दोहे

संस्कार की शुभ गति निरखि !

संस्कार की शुभ गति निरखि, आभोग को कबहू परखि; मम मन गया सहसा चहकि, कबहुक रहा था जो दहकि ! झिझके झुके झिड़के जगत, भिड़के भयानक युद्ध रत; हो गए जब संयत सतत, भव बहावों से हुए च्युत ! बाधा व्यथा तब ना रही, धुनि समर्पण की नित रही; चाहत कहाँ तब कोई रही, जो मिल गया भाया वही ! भावों में भुवनेश्वर रमा, ईशत्व में स्वर को समा; ऐश्वर्य में उर प्रस्फुरा,…