दोहे

विश्वास में बसा है यहाँ!

विश्वास में बसा है यहाँ,  सारा सिलसिला; मिट जाता जो भी आता,  जगती जड़ का ज़लज़ला!  चैतन्य सत्ता सतत रहती, शून्य समाई; अवलोके लोक लुप्त भाव, ललित लुभाई!  लावण्य हरेक गति में रहा, हर लय छाई; लोरी लिए ही लखते रहो, उनकी खुदाई!  खेलो खिलाओ वाल सरिस,  बुधि न लगाओ; कान्हा की श्यामा श्याम रंग, घुल मिल जाओ!  वसुधा हुई है ध्यान मग्न,  काल भुलाईं; ‘मधु’ कोंपलों में परागों का, प्राण है ढला! ...

बिन खोदे, कुरेदे औ कसे!

बिन खोदे, कुरेदे औ कसे, वे ही तो रहे; आशा औ निराशा की फसल, वे ही थे बोए! हर सतह परत पर्दा किए, प्राण पखारे; प्रणिपात किए शून्य रखे, स्वर्णिम धारे! दहका औ महका अस्मिता की, डोर सँभाले; डर स्वान्त: सुशान्त किए, द्वारे निहारे!  बीमारी कोई कहाँ रही, तयारी रही; मानव के मन की प्रीति श्रीति, खुमारी रही! ‘मधु’ वाद्य यंत्र तार तरासे औ तराजे; उर उसासों में वे थे रहे, राग रसाए!  ✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’

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