दोहा:- जय नेता गन राजनीती

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दोहा:- जय नेता गन राजनीती के तुमको करू प्रणाम // तुम्ही विधाता अन्यायी के करो चापलूसों का काम// चौपायी :- जय राजनीती के नेता गण // तुम मोहे हो निर्दयी के मन/// सब चमचो की करो भलायी // वे चाहे जितनी करे बुरायी // उन्हें आंच नहीं आने पाये // तुम्हरी कुर्सी भले ही जाये // भ्रष्टाचार में तुम आगे हो/// अवगुण कारी के धागे हो/// घपला झगड़ा तुम करवाते // सही जनों को यूं मरवाते // राजनीति के पके पुजारी/// तुम दोषी के करो रखवारी/// जुर्म करवाने में माहिर हो/// चोर उचक्कों में सामिल हो/// धन्य धन्य भारत के बीर // भोली जनता पे मारो तीर/// है कुर्सी का खेल निराला // हरदम ओढ़े रहो दुशाला/// रुपयों की तुमको भूख लगी है/// बेईमानी की प्यास जगी है/// कब तक ऐसे चलेगा काम/// चले जाओगे धुरिया धाम/// हाथ जोड़ कर नहीं बचोगे/// सब देखेगे जल्द पिसोगे // दोहा:-   भगवन ऐसी बया चला दो // अत्याचार हो जाये कम /// राजनीति के बेईमानो का /// फिर भारत में हो न जन्म//   शम्भूनाथ

कन्या भ्रूण हत्या पर कुछ दोहे

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-डा.राज सक्सेना बेटे  को  दें  स्वर्ग  सुख, बेटी  भोगे  नर्क | लानत ऐसी सोच पर, करती  इनमे फर्क || -०- कम अकलों की वजह से देश हुआ बरबाद | बेटी को जो समझते, घर का एक अवसाद || -०- बेटी हरेक सुलक्षणी, बेटे अधिक कपूत | बेटी घर को पालती, अलग जा बसे पूत || -०- रहती… Read more »

सुधियां- डा.राज सक्सेना

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पोर – पोर थर-थर करे,  प्रिय की सुधि से आज | क्या भूलूं उन क्षणों से, हर क्षण प्रिय है ‘राज’ ||   प्रथम पहर मधुयामिनी , प्रियतम थामा  हाथ | पोर – पोर बिहंसा सखी, हर किलोल के साथ ||   वस्त्रों संग छूटे सभी, तन-मन के तटबंध | अंतरमन तक हो गए, जन्मों… Read more »

सौन्दर्य वर्णन

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कृष्ण मेघ से कृष्णता, ले केशों में डाल | उठा दूज का चाँद ज्यों, रचा विधाता भाल | खिची कमान भोंहें रची, पलक सितारे डाल | नयन कटीले रख दिए, मृग से नयन निकाल | तीखी, सीधी और खड़ी, रची विधाता नाक | रक्तवर्ण, रस से भरे, रचे होंठ रस-पाक | चिबुक अनारों से रचे… Read more »

दोहों पर दोहे

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उर्दू में है शेर ज्यों, दोधारी शमशीर | हिंदी में दोहा अटल, सही लक्ष्य का तीर |   शेरो में शायर भरे, पूरे मन के भाव | इसी भाँति  दोहा करे, सीधे मन पर घाव |   गजल शेर का एक जुज, हो इनसे परिपूर्ण | पर दोहा है चतुष्पद, भाव भरे सम्पूर्ण |  … Read more »

मच्छड़ का फिर क्या करें

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मैंने पूछा साँप से दोस्त बनेंगे आप। नहीं महाशय ज़हर में आप हमारे बाप।।   कुत्ता रोया फूटकर यह कैसा जंजाल। सेवा नमकहराम की करता नमकहलाल।।   जीव मारना पाप है कहते हैं सब लोग। मच्छड़ का फिर क्या करें फैलाता जो रोग।।   दुखित गधे ने एक दिन छोड़ दिया सब काम। गलती करता… Read more »

एक अनोखी बात

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पाँच बरस के बाद ही, क्यों होती है भेंट? मेरे घर की चाँदनी, जिसने लिया समेट।।   ऐसे वैसे लोग को, मत करना मतदान। जो मतवाला बन करे, लोगों का अपमान।।   प्रत्याशी गर ना मिले, मत होना तुम वार्म। माँग तुरत भर दे वहीं, सतरह नम्बर फार्म।।   सत्ता के सिद्धान्त की, एक अनोखी… Read more »

प्रश्न अनूठा सामने

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प्रश्न अनूठा सामने, क्या अपनी पहचान? छुपे हुए संघर्ष में, सारे प्रश्न-निदान।।   कई समस्या सामने, कारण जाने कौन? मिला न कारण आजतक, समाधान है मौन।।   बीज बनाये पेड़ को, पेड़ बनाये बीज। परिवर्तन होता सतत, बदलेगी हर चीज।।   बारिश चाहे लाख हों, याद नहीं धुल पाय। याद करें जब याद को, दर्द… Read more »

नारी बिन सूना जगत

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मँहगाई की क्या कहें, है प्रत्यक्ष प्रमाण। दीन सभी मर जायेंगे, जारी है अभियान।।   नारी बिन सूना जगत, वह जीवन आधार। भाव-सृजन, ममता लिए, नारी से संसार।।   भाव-हृदय जैसा रहे, वैसा लिखना फर्ज। और आचरण हो वही, इसमें है क्या हर्ज।।   कट जायेंगे पेड़ जब, क्या तब होगा हाल। अभी प्रदूषण इस… Read more »

बस माँगे अधिकार

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कैसे कैसे लोग से भरा हुआ संसार। बोध नहीं कर्त्तव्य का बस माँगे अधिकार।।   कहने को आतुर सभी पर सुनता है कौन। जो कहने के योग्य हैं हो जाते क्यों मौन।।   आँखों से बातें हुईं बहुत सुखद संयोग। मिलते कम संयोग यह जीवन का दुर्योग।।   मैं अचरज से देखता बातें कई नवीन।… Read more »