसका किसि जाति से लेना देना नही है केवल जाति के नाम पर अपना स्थान फ़िक्स करना है,और ये ही राज्स्थान मे करने कि कोशिश कि थि मिणा और गुजर्र नेताओ ने पर धन्य है राज्स्थान कि वीर प्रसुता धरती जल्द ही समरसता को पाकर शान्ति लौट आयी,जिसके लिये केवल और केवल राज्स्थान के लोग जिम्मेदार है ना कि जातिवादि आग भडकाने वाले एसे तथाकथित बुधिजिवि………………………..

      Reply
  20. दीपक चौरसिया ‘मशाल’

    Dipak 'Mashal'

    हाँ एक बात और कि लेखक के अनुसार कराते, जूडो, कुंगफू आदि सीखने वाले सभी आतंकवादी ही हुए क्योंकि वो भी संघ की शाखाओं में हथियार(जो सिर्फ लाठी ही है) सीखने की तरह आत्मरक्षा का प्रक्षिशन लेते हैं.. पर महानुभाव संघ वालों को तो मैंने भी कभी लाठी भांजते नहीं देखा.. हाँ हाथ में लेकर जरूर चलते हैं. अपनी कलम को ईश्वर के सामने रखा कीजिए सर शायद वो झूठ बोलना छोड़ दे..
    यदि ए.सी. में बैठ के लिखने से फुर्सत हो तो बन्धु कभी किसी शाखा में होके आइये और जानिये कि आप कितनी बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं.. ye सब मीडिया की उपज है जो सिर्फ झूठ की नींव पर खड़ी है और किसी दिन भरभरा कर गिरेगी.. मैं भी कभी इसी तरह का सिचता था लेकिन जब कुछ शाखाओं में खुद जाके देखा उनके सही अनुयाइयों से मिला तो अपनी ही सोच पर दुःख हुआ..
    आपको मेरी बात कडवी जरूर लगेगी लेकिन एक बार आजमा के देखेंगे तो आपको भी ख़ुशी होगी कि जीवन में एक गलतफहमी को तो दूर कर पाया.. आतंकवाद और संघ के अंतर को समझिये.. कभी-कभी पूर्वाग्रह आपको असलियत से बहुत दूर ले जाते हैं..

    Reply
  21. दीपक चौरसिया ‘मशाल’

    Dipak 'Mashal'

    एक गैरजिम्मेवाराना, कोंग्रेस के लिए अंधभक्ति दर्शाती, कई सारे झूठे तथ्यों पर आधारित और मनगढ़ंत पोस्ट कह सकते हैं इसे.. मैं ना ही बहुत कट्टर संघ समर्थक हूँ और ना ही भाजपाई लेकिन झूठ के खिलाफ हूँ.. चाहे वो मुसलमाँ बोले या हिन्दू.. झूठ-झूठ है और आपने भी कई सारी सिर्फ सुनी सुनाई कहानियाँ लिख दीं. इस तरह के आलेख प्रवक्ता.कॉम की निष्पक्षता को भी संदेह के कटघरे में खड़ा करते हैं..

    Reply
  22. Anil Sehgal

    “भाजपा को नहीं, भारत को बचाना है!”
    -by- डॉ. पुरुषोत्तम मीणा

    (१) उपर का लिखा अवलोकन कर, समझ नहीं आ रहा कि :

    – किसी भयावह वृतांत से गुजर रहा हूँ; या
    – राजनीति पर कोई लेख पढ़ रहा हूँ; या
    – फिर कोई काल्पनिक कृति.

    (२) फिर लेख और टीका-समीक्षा पर लगी क्रासिंग और अचम्भा दे रही हैं.

    (३) यह क्रासिंग क्या फिल्मी सेंसर censor है or पत्रिका की censure परिनिंदा ?
    (४) झूठा लेख पढ़ और क्रासिंग देख – विस्मय और बहुत दुःख हुआ है.

    (५) अपेक्षा करता हूँ कि भविष्य में प्रवक्ता पढ़ आनंद आया करेगा.

