लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

‘आजतक’ टीवी चैनल ने ‘हे राम’ के नाम से कई संतों की पोल खोलने वाला ‘स्टिंग ऑपरेशन’ पर आधारित एक कार्यक्रम कल यानी 10 सितम्बर 2010 को प्राइम टाइम में प्रसारित किया। संतों को नंगा करने वाले ऐसे ही अनेक कार्यक्रम यह चैनल सास-समय पर दिखाता रहता है। इसबार के कार्यक्रम में चार संत मुरारी बापू,सुधांशु महाराज,दाती महाराज (शनि ग्रह वाले) और स्वामी सुमनानंद जी थे।

इन चारों संतों के बारे में बताया गया कि ये संतई के अलावा विभिन्न किस्म के गैर धार्मिक धंधे करते हैं। भारत का प्रत्येक नागरिक और इनके भक्त यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि सामयिक बड़े संतों में अधिकांश गैर संतई का धंधा करते हैं। मजेदार बात यह है जिन लोगों को इस कार्यक्रम में समर्थन में बोलने के लिए बुलाया गया उनमें बाबा रामदेव और धर्मेन्द्र जी के बारे में तो मैं कह सकता हूँ इनके पास गैर संतई का बड़ा कारोबार है। धर्मेन्द्रजी राममंदिर आंदोलन के गैर संतई के कारपोरेट प्रकल्प का हिस्सा रहे हैं और बाबा रामदेव का जड़ी-बूटी आदि का बडा व्यापारतंत्र और योग के मीडिया प्रोडक्ट का बड़ा धंधा है। सवाल यह है कि क्या गैर संतई के काम करने वाले इन संतों को ‘आजतक’ के संत फार्मूले के आधार पर संत माना जा सकता है?

यह कॉमनसेंस की बात है कि संतों के गैर संतई के धंधों को सब जानते हैं। जिस संत ने संपत्ति जुगाड़ करने, व्यापार करने, कैसेट बेचने, वीडियो बेचने, आशीर्वाद से काम कराने, इशारे से काम कराने आदि के कामों में अपने को लगा लिया है उसने संत के प्रचलित मार्ग का त्याग कर दिया है।

‘आजतक’ वालों ने जो बातें बतायी हैं वे कॉमनसेंस की बातें हैं इनसे संतों के प्रति घृणा पैदा नहीं होती। ‘आजतक’ वाले भूल गए कि संतों को उनके भक्त बहुत अच्छी तरह जानते हैं। वे जितना जानते हैं उसका चैनलों में एक प्रतिशत भी नहीं दिखाया जाता। संतों के भक्तों का संत के प्रति ज्ञान आज सत्य होते हुए भी निष्क्रिय है। क्योंकि संतों ने आम जीवन के उपयोगितावाद से अपने को जोड़ लिया है। कारपोरेट ढ़ंग से काम कराने की कला में महारत हासिल कर ली है। यह आदर्श स्थिति है कि संत सिर्फ भक्ति करें,उपासना करें और गैर धार्मिक कार्यों में भाग न लें।

चैनल वाले भूल गए यह कारपोरेट संस्कृति का जमाना है और धर्म को यदि जिंदा रहना है.संतों को यदि शोहरत हासिल करनी है तो कारपोरेट पद्धति अपनानी होगी और भारत के संतों ने इस बात को पकड़ लिया है। अब पुराने जमाने का धर्म कहीं पर भी नहीं बचा अब पुराने जमाने के संत भी नहीं बचे। पुराने जमाने में न्यूनतम से संत का जीवन चल जाता था आज नहीं चलता।

पूंजीवाद ने संतों को भी जीने का रास्ता दिखाया है। पहले संतों को जीने मात्र के लिए न्यूनतम पूंजी की जरूरत होती थी और वे प्रचार पर ध्यान नहीं देते थे। क्योंकि उनके पास स्थानीय और परंपरागत संचारतंत्र था। लेकिन नए संत वैसे नहीं हैं। ‘आजतक’ चैनल की मुश्किल यहीं पर है वह आज के जमाने में पुराने संत, संत की नैतिकता और धर्म को खोज रहा है।

