सिन्धु सभ्यता की लिपि को नहीं पढ़ा जाना बड़ी साजिश

मनोज ज्वाला

जेनेटिक साइंस ‘गुणसूत्र विज्ञान’ के विविध अनुसंधानों से अब जब यह सिद्ध हो चुका है कि सिन्धु घाटी सभ्यता वास्तव में वैदिक आर्यों की ही एक पुरानी सभ्यता थी और भारत भूमि ही आर्यों की उद्गम भूमि रही है। तब उसके अवशेषों में उपलब्ध लिखित सामग्रियों की लिपि को अब तक नहीं पढ़ा जाना एक गहरे साजिश का परिणाम प्रतीत हो रहा है। इजिप्ट, चीनी, फोनेशियाई, आर्मेनिक तथा सुमेरियाई और मेसोपोटामियाई सभ्यताओं की लिपियां जब पढ़ ली गई हैं, तब सिन्धु सभ्यता के अवशेषों को आखिर अब तक क्यों नहीं पढ़ा जा सका है? जबकि, जेनेटिक साइंस एवं कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी से प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना पहले की तुलना में अब ज्यादा आसान हो गया है। भारत के इतिहास को सही दिशा में सुव्यवस्थित करने के निमित्त इसका पढ़ा जाना आवश्यक है। पहले इस सभ्यता का विस्तार पंजाब, सिंध, गुजरात एवं राजस्थान तक बताया जाता था, किन्तु नवीन वैज्ञानिक विश्लेषणों के आधार पर अब इसका विस्तार तमिलनाडु से वैशाली (बिहार) तक समूचा भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा ईरान तक बताया जा रहा है। कालक्रम भी अब 7000 वर्ष ईसापूर्व तक आंका जाने लगा है। इतनी महत्वपूर्ण सभ्यता के लिखित अवशेषों को अब तक नहीं पढ़ा जाना और बिना पढ़े ही उसके बारे में भ्रम पैदा करने वाली अटकलें लगाते रहना, स्वयं की जड़ों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मारने के समान है।पश्चिम के एक प्रसिद्ध इतिहासकार अर्नाल्ड जे टायनबी ने ठीक ही कहा है कि विश्व में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़छाड़ किया गया है, तो वह भारत का इतिहास है। दरअसल, हुआ यह कि ऐतिहासिक विरासतों-अवशेषों का संरक्षण-विश्लेषण करने वाली हमारी संस्था ‘भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद’ आरम्भ से ही उस अंग्रेजी शासन के कब्जे में रही है, जो ईसाइयत को श्रेष्ठत्तम व प्राचीनत्तम सिद्ध करने की दृष्टि के तहत काम करता रहा। अपनी इसी नीति के तहत अंग्रेजी औपनिवेशिक इतिहासकारों ने यह कहानी गढ़ रखी है कि आर्य लोग भारत के मूल निवासी नहीं, बल्कि बाहर के आक्रमणकारी थे। उनके आक्रमण से ही सिन्धु घाटी सभ्यता नष्ट हो गई। अंग्रेजी शासन की समाप्ति के बाद से लेकर आज तक भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद पर उन्हीं के झण्डाबरदार वामपंथियों का कब्जा रहा है, जो उनकी छद्म योजनाओं को आकार देते रहे। इसी कारण इस प्राचीन सभ्यता के अवशेषों में उपलब्ध बर्तनों, पत्थरों, पट्टियों आदि पर विद्यमान लिखावटों को आज तक नहीं पढ़ा गया। बहाना यह बनाया जाता रहा कि उन लिखावटों की लिपि को पढ़ना सम्भव नहीं है। जबकि, सच यह है कि किसी भी प्राचीन लिपि के अक्षरों की आवृति का विश्लेषण करने की ‘मार्कोव विधि’ से उसका पढ़ना अब सरल हो गया है।दरअसल, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद पर कब्जा जमाये वामपंथी इतिहासकार दूसरे कारणों से इस लिपि की पठनीयता को अपठनीय बताते रहे हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि इसे पढ़ लिये जाने से उनकी झूठी ऐतिहासिक स्थापनाएं ध्वस्त हो जाएंगी। मसलन यह कि तब सिन्धु सभ्यता की प्राचीनता मिस्र (इजिप्ट), चीन, रोम, ग्रीस, मेसोपोटामिया व सुमेर की सभ्यता से भी अधिक पुरानी सिद्ध हो जाएगी। उन्हें यह भय है कि सिन्धु सभ्यता की लिपि को पढ़ लिए जाने से वह वैदिक सभ्यता साबित हो जाएगी। इससे आर्य-द्रविड़ संघर्ष की उनकी गढ़ी हुई कहानी तात-तार हो जाएगी। ईसाई विस्तारवादी औपनिवेशिक अंग्रेजों की यह जो आधारहीन स्थापना है कि आर्य लोग अभारतीय बाहरी आक्रमणकारी हैं। उन्होंने