    Reply
  23. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    विद्वान लेखक पंकज झा जी के लेखों को पढ़ कर सदा लगा कि वे केवल विद्वान नहीं , उनकी प्रस्तुती भी सशक्त है. उनपर टिप्पणी करने से पहले अच्छी तरह सोचना पड़ता है. उनके द्वारा वर्धापन मेरे लिए महत्व पूर्ण है.
    – प्रवक्ता.कॉम पर इस प्रकार के गैर जिम्मेवार लेख प्रकाशित होना सच मच इसकी देशभक्त और जिम्मेवार छवि को खराब करने वाले हैं. इन्हें देश व पत्रिका की हित में रोका जाना चाहिए. देशभक्त संगठनों के विरुद्ध अनर्गल और अतिवादी लेखन और वह भी बिना प्रमाणों के, यह तो सर्वथा अनुचित है. कृपया इस पर उचित कार्यवाही करें और डा. मीना जी से खेद प्रकाशन के लिए कहें . यदि वे अपनी अक्षम्य भूल का परिमार्जन नहीं करते तो उनकी सामग्री पर रोक लगनी चाहिए. प्रवक्ता.कॉम को भी तो खेद प्रकाश करना चाहिए जो कि आपकी छवि के अनुकूल होगा.
    – डा. मीना जी के लेखन का दर तक अध्ययन करके मुझे संदेह हुआ कि वे क्रिप्टो क्रिश्चानों जैसी घूर साम्प्रदायिक व हिन्दू विरोधी, देश -समाज तोड़क भाषा का प्रयोग कर रहे हैं. अतः मैंने उनसे इसके लिए स्पष्टी कारन माँगा ( प्रवक्ता.कॉम पर)
    तो उन्हों ने एक भी प्रश्न का उत्तर दए बिना यह काम अपनी समर्थक दीपा शर्मा को सौंप दिया. रहा-सहा संदेह भी दूर हो गया कि ये लोग भारत-भारतीयता के विरोधियों की जुंडली ही है. क्रिप्टो क्रिश्चन बतलाये जाने पर सफाई का एक भी शब्द नहीं, कोई रोष या विरोध नहीं. तो फिर क्या ये सही साबित नहीं हो रहा कि ये एक क्रिप्टो क्रिश्चन( गुप्त ईसाई) हैं और ये गुप्त ईसाई भारत के अनेकों देशभक्त ईसाईयों से बिलकुल अलग मानसिकता के होते हैं. ये घोर भारत व भारतीयता के विरोधी ही नहीं छद्म शत्रु होते हैं. इन महोदय के २-३ लेख पढ़ें तो स्पष्ट हो जाता है कि ये भारत में विद्वेष के बीज बोने, भारत को तोड़ने के लिए काम कर रहे हैं. इनका गुप्त अजेंडा है कि भारत को पूर्णतः अहिंदू बनाकर पवित्र पोप के शरण में लाना. ज़रा यद् करें कि आजकल इनकी सरपरस्त हैसियत सर्वोच्च सत्ता पर परोक्ष रूप से काबिज है. अतः इनकी जल्दबाजी और ऐग्रेस्सिवनेस समझ में आती है.
    – ऐसी ताकतों को बेपर्दा करदेना इनका सर्वोत्तम इलाज है क्यूंकि सच को छुपाकर झूठ को स्थापित करना ही तो इनका सबसे बड़ा हथिया है.

    Reply
  24. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    दो:
    (५) इंग्लैंड की संघ शाखा में जानते हैं, उस समय की, प्राईम मिनिस्टर मार्गारेट थॅचर “वर्ष प्रतिपदा- (जो डॉ.हेडगेवार जी का जन्म दिन भी) उत्सव में आयी थी। पुलीस की रपट के अनुसार संघ के स्वयंसेवक अनुशासित, और संस्कारी पाए गए थे, इसलिए।बहुत प्रभावित रही। तब जानते हैं, उसने क्या कहा? उसने कहा, कि हम अन्य सभीको इस melting pot देश में melt होने के लिए, कहते हैं।पर आप अपनी कल्चर बनाए रखिए, और आप अपने गुणों को अन्य युवाओं में फैलाएं। जिससे सारे युवाओं में सुधार होगा।
    हिंदुने दुनिया भरमें कहीं भी आतंक या वैमनस्य (अपवाद, शायद जानता नहीं) फैलाया नहीं है।इसका यह परिणाम है।
    सच्चा हिंदुत्व सभीकी भलाइ चाहता है। तर तम भाव, और वरीयता से विचारता है।
    (६‍) हिंदुत्व का बट वृक्ष उदार भले रहे, पर ऐसा भी उदार नहीं, जिससे उसकी जडे ही उखाडी जाए, और वह स्वतः ही मिट जाए। उसकी जडे उखाड कर कोई फेंक दे, तो विश्वको सच्चा आध्यात्मिक संदेश देनेवाला कोई दूसरा बचेगा नहीं।इसी लिए संघ संगठन से सशक्त होना चाहता है।
    दुनिया भरमें कहीं भी “सर्वेपि सुखिनः संतु..-या-.”विश्व बंधुत्व” में मानने वाला, और कोई धर्म नहीं है। सारे अपने अपने अनुयायियों को स्वर्ग, और मीणा जी हमें, नरकमें भेजते हैं।
    आपसे अनुरोध: आप अगर गुजरात जाकर देखना चाहते हैं, तो प्रबंध किया जा सकता है। जो गुजरात की उन्नति आप देखेंगे, मोदीजी से भेंट करेंगे। बहुत अलग विचार रखनेवाले भी चकित हुए हैं। सारा संघ-विरोधी गुजराती आमूलाग्र बदल गया, सच्चाई बहुत गहरी छाप छोडती है।”जे. पी.” भी घोर विरोधक थे फिर प्रशंसक हुए। प्रश्न पूछे?
    == कोइ बँक ज्यादा ब्याज दे, तो आप अपनी बॅंक बदलेंगे या नहीं?== बडा दीर्घ हो गया।