मीडिया या टीवी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम मासकल्चर का फास्टफूड हैं। इनसे चैनल के दर्शकों को न सूचना मिलती है और नहीं ज्ञान मिलता है। सिर्फ समययापन में मदद जरूर मिलती है। इस तरह के कार्यक्रम संत-पंडित-पुजारी या धर्म का कुछ भी नुकसान नहीं करते। उनकी प्रतिष्ठा में इससे कोई कमी नहीं आती। उनके भक्तों की संख्या में गिरावट नहीं आती।

टीवी चैनल वाले यह सोचते हों कि उन्होंने किसी संत या धार्मिक संस्थान को नंगा करके तीर मार लिया या किसी महान यथार्थ का उद्घाटन कर दिया तो वे विभ्रम के शिकार हैं। संत या धर्म को आप मीडिया कवरेज से पछाड़ नहीं सकते। खासकर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ से तो एकदम नहीं। ‘स्टिंग ऑपरेशन’ काल्पनिक सत्य पर आधारित होता है। काल्पनिक सत्य को राज्य, कानून, सरकार, न्यायालय और जनता कहीं पर भी जनसमर्थन नहीं मिलता। वह काल्पनिक है और काल्पनिक से सत्य पैदा नहीं होता। काल्पनिक सत्य के लिए अवैध है।

उल्लेखनीय है मीडिया की साख बनी थी ‘खोजी पत्रकारिता’ से। इसके लिए उसने वास्तव को आधार बनाया और पवित्र तरीके अपनाए। इस तरह की पत्रकारिता के जरिए जो भी सत्य सामने आया उस पर समाज, न्यायालय, सरकार और जनता सभी विश्वास करते हैं। नए जमाने के भारतीय टीवी पत्रकार अब सत्य की खोज में ‘खोजी पत्रकारिता’ नहीं कर रहे हैं। बल्कि असत्य और काल्पनिक के आधार पर ‘स्टिंग ऑपरेशन’ कर रहे हैं। वे कीचड़ से कीचड़ धोना चाहते हैं। ध्यान रहे कीचड़ साफ करने के लिए स्वच्छ पानी चाहिए।

हम याद करें बोफोर्स कांड की ‘खोजी पत्रकारिता को और उसकी राजनीतिक परिणतियों को, बोफोर्स की दलाली का सत्य सरकार गिरा चुका है। कहने का अर्थ यह है सत्य का असर होता है काल्पनिक का चाहे वह कितना ही प्रामाणिक हो कोई असर नहीं होता। अथवा बहुत ही सीमित और तात्कालिक असर होता है।

यह भी ध्यान रहे पाखंड को टीवी कार्यक्रमों या मीडिया कवरेज से पछाड़ा नहीं जा सकता। क्योंकि मीडिया के ढ़ोंग और धर्म के ढ़ोंग में बिरादराना संबंध हैं। जिस तरह मीडिया में चीजें ‘फ्लो’ में पढ़ी जाती हैं और ‘फ्लो’ के अनुसार प्रभाव छोड़ती हैं वैसे ही धर्म की भी गति है। धर्म का भी ‘फ्लो’ है। ‘फ्लो’ को ‘फ्लो’ के जरिए नहीं पछाड़ सकते। तुलनात्मक तौर पर धर्म का ‘फ्लो’ ज्यादा है और वह प्रभावशाली भी है क्योंकि धर्म के ‘फ्लो’ को ग्रहण करके लागू करने वाली सक्रिय संरचनाए हैं। मीडिया के संतों को नंगा करने वाले ‘फ्लो’ का अनुकरण करने वाली सामाजिक संरचनाएं नहीं है। यही वजह है इस तरह के कार्यक्रम कोई सामाजिक असर नहीं छोड़ते।

