आर्थिकी

लूट लिया मोदी ने…

देश वाकई में तभी गंभीर, समझदार या ईमानदार बनता है जब उसे चलाने वाले देश के लोगों के उज्जवल भविष्य के लिए ईमानदारी दिखाए, गंभीर हो| भ्रष्टाचार, बेईमानी से कमाया धन भले ही चंद लोगों को सुकून देता हो मगर ईमानदारी की राह पर चलने वाले लोगों के वर्तमान में मोदी हैं, उनकी व्यवस्था में नोटबंदी जैसे फैसले भी हैं और भ्रष्टों को मिटा देने की सनक भी है|

नोटबंदी से संकट में सियासी दल

दरअसल एसोसिएशन आॅफ डेमोक्रेटिक रिफाॅर्म ने एक जनहित याचिका के जरिए कोशिश की थी कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल सूचना अधिकार के कानूनी दायरे में लाए जाएं। इस सिलसिले में केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा 3 जून 2013 को दिए फैसले में छह राष्ट्रीय दलों को इस कानून के तहत ‘पब्लिक आॅथरिटी‘ माना है। इन दलों में भाजपा, कांग्रेस, बसपा, राकांपा, सीपीआई व सीपीएम शामिल हैं।

सांच को नहीं कोई आंच, मोदी और नोटबंदी

माना कि देश परेशान है, लोग हैरान है और परेशानी का सामना कर रहे हैं, लेकिन मीडिया को इस बात में ज्यादा रूचि है कि देश में कैसी-कैसी परेशानियां सामने आ रही हैं। अरे परेशानियां तो आनी ही थी, यदि किसी देश के साथ युद्ध होता तो संभवत: जो कुछ घर में होता बस वही गुजारे का साधन होता, आटा होता तो चून गूंधा जाता और चून नहीं होता तो भूखे सोना होता। हालात थोड़े असामान्य जरूर हैं लेकिन बदतर नहीं है। लोग जैसे भी हो, जद्दो-जहद कर दो जून की रोटी कमाने में और नोट बदलने में कामयाब हो ही रहे हैं।

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के नये संदर्भ

लगभग सभी गैर कानूनी कार्यों में पैसों का लेनदेन बि‍ना कि‍सी तृतीय पक्ष (बैंक आदि‍ सरकारी यंत्रणा) के होता है, इससे गैर कानूनी धंदों में दि‍न दूगनी और रात चौगुणी प्रगती होती हैं। इन सभी गोरखधंदों को बंद करने का यह रामबाण उपाय हैं। इसमें भारतीय रि‍ज़र्व बैंक के अर्थशास्‍त्री और वि‍शेषज्ञों का योगदान है। नये नोटों को सैटेलाइट द्वारा ट्रैक करने की सुवि‍धा के कारण आगे आने वाले नोटों की ट्रैकिंग से नोटों का प्रयोग हो रहे स्‍थानों का पता लगाया जा सकेगा इससे भवि‍ष्‍य में नकली नोटों को बनाने में के खतरे को भी टाला जा सकेगा।

काली कमाई के खि़लाफ़ नमो का ऐतिहासिक फ़ैसला      

काले धन का संग्रहण करने वाले अब इस अकूत धन को ठिकाने लगाने के नये-नये तरीके खोज रहे हैं। इस निर्णय से न जाने कितने ही करोड़पति,धनाढ्य और पूंजीपति कुछ ही पलों में कंगाल हो गए। भले ही फ़ैसले ने भारत के हर छोटे-बड़े उस तबके को भी प्रभावित किया जो कि पूरी तरह निर्दोश,शरीफ़ और ईमानदार था। मगर इसके महान मक़सद को देखते हुए यह हर लोकतन्त्र प्रेमी का फ़र्ज़ बनता है कि वो देश के लिए इन्हें हृदय से भुला दे।

आर्थिक उदारीकरण के दौर में कालेधन पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

नाव सुधारों पर काम करने वाली संस्था एडीआर के आंकड़े वाकई आश्चर्यजनक हैं कि, 2004 से 2015 के बीच हुए 71 विधानसभा और 3 लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों को 2100 करोड़ रुपए का नकद चंदा मिला है। इससे भी आगे यह कि पिछले लोकसभा चुनाव में आयोग को 300 करोड़ रुपए बिना स्त्रोत का नकद मिला था। यानि कि यह कहने में कोई बुराई नहीं है कि राजनीतिक दलों के पास 80 पैसा ऐसे स्त्रोत से ही आता है,जिसका किसी को पता नहीं है। ऐसे में इसे भी कालेधन और नोट बदलने की मुहिम का हिस्सा बनाकर टैक्स लगाया जाना अच्छा क़दम साबित हो सकता है।

