दोहे

विश्वास ना निज स्वत्व में !

विश्वास ना निज स्वत्व में,  अस्तित्व के गन्तव्य में; ना भरोसा जाया है जो, ले जाएगा ले दिया जो !  बुद्धि वृथा ही लगा कर, आत्मा की बिन पहचान कर; ना नियंता को जानते, ना सृष्टि की गति चीन्हते ! आखेट वे करते फिरे, आक्रोश में झुलसे रहे; बिन बात दूजों को हने, वे स्वयं के भी कब रहे ! राहों को वे मुश्किल किए, राहत किसी को कब दिए; चाहत किसी की कहँ लखे,…

धेनु चरन न तृणउ पात !

धेनु चरन न तृणउ पात, त्रास अति रहत; राजा न राज करउ पात, दुष्ट द्रुत फिरत ! बहु कष्ट पात लोक, त्रिलोकी कूँ हैं वे तकत; शोषण औ अनाचारी प्रवृति, ना है जग थमत ! ना कर्म करनौ वे हैं चहत, धर्म ना चलत; वे लूटनों लपकनों मात्र, गुप्त मन चहत ! झकझोरि डारौ सृष्टि, द्रष्टि बदलौ प्रभु अब; भरि परा-द्रष्टि जग में, परा-भक्ति भरौ तव ! विचरहिं यथायथ सबहि विश्व, तथागत सुभग; मधु क्षरा पाएँ सुहृद ‘मधु’, करि देउ प्रणिपात ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’

तुम चलत सहमित संस्फुरत !

उड़िकें गगन आए धरणि,
बहु वेग कौ करिकें शमन;
वरिकें नमन भास्वर नयन,
ज्यों यान उतरत पट्टियन !

बचिकें विमानन जिमि विचरि,
गतिरोध कौ अवरोध तरि;
आत्मा चलत झाँकत जगत,
मन सहज करि लखि क्षुद्र गति !