कविता एक टेढ़ी मेढ़ी रेखा August 14, 2014 by बीनू भटनागर | 1 Comment on एक टेढ़ी मेढ़ी रेखा -बीनू भटनागर- एक टेढ़ी मेढ़ी रेखा, उत्तरी ध्रुव से चली, दक्षिण के ध्रुव से, जाकर के मिली, प्रशांत महासागर के, रस्ते से गई। रेखा ये ऐसी वैसी नहीं, इसके बांई ओर, तारीख हो आठ, तो दांई ओर होगी नौ, ये नहीं गुज़रती, थल से कहीं, तिथि के कारण, भ्रम हो न कहीं, इसलिये, समुद्र में […] Read more » एक टेढ़ी मेढ़ी रेखा हिन्दी कविता
कविता देश की आवाज़ पर August 13, 2014 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- देश की आवाज़ पर, मर मिटेंगे साथ हम, न किसी का डर हमें, न किसी का है गम़। वीरों के बलिदान को, व्यर्थ न जाने देंगे हम, शान है तिरंगा अपना, शान से फहराएंगे। देख के शक्ति को, दुश्मन थरराएंगे। वादा है हमारा ये, भारत माता से तो आज, प्राण निकल जाए भले, […] Read more » कविता देश की आवाज़ पर हिन्दी कविता
कविता अब भुगतो! August 13, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -क़ैस जौनपुरी- हां, हम समझ गए क़ि कयामत आएगी हमें आग में जलाएगी हम डर गए अब, बस करो ना इतना ही कब्ज़े में रखना था तो बनाया ही न होता किसने कहा था, हमें बनाओ खुराफ़ात तो आप ही को सूझी थी ना अब भुगतो! Read more » अब भुगतो! कविता हिन्दी कविता
कविता लहू में घुले कांटे August 9, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -मनु कंचन- हवा टकरा रही थी, मानो मुझे देख मुस्कुरा रही थी, सूखे पत्ते जो पड़े थे, संग अपने उन्हें भी टहला रही थी, मेरे चारों ओर के ब्रह्माण्ड को, कुछ मादक सा बना रही थी, मैं भूला वो चुभे कांटे, जो पांव में कहीं गढ़े थे, अब तो शायद, वो लहू के संग रगों […] Read more » लहू कविता लहू में घुले कांटे हिन्दी कविता
कविता सुहाना सपना August 9, 2014 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- सपनों ने दिखाये अरमान, देश में बनाओ अपनी पहचान, हक़ीक़त से मैं था अंजान, सपनों में था जो बहुत असान। चल दिये उसी मंजिल पर, जिसको पूरा करना था, हुआ वही जो सपना देखा, पर मेरा ख्बाव अधूरा था। हर रास्ते पर मिली ठोकरें, मंजिल तक न पहुंच पाने को, हिम्मत नहीं हारी […] Read more » कविता सुहाना सपना हिन्दी कविता
कविता जिंदगी August 8, 2014 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- हो गया हूं मैं थोड़ा इस जिंदगी से निराश, पर कही जगी हुई है, मेरे अंदर थोड़ी आस। लाख कोशिशें कर ली मैंने, वक्त पर किसका जोर है, हाय तौबा मची जहां में, हर तरफ तो शोर है। वक्त का आलम है ऐसा, कर दिया जिसने मजबूर, खेला ऐसा खेल मुझसे, […] Read more » कविता जिंदगी जिंदगी कविता हिन्दी कविता
कविता मम्मी ने आकर… August 7, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment -बीनू भटनागर- मम्मी ने आकर, बेटे को जगाया, ‘नींद से जागो, राहुल बाबा! कुछ (प्रधानमंत्री) बनना है तुमको जो, थोड़ी तो महनत करनी ही पड़ेगी।‘ ‘’क्या करना होगा मम्मी? पहले भी बहुत महनत की थी फिर भी…’ ‘’जो हो गया सो हो गया, अब आगे की […] Read more » कविता मम्मी ने आकर राहुल हिन्दी कविता