    Reply
  25. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    एक:
    आदरणीय मीणा जी।
    आपका यह लेख, आपकी सदा की गुणवत्ता दर्शाता नहीं है। शायद व्यस्तता के कारण यह हुआ होगा। लेकिन लेखनी तीर की भाँति होती है। छपने के बाद उसे (delete)विलुप्त नहीं किया जा सकता।
    (१) आपको निम्न साइट देखनेका अनुरोध करता हूं।आज के दिनांक में ३४३४३ (चौतीस हज़ार तीन सौ तैंतालिस ) एकल स्कूल “स्वयंसेवी” रुपमें चलाए जा रहे हैं। http://www.ekalindia.org/ekal_new/index.php-ऐसे छोटे बडे देढ लाख के उपर प्रॉजेक्ट संघ प्रेरित संस्थाएं स्वायत्त रूपसे (संघ टांग सामान्यतः अडाता नहीं है, संघ डिक्टेटर नहीं है।)चल रही है। केवल प्रेरणासे सारे बंधे हैं।
    (2) आपने –माणिक चंद्र वाजपेयी, और श्रीधर पराडकर लिखित, “ज्योति जला निज प्राण की” जो १९४७ विभाजन के समय संघके ५०० से अधिक स्वयंसेवक जो पाकीस्तान से हिंदुओं को सुरक्षित लाने में वीर गति प्राप्त हुए थे, उनकी नाम, नगर और छायचित्र सहित जानकारी की ऐतिहासिक(५७५ पृष्ठोंकी) पुस्तक है।जो, पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करती है।कहीं आपके नगरके संघ कार्यालयसे आपको पढने के लिए लानी चाहिए।
    (३) पाकीस्तान के “डॉन” ने १९४७ की १४ अगस्तके संपादकीय (Editorial) में, संघकी अप्रत्यक्ष रीतिसे प्रशंसा की थी। कहा था, कि संघ १९२५ के बदले यदि १९३५ में हुआ होता, तो आज जो पाकीस्तान हमें मिला है, उससे दुगुना क्षेत्र हमें मिलता।और यदि १९१५ में ही संघ स्थापित होता, तो आधा क्षेत्रभी मिलना कठिन था।–यह कौन कह रहा है? “डॉन”।
    (४) एक कॉमन सेन्स निरिक्षण: जिस गुजरात में १९८५-९० तक बहुसंख्य गांधी वादी, और कांग्रेसी थे, जिसका संघ विरोध चरम था। उदा: मेरे संघमें जाने लगने पर सारे मेरे मुंबई के महोल्ले के मेरे गुजराती मित्रोने मेरा कडेसे कडा बहिष्कार किया, कोई भी मुझ से मित्रता(बोलने तक तैय्यार नहीं था) करने तैय्यार नहीं था; उसी गुजराती बहुल गुजरातमें एक संघ स्वयंसेवक नरेंद्र(भगवान नहीं है, गलतियां भी कर सकता है) अपने निःस्वार्थी संघ संस्कारों के कारण, और कठोर परिश्रम से नंदनवन बना पाया है। जो ५५ वर्षमें कांग्रेस कर ना पायी, उसने कुछ चंद वर्षोंमें कर दिखाया है। यह मिडीया निर्मित कपोल कल्पित कहानी नहीं है। आप को एक बार मीणा जी गुजरात जाना चाहिए। आंखो देखी सच्चायी कुछ और ही परिणाम करती है। नरेंद्र मोदी जी से भेंटका भी प्रबंध किया जा सकता है।

