कविता साहित्य प्यारो घणो लागे मन्हें राजस्थान। September 11, 2015 / September 11, 2015 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment प्यारो घणो लागे मन्हें राजस्थान। ——————————– वीर जाण्या छ जीं धरती न महिमा करि न जावे बखान प्यारो घणो लागे मन्हें राजस्थान। तीज को मेळो बूंदी लागे, कोटा का दशवारो जयपुर की गणगौर रंगीली, पुस्कार दुःख हर सारो, मेवाड़ की आन उदयपुर झीलां की नगरी छ, मेवाड़ चित्तौड़ किला महाराणा की धरती छ, पद्मिनी जोहार […] Read more » poem by kuldeep prajapati प्यारो घणो लागे मन्हें राजस्थान।
कविता साहित्य खिलौना September 11, 2015 by श्यामल सुमन | Leave a Comment खिलौना देख के नए खिलौने खुश हो जाता था बचपन में। बना खिलौना आज देखिये अपने ही जीवन में।। चाभी से गुड़िया चलती थी बिन चाभी अब मैं चलता। भाव खुशी के न हो फिर भी मुस्काकर सबको छलता।। सभी काम का समय बँटा है अपने खातिर समय कहाँ। रिश्ते नाते संबंधों के बुनते हैं […] Read more » poems by Shyamal Suman खिलौना
कविता साहित्य चिन्गारी भर दे मन में September 9, 2015 by श्यामल सुमन | Leave a Comment चिन्गारी भर दे मन में ऐसा गीत सुनाओ कविवर, खुद्दारी भर दे मन में। परिवर्तन लाने की खातिर, चिन्गारी भर दे मन में।। हम सब यारों देख रहे हैं, कैसे हैं हालात अभी? कदम कदम पर आमजनों को, मिलते हैं आघात अभी। हक की रखवाली करने को, आमलोग ने चुना जिसे, महलों में रहते क्या […] Read more » चिन्गारी भर दे मन में
कविता जिसकी है नमकीन जिन्दगी September 7, 2015 by श्यामल सुमन | Leave a Comment जिसकी है नमकीन जिन्दगी **************************** जो दिखती रंगीन जिन्दगी वो सच में है दीन जिन्दगी बचपन, यौवन और बुढ़ापा होती सबकी तीन जिन्दगी यौवन मीठा बोल सके तो नहीं बुढ़ापा हीन जिन्दगी जीते जो उलझन से लड़ के उसकी है तल्लीन जिन्दगी वही छिड़कते नमक जले पर जिसकी है नमकीन जिन्दगी […] Read more » जिसकी है नमकीन जिन्दगी
कविता गन्दी बस्ती September 7, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment अन्त:विचारों में उलझा न जाने कब मैं एक अजीब सी बस्ती में आ गया । बस्ती बड़ी ही खुशनुमा और रंगीन थी । किन्तु वहां की हवा में अनजान सी उदासी थी । खुशबुएं वहां की मदहोश कर रहीं थीं । पर एहसास होता था घोर बेचारगी का टूटती सांसे जैसे फ़साने बना रही थीं […] Read more » गन्दी बस्ती
कविता जो रिश्तों पर भारी है September 4, 2015 by श्यामल सुमन | Leave a Comment जो रिश्तों पर भारी है ************************** अपना मतलब अपनी खुशियाँ पाने की तैयारी है वजन बढ़ा मतलब का इतना जो रिश्तों पर भारी है मातु पिता संग इक आंगन में भाई बहन का प्यार मिला इक दूजे का सुख दुख अपना प्यारा सा संसार मिला मतलब के कारण ही यारों बना स्वजन व्यापारी है वजन […] Read more » Featured जो रिश्तों पर भारी है
कविता अट्टहास सुन रहे हो काल का???? September 3, 2015 by राम सिंह यादव | Leave a Comment इस धरती को जीने योग्य कैसे बनाएँ? अट्टहास सुन रहे हो काल का???? अबूझ गति खंड की जो क्षण का वेग है।।।।।। अनसुलझे किस्सों में हिन्दू – मुसलमान हैं……….. असंख्य धर्म हैं अनंत मर्यादाएं हैं………. सब जीवंत हैं और सब मृत भी……… शिव के शाश्वत ब्रह्मांड में युगों से लिखी लहरियाँ […] Read more » Featured अट्टहास सुन रहे हो काल का????
कविता मौन का संगीत September 3, 2015 by श्यामल सुमन | Leave a Comment जो लिखे थे आँसुओं से, गा सके ना गीत। अबतलक समझा नहीं कि हार है या जीत।। दग्ध जब होता हृदय तो लेखनी रोती। ऐसा लगता है कहीं तुम चैन से सोती। फिर भी कहता हूँ यही कि तू मेरा मनमीत। अबतलक समझा नहीं कि हार है या जीत।। खोजता हूँ दर-ब-दर कि […] Read more » Featured poem by shyamal suman मौन का संगीत
कविता घर मेरा है नाम किसी का September 1, 2015 by श्यामल सुमन | Leave a Comment घर मेरा है नाम किसी का और निकलता काम किसी का मेरी मिहनत और पसीना होता है आराम किसी का कोई आकर जहर उगलता शहर हुआ बदनाम किसी का गद्दी पर दिखता है कोई कसता रोज लगाम किसी का लाखों मरते रोटी खातिर सड़ता है बादाम किसी का जीसस, अल्ला […] Read more » Featured घर मेरा है नाम किसी का
कविता विविधा मेरा सब कुछ अब तू ही मेरे मौला August 19, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment मुझे अपने रंग में ; रंग दे ,मेरे मौला मुझे भी अपने संग ले ले ,मेरे मौला जब हर कोई मेरा साथ छोड़ दे , दुनिया के भीड़ में तन्हा छोड़ दे तब ज़िन्दगी की तन्हाइयों में एक तेरा ही तो साया ; मेरे साथ होता है मेरे मौला मेरा सब कुछ अब तू […] Read more » मेरा सब कुछ अब तू ही मेरे मौला
कविता विविधा स्वामी विवेकानंद August 19, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment आज भी परिभाषित है उसकी ओज भरी वाणी से निकले हुए वचन ; जिसका नाम था विवेकानंद ! उठो ,जागो , सिंहो ; यही कहा था कई सदियाँ पहले उस महान साधू ने , जिसका नाम था विवेकानंद ! तब तक न रुको , जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो … कहा था […] Read more » स्वामी विवेकानंद
कविता विविधा रूपांतरण August 17, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on रूपांतरण एक भारी वर्षा की शाम में अकेले भीगते हुए … .. और अंधेरे आकाश की ओर ऊपर देखते हुए .. जो की भयानक तूफ़ान के साथ गरज रहा था और .. आसपास कई काले बादल भी छाए हुए थे मैंने प्रभु से प्रार्थना करना शुरू कर दिया की ; अधिक से अधिक ,ऐसी भारी बारिश […] Read more » रूपांतरण