कविता हर हाथ तिरंगा हो July 1, 2014 by श्यामल सुमन | Leave a Comment -श्यामल सुमन- ना कोई नंगा हो, ना तो भिखमंगा हो। चाहत कि रिश्ता आपसी घर में चंगा हो।। धरती पर आई, लेकर खुशियाली। सूखी मिट्टी में, भर दी हरियाली। चाहत कि पहले की तरह निर्मल सी गंगा हो। ना कोई नंगा हो— ये जात-धरम की बात, सम्बन्धों पे आघात। भाई से भाई क्यों, नित करता […] Read more » कविता देश कविता हर हाथ तिरंगा हो हिन्दी कविता
कविता मैं, शायर नहीं July 1, 2014 by रवि कुमार छवि | Leave a Comment -रवि कुमार छवि- मैं, शायर नहीं, क्योंकि शायर तो लोगों के साथ रहकर भी, तन्हा रहता है, मैं, उसकी क़लम की स्याही की एक बूंद हूं, जिसके निशां के धब्बे, जिंदगी के पन्नों पर है, ख़ूब सिखाया तेरे धोखे ने, फिर भी क़लम ख़ामोश रही मेरी, सड़क किनारे चलता रहा, किसी हादसे से बचकर, बेख़बर […] Read more » कविता मैं शायर नहीं हिन्दी कविता
कविता आ कर लें हम तुम प्यार July 1, 2014 by श्यामल सुमन | Leave a Comment -श्यामल सुमन- है प्रेम सृजन संसार, आ कर लें हम तुम प्यार। ना इन्सानी बाजार, आ कर लें हम तुम प्यार।। रिश्ते जीवन की मजबूरी, फिर आपस में कैसी दूरी। कुछ नोंक-झोंक और खटपट संग, मिलती रिश्तों को मंजूरी। ये रिश्ते हैं आधार, आकर लें हम तुम प्यार।। हंसकर जीने की आदत हो, चाहे जैसी […] Read more » आ कर लें हम तुम प्यार कविता स्नेह कविता
कविता रेल क्यों हो रही है फेल July 1, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 2 Comments on रेल क्यों हो रही है फेल -रवि श्रीवास्तव- देश की रीढ़ बनी ये रेल, आख़िर क्यों हो रही है फेल ? जाने कैसे हो गई बीमार हो रही हादसे का शिकार । कभी एक दूसरे से टकराना, कभी पटरा से नाचे उतर जाना। असुविधा भरा हो रहा सफर, यात्रियों को सताता असुरक्षा का डर। ऐसे गम्भीर मुद्दे पर राजनीति न खेलें, […] Read more » रेल रेल कविता रेल फेल
कविता ये गली June 30, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- ये गली आख़िर कहां जाती है, हर दो कदम पर मुड़ जाती है। मुझे तलाश है उसकी, जिसे देखा था इस गली में, चल रहा हूं कब ये अरमान लिए दिल में। शायद इत्तेफ़ाक ले मुलाकात हो जाए, हर मोड़ पर सोचता हू मंजिल मिल जाए। सकरे रास्ते और ये दलदल, चीखकर कहते […] Read more » कविता ये गली हिन्दी कविता
कविता ग्यारह हाइकू June 27, 2014 / October 8, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment -बीनू भटनागर- 1. पंछी अकेला प्रतीक्षा करे साथी आई न पाती। 2. आकाश सूना बादल आये जाये धरा न भीगे। 3 मन उदास तन की है थकान नींद न आये। 4. भीगी चुनरी घनी रे बदरिया ओ संवरिया। 5. घर का चूल्हा ठन्डा पड़ा हुआ है अतिथि आये! 6. ना मैं जानू हूं तुम क्यों […] Read more » कविता हिन्दी कविता
कविता इंसान हूं नादान हूं… June 27, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -नेहा राजोरा- इंसान हूं नादान हूं… बेसब्र हूं क्योंकि फिक्रमंद हूं… अपनी दुआओं पर है मुझको ऐतबार, तेरे रहमों करम पर भी है मुझको इख्तियार, तू सोचता होगा है, तुझ पर यकीन, फिर भी क्यों अंजान हूं… कहा न इंसान हूँ नादान हूं… बेसब्र हूं क्योंकि फिक्रमंद हूं… Read more » इंसान कविता इंसान हूं नादान हूं कविता हिन्दी कविता
कविता दंगा बना देश का नासूर June 25, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- क्यों होता है दंगा फसाद, कौन है इसका ज़िम्मेदार ? छोटी-छोटी हर बातों पर, निकल आते हैं क्यों हथियार। आक्रोश की आंधी में, लोग बहक जाते हैं क्यों ? एक दूसरे के आखिर हम, दुश्मन बन जाते हैं क्यों ? लड़कर एक दूसरे से देखो, करते हैं हम खुद का नुकसान। दंगा भड़काने […] Read more » एकता कविता दंगा दंगा बना देश का नासूर
कविता कैसी पलटी है समय की धार June 25, 2014 / June 25, 2014 by जावेद उस्मानी | Leave a Comment -जावेद उस्मानी- कैसी पलटी है समय की धार। हमसे रूठी हमारी ही सरकार। उतर चुका सब चुनावी बुखार। नहीं अब कोई जन सरोकार। अनसुनी है अब सबकी पुकार। बहरा हो गया हमारा करतार। दमक रहा है बस शाही दरबार। झोपड़ों में पसरा और अंधकार। सुन लो अब भी एक अर्ज़ हमार। आपकी पालकी के हमीं […] Read more » कविता कैसी पलटी है समय की धार समय की धार हिन्दी कविता
कविता मेहनत किसान की June 23, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- आखिर हम कैसे भूल गये, मेहनत किसान की, दिन हो या रात उसने, परिश्रम तमाम की। जाड़े की मौसम वो ठंड से बड़े, तब जाके भरते, देश में फसल के घड़े। गर्मी की तेज धूप से, पैर उसका जले, मेहनत से उनकी देश में, भुखमरी टले। बरसात के मौसम में, न है भीगने […] Read more » मेहनत किसान की हिन्दी कविता
कविता पूछ परख के चक्कर में घनचक्कर हुआ लोकतंत्र June 23, 2014 by जावेद उस्मानी | Leave a Comment -जावेद उस्मानी- मर गए अनगिनत गरीब देखते सियासी तंत्र मंत्र महंगाई की ज्वाला से घिरा व्याकुल सारा प्रजातंत्र कहीं बलात्कार तो कहीं हत्या, जंगल बना जनतंत्र पूंजीधीश के गले लगते भजते विकास का महामंत्र हवा पानी तक हजम कर गए जिनके उन्नत सयंत्र अच्छा है यदि जपें न्याय सम्मत जनहित का जंत्र लोकहित के नारों […] Read more » लोकतंत्र लोकतंत्र कविता हिन्दी कविता
कविता युग देखा है June 21, 2014 by बीनू भटनागर | 2 Comments on युग देखा है -बीनू भटनागर- एक ही जीवन में हमने, एक युग पूरा देखा है। बड़े बड़े आंगन चौबारों को, फ्लैटों मे सिमटते देखा है। घर के बग़ीचे सिमट गये हैं, बाल्कनी में अब तो, हमने तो पौधों को अब, छत पर उगते भी देखा है। खुले आंगन और छत पर, मूंज की खाटों पे बिस्तर, पलंग निवाड़ […] Read more » कविता जीवन कविता युग देखा है हिन्दी कविता