कविता मै एकान्त हूँ,एकांतवास से बोल रहा हूँ March 25, 2020 / March 25, 2020 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मै एकान्त में हूँ,पर किसी के इन्तजार में हूँ |शांत हूँ,पर कल के कोलाहल के इन्तजार में हूँ || डरा नहीं हूँ, इस सन्नाटे को देखकर मै आज |देख रहा हूँ,इसमें भारत के भविष्य का आज || भाग दौड़ के माहौल से अलग एकांत चाहता हूँ मै |अपनी यादो को फिर से जीवन देना चाहता […] Read more » एकांतवास से बोल रहा हूँ मै एकान्त हूँ
कविता दुर्गा माँ से विनती March 25, 2020 / March 25, 2020 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment हे ! दुर्गा माता,विनती करते तुमसे आज | कोरोना से बचाईये. भारत को तुम आज || रहे सभी सुखी संसार में, दुखिया रहे न कोय | करे प्रार्थना आप से,कोरोना किसी को न होय || करे सब पूजा घर में ही ,बाहर न जाने कोय | जो घर से बाहर जायेगा,उसकी पूजा न होय || […] Read more »
कविता उठो देश वासियो, कोरोना को देश से अब भगाना है | March 23, 2020 / March 23, 2020 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment उठो देश वासियो, कोरोना को देश से अब भगाना है | ये एक ऐसा दुश्मन है, जिसको अब मार भगाना है || ये एक घातक कीटाणु है,जो हमारे शरीर में घुस जाता है | तोप तलवार और गोली से भी, ये कभी नहीं मर पाता है || कोरोना एक संक्रामक बीमारी है,जो फैलता जाता है […] Read more » कोरोना को देश से अब भगाना है
कविता जनता कर्फ़यु की कुछ झलकियाँ March 23, 2020 / March 23, 2020 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment सूनी सडके,दुकाने बंद,कोई ग्राहक नहीं आया |देखो भैया,इस कोरोना ने कैसा कहर है ढाया || छिपे हुए है सब अपने घर में,कोई नहीं बोल रहा है |कमीना कोरोना,शिकार की तलाश में डोल रहा है || बच्चे भी घर में मस्त है,खेल रहे है अपने खेल |कोरोना भी खेल रहा है,अब साँप सीडी का खेल || […] Read more » जनता कर्फ़यु जनता कर्फ़यु की कुछ झलकियाँ
कविता गौरैया March 21, 2020 / March 21, 2020 by प्रवेश कुमार सिन्हा | 1 Comment on गौरैया रोज सबेरे मेरे कमरे में खिड़की से आती गौरैया अपनी मीठी आवाजो से मुझको है जगाती गौरैया समय से कोई कार्य करने हमें है सिखलाती गौरैया चहक चहक की बोली से मन मेरा भरमाती गौरैया फुदक फुदक कर परी जैसी घर की रौनक बढ़ाती गौरैया उसी मे खो कर रह जाऊ मैं चुपके से कह […] Read more » गौरैया
कविता तो कोरोना क्यों होय || March 20, 2020 / March 20, 2020 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment साबुन से सब धोइये,अपने दोनों हाथ |कोरोना से छूट जायेगा,तुम्हारा साथ || जनता कर्फ़यु लगाईये,आगामी रविवार |कम हो जायेगा तुम पर,कोरोना का वार || डॉक्टर्स,नर्स का करो तुम प्रगट आभार |ये लोग सदा करते ,तुम्हारा ही उपकार || बुजर्गो को मत भेजिए,घर से तुम बाहर |झेल न पात है,ये कोरोना का तीखा वार || करो […] Read more »
कविता साहित्य क्यों राम नहीं तुम बन सके March 19, 2020 / March 19, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment क्यों राम नहीं तुम बन सके कारण तो बतला दो भैईया ? मातपिता से क्यों मुंह मोड़ा कारण तो समझा दो भैईया ? कमी कहॉ हुई उनकी ममता में क्यों बोलना वे भूले भैईया ? बहिन भाई से क्यों प्रीति तोड़ी अनमोल खजाना क्या पाया भैईया? जिस माता पिता ने जन्म दिया, अंधेरी उनकी हर […] Read more » क्यों राम नहीं तुम बन सके
कविता कवि सम्मेलन March 19, 2020 / March 19, 2020 by आलोक कौशिक | Leave a Comment स्वार्थपरायण होते आयोजक संग प्रचारप्रिय प्रायोजक भव्य मंच हो या कोई कक्ष उपस्थित होते सभी चक्ष सम्मुख रखकर अणुभाष करते केवल द्विअर्थी संभाष करता आरंभ उत्साही उद्घोषक समापन हेतु होता परितोषक करते केवल शब्दों का शोर चाहे वृद्ध हो या हो किशोर काव्य जिसकी प्रज्ञा से परे होता आनन्दित दिखते वही श्रोता करतल ध्वनि संग […] Read more » कवि सम्मेलन
कविता बेर कहाँ हैं झरबेरी के March 17, 2020 / March 17, 2020 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment बाल वीर या पोगो ही, देखूंगी ,गुड़िया रोई। चंदा मामा तुम्हें आजकल, नहीं पूछता कोई। आज देश के बच्चों को तो, छोटा भीम सुहाता। उल्टा चश्मा तारक मेहता, का भी सबको भाता। टॉम और जेरी की जैसे, धूम मची है घर में। बाल गणेशा उड़ कर आते, अब बच्चों के मन में। कार्टून की गंगा […] Read more » बेर कहाँ हैं झरबेरी के
कविता तुम सबसे अंनूठी हो मॉ March 14, 2020 / March 14, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment तुम सबसे अंनूठी हो मॉ दुख आया तो दवा नहीं ली हारी नहीं, तू खुद से लडी थी पिताजी देखे, सख्त बहुत थे तनखा लाकर वे दादी को देते पाई पाई को तू तरसा करती मजबूरी थी तू मजदूरी करती बेकार हुये जब कपड़े पिता के झट सिलवाती,,रहे न हम उघडे वे भी क्या दिन […] Read more » तुम सबसे अंनूठी हो मॉ
कविता पिता के अश्रु March 14, 2020 / March 14, 2020 by आलोक कौशिक | Leave a Comment बहने लगे जब चक्षुओं से किसी पिता के अश्रु अकारण समझ लो शैल संतापों का बना है नयननीर करके रूपांतरण पुकार रहे व्याकुल होकर रो रहा तात का अंतःकरण सुन सकोगे ना श्रुतिपटों से हिय से तुम करो श्रवण अंधियारा कर रहे जीवन में जिनको समझा था किरण स्पर्श करते नहीं हृदय कभी छू रहे […] Read more » पिता के अश्रु
कविता खण्डहर लगता पुराना मकान March 12, 2020 / March 12, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment सदैव अपने बच्चों के भविष्य के लिए हर पिता बनाता है एक सुंदर सा मकान जिसमें वह अधिष्ठित करता है अपने इष्टदेव अपने कुलदेवता को । साल दिन महीने वर्ष के साथ बदलती है ऋतुए, सर्दी गर्मी ओर बरसात हर साल वह देवों को सुलाता है होली दीवाली नवरात्रि मनाता है गणेश चतुर्थी, शिवरात्रि, जन्माष्टमी […] Read more » खण्डहर लगता पुराना मकान