‘सत्यार्थ-प्रकाश लिखकर ऋषि दयानन्द ने मानव जाति का उपकार किया है’

मनमोहन कुमार आर्य,

महर्षि दयानन्द वेद, इतिहास एवं संस्कृति के मूर्धन्य विद्वान व प्रचारक थे। उन्होंने सहस्रों की संख्या में संस्कृत भाषा के प्राचीन शास्त्रीय व इतर ग्रन्थों का अध्ययन किया था और लगभग तीन सहस्र ग्रन्थों को प्रामाणिक माना था। वेद सहित ऋषि दयानन्द अष्टाध्यायी-महाभाष्य व्याकरण, निरुक्त, ब्राह्मण ग्रन्थ, दर्शन, उपनिषद, रामायण, महाभारत, चरक, सुश्रुत आदि विस्तृत वैदिक साहित्य के भी उच्च कोटि के भी विद्वान थे। वह धर्म एवं संस्कृति के मर्मज्ञ थे और उनका जीवन धर्म व संस्कृति के पोषक आदर्श पुरुष का जीवन्त उदाहरण हैं। वह वेद, दर्शन, उपनिषदों की जिन मान्यताओं व सिद्धान्तों का प्रचार करते थे उनको स्थायी रूप से सुरक्षित करने व युगों-युगों तक उनसे लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए उन्होंने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की रचना की थी। सत्यार्थ-प्रकाश में ईश्वर के एक सौ से अधिक नामों की व्याख्या है। वेदों पर आधारित बाल शिक्षा, अध्ययन-अध्यापन विषय, सन्ध्या अग्निहोत्र उपदेश, गुरुमन्त्र व्याख्या, ब्रह्मचर्योपदेश, पठन-पाठन की विशेष विधि, स्त्री व शूद्रों के अध्ययन की विधि व अधिकार, विवाह विषय, गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वर्णव्यवस्था, पंच-महायज्ञ, गृहस्थ-धर्म, पण्डित व मूर्ख के लक्षण, वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम की विधि, राजधर्म विषय, दण्ड व्याख्या, ईश्वर विषय, ईश्वरोपासना विषय, जीव और उसकी स्वतन्त्रता, वेद विषय विचार, सृष्टि उत्पत्ति विषय, मनुष्य की आदि सृष्टि के स्थान का निर्णय, ईश्वर का जगत को धारण करना, विद्या-अविद्या विषय, मुक्ति और मोक्ष विषय, आचार, अनाचार, भक्ष्य, अभक्ष्य विषय, आर्यावत्र्तीय मत-मतान्तरों का खण्डन व मण्डन एवं नास्तिक-चारवाक-बौद्ध-जैन आदि मत, कृश्चियन मत और यवनमत की समीक्षा आदि विषयों का उल्लेख है। सत्यार्थ-प्रकाश ऐसा ग्रन्थ है जो मनुष्य द्वारा सत्य धर्म ग्रहण करने के विषय में सहायक है। सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन से अध्येता की इस सृष्टि विषयक सभी प्रश्नों व शंकाओं आदि का समाधान होता है। सत्यार्थप्रकाश की मुख्य विशेषता यह भी है कि इसमें वेदों के आधार पर ईश्वर, जीव तथा प्रकृति की सत्ताओं को वेद के मन्त्रों व उनके हिन्दी में अर्थ देकर समझाया गया है। वेदों की सभी मान्यतायें आधुनिक काल में भी मनुष्यों द्वारा जानने व आचरण करने योग्य हैं। वेदों के मार्ग पर चलकर ही सभी मनुष्यों की लौकिक व पारलौकिक प्रगति होती है। यदि मनुष्य वेदों के मार्ग पर न चले तो मनुष्य की उन्नति के स्थान पर पतन होता है।

