मनोरंजन सिनेमा हिंदी फिल्मी गीतों में व्यंग्य June 27, 2025 / June 27, 2025 by विवेक रंजन श्रीवास्तव | Leave a Comment विवेक रंजन श्रीवास्तव हिंदी फिल्मी गीतों में व्यंग्य एक सशक्त माध्यम रहा है जिसने सामाजिक विसंगतियों, राजनीतिक भ्रष्टाचार और मानवीय दुर्बलताओं को बिना कटुता तीखेपन से उघाड़ा है। ये गीत मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक दर्पण का काम करते हैं जो समाज के अंतर्विरोधों को संगीत और शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, फिल्म पड़ोसन (1968) का गीत “एक चतुर नार करके सिंगार, मेरे मन के द्वार ये घुसत जात…” राजेंद्र कृष्ण द्वारा रचित और किशोर कुमार व मेहमूद द्वारा गाया गया यह गीत नारी चतुराई और पुरुष अहं पर करारा व्यंग्य करता है। इसमें दक्षिण भारतीय लहजे का प्रयोग हास्य के साथ-साथ सांस्कृतिक रूढ़ियों को भी चिह्नित करता है । फिल्म प्यासा (1957) का गीत “सर जो तेरा चकराए, या दिल डूबा जाए…” शकील बदायूंनी के बोल और मोहम्मद रफी की आवाज में जॉनी वॉकर पर फिल्माया गया था। यह गीत शहरी जीवन की अवसादग्रस्त दिनचर्या और तनावमुक्ति के लिए तेल मालिश (चंपी) पर निर्भरता का मखौल बनाकर हास्य उत्पन्न करता है। जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान एक चंपी में खोजा जा रहा है जो निजी कुंठाओं से भागने का प्रतीक बन जाता है. यह व्यंग्य हास्य मिश्रित है। काला बाज़ार (1989) का गीत “पैसा बोलता है…” कादर खान पर फिल्माया गया जो धन के अमानवीय प्रभुत्व को दर्शाता है। नितिन मुकेश की आवाज में यह गीत पूँजीवादी समाज में नैतिक मूल्यों के पतन की ओर इशारा करता है, जहाँ पैसा हर रिश्ते और सिद्धांत पर हावी है । कॉमेडियन महमूद की अदाकारी ने कुंवारा बाप (1974) के गीत “सज रही गली मेरी माँ चुनरी गोते में…” को यादगार बनाया। यह गीत हिजड़ों के माध्यम से समलैंगिकता और पारंपरिक पितृसत्ता पर प्रहार करता है। बोल “अम्मा तेरे मुन्ने की गजब है बात…” लालन-पालन में पुरुष की भूमिका को चुनौती देते हैं, जो उस दौर में एक साहसिक विषय था । 1950-80 के दशक के स्वर्ण युग में कॉमेडियन्स ने व्यंग्य को नई ऊँचाइयाँ दीं। जॉनी वॉकर की विशिष्ट अभिव्यक्ति, महमूद का स्लैपस्टिक हास्य और किशोर कुमार का संगीत के साथ व्यंग्य का संयोजन, सभी ने गीतों को सामाजिक टिप्पणी का माध्यम बनाया। फिल्म हाफ टिकट (1962) का गीत “झूम झूम कव्वा भी ढोलक बजाये…” या गुमनाम (1965) का “हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं…” जैसे गीतों ने रंगभेद और वर्ग संघर्ष को हल्के अंदाज में प्रस्तुत किया था । साहित्य और फिल्मी गीतों के बीच का सामंजस्य भी रोचक रहा है। गीतकारों ने साहित्यिक रचनाओं को फिल्मों में लोकप्रिय बनाया। गोपाल दास ‘नीरज’ ने मेरा नाम जोकर (1970) के गीत “ऐ भाई ज़रा देख के चलो…” को अपनी पुरानी कविता “राजपथ” से अनुकूलित किया था, जो मानवीय अहंकार पर व्यंग्य था । इसी प्रकार, रघुवीर सहाय की कविता “बरसे घन सारी रात…” को फिल्म तरंग (1984) में लिया गया, जो साहित्य और सिनेमा के बीच सेतु बना । व्यंग्य के सम्पुट के साथ इस तरह के फिल्मी गीतों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। “पैसा बोलता है…” जैसे गीत आज के भौतिकवादी युग में और भी सटीक लगते हैं। ये गीत सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करने के साथ-साथ श्रोताओं को हँसाते-गुदगुदाते हुए विचार करने को प्रेरित करते हैं, जो हिंदी सिनेमा की सांस्कृतिक धरोहर का अमर हिस्सा हैं । विवेक रंजन श्रीवास्तव Read more » हिंदी फिल्मी गीतों में व्यंग्य
