कविता पहचान कहाँ खो गए December 31, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा जिन्हें ढूंढ़ रही थी आँखें वो कहाँ चले गए जिन्हें देख रही थी आँखें वो पहचान कहाँ खो गए जिन रास्तों पर चलने की सीख गुरुजनों के दी थी वे रास्ते क्यों अब सुनसान पड़ गए जिन पर चलने से किया था मना वे रास्ते क्यों अब भीड़ से पट गए परवरिश में […] Read more » पहचान कहाँ खो गए
कविता कब आओगे गुरु गोविंद सिंह?? December 31, 2013 / December 31, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment विमलेश बंसल आओ हम सब याद करें, गुरु गोविंद के बलिदान को। जिसने हिंदू धर्म की खातिर, किया न्योछावर प्राण को॥ वंदे मातरम् 1.माता गुजरी, पिता गुरु, तेगबहादुर के घर में। जन्म हुआ सोलह सौ छ्यासठ, खेले पटना शहर में। नौ वर्ष में गुरु की गद्दी, मिल गई वीर जवान को॥ जिसने हिंदू धर्म…… वंदे […] Read more » कब आओगे गुरु गोविंद सिंह??
कविता हो गया है विहान री December 28, 2013 / December 28, 2013 by बीनू भटनागर | 6 Comments on हो गया है विहान री 1. हो गया है विहान री सखि,हो गया है अब विहान री, तू नींद छोड़ कर जाग री। पंछियों का कलरव गूंज रहा, सूरज देहरी को पूज रहा। तू अब तक सोई है री सखि, आंखों में लिये ख़ुमार री। चल उठ पनघट तक जाना है, दो चार घड़े जल लाना है, मै छाछ कलेवा बनालूं […] Read more » poem कविता हो गया है विहान री
कविता महर्षि दयानंद की अमर कहानी December 28, 2013 / December 28, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -विमलेश बंसल ‘आर्या’- मो- 8130586002 Vimleshbansalarya69@gmail.com हम सब मिल शीश झुकायेंगे, गुरु देव दयानंद दानी को। उस वैदिक वीर पुरोधा की, गायेंगे अमर कहानी को॥ 1.अट्ठारह सौ इक्यासी की, फ़ाल्गुन कृष्णा दशमी तिथि को, गुजरात प्रांत टंकारा में, था जन्म लिया मूलक मिति को। शंकर से शंकर […] Read more » Maharshi Dayanand महर्षि दयानंद की अमर कहानी
कविता कविता : एक थी आरुषि November 26, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on कविता : एक थी आरुषि एक थी आरुषि हंसती खिलती एक सुकुमारी, माता-पिता की संतान वो प्यारी, एक रात न जाने कौन कंही से आकर, उसको मार गया। मां बाप को उसकी मौत पर, रोने का अवसर भी न मिला। बिन जांचे परखे ही पुलिस ने बेटी का चरित्र हनन किया। जो भी सबूत मिले उनसे,… पिता को ही आरोपी […] Read more »
कविता तेरे चमन में दोस्त November 12, 2013 by सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” | Leave a Comment सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” क्या क्या अभी है बाकी, इस अंजुमन में दोस्त , चाहत भी मोहब्बत भी, तेरे चमन में दोस्त…………. इस ओर सियासत है, और बेरहम है दोस्त, उस ओर अदावत है, और बस चुभन है दोस्त, कहते हैं जिसको अच्छा, वो बदचलन है दोस्त, मुझको जो मयस्सर है, वो बस घुटन है दोस्त, […] Read more » तेरे चमन में दोस्त
कविता स्मृतियाँ November 7, 2013 / November 7, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बीनू भटनागर समृति के जब जुड गये तार, पंहुच गये कई वर्षो पार। मां की ममता कभी मनुहार, कभी कड़कती हुई फटकार। बचपन की वो भोली यादें, कभी यौवन की बिसरी बातें। सखी सहेलियों की बारातें, चुपके चुपके मनकी बातें। सुख समृद्दि वाले दिन रात, या दुख की जब हुई बरसात। ये जीवन चलचित्र समान, […] Read more »
कविता कविता : दीप जलाएँ November 2, 2013 by हिमकर श्याम | 1 Comment on कविता : दीप जलाएँ दिल से दिल के दीप जलाएँ मानव-मानव का भेद मिटाएँ दिल से दिल के दीप जलाएँ आंसू की यह लड़ियाँ टूटे खुशियों की फुलझड़ियाँ छूटे शोषण, पीड़ा, शोक भुलाएँ कितने दीप जल नहीं पाते कितने दीप बुझ बुझ जाते दीपक राग मिलकर गाएँ बाहर बाहर उजियारा है भीतर गहरा अंधियारा है […] Read more »
कविता घनश्याम काका October 14, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment घनश्याम काका को, बहुत शिकायत हैं, अपने बेटे बहू से, शिकायतों की पूरी लिस्ट है जिसे, वो हर आये गये से शेयर करते हैं, जैसे ‘’मेरे पास बैठने का किसी के पास वख़्त नहीं है, मेरी दवाइयाँ कोई समय पर लाकर नहीं देता, ठंडा खाना खाना पड़ता है वगैरह वगैरह बच्चो की पढ़ाई की वजह […] Read more » घनश्याम काका
कविता हिमालय के इस आँगन में October 14, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment हिमालय के इस आँगन में उषा की प्रथम किरणे अभिनन्दन करती हुई हिम से ढके पर्वतों को सफ़ेद मोतियों से पिरोती हुई श्यामल नभ में छोटे छोटे बादल के कण हिम पर्वतों को चादर सी ढकती हुई मदमस्त हो रही हैं धीरे धीरे पहाड़ियां आती जाती घटाओं में बर्फीली हावाओं में कुछ बारिश की बूदें […] Read more »
कविता चाँद तारे October 12, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बीनु भटनागर चाँद ने थोड़ी सी रौशनी, सूरज से उधार लेकर, हर रात को थोड़ी थोड़ी बाँट दी। अमावस की रात तारों ने, चाँद के इंतज़ार मे, जाग कर गुजार दी। अगले दिन चाँद निकला, थका सा पतला सा, तारों ने चाँद की, आरती उतार ली। ‘’महीने मे एक बार लुप्त होना, मजबूरी है मेरी, […] Read more » चाँद तारे
कविता कविता : जीवन का हिसाब October 12, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा तुमसे बेहतर तुम्हें जाने कौन मुझसे बेहतर मुझे जाने कौन लोग कहें न कहें मानें न मानें जानें न जानें पहचानें न पहचानें क्या फर्क पड़ेगा जैसे हम हैं वैसे हम हैं जैसा आगे करेंगे वैसा ही बनेंगे सच है, झूठ से सच कैसे साबित करेंगे गलत तरीके से जब जोड़ेंगे संपत्ति […] Read more » कविता : जीवन का हिसाब