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  26. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    कौन है ये लोग??
    सबसे पहले हमे यह जानना पडेगा कि संघ को गालिया बकने का धंधा करने वाले ये लोग है कौन,अगर हम इनके बारे मे थोडा भी जागरुक होकर जाने तो पल मे पता चल जाता है कि ये लोग जातिवादि राजनिति का धंधा करते है जहां भइ हिन्दु एक होकर एक सवर मे बोलता है तो इन्को अपनी दुकानदारि बण्द होने का खतरा दिखयि देने लगता है तो ये लोग वहा पहुंच कर वंचित बन्धुओ को भडकाते है,सामाजिक माहौल को बिगाडाने की इन लोगो की पुरि कोशिश होती है क्योकी इनके राजनितिक आका नही चाहते कि हिन्दु एकता हो,गुजरात के चुनावो के समय एन लोगो ने गांव-गांव,गलि गलि गुम गुम कर बहुत द्ष्प्रचार किया लेकिन गुजरात के हिन्दुओ ने इन्को दिन मे तारे दिखा दिये,इन लोगो के नाम पर ना जाने कितने ही एन्जीओ बने होते है जो सरकार से फ़ड लेते है हि विदेश से बहुत पैसा आता है,इन लोगो के पास कोयी तर्क नही होता अस्स्भ्य भाषा मे संघ को,हिन्दुओ को गालिया बकना ही इनका लक्क्ष होता है,पुरा का पुरा झुठो का पुलिन्दा लिखने वाले इन लोगो को पत्र-पत्रिकाये अपने पत्र मे स्थान देती है क्योकि इनके साथ फ़र्जि नामो कि फ़ेसियत जो होति है,ज्यादातर केसो मे पत्र इनके वास्त्विक उद्दद्देश्य से अनजान ही रहते है,येन केन ये लोग चाहते है कि जातिवादि माहौल बन और समाज में वैम्न्स्य बढे ताकि गरिब व वन्चित लोगो का आसानि से धर्मान्तरण हो,और इनका आसान लक्क्ष्य हमेशा संघ रहता है,क्योकि अपने पुरि शक्ति होने के बाद भी संघ अमुमन प्रतिकिर्या नही करता,केवल देख कर हंस देता है तो इन लोगो को लगता है कि संघ तो ठिक है हम गालिया बकते जाते है पर ये लोग कुछ नही बोल रहे है एस लिये इनकि भाषा और असभ्य होती जाती है.
    अब आते है प्रस्तावित सहाब के लेख पर,जिस किसि ने भी इन सहाब के सारे लेख पढे है वो कुछ बाते समझ सकता है जो निम्न है:
    १.आरक्षण समस्या को दुर करने का उपाय नही बल्कि अधिकार है,जो अन्नत काल तक बना रहेगा.
    २.हिन्दु धर्म कुछ नही केवल बामण-राजपुत-बनिया वाद है,सारि बुराईया हिन्दु धर्म मे है.
    ३.हिन्दु एकता कि बात करना बहुत बडा पाप है,चुंकि संघ ये काम कर रहा है इस लिये बहुत बडा अपराधि है,अत: चाहे झुटः हो या असभ्य हमें बस संघ को गालिया बकनी है.
    ४.कश्मिर तो मुसलमानो का है कश्मिर मे अल्गावाद संघ कि देन है,पथर जो मार रहे है वो संघ के लोग है.
    ५.संघ के लोगो ने ही खुद के घरों मे आग लगा कर पिछडो को भडकाया है.
    ६.राम मन्डिर कभी नही बनना चाहिये मन्दिरो को तोडना तो मुसलमानो का जन्मसिध अधिकार है जैसे हिन्दुओ को गालिया बकना हम्र्रा.
    ७.पुरे भारत मे केवल संविधान तो हमे ही पता है बाकि तो मुर्ख है,सारि योग्यताए तो केवल हमारे पास है बाकि तो जातिवाद के चलते पास होते है.
    ८.आई ए एस कि परिक्षा मे धांधलि होति है क्योकि ज्यादा बाम्ण-बनिये बनते है और जनसख्या से ज्यादा तो कोयी कुछ बन ही नही सक्ता.
    ९.धर्मान्तरण भले ही कर लो केलिन नाम चेण्ज नही करना क्योकि नाम चेज किया तो आरक्षण हट जायेगा जो हमारा जन्मसिध अधिकार है.
    १०.भाजपा सब्से बुरी पार्टि है अत: आप लोग कांगेरेस को सपोर्ट करो.
    ११.हिन्दु तो नारियो को बहुत बुरि दशा मे रखते है{पता नही अपनि माता जि और पत्नी से पुछा या नही}
    १२.हिन्दु धर्म तो केवल मनु स्म्र्ति मे है और वो भी वो व्याख्या जो हम करे बाकि सब गलत है.
    एसि कुछ बाते जो मेने नोट की है हालाकि और भी बहुत देमाग मे आ रही है जो बाद मे लिखौन्गा.अगर हम उप्रोक्त बातो को एक सम्ग्र रुप से देखे तो बहुत ही सर्ल शब्दो मे जो चिज उभर क सामने आति है वो ये है कि ये बुधिजिवि का दम भरने वाले कोन्गेस व किर्श्न मशिनरियो से पैसे खाकर केवल केवल संघ को गालिया बकने का धंधा कर रहे है,जाहिर सि बात है फ़र्जि संघटनो के नामो की वजह से इनको “प्रवक्ता” ने स्थान दिया है लिकिन क्या कोयी ये पुछने वाल है कि आप जो बक्वास लिख रहे हो उसके पुछे कोयी तर्क है?कोयी सबुत है?? कोयि बौधिक आधार है???कोयि रचनात्मक कार्य है??समाज मे प्रेम फ़ैले इसकि कोयि योजना है?? दुष्प्रचार को स्थान देना मेरी नजर मे अभिव्क्ति कि स्व्तन्त्र्ता का दुरुपयोग करना ही है आशा है सम्पाद्क महोद्य व प्रव्क्ता हमारे एस विचार को समझेगि.

    Reply
  27. निरंकुश आवाज़

    आरदरणीय सम्पादक जी,
    ========================
    बेहतर होता कि आप साफ तौर पर इस आलेख को प्रकाशित करने से इनकार कर देते या इस बारे भी वैसे ही चुप रहते जैसे कि आपने गाँधी पर लिखे गये मेरे लेख को आज तक दबा रखा है, उसी प्रकार से इस लेख को भी दबा देते।
    ========================

    आपने मेरे इस लेख को न चाहते हुए भी प्रकाशित करके मेरी इस सोच को प्रमाणित कर दिया है कि देश के एक प्रतिशत से भी कम लोगों के बौद्घिक कब्जे को नकारना असम्भव है। यहूदियों के वंशजों को नकारना एवं उनके शिकंजे से मुक्त होना इस देश में किसी के लिये आसान काम नहीं है।

    पहली बार मुझे यह देखने को मिल रहा है कि आपने लेखक के विचारों को सम्मान देने का दिखावा करने के साथ-साथ हिन्दुत्व को आतंक का पर्याय बना चुके लोगों के दबावों को भी बखूबी झेला है।

    कितने आश्चर्य की बात है कि आपने कभी भी तोगड़िया के सम्प्रदायिकता फैलाने वाले एवं चिपलूनकर के लेखों में लिखी गयी अपमानजनक बातों को इस तरीके से क्रोस करके प्रकाशित नहीं किया, जैसा कि इस लेख में किया गया है।

    इससे तो बेहतर होता कि आप साफ तौर पर इस आलेख को प्रकाशित करने से इनकार कर देते या इस बारे भी वैसे ही चुप रहते जैसे कि आपने गाँधी पर लिखे गये मेरे लेख को आज तक दबा रखा है, उसी प्रकार से इस लेख को भी दबा देते।

