पर्यावरण

Environment

मौसम विभाग की चेतावनी : बादलों के बरसने की घट रही है क्षमता

वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती है तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।  महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमण्डल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊंचाईयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिये कम्प्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है। इनसे जो आंकड़ें इकट्ठे होते हैं उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है।

लद्दाख के वातावरण को बचाने का अनोखा प्रयास

स्थानीय लोगो के माल मवेशी पर हिंसक हमलों के कारण लोगो का तेंदुए पर गुस्सा बहुत अधिक था, ऐसे में क्षेत्र में विभिन्न पशुओं के नस्लों की रक्षा करना महत्वपूर्ण था। रात के समय पशुओं को रखने की जगह चारो ओर से तो सुरक्षित थी परंतु उपर से खुली होती थी। कारणवश स्नो लेपर्ड रात के समय में जानवरों पर हमला कर देता था और लोगो औरस्नोलेपर्ड के बीच संघर्ष का एक वातारण निरंतर रुप से बढ़ता ही जा रहा था।

घट रहे हैं पेड़़

पेड़ लगाने और उनकी सुरक्षा से जुड़ा सबसे दुखद पहलू यह है कि सरकारी नीतियां के चलते सारी जिम्मेबारियां लाल फीताशाही की गिरफ्त में आ गई है। पेड़ लगाने, काटने, उसे परिवहन व विक्रय करने के कायदे-कानून राज्य सरकारों के आधीन हैं। निजी भूमि पर लगाया गया पेड़ भी काटने के लिए राजस्व और वन विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है। इनमें रिष्वत का बोलबाला है। नतीजतन इन परेशानियों से बचने के लिए लोगों ने पेड़ उगाना ही बंद कर दिया है। इस कारण आम आदमी का वन प्रबंधन से अब कोई संबंध ही नहीं रह गया है। आज भारत के सबसे गरीब लोग सबसे संमृद्ध वनों में रहते है। किंतु पेड़ और वनोपज से सर्वथा वंचित है। गोया जब इन गरीबों को पेड़ उगाने और काटने के साथ वनोपज के स्वामित्व से जोड़ा जाएगा, तभी वनों का विकास व सरंक्षण संभव है।

पर्यावरण में युद्ध स्तरीय सुधार की जरुरत

– पर्यावरण की अवहेलना के गंभीर दुष्परिणाम समूचे विश्व में परिलक्षित हो रहे हैं। अब सरकार जितने भी नियम-कानून लागू करें उसके साथ साथ जनता की जागरूकता से ही पर्यावरण की रक्षा संभव हो सकेगी। इसके लिए कुछ अत्यंत सामान्य बातों को जीवन में दृढ़ता-पूर्वक अपनाना आवश्यक है। जैसे -प्रत्येक व्यक्ति प्रति वर्ष यादगार अवसरों (जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ) पर अपने घर, मंदिर या ऐसे स्थल पर फलदार अथवा औषधीय पौधा-रोपण करे, जहाँ उसकी देखभाल हो सके। उपहार में भी सबको पौधो दें। शिक्षा संस्थानों व कार्यालयों में विद्यार्थी, शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारीगण राष्ट्रीय पर्व तथा महत्त्वपूर्ण तिथियों पर पौधों रोपे।

विश्व में विकास की अंधी दौड़ से प्रकृति बढ रही विनाश की ओर

आज विवाह, जन्मदिन, पार्टी और अन्य ऐसे समारोहों पर उपहार स्वरूप पौधों को देने की परंपरा शुरू की जाए। फिर चाहे वो पौधा, तुलसी का हो या गुलाब का, नीम का हो या गेंदे का। इससे कम से कम लोगों में पेड पौधों के प्रति एक लगाव की शुरूआत तो होगी। और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता आएगी और ईको फ्रेंडली फैशन की भी शुरुआत होगी।

