काले दिवस के सफेद दोहे

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आर के रस्तोगी   कोई किसे हिटलर कहे,कोई किसे को औरंगजेब जब जिसको मौका मिले,काटे जनता की ये जेब काला दिवस मना कर,क्या करना चाहते हो सिद्ध दोनो आपस में ऐसे लड़ रहे ,जैसे मांस पर गिद्ध बीती गई बिसार दो,एक दूजे की टांग खीचते क्यों ? गड़े मुर्दे उखाड़ने में,समय बर्बाद करते हो तुम… Read more »

धेनु चरन न तृणउ पात !

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धेनु चरन न तृणउ पात, त्रास अति रहत; राजा न राज करउ पात, दुष्ट द्रुत फिरत ! बहु कष्ट पात लोक, त्रिलोकी कूँ हैं वे तकत; शोषण औ अनाचारी प्रवृति, ना है जग थमत ! ना कर्म करनौ वे हैं चहत, धर्म ना चलत; वे लूटनों लपकनों मात्र, गुप्त मन चहत ! झकझोरि डारौ सृष्टि, द्रष्टि बदलौ प्रभु अब; भरि परा-द्रष्टि जग में, परा-भक्ति भरौ तव ! विचरहिं यथायथ सबहि विश्व, तथागत सुभग; मधु क्षरा पाएँ सुहृद ‘मधु’, करि देउ प्रणिपात ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’

कभी चल पड़ते हैं हम सर छत्र धारे !

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कभी चल पड़ते हैं हम सर छत्र धारे, छोड़ चल देते कभी सारे नज़ारे; प्रीति की कलिका कभी चलते सँवारे, सुर लिए कोई कभी रहते किनारे !   ज़माने की भीड़ में उर को उबारे, हिय लिए आनन्द की अभिनव सी धारें; भास्वर भव सुरभि की अनुपम घटाएँ, विश्व विच व्यापक विलोके चिर विधाएँ !… Read more »

कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ

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कुछ भ्रान्तियाँ औ क्रान्तियाँ,ले जा रहीं भव दरमियाँ; भ्रम की मिटाती खाइयाँ,श्रम कर दिखातीं कान्तियाँ। हर किरण ज्योतित भुवन कर,है हटाती परछाइयाँ; तम की तहों को तर्ज़ दे,तृण को दिए ऊँचाइयाँ। छिप कर अणु ऊर्जित रहा,पहचाना ना हर से गया; हर वनस्पति औषधि रही,जानी कहाँ पर वह गई ! हर प्राण अद्भुत संस्करण,संकलन सृष्टि विच… Read more »

छोड़ कर जगत के बंधन !

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छोड़ कर जगत के बंधन, परम गति ले के चल देंगे; एक दिन धरा से फुरके, महत आयाम छू लेंगे ! देख सबको सकेंगे हम, हमें कोई न देखेंगे; कर सके जो न हम रह कर, दूर जा कर वो कर देंगे ! सहज होंगे सरल होंगे, विहग वत विचरते होंगे; व्योम बन कभी व्यापेंगे,… Read more »

दर्द से ऊपर निकलना चाहिये !

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दर्द से ऊपर निकलना चाहिये; छिपा जो आनन्द लखना चाहिये ! झाँकना सृष्टि में सूक्ष्म चाहिये; चितेरे बन चित्त से तक जाइये !   सोचना क्यों हमको इतना चाहिये; हो रहा जो उसको उनका जानिये ! समर्पण कर बस उसे चख जाइये; प्रकाशों की झलक फिर पा जाइये !   मिला मन को इष्ट के… Read more »

जो छा रहा वह जा रहा !

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जो छा रहा वह जा रहा ! जो छा रहा वह जा रहा, ना संस्कार बना रहा; प्रारब्ध है कुछ ढा रहा, ना लोभ पैदा कर रहा ! मन मोह से हो कर विलग, लग संग मन-मोहन सजग; नि:संग में सब पा रहा, वह हो असंग घुला मिला ! खिल खिला कर है वह खुला,… Read more »

मो कूँ रहत माधव तकत !

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मो कूँ रहत माधव तकत, हर लता पातन ते चकित; देखन न हों पावति तुरत, लुकि जात वे लखि मोर गति ! मैं सुरति जब आवति रहति, सुधि पाइ तिन खोजत फिरति; परि मुरारी धावत रहत, चितवत सतत चित मम चलत ! जानत रहत मैं का चहत, प्रायोजना ता की करत; राखत व्यवस्थित व्यस्त नित,… Read more »

चलि दिए विराट विश्व !

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चलि दिए विराट विश्व, लै कें फुरकैंया; ध्यान रह्यौ निज सृष्टा, नैनन लखि पैयाँ ! पैंजनियाँ बजति रहीं, देखत है मात रही; प्रकृति ललचात रही, झाँकन रुचि आत रही ! सँभलावत गात चलत, मोहन मन कछु सोचत; अँखियन ते जग निरखत, पगडंडिन वे धावत ! पीले से वस्त्र पहन, गावत तुतलात रहत; दौड़त कबहू ठहरत,… Read more »