ग्रामीण भारत को खुशहाल बनाने वाला बजट

प्रमोद भार्गव

इसमें दो राय नहीं कि नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा बही-खाता ग्रामीण भारत के चौतरफा विकास का स्पष्ट संकेत देता है। इसमें सबसे अधिक घोषणाएं ग्राम, कृषि और किसान केंद्रित हैं। कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र एवं विकास के लिए 4.06 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इनमें से 2.83 लाख करोड़ रुपए कृषि के लिए और 1.23 लाख करोड़ रुपए ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज के लिए देने की घोषणा की गई है। 20 लाख किसानों को सौर उर्जा संयंत्र लगाने के लिए प्रधानमंत्री कुसुम योजना के अतंर्गत धन उपलब्ध रहेगा। 2025 तक दूध उत्पादन क्षमता दोगुनी करने का लक्ष्य है। फिलहाल 108 लाख टन दूध और उसके सह-उत्पाद, उत्पादित होते हैं। इसी तरह 2022-23 तक मत्स्य उत्पादन बढ़ाकर 200 लाख टन किया जाएगा। कृषि उत्पादनों को शीघ्र मंडियों तक पहुंचाने की दृष्टि से किसान रेल और हवाई-जहाज के भी प्रावधान किए गए हैं। ये सभी लक्ष्य ऐसे हैं, जो खेती-किसानी एवं पशुपालन से आजीविका चलाने वाले लोगों को राहत देते हुए 2022 तक उनकी आमदनी दोगुनी कर सकते हैं। साफ है, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में प्रस्तुत किया गया यह वार्षिक लेखा-जोखा देश के धरातल को मजबूत करेगा।वित्त मंत्री ने महात्मा गांधी के उस कथन को फलीभूत करने की कोशिश की है, जिसमें उन्होंने कहा था, कि ‘भारत की आत्मा गांवों में बसती है, इसलिए भारत का पहला लक्ष्य अंत्योदय का उत्थान होना चाहिए।‘ अंत्योदय शब्द भाजपा के प्रेरणा पुरुष दीनदयाल उपाध्याय ने ही दिया है। इस शब्द का अर्थ है, जो जातियां हाशिए पर पड़ी गरीबी का दंश झेल रही हैं, उनके उत्थान के उपाय सरकार की प्राथमिकता में हों। मध्यम वर्ग को नजरअंदाज कर और अमीरों की तिजोरी से अतिरिक्त धन निकालकर ग्रामीण भारत के विकास में लगाना, इस बात को दर्शाता है कि सरकार ग्रामीण और शहरी भारत की असमानता की जो खाई बढ़ती जा रही है, अगले पांच सालों में उसे पाटने के ठोस उपायों में लग गई है। निचले तबके की आमदनी बढ़ाने और बुनियादी संसाधन उपलब्ध कराना ही ऐसे उपाय हैं, जो समावेशी विकास के लक्ष्य को पूरा करने में सहायक हो सकते हैं। इस नजरिए से किसान की आय दोगुनी करना, गरीबों को स्वास्थ्य बीमा, महिलाओं को उज्ज्वला गैस चूल्हा उपलब्ध कराना, गांव के हर घर को बिजली और पाईप लाइन के जरिए नल देना, ग्रामीणों को आवास और शौचालय बनाना निःसंदेह ऐसे उपाय हैं, जो लाचार को सशक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ग्राम आधारित इस बजट से उद्योग जगत को प्रसन्न होना चाहिए, क्योंकि अंततः इन सभी योजनाओं की आपूर्ति उन्हीं के द्वारा संभव होगी। बजट में एक नया उपाय दुग्ध उत्पादन दोगुना करना और मछुआरों को किसान का दर्जा देना है। साफ है, कृषि क्षेत्र को मिलने वाले सरकारी लाभ से ये मछुआरे भी जुड़ जाएंगे। मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में करीब 3 करोड़ मछुआरों को इसका लाभ मिलेगा।इस बजट में नवाचारी प्रयोग करते हुए अन्नदाता को ऊर्जादाता बनाने का लक्ष्य रखा गया है। हमारे अनेक किसान अपने स्तर पर ऊर्जा का निर्माण करते हैं, किंतु उन्हें महत्व नहीं दिया जाता। अब किसान अपनी बंजर भूमि में सौर ऊर्जा संयंत्र लगा सकेंगे। यदि किसान अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली बनाते हैं तो उन्हें इसे बेचने का भी अधिकार होगा। इस बजट में 20 लाख किसानों को ग्रिड से जुड़े सोलर पंप लगाने के लिए आर्थिक मदद दी जाएगी। इस लक्ष्यपूर्ति के लिए 1.69 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया है।

