दोहे

मातृ-भूमि वन्दना -राज सक्सेना

     भरत-भूमि,भव-भूति  प्रखण्ड | उन्नत, उज्ज्वल, भारतखण्ड | सकल-समन्वित,श्रमशुचिताम, शीर्ष-सुशोभित,श्रंग-शताम | विरल-वनस्पति, विश्रुतवैभव,  पावन,पुण्य-प्रसून,शिवाम

दोहा:- जय नेता गन राजनीती

दोहा:- जय नेता गन राजनीती के तुमको करू प्रणाम // तुम्ही विधाता अन्यायी के करो चापलूसों का काम// चौपायी :- जय राजनीती के नेता गण // तुम मोहे हो निर्दयी के मन/// सब चमचो की करो भलायी // वे चाहे जितनी करे बुरायी // उन्हें आंच नहीं आने पाये // तुम्हरी कुर्सी भले ही जाये // भ्रष्टाचार में तुम आगे हो/// अवगुण कारी के धागे हो/// घपला झगड़ा तुम करवाते // सही जनों को यूं मरवाते // राजनीति के पके पुजारी/// तुम दोषी के करो रखवारी/// जुर्म करवाने में माहिर हो///