    आपको मजबूर नहीं होना चाहिये। सम्पादकीय धर्म कभी भी दो नावों पर सवार होकर पूर्ण नहीं किया जा सकता! एक तरफ तो आप विचारों को प्रकट करने के लिये हर किसी को अवसर देना चाहते हैं, दूसरी ओर हिन्दुत्ववादी आतंकियों को प्रसन्न भी रखना चाहते हैं। दोनों बातें एक साथ सम्भव नहीं है।

    यदि आप इंसाफ और निष्पक्षता में विश्वास एवं आस्था रखते हैं तो (जिसके सम्बन्ध में, मैं पक्षधर रहा हूँ) आपसे आग्रह है कि आप अपने एक पक्षीय पाठक वर्ग को खुश करने के लिये मेरे इस लेख को हटा दें। या फिर क्रोस की गयी पंक्तियों के पीछे अन्तर्निहित सम्पादकीय न्याय को सामने लायें।

    आदरणीय सम्पादक जी मैं जानता हूँ कि इस देश के 98 प्रतिशत से अधिक लोगों के हकों को छीनने और कुचलने वाली प्रवृत्तियों में लिप्त लोगों के विरुद्ध आवाज उठाना पहली बार तो आसान नहीं है और यदि आवाज उठायी जाती है तो फिर आरएएसएस के घटिया लोगों की, घटिया शब्दावली, धमकियों, गुण्डागर्दी और दहशत पैदा करने वाले माहौल को सहने के लिये तैयार रहना पडता है। लेकिन जिन लोगों को अपनी जान प्यारी नहीं होती उन्हें इनसे कोई फर्क नहीं पडता है। कोई आश्चर्य नहीं कि एक दिन आपको अपनी साईट पर मजबूर होकर प्रकाशित करना पडे कि आरएसएस/विश्व हिन्दू परिषद/भाजपा के गुण्डों ने डॉ. पुरुषोत्तम मीणा का कत्ल कर दिया है। प्रवक्ता पर कलुषित विचार प्रकट करने वाले कुछ पाठकों की ओर से ऐसे प्रयास प्रारम्भ भी हो चुके हैं।

    कोई मुझे बेशक सोनिया का, क्रिश्चनों का या विदेशियों का एजेण्ट कहता रहे, इससे मुझ पर कोई असर नहीं होने वाला। मैं न तो कांग्रेसी हूँ (गाँधी वाला लेख आपने प्रदर्शित किया होता तो सबको पता होता) और न हीं क्रिश्चयन, लेकिन जिन लोगों के पास शिष्टतापूर्वक और तार्किक आधार पर कहने को कुछ भी शेष नहीं रहता है तो वे या तो लेख को हटाने की बात करते हैं या फिर घटिया भाषा या तू-त‹डाके की भाषा का इस्तेमाल करने लगते हैं। या फिर गुण्डागर्दी करते हैं।

    हम आदिवासियों को इसकी आदत है। कम से कम मुझे तो 30 वर्ष पूर्व ही इन लोगों ने यह सब सिखला दिया है। वैसे अब हमने ऐसी बातों का हर मंच पर जवाब देना सीख लिया है। जिन विषयों में पारंगतता नहीं है, उनमें भी हासिल कर रहे हैं।

    यहूदियों के वंशजों द्वारा आदिवासी की आवाज को दबाने का नतीजा नक्सलवाद के रूप में संसार देख रहा है। यदि आगे भी ऐसा ही होता रहा तो हालात अनियन्त्रित होना तय है। फिर ये शोषक और अत्याचारी किन लोगों पर शासन करेंगे।

    कुछ लोग मुझे काँग्रेस एवं नेहरू-गाँधी परिवार का समर्थक या पिठ्ठू मानते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इन लोगों ने ही देश और विशेषकर आदिवासियों को अंधकूप में धकेला है। देश को इन्हीं लोगों ने बर्बाद किया है, यहाँ तक कि आरएसएस जैसे आतंकी संगठन को काँग्रेस ने पालापोसा है। जो अब देश के लिये भिण्डरवाले का रूप लेता जा रहा है।

    सम्पादकजी आप अपना निर्णय तो लीजिये और इस देश को नौच-नौच कर खा रहे एवं लगातार शोषण कर रहे लोगो के विचारों को समर्थन दीजिये। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि आपकी साईट पर भविष्य कभी कोई लेख नहीं भेजूँगा।

    शुभकामानओं सहित
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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  28. Ravindra Nath

    मीणा जी आशा है कि आपके परिवार मे सब कुशल मंगल से होगे, पर लेख को देख कर लगता है कि अभी भी आप मानसिक तनाव मे हैं। कृपया कुछ दिन अवकाश ले तत्पश्चात आप स्थिर चित्त से गंभीर लेखन कर सकेगे।

    Reply
  29. पंकज झा

    पंकज झा.

    प्रवक्ता का सौभाग्य है कि उसके साथ गम्भीर, विद्वान एवं स्तरीय पाठकों की जमात है. डा. मधुसूदन साहब एवं डा. राजेश कपूर प्रभृति अध्येताओं की टिप्पणी पढ कर दुविधा हो जाता है की लेख महत्वपूर्ण है या टिप्पणी. खास कर जब वह टिप्पणी अपने जैसे किसी अल्पग्य के लेख पर हो तो संकोच का पारावार नही रहता. अफसोस हो रहा है की ऐसे महानुभावों को अपनी उर्जा इस तरह के बेहुदा आलेखों पर टिप्पणी देने में लगा पड़ा है. अभिषेक और रमेश जी की बातों से सहमत की सम्पादक यह लेख वापस ले लें और अपने साइट के साख की खातिर ऐसे उल-जुलुल कथित लेखकों को अपना मंच देने से बचें.

