कविता अवमूल्यन : कविता – सतीश सिंह November 9, 2009 / December 25, 2011 by सतीश सिंह | 2 Comments on अवमूल्यन : कविता – सतीश सिंह पता नहीं कब और कैसे धूल और धुएं से ढक गया आसमान सागर में मिलने से पहले ही एक बेनाम नदी सूख़ गई एक मासूम बच्चे पर छोटी बच्ची के साथ बलात्कार करने का आरोप है स्तब्ध हूँ खून के इल्ज़ाम में गिरफ्तार बच्चे की ख़बर सुनकर इस धुंधली सी फ़िज़ा में सितारों से आगे […] Read more » Poems Satish Singh अवमूल्यन कविता सतीश सिंह
कविता पाती : कविता – सतीश सिंह November 9, 2009 / December 25, 2011 by सतीश सिंह | Leave a Comment पाती मोबाईल और इंटरनेट के ज़माने में भले ही हमें नहीं याद आती है पाती पर आज़ भी विस्तृत फ़लक सहेजे-समेटे है इसका जीवन-संसार इसके जीवन-संसार में हमारा जीवन कभी पहली बारिश के बाद सोंधी-सोंधी मिट्टी की ख़ुशबू की तरह फ़िज़ा में रच-बस जाता है तो कभी नदी के दो किनारों की तरह […] Read more » Poems Satish Singh कविता पाती सतीश सिंह
कविता प्रोफेशनल November 8, 2009 / December 25, 2011 by सतीश सिंह कुछ भी दिल से नहीं लगाते इसलिए हैं अपने काम के प्रति बहुत ही प्रतिबध्द। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए किसी भी हद को पार कर सकते हैं। इन्हें गलती से लौटाए ज्यादा पैसे रखने में कोई गुरेज़ नहीं। बेशर्मी से चार लोगों के बीच अकेले चाय पी सकते हैं। मांग सकते हैं दूसरों की […] Read more » Professional Satish Singh कविता प्रोफेशनल सतीश सिंह
कविता सहजीवन November 7, 2009 / November 7, 2009 by सतीश सिंह | 3 Comments on सहजीवन पत्नी नहीं है वह पर स्वेछा से करती है अपना सर्वस्व न्यौछावर एक अपार्टमेन्ट की बीसवीं मंजिल पर है उनका एक छोटा सा आशियाना घर को सुंदर रखने के लिए रहती है वह हर पल संघर्षरत पुरुष मित्र के लिए नदी बन जाती है वह और समेट लेती है अपने अंदर उसके […] Read more » कविता सतीश सिंह सहजीवन
कविता साधो हर नेता मधु कोडा.. – गिरीश पंकज November 4, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 1 Comment on साधो हर नेता मधु कोडा.. – गिरीश पंकज साधो हर नेता मधु कोडा. जिसे मिला वो डट कर खाए, नहीं किसी ने मौका छोडा. साधो हर नेता मधु कोडा……. (१) मौका पा कर नेता लूटे, क्या जाने कब कुर्सी छूटे. राजनीति में अपराधी है. बहुत बड़ी अब ये व्याधी है. जनता अब तो जागे थोडा…. साधो हर नेता मधु कोडा….. (२) राजनीति अब […] Read more » Girish Pankaj गिरीश पंकज
कविता इल्जाम October 21, 2009 / December 26, 2011 by हिमांशु डबराल | 2 Comments on इल्जाम वो इस कदर गुनगुनाने लगे है, के सुर भी शरमाने लगे है… हम इस कदर मशरूफ है जिंदगी की राहों में, के काटों पर से राह बनाने लगे है… इस कदर खुशियाँ मानाने लगे है, के बर्बादियों में भी मुस्कुराने लगे है… नज्म एसी गाने लगे है, की मुरझाए फूल खिलखिलाने लगे है… चाँद ऐसा […] Read more » Himanshu Dabral Ilzam इल्जाम हिमांशु डबराल
कविता मन में गर उत्साह रहे तो रोजाना दीवाली है…गिरीश पंकज… October 16, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 2 Comments on मन में गर उत्साह रहे तो रोजाना दीवाली है…गिरीश पंकज… मन में गर उत्साह रहे तो रोजाना दीवाली है, वरना इस महंगाई में तो रूखी-सूखी थाली है।। जो गरीब है, वह भी तो त्यौहार मनाया करता है, लेकिन पूछो तो खुशियाँ वह कैसे लाया करता है। भीतर आँसू हैं, बाहर मुस्कान दिखाई देता है, पीड़ा भी धन वालों को इक गान सुनाई देता है। सच […] Read more » excitement उत्साह
कविता दीवाली पर एक गीत..- गिरीश पंकज October 15, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | Leave a Comment जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. . हर चेहरा मुस्कान भरा हो, हर आँगन नाचे खुशहाली, जिस दिन ऐसी दुनिया देखो, समझो तब सच्ची दीवाली. . जिनके घर में अँधियारा है, उनको भी उजियारा बाँटें. कदम-कदम पर दुःख के पर्वत, आओ उनको मिल कर काटें. जीवन का है लक्ष्य यही हम, हर […] Read more » Diwali दीवाली
कविता अंधेरे के विरुद्ध इरोम शर्मीला छानू… October 12, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | Leave a Comment इरोम शर्मीला छानू…अब किसी परिचय की मोहताज नही है. वह पिछले आठ वर्षो से आमरण-अनशन पर है। उसकी एक सूत्री मांग है-मणिपुर में फौज को मिले विशेषाधिकार को समाप्त किया जाए। पूरा देश जानता है कि अपने विशेषाधिकार के कारण वहाँ फौज ने नागरिकों पर कितने कैसे-कैसे अत्याचार किए हैं. अत्याचार की इंतिहा को समझाने […] Read more » irom-sharmila इरोम शर्मीला
कविता साहित्य कविता \ रंग October 9, 2009 / December 26, 2011 by हिमांशु डबराल | Leave a Comment रंग बदल जाते है धुप में, सुना था फीके पड़ जाते है, सुना था पर उड़ जायेंगे ये पता न था! हाँ ये रंग उड़ गए है शायद… जिंदगी के रंग इंसानियत के संग, उड़ गए है शायद… अब रंगीन कहे जाने वाली जिंदगी, हमे बेरंग सी लगती है, शक्कर भी हमें अब फीकी सी […] Read more » poem कविता
कविता छोड़ दो थोड़ा-सा दूध थनों में : प्रणय प्रियंवद October 9, 2009 / December 26, 2011 by जयराम 'विप्लव' | Leave a Comment छोड़ दो थोड़ा-सा दूध थनों में गायों के बच्चों के लिए पेड़ में कुछ टहनियां छोड़ दो नई कोपलों के आने के लिए Read more » Jairam जयराम "विप्लव"
कविता साहित्य सुशील कुमार पटियाल की दो कविताएं October 7, 2009 / December 26, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on सुशील कुमार पटियाल की दो कविताएं बांधो ना मुझे तुम बंधन में बांधो न मुझे तुम बंधन में, बंधन में मैं मर जाऊंगा ! उन्मुक्त गगन का पंछी हूं, उन्मुक्त ही रहना चाहूंगा ! मिल जाए मुझे कुछ भी चाहे , पर दिल को मेरे कुछ भाए ना ! मैं गीत खुशी के गाता था, मैं गीत ये हरदम गाऊंगा ! […] Read more » Susheel Kumar Patiyala सुशील कुमार पटियाल