6 Responses to “मीडिया का फास्टफूड है धर्म का ‘स्टिंग ऑपरेशन’”

  1. भारत भूषण

    Bharat Bhushan

    हमें यह अच्छी तरह समझ आ गया है, ये चैनल जो साधू संतों के स्टिंग दिखाते हैं, इन्हें सिर्फ हिन्दू साधू संतों में ही भ्रष्टाचार नजर आता है, कभी मौलवियों, मदरसों, पादरियों, चर्चों में भ्रष्टाचार नहीं नजर आता है, चर्च द्वारा ननों का शोषण नजर नहीं आता, लोभ देकर चर्च द्वारा धर्मांतरण नजर नहीं आता, मुसलमानों द्वारा जबरन धर्मांतरण नजर नहीं आता,
    मीडिया के इसी दोगलापण की वजह से आज, मीडिया पर लोगों का भरोसा उठ गया है, अधिकाँश हिन्दू दर्शक यह समझ गए हैं की, इस तरह का स्टिंग दिखाने वाले चैनल में विदेशी निवेश ज्यादा है या चर्च समर्थकों का निवेश है, इस लिए इन चैनलों का TRP भी घट रहा है, आज के डेट में थोडा अच्छा चैनल या कहें कम बायस्ड जी टीवी रह गया है,

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  2. अहतशाम "अकेला"

    बहुत अच्छा चतुर्वेदी जी

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  3. bharat raj purohit

    आज तक ओर आइ बी एन चेन्नल पे गुजरात मै सरकार ने बेन लगा दिया है गुजरात मै कोइ भी ये दोनो चेन्नल नही देख ता है

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  4. Vinay Dewan

    जिसके खुद के घर शीशे के हो उन्हें दूसरों पैर कीचड नहीं उछालना चाहिए….आज के दौर मैं मीडिया से बड़ा दुराचारी शायद कोई नहीं शायद नेता भी नहीं…जो काम मीडिया कर रहा है…उससे अब मीडिया के संवाददाताओं और रिपोर्टरों के गली गली मैं पिटने की नौबत आने मैं देर नहीं है.
    हिन्दू भली भांति समझते हैं की कांग्रेस के इशारे पर पूरा मीडिया हिन्दू धर्म की कमर तोड़ने पे तुला है, ताकि कांग्रेस का वोट बैंक अमर हो जाये. जैसे अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों के दम पर इंडिया मैं राज किया आज उसी तरह मीडिया हिन्दुओं का उपयोग कर कांग्रेस के टुकड़ों पर उसकी चाकरी मैं लगा है कंस और रावन का जो हश्र हुआ वही इस आज तक (कंस) और तमाम रावन बने चैनलों का होना है.

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    • bharat raj purohit

      आज तक ओर आइ बी एन चेन्नल पे गुजरात मै सरकार ने बेन लगा दिया है गुजरात मै कोइ भी ये दोनो चेन्नल नही देख ता है

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  5. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    आलेख के सीमित कलेवर से इतर और भी इस विषय वस्तु की अन्तर्धाराएँ हैं .मसलन स्टिंग आप्रेसन के नाम पर हो रही ब्लेक मेलिंग .कल तक जो चेनल
    हिमांशु या दाती महाराज की बखिया उधेड़ रहा था यह अब उनको स्टूडियो में स्पष्टीकरण के बहाने बुलाकर अपनी टी आर पी बढाने में बहरहाल सफल रहा .असल बात तो प्रतिस्पर्धा ही है -जो व्यक्ति .समाज .को गलाकाट प्रतिद्वंदिता के दौर में वैश्विक पूंजीवाद की नाजायज औलाद सावित हो चुकी है .इस पतनशील व्यवस्था के संरक्षकों अर्थात धर्म्ध्वजो को रंगे हाथो बलात्कार के केश में पकडे जाने पर न केवल व्यवस्था अपितु जनमत भी उनको अपने दुखो का निदान करता समझकर क्रांति या बदलावों की चर्चा से भी डरता है .यह युगंधेर है जिसे परिवर्ती कल में चीन ने भी भीगा था .

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