मनोरंजन सिनेमा धूम 4′ में नजर आएंगी श्रद्धा कपूर? June 27, 2025 / June 27, 2025 by सुभाष शिरढोनकर | Leave a Comment सुभाष शिरढोनकर फिल्म ‘स्त्री 2’ की रिकार्ड तोड़ कामयाबी के बाद एक्ट्रेस श्रद्धा कपूर लगातार चर्चाओं में बनी हुई हैं। उनकी यह फिल्म साल 2024 की सबसे बड़ी और हिंदी में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म साबित हुई। इस फिल्म ने कमाई के मामले में ‘गदर 2’ और ‘जवान’ के रिकॉर्ड भी तोड़ दिए। फिल्म की कामयाबी के बाद फिल्म मेकर एकता […] Read more » Will Shraddha Kapoor be seen in 'Dhoom 4'? श्रद्धा कपूर
मनोरंजन सिचुएशनशिप: रिश्ता जिसमें किन्तु-परन्तु नहीं June 27, 2025 / June 27, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment सचिन त्रिपाठी प्रेम संबंधों की परिभाषाएं समय के साथ बदलती रही हैं। पहले ‘प्रेम’ एक स्थायी, सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति वाला संबंध था। फिर प्रेम विवाह, लिव-इन रिलेशनशिप और अब ‘सिचुएशनशिप’ जैसे नए रूप सामने आए हैं। सिचुएशनशिप कोई पारंपरिक प्रेम संबंध नहीं है, न ही यह पूर्णतः मित्रता है। यह उन दो लोगों के बीच का अनिश्चित-सा, पर भावनात्मक रूप से गहरा जुड़ा हुआ रिश्ता है जिसमें स्पष्टता की बजाय धुंध, स्थायित्व की जगह अस्थाई होना और भरोसे की जगह संभावनाएं होती हैं लेकिन क्या सिचुएशनशिप सिर्फ भ्रम है? या यह आज की पीढ़ी का आत्म-स्वतंत्र और यथार्थवादी प्रेम है? इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए हमें इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को गहराई से समझना होगा। आज के युवा स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हैं चाहे वह करियर हो, स्थान चयन हो या रिश्ते। सिचुएशनशिप इस आज़ादी को जगह देता है। इसमें दोनों व्यक्ति एक-दूसरे की कंपनी पसंद करते हैं, लेकिन अपने जीवन के निर्णय स्वतंत्र रूप से लेते हैं। कोई सामाजिक दबाव नहीं, न ही विवाह का अनावश्यक तनाव। यह रिश्ता उन्हें भावनात्मक संबल देता है जो अभी जीवन में स्थायित्व के लिए तैयार नहीं हैं। युवा जो पढ़ाई, करियर या निजी हीलिंग के दौर से गुजर रहे हैं, वे किसी गंभीर संबंध में बंधे बिना भी साथी के साथ जुड़ सकते हैं। अक्सर सिचुएशनशिप में दोनों पक्ष शुरू से स्पष्ट होते हैं कि वे अभी किसी परिभाषित रिश्ते में नहीं हैं। यह पारदर्शिता कई बार उस झूठ और छल से बेहतर होती है जो परंपरागत प्रेम संबंधों में दिखावे के रूप में होता है। आज की पीढ़ी अपने करियर और आत्म-विकास को पहले स्थान पर रखती है। विवाह या रिश्तों की स्थायित्वपूर्ण जिम्मेदारियों को टालते हुए भी वे एक भावनात्मक सहारा चाहते हैं। सिचुएशनशिप इस जरूरत को पूरा करता है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें न कोई वचन होता है, न कोई भविष्य की रूपरेखा। कई बार एक व्यक्ति अधिक जुड़ जाता है जबकि दूसरा असमंजस में रहता है। इससे भावनात्मक असुरक्षा, ईर्ष्या और दुख जन्म लेते हैं। सिचुएशनशिप में वर्षों निकल जाते हैं, और जब अंत में कोई एक व्यक्ति दूर चला जाए तो दूसरे के लिए यह गहरे आघात का कारण बनता है। कई युवाओं के लिए यह एक ‘इमोशनल इंवेस्टमेंट’ होता है जिसकी कोई निश्चित परिणति नहीं होती। भले ही शहरी युवा वर्ग इसे स्वीकार कर चुका हो, लेकिन सामाजिक ढांचे में यह अब भी अजीब या ‘अधूरा’ माना जाता है। परिवार, समाज और रिश्तेदारों के सवालों का उत्तर नहीं होता: ‘क्या चल रहा है?’ ‘क्या रिश्ता है?’ “कब शादी करोगे?’ बहुत से लोग सिचुएशनशिप की आड़ में किसी को ‘टाइम पास’ समझने लगते हैं। वे यह रिश्ता तब तक बनाए रखते हैं जब तक कोई बेहतर विकल्प न मिल जाए। इसमें भावनात्मक धोखा मिलने की संभावना बहुत अधिक रहती है। भारत में मेट्रो शहरों, विश्वविद्यालय परिसरों और मल्टीनेशनल कंपनियों के युवाओं में यह रिश्ता तेजी से बढ़ रहा है। टिंडर, बम्बल जैसे डेटिंग ऐप्स पर कई युवा अब ‘सिचुएशनशिप’ को रिश्ता मानते हैं। 