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  30. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    मुझे तो पहले ही पता था कि ये सहाब दिमागी रुप से विक्षिप्त है,अरे मुर्ख! अरे सरकार के पास थोडा भी सबुत होता तो अब तक ये कोन्ग्रेस्स सरकार संघ पर बैन लगा देती पर कुछ नही है सरकार के पास,केवल नॊटंकि है,जिस घटिया भाषा का प्रयोग तुमने किया वो बताता है कि तेरे घर के संस्कार कैसे है??तेरे जैसे लोग ही सामाजिक समरसता को तोडते है,जितना झुट का पुलिंदा लिखा है,कोयी सबुत है तेरे पास????ये लेख लिखकर तुने साबित कर दिया कि तु राजनितिक आकाओ के इशारो पर नाच कर समाज मे वैम्नस्य फ़ैलाने वाला एक अपराधि से बडंकर कोयी और नही है.सम्पाद्क जी मेने अत्यधिक कटु भाषा का प्रोग किया है और उससे भी ज्यादा आति है,क्या आपको लगता है कि ये सहाब जिनका लेख आपने छापा है कोयी एक भी तर्क संगत बात कर रहे है???
    क्या आप चाहते है कि आपका ये मंच एसे लोगो के हाथों कि कथपुतलि बनें जो फ़र्जि नामो से ,फ़र्जि संगठनो से,आपके एस मंच का दुरुप्योग करने लगे है????पिछले १५ साल से नियमित शाखा जाता कभी भि कोय प्रकार कि हिन्सा मे भाग नहि लिया,क्योकि सघ मुझे प्रेम करना सिखता है,एसे गधे के लेख पढ कर बोधिक हिंसा कि जरुर इच्छा हो रही है,इससे बहुत ज्यादा योग्य्ता है संघ के स्व्यंसेवको में,अगर ये सहाब कोयि सबुत नही दे सकते तो ये मान कर चलिये ये कोयि कोन्गेसि कन्व्रटेड किर्शन है जो आपकि भलामान्सता का लभ उथा कर राजनेतिक गोटिया फ़िट करने मे लगे है,मुझे अभि तक का सबसे घटिया और बिल्कुल बकवास लेख लगा है,अगर आप इसे वापस नही लेते तो ये बात मेरि समझ मे अच्छि तरिके से आ जायेगी आप भी इन सज्जन{?} से मिले हुवे है,हम लोगो के पास फ़ालतु टाइम नही है कि जातिवादि लोगो के प्रलाप का उत्तर देते फ़िरें,ये तो इनका धंधा है,दो चार के नाम तो मुझे भी पता है.

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    • अभिषेक पुरोहित

      abhishek purohit

      मै क्षमा चाहता हुं कि मेने अनेक जगह सम्मनिय लेखक के प्रअति कुछ अस्भ्य्ता क प्रयोग किया निश्चित रुप से यह हाम्रि संस्क्रिति नही है,पहलि बार जब मेने ये लेख पडा तो मुझे बहुत ज्यादा गुस्सा आया थ और मेने बहुत संयत होकर लिखा अगर कोयी डिलिट का ओप्शन हो तो सम्पादक जी आप मेरा पुराना कमेण्ट डिलित कर दिजिये

