कविता हम हिन्दु अब आतन्कवादी हो गये… February 6, 2013 / February 6, 2013 by अभिनव शंकर | 1 Comment on हम हिन्दु अब आतन्कवादी हो गये… जाँत-पाँत पर,ऊँच-नीच पर तोड़-तोड़ कर, परम्पराओं को,पुराणों को मोड़-मोड़ कर, पश्चिमीकरण की अखिल भारतीय आंधी चला , स्वदेशी को गाँधी की सती बना, चिता जला, नर-पिशाच वो खडे आज पहन खादी हो गये, हम हिन्दु अब आतंकवादी हो गये … जिसके प्रतिष्ठा को लड़े-भिड़े, हुएँ खेत शिवाजी, जिसके लिए महाराणा हुएँ घास खाने को […] Read more »
कविता कविता – यायावर February 2, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment वह मेरे खाने के पीछे पड़ा था जब मैं खाना चाहता था अपना रुखा-सूखा खाना । वह मेरी नींद चुराना चाहता था जब मैं सोना चाहता था थक-हारकर एक पूरी नींद । वह मेरे प्यास के पीछे भी पड़ गया जब मैं पीना चाहता था चुल्लू भर पानी । वह मेरे घर […] Read more »
कविता चिन्ह February 2, 2013 / February 2, 2013 by विजय निकोर | 2 Comments on चिन्ह कोई अविगत “चिन्ह” मुझसे अविरल बंधा, मेरे अस्तित्व का रेखांकन करता, परछाईं-सा अबाधित, साथ चला आता है । स्वयं विसंगतिओं से भरपूर मेरी अपूर्णता का आभास कराता, वह अनन्त, अपरिमित विशाल घने मेघ-सा, अनिर्णीत, मेरे क्षितिज पर स्वछंद मंडराता है । उस “चिन्ह” से जूझने की निरर्थकता मुझे अचेतन करती, निर्दयता से घसीट […] Read more »
कविता सू्र्यदेव का स्वागत February 1, 2013 / February 1, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on सू्र्यदेव का स्वागत सू्र्यदेव का स्वागत मै बाँहें फैला कर करता हूँ, आग़ोश मे लेलूँ सूरज को, महसूस कभी ये करता हूँ। उदित भास्कर की किरणे, जब मेरे तन पर पड़ती हैं, स्फूर्ति सी तन मे आती है, जब सूर्य नमन मै करता हूँ। स्वर्णिम आरुषि मे नहाकर मै, भानु को जल-अर्घ भी देता हूँ, फिर […] Read more »
कविता कविताएं-सौरभ राय ‘भगीरथ’ January 26, 2013 / January 27, 2013 by सौरभ राय 'भगीरथ' | Leave a Comment संतुलन मेरे नगर में मर रहे हैं पूर्वज ख़त्म हो रही हैं स्मृतियाँ अदृश्य सम्वाद ! किसी की नहीं याद – हम ग़ुलाम अच्छे थे या आज़ाद ? बहुत ऊँचाई से गिरो और लगातार गिरते रहो तो उड़ने जैसा लगता है एक अजीब सा समन्वय है डायनमिक इक्वीलिब्रियम ! अपने उत्त्थान की चमक […] Read more »
कविता संदेश January 26, 2013 by श्यामल सुमन | Leave a Comment संदेश भारत है वीरों की धरती, अगणित हुए नरेश। मीरा, तुलसी, सूर, कबीरा, योगी और दरवेश। एक हमारी राष्ट्र की भाषा, एक रहेगा देश। कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।। सोच की धरती भले अलग हों, राष्ट्र की धारा एक। जैसे गंगा में मिल नदियाँ, हो जातीं हैं नेक। रीति-नीति […] Read more »
कविता कविता – गर्म होता समय और हम January 22, 2013 / January 22, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment अभी समय के भंडार में ब्लैकहोल होने की बात सुगबुगाहट तक सिमित नहीं है और ना ही बची है कोई ओजोन समय के गर्भ मेँ । आज समय का नाप-तौल मापने की सारी शक्ति उदारवाद के चमकते फर्श पर सिसकने को विवश है और कामना के हर कदम पर बिछने को आतुर वे सारी […] Read more »
कविता उत्तर-आधुनिकयुगीन युवाओं की स्थिति पर -दोहे. January 21, 2013 by श्रीराम तिवारी | Leave a Comment Name: Shriram Tiwari नव-युग के तरुणी -तरुण ,शिक्षित-सभ्य-जहीन। सिस्टम के पुर्जे बने, हो गए महज़ मशीन।। अधुनातन साइंस का, भौतिक महाप्रयाण। नवयुग के नव मनुज का, हो न सका निर्माण।। उन्नत-प्रगत-प्रौद्दोगिकी, शासक जन विद्द्वान। शोषित -पीड़ित दमित का,कर न सके कल्याण।। भ्रष्ट स्वार्थी तंत्र में, जिन के जुड़े हैं […] Read more »
कविता चार राग January 21, 2013 / January 21, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment भोर मे भैरवी के स्वर छिड़े हैं, इन्ही के साथ हम प्रभु से जुड़े हैं, संगीत साधना बनी आराधना , फिर कंहीं क्यों और करूँ प्रार्थना । स्वर ताल मे बंदिशों को बाँधकर , साज़ों मे संगीत लहरी ढालकर, तक धिं तक ता तारानों मे डालकर , गा भैरव कोमल रिषभ संभालकर । […] Read more »
कविता मै और तुम January 20, 2013 / January 20, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मै और तुम और ये साथ, संजोये चल रहे हैं साथ साथ, अन्तर का ये अंतहीन सिलसिला, पर कोई जोड़ नहीं है बिन सिला। मै अधीर तुम धीरज, मै बहाव तुम ठहराव, मै नदी तुम झील, संजोये चल रहे हैं ये साथ, बिना बिखराव। तुम मौन मै वाचाल मै धरा तुम आकाश, शान्त सागर तुम […] Read more » poem by binu bhatnagar
कविता मौन में पलने दो January 19, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment तुम मेरे संतृप्त स्नेह की शिल्पकार जैसे भी चाहो तराशो इसको, नाम दो, आकार दो, ….. पर शब्द न दो, कि शब्दों में छिपे होते हैं भ्रम अनेक, छंटता है इनसे अनिष्ट छलावा, शब्द छोड़ जाते हैं छलनी मुझको, प्रिय, मैं अब स्नेह से नहीं स्नेहमय शब्दों से डरता हूँ । आओ, बैठो पास, और पास मेरे, कहो […] Read more » मौन में पलने दो
कविता सच बतलाना January 16, 2013 / January 16, 2013 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment नहीं कहानी भूतों वाली कहना अम्मा, ना ही परियों वाला कोई गीत सुनाना| क्या सचमुच ही चंदा पर रहती है बुढ़िया, इस बारे में मुझको बिल्कुल सच बतलाना| कहते हैं सब चंदा पर अब , इंसानों के पैर पड़ चुके| वायुयान ले धरती वाले, चंदा पर दो बार चढ़ चुके| चंद्र ग्रहण पर उसको […] Read more »