लेखक परिचय

जगमोहन ठाकन

जगमोहन ठाकन

फ्रीलांसर. यदा कदा पत्र पत्रिकाओं मे लेखन. राजस्थान मे निवास.

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–   जग मोहन ठाकन-   politics

गुरूजी प्रवचन करके जैसे ही घर पर लौटे तो देखा कि बाहर कचरादानी में ताज़ा बैंगन का भुरता मंद-मंद मुस्करा रहा है ! रसोई द्वार पर पत्नी को देखते ही गुरूजी ने पूछा – देवी जी , यह जायकेदार बैंगन की सब्जी और कचरा दान में ? क्या जल गई थी या नमक ज्यादा हो गया था ? गुरु पत्नी ने आश्चर्यपूर्वक कहा –महाराज, आप ही तो प्रवचन में कह रहे थे कि बैंगन का भुरता बड़े नुकसान की चीज है ! थोड़े समय पहले ही तो आप बुराई पर बुराई कर रहे थे बैंगन के भुर्ते की ! मैंने तो आपके ही प्रवचन से प्रभावित होकर ताज़ा बनाये बैंगन के भुर्ते  को कचरादानी में फेंका है ! गुरु जी ने माथे पर हाथ मारा –अरी भाग्यवान , वो प्रवचन तो पब्लिक के लिए था ! बैंगन का भुरता  तो बड़ा ही गुणकारी होता है ! प्रवचन तो होते ही पर- वचन है यानि कि दूसरों के लिए वचन !

उपरोक्त कथा सार को अपने जीवन में अक्षरश ढाल चुकी एक इटेन्डियन मां ने अपने  प्रौढ़ आयु के नादान बच्चे को राजनीति के गुर सिखाते हुए एक ब्रह्म वाक्य बताया –पुत्र सत्ता जहर है ! हम जनता के लिए बने हैं, जनता द्वारा बने हैं और जनता को यह बात सिखानी है ! गुर शिक्षा चल ही रही थी कि दरवाजे की घंटी टनटनाने लगी ! मां ने आगंतुक से भेंट करने के लिए पुत्र को, यह कहकर कि बाकी फिर कभी, दूसरे  कमरे में भेज दिया ! अगले ही दिन पुत्र अपने चेले चपटओं की एक सभा में प्रवचन दे रहे थे – सत्ता जहर है, हम जनता के लिए बने हैं, जनता द्वारा बने हैं और जनता को यह बात सिखानी है ! ऐसा  मम्मा ने कहा है !

यही ब्रह्म वाक्य मीडिया के माध्यम से एक तेली पुत्र तक भी पहुंचा ! तेली पुत्र मंद मंद मुस्काया ! उसने ब्रह्म वाक्य के सार सूत्र को समझ लिया था ! क्योंकि दो पीढ़ी पूर्व उसके एक पूर्वज ने ऐसे ही एक जहर का रसास्वादन कर लिया था ! उस समय गुलाम भारत में एक सेठ पूर्वज तेली को मजदूरी पर अपने साथ मार्किट ले गया था, एक पीपा सिर पर लादकर घर लाने के लिए ! पूर्वज तेली ने रास्ते में आराम करने हेतु पीपा उतार  कर नीचे रखा ,तो  देखा कि पीपे के ढीले ढक्कन से कुछ तरल बाहर निकला हुआ है ! पूर्वज तेली ने सेठ से पूछा कि इस पीपे में क्या है ? सेठ ने  तेली को झिडकते हुए कहा –जहर है ,वो पीपे के ढक्कन को ना खोले ! सेठ पूर्वज तेली को आराम करके आने का निर्देश देकर चल पड़ा ! पूर्वज तेली को शक हुआ ! उसने ढक्कन के पास बाहर निकले तरल को अंगुली भरकर चखकर देखा ! अरे , यह तो मीठा है , बिलकुल शहद की तरह ! पूर्वज तेली को उसकी इमानदारी ने ढक्कन खोलने से रोका ! पर चंचल दिल नहीं माना और तेली ने ढक्कन खोलकर देख लिया ! पीपा तो रसगुल्लों से भरा था ! खैर पूर्वज तेली ने भर पेट रसगुल्ले चखे और ढक्कन को पुनः चोकस बंद करके चल पड़ा !

खबर पढ़कर- पूर्वज तेली की तीसरी पीढ़ी के इस तेली पुत्र ने “सत्ता जहर है’’ ब्रह्म वाक्य को आत्मसात करते हुए बुदबुदाया – हम इस जहर को चख चुके हैं और अब भी इस जहर को हम चखकर ही विराम लेंगे ! मां-पुत्र को  चिंता हो रही है कि यह जहर की पोटली अब उनसे खिसकने वाली है !

One Response to “बैंगन का भुरता बनाम सत्ता का जहर”

  1. mahendra gupta

    बहुत सुन्दर कभी कभी अपनी ही कही बात अपने लिए परेशानियां पैदा कर देती हैं.

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