भारत के मूल निवासियों अर्थात सिन्धु घाटी के लोगों को दक्षिण में खदेड़ दिया, जहां वे आदिवासी के तौर पर जंगलों में छिपकर रहने लगे और वे लोग द्रविड़ हैं, यह गलत साबित हो जाएगा। यही कारण है कि औपनिवेशिक वामपंथी इतिहासकारों में से कुछ लोग सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़कर पढ़ने का प्रयास करते रहे तो कुछ लोग इसे चीनी भाषा के नजदीक ले जाते हैं। उन्हीं इतिहासकारों में से कुछ इसे मुंडा आदिवासियों की भाषा बताते हैं तो कुछ इसे ईस्टर द्वीप के आदिवासियों की भाषा से जोड़कर पढ़ने की वकालत करते हैं। जबकि सच यह है कि सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि ‘ब्राम्ही’ लिपि से मिलती-जुलती हुई है। जिसे पूर्व ब्राम्ही लिपि कहा जा सकता है। उसमें लगभग 400 प्रकार के अक्षर चिह्न और 39 अक्षर हैं। ठीक वैसे ही जैसे रोमन में 26 और देवनागरी में 52 प्रकार के अक्षर हैं। ब्राम्ही लिपि भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक है। जो वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक प्रचलन में रही। इसी लिपि से पाली, प्राकृत व संस्कृत की कई लिपियों का निर्माण हुआ है। सम्राट अशोक ने गौतम बुद्ध के ‘धम्म’ का प्रचार-प्रसार इसी लिपि में कराया था। उसके सारे शिलालेख इसी लिपि में हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता के लेखों की लिपि और ब्राम्ही लिपि में अनेक समानताएं पाई गई हैं। ब्राम्ही की तरह वह लिपि भी बाएं से दाएं लिखी पायी गई है। जिसमें स्वर, व्यंजन एवं उनके मात्रा चिह्नों सहित लगभग 400 अक्षर चिह्न हैं। पुरातात्विक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों में से लगभग 3000 लेख प्राप्त हुए हैं। जिन्हें पढ़ने की आधी-अधूरी कोशिश हुई भी है तो अभारतीय लिपियों के आधार पर हुई है। ब्राम्ही लिपि के आधार पर इसे पढ़ने की कोशिश करने वाले इतिहासकारों के अनुसार इसके 400 अक्षर चिह्नों में 39 अक्षरों का व्यवहार सर्वाधिक 80 प्रतिशत बार हुआ है। ब्राम्ही लिपि के आधार पर इसे पढ़ने से संस्कृत के ऐसे कई शब्द बनते हैं, जो उन अवशेषों के संदर्भों से मेल खाते हैं। जैसे- श्री, अगस्त्य, मृग, हस्त, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, मूषक, अग्नि, गृह, यज्ञ, इंद्र, मित्र, कामधेनु आदि। बावजूद इसके उसे पढ़ने की दिशा को भारत से सुदूर देशों की लिपि अथवा असंस्कृत भाषाओं की लिपि की तरफ मोड़ने की चेष्टा होती रही है। सिन्धु सभ्यता की लिपि को पढ़ने में एकमात्र कठिनाई यह है कि उसकी लिखावट की शैली में अनेक भिन्नताएं हैं, जिसे सम्यक दृष्टि से सुलझाया जा सकता है। ब्राम्ही लिपि के आधार पर उस प्राचीन भारतीय सभ्यता के लेखों को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि उस काल की भाषा वही थी जो वेदों की भाषा है। अर्थात सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग उस वैदिक धर्म व वैदिक संस्कृति से ही सम्बद्ध थे, जिससे आज का सनातन हिन्दू समाज सम्बद्ध है। साथ ही, यह भी कि आर्य और द्रविड़ कोई अलग-अलग जातियां नहीं थीं। यह सत्य स्थापित हो जाने से आर्य-द्रविड़ विभेद का दरार स्वतः समाप्त हो जाएगा। जिसे ईसाई विस्तारवादी इतिहासकारों ने ईसाइयत के विस्तार और भारत राष्ट्र व हिन्दू समाज में विखण्डन की अपनी कुटिल कूटनीति के तहत कायम किया हुआ है। जिसकी वजह से दक्षिण भारत में भाषिक-सांस्कृति अलगाव पनप रहा है। ऐसे में एक साजिश के तहत सिन्धु घाटी सभ्यता के लेखों को भारतीय दृष्टि से भारतीय लिपि के आधार पर नहीं पढ़ा जाना एक राष्ट्रीय त्रासदी से कम नहीं है। इसी कारण भारत के इतिहास को वास्तविक स्वरुप नहीं मिल पा रहा है और इसके प्रति तरह-तरह के भ्रम कायम हैं।

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