कविता खूबसूरत हो तुम August 6, 2014 / August 6, 2014 by लक्ष्मी जायसवाल | 1 Comment on खूबसूरत हो तुम -लक्ष्मी जायसवाल- खूबसूरती एक मुस्कुराहट है, और इस मुस्कुराहट में, अपनी हंसी से, चांदनी बिखेरती हो तुम। खूबसूरती एक सपना है, और उन सपनों में, अपनी उम्मीदों के, रंग भर जाती हो तुम। खूबसूरती एक जगमगाहट है, और उस जगमगाहट में, अपनी बातों से, रोशनी भर जाती हो तुम। खूबसूरती एक प्यारी अदा है, और उस अदा को, अपने […] Read more » कविता खूबसूरत हो तुम हिन्दी कविता
कविता लहू तो एक रंग है August 4, 2014 / October 8, 2014 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- लहू तो एक रंग है, आपस में एक दूसरे से, हो रही क्यों जंग है ? लहू तो एक रंग है, लहू तो एक रंग है। हर तरफ तो शोर है, किस पर किसका जोर है? ढ़ल रही है चांदनी, आने वाली भोर है। रक्त का ही खेल है, रक्त का ही मेल […] Read more » एकता कविता भाईचारा भाईचारा कविता लहू तो एक रंग है
कविता दूध पीकर, नाग देव प्रसन्न August 2, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’- 1.दूध पीकर, नाग देव प्रसन्न, नाग पंचमी। 2.आओ झूलेँगे, द्वारे नीम सखियां, झूला पड़ा है। 3.बहनें सजीँ, गुड़िया जैसी लगें, गुड़िया पर्व। 4.दंगल लगें, मल्लयुद्ध के लिए, योद्धा तैयार। 5.सजी दुकानें, घूम रहे हैं बच्चे, लगा है मेला। 6.घुघुरी पकी, भर-भरके दोना, सभी चबाएँ। 7.रंग-बिरंगी, धरा पोशाक धारे, गुड़िया पर्व। 8.ऊँची […] Read more » दूध पीकर नाग देव प्रसन्न नाग पंचमी
कविता मेरी नानी का घर August 2, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment –बीनू भटनागर- बहुत याद आता है कभी, मुझे मेरी नानी का घर, वो बड़ा सा आंगन, वो चौड़े दालान, वो मिट्टी की जालियां, झरोखे और छज़्जे। लकड़ी के तख्त पर बैठी नानी, चेहरे की झुर्रियाँ, और आँखों की चमक, किनारी वाली सूती साड़ी, और हाथ से पंखा झलना। नानी की रसोई, लकड़ी चूल्हा और फुंकनी, रसोई में गरम गरम रोटी खाना, वो पीतल के बर्तन , वो काँसे की थाली, उड़द की दाल अदरक वाली, देसी घी हींग, ज़ीरे का छौंक, पोदीने की चटनी हरी मिर्च वाली। खेतों से आई ताज़ी सब्ज़ियां, बहुत स्वादिष्ट होता था वो भोजन। आम के बाग़ और खेती ही खेती। नानी कहती कि, ‘’बाज़ार से आता है, बस नमक वो खेत मे ना जो उगता है।‘’ कुएँ का मीठा साफ़ पानी। और अब पानी के लिये इतने झंझट, फिल्टर और आर. ओ. की ज़रूरत। तीन बैडरूम का फ्लैट, छज्जे की जगह बाल्कनी, न आंगन न छत बरामदे की न कोई निशानी, और रसोई मे गैस,कुकर, फ्रिज और माइक्रोवेव, फिर भी खाने मे वो बात नहीं, ना सब्ज़ी है ताज़ी, किटाणुनाशक मिले हैं, फिर उस पर ,अस्सी नब्बे का भाव। क्या कोई खाये क्या कोई खिलाये। आज नजाने क्यों , नानी का वो घर याद आये। Read more » कविता मेरी नानी का घर हिन्दी कविता
कविता भ्रष्टाचार है इक मायावी राक्षस August 1, 2014 / August 1, 2014 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- भ्रष्टाचार है इक मायावी राक्षस, बन गया इस देश का भक्षक, हर तरफ है ये तो फैला, लड़ा नहीं जा सकता अकेला, बन गया ये तो झमेला, जायेगा न अब ज्यादा झेला, मिलकर सभी दिखाओ जोर, कर तुम इसको कमजोर , तोड़ दो इसकी रीढ़ की हड्डी, बंध न पाए जिसमे पट्टी , कर […] Read more » भ्रष्टचार है इक मायावी राक्षस भ्रष्टाचार पर कविता