बजट, महंगाई और आम आदमी

बजट की सही समीक्षा बजट पेश किये जाने के कुछ दिनों बाद ही हो सकती है। तत्काल प्रतिक्रियाएं तो क्षणिक होती हैं तथा सही आकलन के बगैर होती हैं इसीलिए प्रतिक्रिया में बस इतना ही कहा जाता है कि बजट अच्छा है या बुरा। दरअसल बजट के पहले मीडिया द्वारा ऐसा उन्माद पैदा कर दिया जाता है कि बजट सतरंगी ही नज़र आता है, उसका बदरंग पहलू तो नज़र ही नहीं आता। कुछ दिन बाद जब बजटीय आंकड़ों का सच उजागर होने लगता है तब लगता है कि बजट जैसा पेश किया गया दरअसल वैसा है नहीं। यही हाल वर्ष 2010-2011 के लिए पेश किए गये बजट का भी रहा।

कहा तो ये गया कि वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने एक अच्छ

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