सुनके ज़्यादा भी करोगे तुम क्या !

(मधुगीति १८११२५ स)

सुनके ज़्यादा भी करोगे तुम क्या,

ध्वनि कितनी विचित्र सारे जहान;

भला ना सुनना आवाज़ें सब ही,

चहते विश्राम कर्ण-पट देही !

सुनाया सुन लिया बहुत कुछ ही,

सुनो अब भूमा तरंग ॐ मही;

उसमें पा जाओगे नाद सब ही,

गौण होएँगे सभी स्वर तब ही !

राग भ्रमरा का समझ आएगा,

गुनगुना ब्रह्म भाव भाएगा;

सोच हर हिय का ध्यान धाएगा,

कान कुछ करना फिर न चाहेगा !

जो भी कर रही सृष्टि करने दो,

सुन रहे उनको अभी सुनने दो;

सुनो तुम उनकी सुने उनको जो,

सुनाओ उनको लखे उनको जो !

गूँज जब उनकी सुनो लो थिरकन,

बिखेरो सुर की लहर फुरके सुमन;

बना ‘मधु’ इन्द्रियों को उर की जुवान,

रास लीला में रमे ब्रज अँगना !

✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’

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