धर्म-अध्यात्म वेद का ज्ञान और भाषा प्राचीन व अर्वाचीन ग्रन्थों में सबसे उन्नत November 29, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment संसार में प्रचलित विकासवाद के सिद्धान्त के अनुसार संसार का क्रमिक विकास होता है। उनके अनुसार एक प्रकार के जीवाणु ‘अमीवा’ से मुनष्य व अन्य प्राणी बने हैं। भौतिक जगत व अमीवा किससे बने, इसका समुचित उत्तर उनके पास नहीं है। सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व हमारे ब्रह्माण्ड का विकास नहीं अपितु विकास से ह्रास हो रहा है, अतः इस कारण विकासवाद का सिद्धान्त पिट जाता है। Read more » प्राचीन भाषा वेद वेद वेद अर्वाचीन ग्रन्थों में सबसे उन्नत वेद का ज्ञान
धर्म-अध्यात्म सभी मनुष्यों पर ईश्वर के असंख्य उपकारों के कारण सभी उसके ऋणी November 29, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य क्या मनुष्य ईश्वर का ऋणी है? यदि है तो वह ईश्वर का ऋणी कब व कैसे बना? मनुष्य ईश्वर का ऋणी कब बना, इस प्रश्न का उत्तर है कि वह सदा से ईश्वर का ऋणी है और हर पल व हर क्षण उसका ऋण बढ़ता ही जा रहा है। यह बात और […] Read more » ईश्वर
धर्म-अध्यात्म सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का उद्देश्य और प्रभाव November 28, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य “सत्यार्थ प्रकाश” विश्व साहित्य में महान ग्रन्थों में एक महानतम् ग्रन्थ है, ऐसा हमारा अध्ययन व विवेक हमें बताता है। हमारी इस स्थापना को दूसरे मत के लोग सुनेंगे तो इसका खण्डन करेंगे और कहेंगे कि यह बात पक्षपातपूर्ण है। उनके अनुसार उनके मत व पंथ का ग्रन्थ ही सर्वोत्तम व महानतम् […] Read more » सत्यार्थप्रकाश सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का उद्देश्य
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म परम पिता परमेश्वर की मुख्य शक्तियाँ November 25, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी हम बचपन से भगवान और देव-देवियों की प्रार्थना करते आ रहे हैं, उनकी भक्ति करते आ रहे हैं और इसी तरह अलग-अलग तरीके से भगवान एवं धर्म से जुड़े हुए हैं। जब हम इस विशाल ब्रह्मांड को देखते हैं तब एक अद्भुत शक्ति का अनुभव करते हैं जो सभी को संतुलित रखती […] Read more » परम पिता परमेश्वर परमेश्वर श्रीकृष्ण श्रीविष्णु
धर्म-अध्यात्म ईश्वर का अस्तित्व आदि व अन्त से रहित है’ November 22, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य हम संसार में देखते हैं कि प्रत्येक पदार्थ का आदि अर्थात् आरम्भ होता है और कुछ व अधिक काल बाद उसका अन्त वा समाप्ति हो जाती है। आदि शब्द जन्म के लिए भी प्रयुक्त होता है और अन्त शब्द को मृत्यु के रुप में भी जाना जाता है। विश्व का अधिकांश भाग […] Read more » आदि व अन्त से रहित है’ ईश्वर
धर्म-अध्यात्म ईश्वर, समाज में अन्याय व नास्तिकता November 22, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य ईश्वर किसे कहते हैं? एक दशर्नकार ने इसका उत्तर दिया है कि जिससे यह सृष्टि बनी है, जो इसका पालन करता है तथा जो इस सृष्टि की अवधि पूरी होने पर प्रलय करता है, उसे ईश्वर कहते हैं। इस उत्तर के अनुसार ब्रह्माण्ड में एक सच्चिदानन्दस्वरुप, सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ ईश्वर नामी चेतन […] Read more » ईश्वर समाज में अन्याय समाज में अन्याय व नास्तिकता समाज में नास्तिकता
धर्म-अध्यात्म ऋषि दयानन्द के दो मुख्य मन्तव्य और उनके अनुसार मनुष्य का कर्तव्य November 18, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य ऋषि दयानन्द ने अपने विश्व विख्यात ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ के अन्त में ‘स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश’ के अन्तर्गत अपने निजी मन्तव्यों का प्रकाश किया है। अपना निजी मन्तव्य बताते हुए वह लिखते हैं कि ‘मैं अपना मन्तव्य उसी को जानता हूं कि जो तीन काल में सबको एक सा मानने योग्य है। मेरा कोई नवीन […] Read more » ऋषि दयानन्द ऋषि दयानन्द के अनुसार मनुष्य का कर्तव्य ऋषि दयानन्द के दो मुख्य मन्तव्य