सत्यार्थप्रकाश न होता तो संसार ईश्वर के सत्यस्वरुप को जानने में समर्थ न होता। इसका एक कारण यह है कि वेद सृष्टि के आदि काल में ईश्वर से उत्पन्न संस्कृत भाषा में थे जिसके अर्थ अष्टाध्यायी-महाभाष्य व निरुक्त की पद्धति, इतर वेदांगों का ज्ञान तथा प्राचीन ब्राह्मण, दर्शन, उपनिषद, आयुर्वेद आदि ग्रन्थों की सहायता से ही जाने जा सकते थे। ऋषि दयानन्द ने इन ग्रन्थों सहित हजारों ग्रन्थों को पढ़ा था और तीन हजार ग्रन्थों को प्रामाणिक माना था। अपने इस ज्ञान व अनुभव से वह वेद मन्त्रों के मनुष्य जाति के लिए उपयोगी अर्थों की संगति लगा पाये थे। ऋषि दयानन्द के समय में वेद-मन्त्रों के प्रामाणिक अर्थ व भाष्य आदि उपलब्ध नहीं थे। सायण व महीधर आदि के जो भाष्य थे उनमें वेदों की याज्ञिक प्रक्रिया के अनुसार अर्थ किये गये थे और वह भी अनुपयुक्त व मन्त्रों की मूल भावना के विपरीत एवं यथार्थ अर्थ नहीं थे। देश की प्रचलित भाषा हिन्दी थी। हिन्दी में किसी भी शास्त्रीय ग्रन्थ के अनुवाद आदि उपलब्ध नहीं थे। ऋषि दयानन्द ने देश में सबसे पहले हिन्दी भाषा की महत्ता को समझा। हिन्दी को वह आर्यभाषा कहते थे। ऋषि दयानन्द ने सम्पूर्ण यजुर्वेद का संस्कृत व हिन्दी में भाष्य व भाषानुवाद किया है। यह ऐसा कार्य हुआ है कि जिससे साधारण हिन्दी पढ़ने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी वेद-मन्त्रों के अर्थाें को भली-भांति जान सकता है। ऋषि दयानन्द ने ऋग्वेद का संस्कृत-हिन्दी भाष्य आरम्भ किया था। वह दस मण्डल वाले ऋग्वेद के सातवें मण्डल का भाष्य कर रहे थे। सातवें मण्डल का आधे से अधिक भाष्य हो चुका था। कुछ महीनों बाद ही ऋग्वेद का भाष्य वह पूर्ण कर लेते परन्तु जोधपुर प्रवास में उन्हें विष दे दिया गया जिसके कारण 30 अक्तूबर, सन् 1883 को उनकी मृत्यु हो गई। इससे वेद भाष्य का कार्य रुक गया। बाद में उनके कई शिष्यों ने वेदों के अवशिष्ट भाग का भाष्य किया। अब चारों वेदों पर अनेक विद्वानों के भाष्य व टीकायें उपलब्ध हैं। सामवेद पर आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार व पं. विश्वनाथ वेदोपाध्याय जी आदि अनेक विद्वानों का भाष्य है। अथर्ववेद पर भी पं. क्षेमकरण दास त्रिवेदी एवं पं. विश्वनाथ वेदोपाध्याय जी का भाष्य उपलब्ध है। पं. जयदेव शर्मा विद्यालंकार और पं. हरिशरण सिद्धान्तालंकार जी के भी चारों वेदों पर वेदभाष्य उपलब्ध हैं। इनका अध्ययन कर वेद-ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