मोटिवेशन : ‘नोट बंदी’ का नाजुक दौर और हम

कहना न होगा, डाक व बैंक कर्मियों पर इस वक्त बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, जिसका निर्वहन उन्हें अत्यधिक तन्मयता, दक्षता, संवेदनशीलता, इमानदारी एवं संयम के साथ करने की आवश्यकता है. बड़े डाकघरों तथा बैंक शाखाओं में पुराने नोट बदलनेवालों, वरीय नागरिक, दिव्यांग और महिलाओं, बड़ी जमा राशि को अपने खाते में जमा करने वाले ग्राहकों आदि के लिए अलग-अलग काउंटर खोलने की जरुरत तो है ही. संबंधित विभागों के वरीय अधिकारियों द्वारा इस कार्य की सतत मॉनिटरिंग भी अपेक्षित है. सिविल सोसाइटी के जाने -माने लोगों को भी अपनी भूमिका दर्ज करने की जरुरत है.

रुपया बड़ा या राष्ट्रहित

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में ऐसे लोगों को भरपूर भरोसा दिलाते हुए उनके हितों के संरक्षण की बात कही, उन्होंने कहा कि देश के लिए देश का नागरिक कुछ दिनों के लिए यह कठिनाई झेल सकता है, मैं सवा सौ करोड़ देशवासियों की मदद से भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई को और आगे ले जाना चाहता हूँ, उन्हीं के शब्दों में ‘ तो आइए जाली नोटों का खेल खेलने वालों और कालेधन से इस देश को नुकसान पहुंचाने वालों को नेस्तनाबूत कर दें, ताकि देश का धन देश के काम आ सके, मुझे यकीन है कि मेरे देश का नागरिक कई कठिनाई सहकर भी राष्ट्र निर्माण में योगदान देगा। मोदी के इन शब्दों को पूरे देशवासियों को ध्यान से पढऩा चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रहित से बड़ा कोई नहीं।

आखिर इस राष्ट्रहित के निर्णय पर आपत्ति क्यों?

इन दोनों ही बातों में प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना है, कोई भी समझदार और देशभक्त नागरिक इसका विरोध करेगा ऐसा समझ नहीं आता है। ऐसा पहली बार नहीं है जब राष्ट्रहित की खातिर कोई बड़ा निर्णय लिया गया है। यहां यह भी लिखने में कोई संकोच नहीं है कि इस देश के नागरिकों ने हमेशा राष्ट्रहित हेतु लिए कठोर निर्णयों का न केवल स्वागत किया है बल्कि उसमें तन मन धन से सहयोग भी किया है।

‘काला धन’: घबराइए मत

जहां तक नगदप्रेमी करोड़पतियों, अरबपतियों, खरबपतियों और हमारे महान नेताओं का प्रश्न है, उन्हें भी ज्यादा डरने की जरुरत नहीं है। वे अपने हजारों कर्मचारियों और लाखों पार्टी-कार्यकर्ताओं में से एक-एक को लाखों पुराने नोट देकर उन्हें नये नोटों में बदलवा सकते हैं। उप्र के नेताओं ने यह ‘पवित्र कार्य’ शुरु भी कर दिया है। नेता ही नेता को पटकनी मार सकते हैं। जाहिर है कि सरकार डाल-डाल है तो सेठ और नेता पात-पात हैं।

500 व 1000₹ के नोट बन्द, काले धन व आतंकवाद पर जबरदस्त प्रहार

देश में प्रचलित कुल मुद्रा का 86% 500 व 1000₹ के नोटों की शक्ल में है। कुल प्रचलित मुद्रा के 86% भाग को फिल्टर करना बहुत बड़ा काम है, जो सरकार की बड़ी पूर्व तैयारी के बिना सम्भव न हो पाता। विचार करें पुराने नोटों के बदले नये नोट बैंक से ही मिलेंगे अर्थात देश में प्रचलित सभी नोट मुद्रा का 86% बैंक में जमा होंगे, आप पुराने नोट बैंक में तय समय सीमा में जमा कराइये, वहां से नये नोट प्राप्त करिये।