धर्म-अध्यात्म ‘जाने चले जाते हैं कहां दुनियां से जाने वाले’ का वैदिक समाधान November 17, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment जाने चले जाते हैं कहां? दुनियां से जाने वाले’ प्रश्न का उत्तर केवल वैदिक साहित्य में ही सुलभ होता है। ऐसा ही एक प्रश्न यह भी हो सकता है ‘जाने चले आते हैं कहांसे दुनियां में आने वाले।’ इन दो प्रश्नों में से एक प्रश्न का उत्तर मिल जाये तो दूसरे का उत्तर स्वतः मिल जायेगा। Read more »
चिंतन धर्म-अध्यात्म सभी मनुष्यों के करणीय पाचं सार्वभौमिक कर्तव्य November 15, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनुष्य का जन्म माता-पिता व सृष्टिकर्ता ईश्वर के द्वारा होता है। ईश्वर द्वारा ही सृष्टि की रचना सहित माता-पिता व सन्तान का जन्म दिये जाने से ईश्वर प्रथम स्थान पर व माता-पिता उसके बाद आते हैं। आचार्य बालक व मनुष्य को संस्कारित कर विद्या व ज्ञान से आलोकित करते हैं। अतः अपने आचार्यों के प्रति भी मनुष्यों का कर्तव्य है कि वह अपने सभी आचार्यों के प्रति श्रद्धा का भाव रखंे और उनकी अधिक से अधिक सेवा व सहायता करें। Read more » पाचं सार्वभौमिक कर्तव्य सभी मनुष्यों के करणीय पाचं सार्वभौमिक कर्तव्य
चिंतन धर्म-अध्यात्म ऋषि दयानन्द के जीवन के अन्तिम प्रेरक शिक्षाप्रद क्षण November 15, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment स्वामी दयानन्द जी का जीवन आदर्श मनुष्य, महापुरुष व महात्मा का जीवन था। उन्होने अपने पुरुषार्थ से ऋषित्व प्राप्त किया और अपने अनुयायियों के ऋषित्व प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया। एक ऋषि का जीवन कैसा होता है और ऋषि की मृत्यु किस प्रकार होती है, ऋषि दयानन्द का जीवनचरित उसका प्रमाणिक दस्तावेज हैं जिसका अध्ययन व मनन कर सभी अपने जीवन व मृत्यु का तदनुकूल वरण व अनुकरण कर सकते हैं। हम आशा करते हैं कि पूर्व अध्ययन किये हुए ऋषि भक्तों को इसे पढ़कर मृत्यु वरण के संस्कार प्राप्त होंगे। इसी के साथ यह चर्चा समाप्त करते हैं। ओ३म् शम्। Read more » death of Swami dayanand Featured ऋषि दयानन्द ऋषि दयानन्द के भक्तों की प्रशंसा पुराणों की आलोचना पौराणिक छात्र को फटकार
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म लेख साहित्य स्वास्तिक शास्वत और विश्वव्यापी सनातन प्रतीक November 14, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का अर्थ 'सत्ता' या 'अस्तित्व' और 'क' का अर्थ 'कर्त्ता' या करने वाले से है। इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द का अर्थ हुआ 'अच्छा' या 'मंगल' करने वाला। 'अमरकोश' में भी 'स्वस्तिक' का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - 'स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध' अर्थात् 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।' Read more » Featured अन्य देशों के लिए स्वास्तिक के चिन्ह का महत्व भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक का पौराणिक महत्त्व विश्वव्यापी सनातन प्रतीक स्वस्तिक चिह्न :- स्वास्तिक के चिन्ह का महत्व स्वास्तिक शास्वत
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म आपके लिए सोना धारण करना/पहनना कितना लाभकारी या नुकसानकारी होगा November 9, 2016 by पंडित दयानंद शास्त्री | 2 Comments on आपके लिए सोना धारण करना/पहनना कितना लाभकारी या नुकसानकारी होगा आइये आज सबसे पहले हम जानते है की सोना पहनना कितना शुभ है । वे जातक जिन्हें विवाह के अनेक वर्षों पश्चात् भी यदि संतान नहीं हो रही है तो उसे अनामिका ऊंगली में सोने की अंगूठी पहनने से लाभ होता है। एकाग्रता बढ़ाने के लिए तर्जनी यानि इंडैक्स फिंगर में सोने की अंगूठी पहनने […] Read more » सोना सोना धारण करना कितना नुकसानकारी सोना धारण करना कितना लाभकारी