मालूम हो, बुंदेलखंड में मंगल सिंह नाम का एक ऐसा ग्रामीण अन्वेषक है, जिसने ‘मंगल टर्बाइन’ नाम से एक ऐसा आविष्कार किया है, जो सिंचाई में डीजल व बिजली की कम खपत का बड़ा व देशज उपाय है। यह चक्र उपकरण जलधारा के प्रवाह से गतिशील होता है और फिर इससे आटा चक्की, गन्ना पिराई व चारा कटाई मशीन आसानी से चला सकते हैं। साफ है, मंगल सिंह द्वारा निर्मित यह उपकरण उसे अन्नदाता के साथ-साथ ऊर्जादाता का भी दर्जा देता है। इस टर्बाइन का व्यावसयिक प्रयोग शुरू हो जाए तो यह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसानों को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का काम करेगा। लेकिन ऐसे ग्रामीण आविष्कारकों के साथ अकादमिक डिग्री नहीं होने के कारण इन्हें मान्यता नहीं मिलती है।

हाल ही में कर्नाटक के एक अशिक्षित किसान गणपति भट्ट ने पेड़ पर चढ़ जाने वाली बाइक का आविष्कार करके देश के उच्च शिक्षित वैज्ञानिकों व विज्ञान संस्थाओं को हैरानी में डाल दिया। गणपति ने ऐसी अनूठी मोटरसाइकल का निर्माण किया है, जो कम खर्च में नारियल एवं सुपारी के पेड़ों पर आठ मिनट में चढ़ जाती है। इस बाइक से एक लीटर पेट्रोल में 80 पेड़ों पर आसानी से चढ़ा जा सकता है। अब ऐसे लोगों द्वारा निर्मित रचनात्मक उत्पादों को भारत सरकार बौद्धिक संपदा कानून के तहत पेटेंट कराएगी और इन्हें औद्योगिक उत्पादों के रूप में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार उपलब्ध कराएगी। यदि ऐसा होता है तो धान के खेतों में उपजने वाली पराली का बड़ी मात्रा में ऊर्जा के लिए उपयोग होने लग जाएगा।इस समय देश में कृषि उत्पादन चरम पर है। वर्ष 2017-18 में करीब 290 मिलियन टन खाद्यान्न और करीब 325 मिलियन टन फलों व सब्जियों का रिकाॅर्ड उत्पादन हुआ है। बावजूद किसान सड़कों पर उपज फेंकने को मजबूर होते हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में टमाटर और प्याज की पैदावार बहुत है, ऐसे में इनके मुनासिब दाम नहीं मिलते हैं। भविष्य में यह उत्पाद खराब न हों, इस नजरिए से दो नई योजनाओं ‘कृषि उड़ान‘ और ‘किसान रेल‘ के जरिए जल्दी खराब होने वाली उपजों को देशभर की मंडियों में पहुंचाने के प्रावधान किए हैं। कृषि उड़ान से विदेशों में भी कृषि उत्पाद बेचने की व्यवस्था होगी। भारतीय रेलवे जो किसान रेलें पीपीपी आधार पर चलाएगी, उनसे दूध, मछली, फल व सब्जियां मंडियों तक पहुंचाए जाएंगे। ये रेलें वातानुकूलित होंगी। मनरेगा में भी आवंटन बढ़ाकर ग्रामीण आधारित नए रोजगार सृजित होने का अवसर मिलेगा। कुल 16 बड़ी घोषणाएं किसानों के हित में की गई हैं।इस लिहाज से बजट यदि कृषि, किसान और गरीब को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है तो यह सरकार की कृपा नहीं बल्कि दायित्व है, क्योंकि देश की आबादी की आजीविका और कृषि आधारित उद्योग अंततः किसान द्वारा खून-पसीने से उगाई फसल से ही गतिमान रहते हैं। यदि ग्रामीण भारत पर फोकस नहीं किया गया होता तो जिस आर्थिक विकास दर को 7 से 9 प्रतिशत तक ले जाने की उम्मीद जताई जा रही है, वह संभव ही नहीं है। इस समय पूरे देश में ग्रामों से मांग की कमी दर्ज की गई है। निःसंदेह गांव और कृषि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए जो बजट प्रावधान किए गए हैं, वह वाकई ईमानदारी से खर्च होता है तो गांव से शहर तक खुशहाली आना तय है। ऐसे ही उपायों से शहरी और ग्रामीण भारत की खाई भी कम होगी।

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