बिहार गाद संकट: समाधान, पहल और चुनौतियां

जब तक भगीरथी पर टिहरी बांध, गंगा पर भीमगौड़ा, नरोरा जैसे ढांचे नहीं थे, तब तक यह बैक्टीरियोफाॅज हिमालय में पैदा होकर बिहार और बंगाल तक आते थे। बहुत संभव है कि इनके कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और बंगाल के गंगा किनारे के भूजल की निर्मलता भी सुनिश्चित होती रही हो। नीरी की एक रिपोर्ट बताती है कि अब मात्र 10 प्रतिशत बैक्टीरियोफाॅज ही नीचे आते हैं। शेष 90 प्रतिशत टिहरी की झील में बंधकर रह जाते हैं। जाहिर है कि टिहरी बांध द्वारा पैदा की रुकावट के कारण अब यह बैक्टीरियोफाॅज और हिमालय से निकली विशिष्ट गुणों वाली सिल्ट अब बिहार तक नहीं पहुंचती।

पर्यावरण की सुरक्षा – हमारा नैतिक कर्त्तव्य

यदि कोई चाहकर भी वृ़क्षारोपण के कार्य में सहयोग न दे पाये तो कोई बात नहीं । वह कम से कम इतना सहयोग तो जरूर कर ही सकता है कि – हममें से हर कोई रेल और सडक मार्ग से यात्रा जरूर करता है । इन यात्राओं के दौरान खाये जाने वाले फलों के बीजों को इधर-उधर कचरे के रूप में न फेंककर यात्रा के दौरान ही सडक या रेल मार्ग के किनारे बिखेर दें । उन बिखेरे गये बीजों से कुछ नहीं तो यदि 10 प्रतिशत पौधे ही पनप जायें तो भी पर्यावरण संरक्षण की दिषा में उनका यह बहुत बडा योगदान होगा ।

नदियों का सूखना

गंगा का संकट टूटते हिमखंड ही नहीं हैं, बल्कि औद्योगिक विकास भी है। कुछ समय पूर्व अखिल भारतीय किसान मजदूर संगठन की तरफ से बुलाई गई जल संसद में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिए जलस्रोतों के दुरूपयोग और इसकी छूट दिए जाने का भी विरोध किया था। कानपुर में गंगा के लिए चमड़ा, जूट और निजी वोटलिंग प्लांट संकट बने हुए है। टिहरी बांध बना तो सिंचाई परियोजना के लिए था, लेकिन इसका पानी दिल्ली जैसे महानगरों में पेयजल आपूर्ति के लिए कंपनियों को दिया जा रहा है। गंगा के जलभराव क्षेत्र में खेतों के बीचो-बीच पेप्सी व काॅक जैसी निजी कंपनियां बोतलबंद पानी के लिए बड़े-बड़े नलकूपों से पानी खींचकर एक ओर तो मोटा मुनाफा कमा रही हैं, वहीं खेतों में खड़ी फसल सुखाने का काम कर रही है।

स्वच्छ भारत अभियान : अभियानों से नहीं सुधरेगी व्यवस्था

बाजारों में एक अजीब दृश्य दिखता है। लोग सुबह दुकान खोलते समय सफाई करते हैं और फिर कूड़ा सड़क पर डाल देते हैं। घरों में भी प्रायः ऐसा होता है। अब कई जगह नगरपालिकाएं सप्ताह में दो बार कूड़ागाड़ी भेजने लगी हैं; पर लोगों को आज नहीं तो कल समझना होगा कि सफाई करने की नहीं रखने की चीज है। ऐसी वस्तुएं प्रयोग करें, जो फिर काम आ सकें। घर का कूड़ा घर में ही खपाना या नष्ट करना होगा। वरना समस्या बढ़ती ही जाएगी।

यमुना का प्रदूषण और उमा भारती के प्रयास

उमा भारती के अनुसार उन्होंने यमुना के लिए जो प्लान किया है उसमे दिल्ली से गंदा पानी अब मथुरा में नहीं आ पायेगा। नमामि गंगे प्रोजेक्ट में दिल्ली से आने वाला गंदा पानी ट्रीट होकर मथुरा की यमुना नदी में शुद्ध होकर आयेगा। जिसके लिए दिल्ली में भी कई प्रोजेक्ट्स को पहले ही लांच किया जा चुका है। इसके अलावा उमा भारती ने दिल्ली में यमुना को हाइब्रिड एन्यूटी पर ले जाकर पूरी की पूरी यमुना और उसके घाटों को ठीक करने की बात कही है। अगले चरण में आगरा की यमुना नदी को भी इस योजना का हिस्सा बनाने की बात की गयी है।’’ अब आगे देखने वाली बात होगी कि केंद्रीय मंत्री उमा भारती यमुना का कितना जीर्णोद्धार या कायाकल्प कर पाती हैं।