सत्यार्थप्रकाश का उद्देश्य मुख्यतः वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों से मनुष्य समाज को परिचित कराना है जिससे लोग वेदों का अनुकरण व अनुशरण कर सकें। वेदों का आचरण ही मनुष्य को अभ्युदय व निःश्रेयस प्राप्त कराता है। इसी को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति व सिद्धि भी कहते हैं। सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन से ईश्वर, जीव, प्रकृति सहित ईश्वर से सृष्टि की रचना व पालन सहित प्रलय एवं अन्य सभी विषयों का ज्ञान होता है जिनका उल्लेख उपर्युक्त पंक्तियों में किया गया है। सत्यार्थप्रकाश पढ़कर देश व संसार में प्रचलित प्रायः सभी मतों व उनकी मान्यताओं के ज्ञान के साथ उनमें विद्यमान अविद्याजन्य बातों व मान्यताओं का भी ज्ञान होता है। इससे मनुष्य में विवेक व सत्यासत्य को जानने की योग्यता उत्पन्न होती है। मनुष्य असत्य का त्याग कर सत्य को ग्रहण कर सकता है और अपना जीवन सत्य-पथ पर चलाकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। यदि सत्यार्थप्रकाश को नहीं पढ़ेगे तो हम जीवन को यथार्थ रूप में नहीं जान व समझ सकते। सत्यार्थप्रकाश हमें ईश्वरीय ज्ञान वेद सहित ऋषि-मुनियों के ग्रन्थों ब्राह्मण, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों के अध्ययन से जोड़ता है। 6 दर्शनों में एक एक दर्शन योग दर्शन है। योग दर्शन में ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना के आठ अंग बताये गये हैं जिनमें अन्तिम अंग समाधि है। यह योग दर्शन ही मनुष्य को समाधि अवस्था तक पहुंचा कर ईश्वर का प्रत्यक्ष व साक्षात्कार कराता है। योग दर्शन पर भी हिन्दी भाषा में अनेक आर्य विद्वानों के भाष्य व टीकायें उपलब्ध हैं। इनकी सहायता से योग को समझा जा सकता है और उसका आचरण व अभ्यास कर सफलता प्राप्त की जा सकती है।

सत्यार्थप्रकाश को पढ़ लेने व उसके निरन्तर स्वाध्याय के परिणामस्वरूप मनुष्य अविद्या से युक्त मतों के आचार्याें व प्रचारकों द्वारा फैलाये जाने भ्रमों में फंसता नहीं है। इससे वैदिक धर्मी मनुष्यों के धर्मान्तरण की चेष्टायें भी विफल होती हैं। सत्यार्थप्रकाश पढ़कर मनुष्य संसार के सभी मतों के आचार्यों व अनुयायियों को वैदिक मत की श्रेष्ठता और अन्य मतों में विद्यमान मिथ्यात्व को उन्हें बता सकता है। सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर यह ज्ञात होता है कि सभी प्राणियों में जो चेतन अनादि व अविनाशी जीवात्मायें विद्यमान हैं वह सभी स्वरूप की दृष्टि से एक समान हैं। ईश्वर सबका माता, पिता, आचार्य, राजा और न्यायाधीश है। उसकी शरण को प्राप्त होकर ही मनुष्य को सुख व आनन्द की उपलब्धि होती है। विगत 143 वर्षों में वैदिक धर्म की जो रक्षा हुई है उसका मुख्य श्रेय ऋषि दयानन्द, आर्यसमाज व इनके अनुयायियों को ही हैं। सत्यार्थप्रकाश मनुष्य को मृत्यु से दूर अमृत की ओर ले जाता है। जिस मनुष्य ने भी सत्यार्थप्रकाश को पढ़ा है उसे आत्म-ज्ञान व आत्म-बल प्राप्त हुआ है और उसे आत्मिक सुख वा आनन्द की प्राप्ति हुई है। संसार के सभी मनुष्यों को सत्यार्थप्रकाश पढ़ना चाहिये और इसका प्रचार कर अपने व दूसरों मनुष्यों के जीवन को श्रेष्ठ व उत्तम बनाना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश संसार का श्रेष्ठ धर्म ग्रन्थ है। इसकी प्रत्येक मान्यता ज्ञान व विज्ञान से युक्त होने सहित बुद्धि, तर्क व युक्ति से भी सत्य सिद्ध है। आज के वैज्ञानिक युग में सत्यार्थप्रकाश धर्मग्रन्थ ही ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर सत्य सिद्ध होता है। यह ग्रन्थ ही विश्व शान्ति का विकल्प भी है। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
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