बोलो मियां नियाजी


“ख्वाबे गफलत में सोये हुए मोमिनों ऐशो इशरत बढ़ाने से क्या फायदा आँख खोलो याद रब को करो उम्र यूँ ही गंवाने का क्या फायदा “अल्लामा इक़बाल का ये शिकवा आजकल जनाब इमरान खान नियाजी साहब पर खूब सूट करता है जो यूनाइटेड नेशन के मंच से दुनिया भर के लोगों का आह्वन कर रहे हैं कि या तो हमें भीख दो ,या तो हमारे दुश्मन पर तुम हमला करो वरना ये होगा,वो होगा,और पता नहीं क्या क्या होगा ।उनकी हालत हाई स्कूल के उस बच्चे जैसी है जो माइक और मंच पर एक कविता सुनाने गया था मगर वहाँ उसने वो सारी कविताएं सुना डालीं जितनी उसे याद थीं ,भले ही निर्णायक चिल्लाता रहा कि उसका समय खत्म हो चुका है ।यही हाल अब यूनाइटेड नैशन्स में होगा जहाँ अध्यक्ष महोदय बजर बजाते रह गए और मियां इमरान नो बॉल पर बाउंसर फेंकते रहे और उनके पेड प्रतिनिधि ताली और मेज बजाते रहे ।ट्रम्प साहब ने ये कुछ रोज पहले ही पूछा था कि” मियां नियाजी ऐसे  कव्वालों का कुनबा आप लाते कहाँ से हैं “।वक्त आ गया है कि उस मंच पे माइक की आवाज़ बन्द करने और मार्शल से वक्ता को खिंचवाने की भी व्यवस्था फिर पाकिस्तानी मार्शल ला के अलावा और कुछ समझते ही कहाँ हैं ।मांगे के जहाज और छटाक भर की डोर मैट से बाग़ बाग़ मियां नियाजी के भाषण पर भारत के एक हिंदुत्ववादी संगठन ने उन्हें ऑफिसियली धन्यवाद ज्ञापित किया है इतने बड़े मंच से मियां नियाजी ने अपनी तकरीर का फोकस उस अल्पचर्चित संगठन पर रखा ,जिससे उनकी प्रसिद्धि और शोहरत की बल्ले बल्ले हो गयी ,गूगल पर दिन रात अब उसी संगठन की खोज हो रही है जिसने कुछ रोज में ही उस संगठन को अल्प चर्चित से बहुचर्चित बना दिया ,ट्वीटर पर ट्रेन्ड हो रहा है वो संगठन ,जो काम अमिताभ बच्चन और टॉम क्रूज विज्ञापन के जरिये ना कर सकते थे ,मियां नियाजी ने भारत के उस संगठन का काम मुफ्त कर दिया ।मियां नियाजी जो बोले तो बोले ही, हद तो तब हो गयी जब चीन ने भी कश्मीर में मानवाधिकारों का मुद्ददा उठा दिया तो क्या लोग हंसने लगे किसी ने भारतीय गाँवों की एक देहाती कहावत का जिक्र छेड़ा “सूप बोले तो बोले ,छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद “अब चीन   भी अगर भारत में मानवाधिकार का  सवाल उठायेगा तो इसे “जोक ऑफ़ द ईयर”का ख़िताब दे रहे हैं लोग।”दोस्त दिल रखने को करते हैं बहाने क्या क्या झूठी खबरें वस्ल ए यार सुना देते हैं “
यही काम पाकिस्तानी के फ्रेंड -कम-बॉस  चीन कर रहा है ।जिसने थेंनआन मन चौक पर छात्रों का नरसंहार ,शिनजियांग के उइगर अल्पसंख्यकों और पिछले दिनों हांगकांग में हुए जुल्मोसितम पर हुए विरोध प्रदर्शनों को भुला दिया ।लोगबाग दुनिया भर में चीन के इस रवैये से हैरान हैं कि वो  दूसरे देश के  ला एंड आर्डर के कर्फ्यू पर तो इतना चिंतित है ,मगर अपने नोबेल शांति पुरस्कार विजेता को जेल में डाला हुआ है और उन्हें नोबेल पुरस्कार तक ग्रहण करने की अनुमति नहीं दी ।लोकतंत्र को ठेंगे पर रखने वाले चीन का नाम भी बड़ा लुभावना है “पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना ” ये ऐसे ही है जैसे चाइनीज मोबाईल की पैकिंग और लुक बड़ा जोरदार होता है ,मगर अंदर से सब कमजोर कलपुर्जे ,फिर वही हिंदुस्तानी मिसाल याद आयी “बाहर से देखा तो कितनी हसीन है अंदर से देखा तो बिगड़ी मशीन है “ये कॉमेडी पाकिस्तान की भी है जो खुद तो कट्टर धार्मिक मुल्क है मगर हमारे सेक्युलर ना रह जाने की हमेशा हाय तौबा मचाता है कि हमारे अल्पसंख्यकों को दुःख है ,जबकि इस मुल्क के अल्पसंख्यक आबादी,इल्म,दौलत सब में तरक्की कर रहे हैं लगातार ,जबकि उनके मुल्क के जन्म के समय की 23 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी सिमट कर महज तीन फीसदी रह गयी है ,जो हैं भी हैं वो भी पल पल मर मर रहे हैं ।ये कैसा काला चश्मा है मियां नियाजी ,और सुना है ऑक्सफोर्ड में आपको पोलिटिकल साइंस में सबसे कम नंबर आये थे ।बेचारे पढ़ने कुछ और गये थे और पढ़ कर कुछ और लौटे ,जिन्हें तीन हजार वर्षों के हिंदुत्व की आइडियोलॉजी का अधकचरा ज्ञान तो हो गया मगर हिंदुत्व की  वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा समझने में विफल रहे ।काबिले जिक्र है कि कश्मीर के अल्पसंख्यकों की खबरें हर पल उन तक होने का वे दावा करते हैं ,मगर  दस लाख अल्पसंख्यक उइगिरों की कत्लों गारद पर जब उनसे पूछा जाता है तब वो कहते हैं कि उन्होंने ऐसा ना अखबार में ना पढ़ा ना सुना “तुम्हारे कानों में सांडे का तेल पड़ा है क्या उइगिरों की चीखें तुमने सच में नहीं सुनी हैं क्या “बोलो मियां नियाजी ? 

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