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  31. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    वैसे तो डा. मीना जी का पूर्वाग्रह इस लेख में बार-बार झलक ही जाता है. भाजपा के विरुद्ध इतने अतिवादी व शत्रुता पूर्ण की ऐतिहासिक तथ्यों को भी झुठला दिया. आदरणीय मीना जी इतिहास आपके कहे अनुसार बदल नहीं जाएगा. आप के इलावा भी लोग हैं जो इतिहास पढ़ते हैं. अतः इतना असत्य तो न लिखें कि आपकी विश्वसनीयता ही खतरे में पड़ जाए.
    – वैसे तो भाजपा की छवी निश्चित रूप से अच्छी नहीं है. पर आपको ये इल्हाम कैसे हो गया कि भाजपा अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है? कोई तथ्य, कोई प्रमाण, कोई आंकड़े ?
    – एक सच ये साफ़ नज़र आ रहा है कि अपने जन व देशविरोधी व्यवहार के कारण खतरे में कोई है तो वह केवल कांग्रेस है.जनता साफ़-साफ़ देख रही है कि सोनिया जी के नेतृत्व में चल रहे शासन ने देश की जनता के हितों की कीमत पर विदेशी व्यापारियों के हाथों में देश के संसाधन बेचने का काम बड़ी निर्लाज्ज्ता से जारी किया हुआ है. अब इस सच पर पर्दा डालना असंभव हो गया है. अतः देश के हितों के विरुद्ध व्यवहार के कारण संकट में कांग्रस है न कि भाजपा या और कोई दूसरा दल ? कहीं इसी चिंता और बौखलाहट व घबराहट की अभिव्यक्ती तो नहीं आपका यह झूठ व कडवाहट से भरा लेख ?
    – आप ने जो कुछ भी कहा है उससे लगता है कि आपने इतिहास का अध्ययन नहीं किया है. या फिर आप किन्ही गुप्त उद्देश्यों की पूर्ती के लिए झूठ बोल रहे हैं.बहुत लम्बी बात नहीं, संक्षिप्त में कहता हूँ. इतिहास की गन्दगी उघाड़ने पर आपने मजबूर कर दिया है. तो देखिये कि इतिहास का प्रमाणिक सच क्या है —–
    *भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने कांग्रेस कमेटी व वर्किंग कमेटी की अनुमती लिए बिना, कांग्रेस की पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्ती की शपथ (२६ जनवरी, १९३०) को ठुकरा कर डोमीनियन स्टेट तथा भारत विभाजन स्वीकार करने का पत्र माऊंट बैटन को सौंप दिया. इतना बड़ा धोखा पार्टी और देश के साथ करने का कारण थी नेहरु जी की प्रेमिका एडविना, माउंट बैटन की पत्नी.
    – ‘एडविना माउंटबैटन’ नामक पुस्तक में जैनेट मॉर्गन ने लिखा है, ” सत्ता हस्तांतरण संझौता-वार्ता में जो लोग थे उनकी पत्नियों की विशेष भूमिका थी ; और उसमें अग्रणी भूमिका एडविना की और उसके नायक जवाहर लाल नेहरु की , जो विधुर और अकेला था और जिसे अपने जीवन में एक औरत की ज़रूरत थी.” ( प्री.३२३) देश को डोमिनियन स्टेट बनाने और देश का विभाजन स्वीकारने का निर्णय अकेले नेहरु का था. पर देश पर नेहरु शासन होने के कारण नेहरु के इस राष्ट्र-घाती अपराध पर पर्दा पडा रहा.
    -एडविना के प्रती नेहरु में इमानदार रहे होंगे पर एडविना तो केवल आपने राष्ट्रीय हितों को साध रही थी. उसका चरित्र कैसा था, इसका एक उद्धरण देखें,
    ” उसके पार्क लें के घर ‘ब्रुक हाउस’ में बटलर को हमेशा यह समस्या बनी रहते थी कि कैसे ह्यु,लैडी और बनी ( एडविना के प्रेमी) जब एक साथ तीनों आये हों उन्हें एक दूसरे के बारे में पता न चले.———–उसने अती कामुकता और बाई -सैक्सुँलिटी की शरण ली.” ( एन्ड्रयु रोबर्ट्स, एमिनेंट चर्चिलीयन,प्री. ५८)
    -नेहरु जी एडविना के आकर्षण में देश के प्रती कितने गैरजिम्मेदारहो गए थे इसका प्रमाण ये उद्धरण है , ”मई,१९४७ को माउंट बैटन और एडविना छुट्टी मनाने शिमला गए. एडविना के सलाह पर माउंट बैटन ने नेहरु को भी शिमला बुला लिया….. एकांत स्थलों में नेहरु और एडविना ने एक दूसरे की प्यार की कसमें खाई. जब शिमला में वाईसराय लोज में वे रंगीन हरियाली के बीच , फूलों बिछी पगडंडियों पर टहल रहे थे, उस समय नीचे मैदान में हिन्दुस्तान जल रहा था.”
    * ज़रा बतलाईये कि देश को तोड़ने और १० लाख लोगों की मृत्यु, बीसियों लाख लोगों के उजड़ने का जिम्मेवार कौन है?
    * कश्मीर पर हमले का जिम्मेवार पाक नहीं था? इतना झूठ चल नहीं सकेगा. आधा काश्मीर आज पाक के कब्जे में होने का कारण भी तो नेहरु जी हे हैं. उन्हों ने हे तो युद्ध बीच में रुकवा दिया था.
    – काश्मीर समस्या को पैदा ही नेहरु जी ने किया था प्लेबेसाईट की मुसीबत हमारे गले दाल कर. यु. एन. ओ. में काश्मीर समस्या को ले जा कर स्थाई रोग बनाने वाले नेहरू नहीं थे क्या? इन सब के पीछे उनकी प्रेयसी या विश कन्या एडविना ही थी जिसके अनेकों प्रमाण उपलब्ध हैं. क्या अप उन्हें जानना चाहेगे ?
    – कृपया ऐसी बात न कहें कि जिससे बाध्य होकर इतिहास के वे गड़े मुर्दे उखाड़ने पड़ें जो हमारे कांग्रेसी शासकों की अशोभनीय करनियों से भरे हुए हैं.

