कभी चल पड़ते हैं हम सर छत्र धारे !

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कभी चल पड़ते हैं हम सर छत्र धारे, छोड़ चल देते कभी सारे नज़ारे; प्रीति की कलिका कभी चलते सँवारे, सुर लिए कोई कभी रहते किनारे !   ज़माने की भीड़ में उर को उबारे, हिय लिए आनन्द की अभिनव सी धारें; भास्वर भव सुरभि की अनुपम घटाएँ, विश्व विच व्यापक विलोके चिर विधाएँ !… Read more »

कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ

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कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ,ले जा रहीं भव दरमियाँ; भ्रम की मिटाती खाइयाँ,श्रम कर दिखातीं कान्तियाँ। हर किरण ज्योतित भुवन कर,है हटाती परछाइयाँ; तम की तहों को तर्ज़ दे,तृण को दिए ऊँचाइयाँ। छिप कर अणु ऊर्जित रहा,पहचाना ना हर से गया; हर वनस्पति औषधि रही,जानी कहाँ पर वह गई ! हर प्राण अद्भुत संस्करण,संकलन सृष्टि विच… Read more »

छोड़ कर जगत के बंधन !

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छोड़ कर जगत के बंधन, परम गति ले के चल देंगे; एक दिन धरा से फुरके, महत आयाम छू लेंगे ! देख सबको सकेंगे हम, हमें कोई न देखेंगे; कर सके जो न हम रह कर, दूर जा कर वो कर देंगे ! सहज होंगे सरल होंगे, विहग वत विचरते होंगे; व्योम बन कभी व्यापेंगे,… Read more »

दर्द से ऊपर निकलना चाहिये !

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दर्द से ऊपर निकलना चाहिये; छिपा जो आनन्द लखना चाहिये ! झाँकना सृष्टि में सूक्ष्म चाहिये; चितेरे बन चित्त से तक जाइये !   सोचना क्यों हमको इतना चाहिये; हो रहा जो उसको उनका जानिये ! समर्पण कर बस उसे चख जाइये; प्रकाशों की झलक फिर पा जाइये !   मिला मन को इष्ट के… Read more »

जो छा रहा वह जा रहा !

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जो छा रहा वह जा रहा ! जो छा रहा वह जा रहा, ना संस्कार बना रहा; प्रारब्ध है कुछ ढा रहा, ना लोभ पैदा कर रहा ! मन मोह से हो कर विलग, लग संग मन-मोहन सजग; नि:संग में सब पा रहा, वह हो असंग घुला मिला ! खिल खिला कर है वह खुला,… Read more »

मो कूँ रहत माधव तकत !

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मो कूँ रहत माधव तकत, हर लता पातन ते चकित; देखन न हों पावति तुरत, लुकि जात वे लखि मोर गति ! मैं सुरति जब आवति रहति, सुधि पाइ तिन खोजत फिरति; परि मुरारी धावत रहत, चितवत सतत चित मम चलत ! जानत रहत मैं का चहत, प्रायोजना ता की करत; राखत व्यवस्थित व्यस्त नित,… Read more »

चलि दिए विराट विश्व !

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चलि दिए विराट विश्व, लै कें फुरकैंया; ध्यान रह्यौ निज सृष्टा, नैनन लखि पैयाँ ! पैंजनियाँ बजति रहीं, देखत है मात रही; प्रकृति ललचात रही, झाँकन रुचि आत रही ! सँभलावत गात चलत, मोहन मन कछु सोचत; अँखियन ते जग निरखत, पगडंडिन वे धावत ! पीले से वस्त्र पहन, गावत तुतलात रहत; दौड़त कबहू ठहरत,… Read more »

तुम चलत सहमित संस्फुरत !

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उड़िकें गगन आए धरणि,
बहु वेग कौ करिकें शमन;
वरिकें नमन भास्वर नयन,
ज्यों यान उतरत पट्टियन !

बचिकें विमानन जिमि विचरि,
गतिरोध कौ अवरोध तरि;
आत्मा चलत झाँकत जगत,
मन सहज करि लखि क्षुद्र गति !

प्राण की आहुति कोई देता !

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प्राण की आहुति कोई देता, समझ बलिदान कहाँ कोई पाता; ताक में कोई है रहा होता, बचा कोई कहाँ उसे पाता ! रही जोखिम में ज़िन्दगी रहती, सुरक्षा राह हर कहाँ होती; तभी तो ड्यूटी है लगी होती, परीक्षा हर घड़ी वहाँ होती ! चौकसी करनी सभी को होती, चूक थोड़ी भी नहीं है चलती;… Read more »