2024 के एक ऑनलाइन सर्वे के अनुसार, 18 से 30 वर्ष की आयु के 42% युवाओं ने स्वीकार किया कि वे ‘डेट कर रहे हैं पर कमिटेड नहीं हैं’। इसका अर्थ स्पष्ट है; रिश्तों की दिशा बदल रही है। हाल ही में एक सोशल मीडिया घटना वायरल हुई जहां एक युवती ने ‘ब्रेकअप नहीं हुआ पर अब हम स्ट्रेंजर हैं’ जैसी पोस्ट लिखी। इसने हज़ारों युवाओं के दिल की आवाज़ को शब्द दे दिए। क्या यह संबंध भविष्य है? इसका उत्तर ‘हां’ और ‘ना’ दोनों हो सकता है। हां, क्योंकि यह उन युवाओं के लिए एक विकल्प है जो फिलहाल स्थायित्व नहीं चाहते, पर अकेलेपन से जूझ रहे हैं। ना, क्योंकि यह संबंध देर-सवेर किसी एक को पीड़ा जरूर देता है, क्योंकि इंसान का मन किसी न किसी बिंदु पर स्पष्टता और सुरक्षा चाहता है। सिचुएशनशिप न तो पूर्णतः अनुचित है, न ही पूर्णतः आदर्श। यह उस दौर की उपज है जिसमें हम प्रेम को परिभाषाओं की कैद से बाहर निकालकर उसके अनुभव की ओर ले जा रहे हैं। पर यह भी सच है कि प्रेम की सबसे मौलिक आवश्यकता ‘स्पष्टता’ है। जिसकी कमी इस रिश्ते को एक ‘चुभता हुआ धुंधलका’ बना देती है। इसलिए यह जरूरी है कि यदि आप सिचुएशनशिप में हैं या उसमें जाने की सोच रहे हैं, तो ईमानदारी, संवाद और सीमाओं की स्पष्टता को सर्वोपरि रखें वरना यह रिश्ता, जिसमें कोई ‘किन्तु-परन्तु’ नहीं होना चाहिए, खुद एक अंतहीन ‘किन्तु-परन्तु’ बन सकता है। सचिन त्रिपाठी Read more » a relationship with no ifs and buts Situationship सिचुएशनशिप
मनोरंजन सिनेमा 22 साल बाद बड़े पर्दे पर लौटी राखी गुलजार June 24, 2025 / June 24, 2025 by सुभाष शिरढोनकर | Leave a Comment सुभाष शिरढोनकर मशहूर एक्ट्रेस राखी गुलजार मां-बेटे के रिश्ते और कामकाजी जीवन के तनाव को दिखाती 9 मई को सिनेमाघरों में रिलीज बांगाली फिल्म ‘आमार बॉस’ के जरिए 22 साल बाद बड़े पर्दे पर लौटी हैं। फिल्म का निर्देशन नंदिता रॉय और शिबोप्रसाद मुखर्जी ने किया है। फिल्म में राखी गुलजार शुभ्रा गोस्वामी और शिबोप्रसाद मुखर्जी उनके बेटे अनीमेष की भूमिका […] Read more » Rakhi Gulzar returns to the big screen after 22 years राखी गुलजार
मनोरंजन सिनेमा बॉलीवुड में पहचान बना रहीं साउथ एक्ट्रेस June 24, 2025 / June 24, 2025 by सुभाष शिरढोनकर | Leave a Comment सुभाष शिरढोनकर पिछले कुछ वक्त से साउथ सिनेमा की अनेक एक्ट्रेसेस हिंदी फिल्मों में नजर आने लगी हैं। यहां के दर्शक न केवल उन्हें पहचान रहे हैं बल्कि हिंदी बेल्ट में उनकी लोकप्रियता काफी बढ़ चुकी है। ऐसी एक्ट्रेसों का सिलसिलेवार ब्योरा पेश है। रश्मिका मंदाना एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं। रश्मिका मंदाना […] Read more » South actress making a mark in Bollywood साउथ एक्ट्रेस
मनोरंजन कॉलर ट्यून या कलेजे पर हथौड़ा: हर बार अमिताभ क्यों? June 23, 2025 / June 23, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment प्रियंका सौरभ सरकार को समझना चाहिए कि चेतावनी सिर्फ चेतना के लिए होती है, प्रताड़ना के लिए नहीं। एक बार, दो बार, चलिए तीन बार — पर हर कॉल पर वही ट्यून, वही स्क्रिप्ट, वही अंदाज़ — यह सिर्फ संचार व्यवस्था को बोझिल नहीं बना रही, बल्कि जनता का भरोसा भी खो रही है। आखिर […] Read more » Caller tune or hammer on the heart कॉलर ट्यून या कलेजे पर हथौड़ा