    Reply
  32. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    “भाजपा को नहीं, भारत को बचाना है!”
    -आदरणीय मीणाजी। कुछ अवधि के बाद आपका पुनर्लेखन हर्ष की बात है। चाहता हूं आप परिवार सहित सकुशल होंगे।
    “भाजपा को नहीं, भारत को बचाना है!”-
    किंतु मेरी दृष्टि में भारत को बचाने के लिए ही “भाजपा” को बचाना है।
    मान भी ले, कि भाजपा में कुछ बुरायियां है, पर वे कांग्रेसकी अपेक्षा नगण्य ना भी हो, तो निश्चितही कम है। सूज्ञ जन दो बुराइयों में से कम बुराई पसंद करेंगे।
    कारण:(१) १९४७ में १ डॉलर= १ रुपया था। आज १ डॉलर= ४५ से ४७ रुपयोंका दर चल रहा है। इसका सरल अर्थ यह हुआ कि “कांग्रेस” की सत्ता ही गत६३ में से ५५ से अधिक वर्ष, भारत में रहते हुए, जो तरक्की(?) हुय़ी उसका एक फल ही, हमारे रुपये का मूल्य घटता रहा है।
    कारण:(२) गुजरात (भाजपा) नें तो राष्ट्र को “आगे” बढने का एक स्वप्नातीत (सपने में भी सोचा नहीं जाता था, ऐसा सपनो की सीमा से भी पार का) मार्ग प्रशस्त किया है। भ्रष्टाचार रहितता, प्रजाके हित में “इ गवर्नेन्स”, क्षमता पूर्ण, ग्रामीण महिलाओं के घरेलु उद्योगों का स्थानिक शिविरोंमें प्रशिक्षण, ३-३ दिन के शिक्षकों की नियुक्ति के जिला जिला में शिविर, २४ घंटे पानी (मैं ने अह्मदाबाद में अनुभव, किया) {पूरा लेख लिखा जा सकता है}
    (३) गोधरा रेल घटनाके प्रतिक्रिया रूप दंगोंको आप जड मूल की घटना की अनदेखी करके नहीं देख सकते।
    (३अ) अगर देखें भी तो हिंदू संख्या में, मुसलमानों से ९ गुना था। कॉमन सेन्स कहता है, कि इसके माने, हिंदुकी हिंसाकी शक्ति मुसलमानों से ९ गुना थी। तो आप बताएं कि, क्या मुसलमानों के मरनेवालों की संख्या, हिंदुओं के मरनेवालों की संख्यासे ९ गुना थी? जी नहीं।{ मैं किसी के भी, मृत्यु से हर्षित नहीं हूं}
    (३आ) और यह हिंदुओंकी प्रतिक्रिया थी। मूल क्रिया के बिना, असंभव। मूल “कारण” का विश्लेषण किए बिना, केवल “परिणाम” के विषय को ही देखना अवैज्ञानिक, अतार्किक, अशास्त्रीय है।
    आंधीके कारण पेडके पत्ते हिले, तो मूल “आंधी”है; और “पत्ते हिलना” परिणाम है।
    पत्ते हिलने के कारण आंधी आयी, यह मानना अशास्त्रीय, अतार्किक, अवैज्ञानिक, और सामन्य समझ के भी परे हैं।
    (४) मीणा जी ६३ वर्षों में पहली बार, भारतके भविष्य के लिए मोदी जी के शासन से आशाकी किरणें और भारतके क्षितिज पर भाग्योदय की उषा की लालिमा दृष्टिगोचर हो रही है।
    (५) नॅनो का प्रकल्प (प्रॉजेक्ट) बंगालसे कहीं और नहीं, पर गुजरात ही क्यों गया?
    भारत के भाग्योदय में आप अवरोध तो नहीं करना चाहते?मैं इतने वर्षों में
    आज पहली बार भारतके विषयमें मोदी जी के शासन के कारण, कभी नहीं था, इतना उत्साहित हूं।
    भारतका सूर्य उगने जा रहा है।
    पूजकर उगते सूरज को जगत सब धन्यता मानता है।
    पर हम सच्चे सूरजको उगाने में, आयु दांव पर लगाए हैं।
    सूरजको उगने के लिए दिल्ली में प्रस्ताव पारित करने की ज़रूरत नहीं है।
    पर आपकी भी, सहायता आवश्यक है। यह काम किसी अकेले “नरेंद्र” का नहीं है। जनतंत्र में “॥स्वयमेव नरेंद्रता॥” संभव नहीं है।

    Reply
    • Ramesh Kumar

      आदरणीय संपादक महोदय,
      सादर नमस्कार

      आपकी वेबसाईट काफी अच्छी है और सभी विचार के लोगों को इसमें आप मौका दे रहे हैं । आप ऐसा कर भारत की वादे वादे जायते की परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं । यह अत्यंत प्रसन्नता की बात है ।

      उपरोक्त लेख का शीर्षक तो अच्छा है लेकिन उसके कंटेट में अनेक स्थानों पर कुछ ऐसी बातें लिखी गई हैं जो तथ्यों से परे हैं, जो आधारहीन है और बेबुनियाद बातें लिखी गई हैं । उदाहरण के लिए लेखक ने लिखा है -हिन्दुत्व के नाम पर संघ शाखाओं में हाथियारों के संचालन का प्रशिक्षण प्रदान करके सरेआम आतंकवाद को बढावा दिया जा रहा है।- यह सफेद झूठ है । मैं वाल्यकाल से स्वयंसेवक हूं । प्रतिदिन शाखा जाता हूं । मुझे किसी प्रकार की हथियारों के संचालन का प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया गया । हां यहां दंड का प्रयोग सिखाया जाता है । अगर लेखक की दृष्टि में दंड हथियार है तथा उससे सरेआम आतंकवाद को बढावा दिया जा सकता है तो मुझे उनकी दृष्टि पर तरस आता है।
      इस पर अधिक टिप्पणी नहीं करुंगा ।

      देश में अभिव्य़क्ति की स्वतंत्रता है । इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि किसी के खिलाफ अनर्गल कुछ भी और झूठी बातें लिखने को अनुमति दी जा सकती है ।
      आपसे विनम्र अनुरोध है कि इस तरह के गलत तथ्यों वाले लेखों को प्रकाशित करने से पहले तथ्यों को जांच लें । यदि कुछ गलत तथ्य लेखक ने लिखा हो तो उस लेख को न प्रकाशित करें । अन्यथा इससे आपकी वेबसाईट की विश्वसनीयता पर असर पड सकता है।

      धन्यवाद

      Reply

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