मनोरंजन सिनेमा ‘सेक्रेड गेम्स’ से मशहूर हुई एक्ट्रेस राजश्री देशपांडे June 12, 2025 / June 12, 2025 by सुभाष शिरढोनकर | Leave a Comment सुभाष शिरढोनकर महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक कृषक मजदूर परिवार में पैदा हुई एक्ट्रेस राजश्री देशपांडे तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। उनका बचपन औरंगाबाद में बीता । स्कूल के दिनों से ही राजश्री ड्रामा में हिस्सा लेने लगी थी। डांस में रुचि थी तो एक आर्केस्ट्रा का हिस्सा बन कर गांव-गांव जाकर लावणी परफॉर्म […] Read more » Actress Rajshri Deshpande Actress Rajshri Deshpande became famous with 'Sacred Games' एक्ट्रेस राजश्री देशपांडे
मनोरंजन सिनेमा साउथ के टॉप 5 मेल एक्टर्स June 10, 2025 / June 10, 2025 by सुभाष शिरढोनकर | Leave a Comment सुभाष शिरढोनकर तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम सिनेमा को समेकित करने वाली साउथ फिल्म इंडस्ट्री ने हाल के वर्षों में न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी जबर्दस्त धाक जमाई है। साउथ फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले एक्टर्स का क्रेज आज बॉलीवुड एक्टर्स से कहीं ज्यादा नजर आने लगा है। इनमें से कुछ एक्टर्स तो […] Read more » साउथ के टॉप 5 मेल एक्टर्स
बच्चों का पन्ना मनोरंजन सोशल मीडिया बच्चों को हिंसक एवं बीमार बना रहा है June 9, 2025 / June 9, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment – ललित गर्ग – सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग से बच्चों का बचपन न केवल प्रभावित हो रहा है, बल्कि बीमार, हिंसक एवं आपराधिक भी हो रहा है। यह चिंताजनक एवं चुनौतीपूर्ण है। यह बच्चों को समय के प्रति, परिवार एव सामाजिक कौशल के प्रति और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति नकारात्मक रूप से प्रभावित कर […] Read more » सोशल मीडिया
Tech मनोरंजन एआइ दिखाने लगी है बगावती तेवर June 9, 2025 / June 9, 2025 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment आज का युग एआइ यानी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग है।यह ठीक है कि एआइ ने आज मानव को अनेक सुविधाएं प्रदान कीं हैं। मसलन आज एआइ हमारे समाज और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। एआइ का उपयोग आज युद्ध, विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा, इंजीनियरिंग, स्पेस, मौसम विज्ञान, घटनाओं का अनुमान लगाने, इंटरनेट ऑफ […] Read more » AI has started showing rebellious attitude the behavior of Open AI's latest ChatGPT o3 model was the most worrying. According to the report the o3 model refused to shutdown 7 times out of 100. एआइ दिखाने लगी है बगावती तेवर
मनोरंजन मोबाइल की लत और विड्रॉल सिंड्रोम: बच्चों को दे रही तनाव की सौगात June 9, 2025 / June 9, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment मोबाइल की बढ़ती लत ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। विड्रॉल सिंड्रोम के तहत बच्चे मोबाइल से दूर होने पर गुस्सा, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी, और सामाजिक दूरी जैसे लक्षण दिखाते हैं। यह समस्या अब चिकित्सा स्तर पर सामने आने लगी है। इसका समाधान है — डिजिटल अनुशासन, आउटडोर […] Read more » Mobile addiction and withdrawal syndrome मोबाइल की लत और विड्रॉल सिंड्रोम
मनोरंजन सिनेमा मेघना गुलजार की फिल्म ‘दायरा’ में करीना कपूर June 3, 2025 / June 3, 2025 by सुभाष शिरढोनकर | Leave a Comment सुभाष शिरढोनकर एक्ट्रेस करीना कपूर अपनी एक्टिंग से हर बार फैंस का दिल जीत लेती हैं। उनकी फिल्मों का फैंस को बेसब्री से इंतजार रहता है हालांकि शादी और फिर दो बच्चों की मां बन जाने के बाद करीना आज पहले की तरह सक्रिय नहीं हैं। हाल ही में करीना कपूर ने अपने करियर के 25 साल […] Read more » करीना कपूर