कविता आम May 13, 2013 / May 13, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on आम गर्मी के दिन, बड़े बड़े दिन, तपती धूप जलन के ये दिन। ये दिन बहुत सताते हैं, परन्तु रसीले आम भी तो, इनहीं दिनो ही आते हैं। आम भी एक अनोखा फल है, कच्चे वाले आम का पन्ना, गर्मी से राहत दे जाता है। और अचार आम का, बेसुवाद खाने को भी, लज़ीज बना कर जाता है। कच्चे आम की मीठी चटनी, उसका तो अंदाज़ अलग है, उसकी तो कुछ बात अलग है, बिन खाये ही नाम लिया तो, मुंह मे पानी आ जाता है। […] Read more » आम
कविता वन्दे मातरम May 10, 2013 by मुकेश चन्द्र मिश्र | 2 Comments on वन्दे मातरम वन्दे मातरम नहीं पूजा है किसी की, ये तो सिर्फ एक माँ को उसके बेटे का सलाम है। यही समझाते हमने सदियाँ गुजार दीं, पर आज तक इसमें रोड़ा इस्लाम है।। जिस सोच ने विभाजित कर दिया देश को, वो आज भी उसी रूप में ही विद्यमान है। सेकुलर और तुष्टीकरण की नीतियों से, हिंद में भी बन गए कई तालिबान हैं।। राष्ट्रभक्त मुस्लिमो को बरगला रहें हैं जो, ऐसे एक नहीं और कई रहमान हैं। फूंक के तिरंगा यदि जिन्दा है कोई तो, संविधान ऐसे चन्द गद्दारों का गुलाम है।। मातृभूमि और माँ की सेवा से बड़ा ना धर्मं, ऐसा सोचना भी क्या सांप्रदायिक काम है? मुल्क से भगावो ऐसे देशद्रोहियों को जो, […] Read more » वन्दे मातरम
कविता अबोध सितारें May 10, 2013 / May 10, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment उस रात में कहीं कुछ घट रहा था जो दिन भर की तपिश के बाद शीतलता को साथ लिए निकल पड़ी थी अपने मूर्त-अमूर्त सपनों की बारात लिए. उस रात के आँचल में जड़ें सितारें और उसके पीछे चलते कितनें ही रहस्यमय घनें अन्धेरें स्पष्ट करते चलते थे परस्पर एक दुसरें की परिभाषाओं को. […] Read more »
कविता व्यंग्य कविता : मनहूस चेहरा May 7, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा पूरे पांच वर्ष बाद चुनाव के समय जब नेताजी लौटकर अपने गाँव आए तो देखकर उन्हें गांववाले बहुत गुस्साए कहा, उनलोगों ने उनसे आप फ़ौरन यहाँ से चले जाइए और फिर कभी अपना यह मनहूस चेहरा हमें न दिखलाइए सुनकर यह नेताजी हो गए उदास कहा, लोगों को बुलाकर अपने पास भाई, अगर […] Read more » poem by milan sinha व्यंग्य कविता
कविता मैं कोई किताब नहीं May 6, 2013 / May 6, 2013 by मंजुल भटनागर | 1 Comment on मैं कोई किताब नहीं मंजुल भटनागर मैं कोई किताब नहीं , एक कविता भी नहीं , एक शब्द भी नहीं , मेरा कोई अक्स नहीं , कोई रूप नहीं , सिर्फ भाव् है , विचारों का एक पुलिंदा है ——- विचार और भाव जब फैलते हैं दिगंत में प्रकृति के हर बोसे में , मेरा अक्स फैल जाता है […] Read more » मैं कोई किताब नहीं
कविता भ्रष्टाचार को रोके कैसे ? May 5, 2013 / May 5, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on भ्रष्टाचार को रोके कैसे ? यू.पी. ए. 2 सरकार हमारी, भोली भाली और बेचारी, राजकुमार उनके ब्रम्हचारी, राज करें उनकी महतारी। प्रधानमंत्री भी भोले भाले, सारे काँण्ड करें मंत्रीगण, कभी कामनवेल्थ धोटाला, 2जी, 3जी मे नहा नहाकर, हैलीकौप्टर की घूस खाकर, कोलगेट से दाँत साफकर, आर्म्स गेट से अन्दर जाकर, रेल गेट से बाहर आकर, कलावती की रोटी खाकर, दामाद को अरबपति बनाकर, हम तो बालक भोले भाले, मंत्री हमारे सारे चमचे, भ्रष्टाचार को रोकें कैसे, वो ही तो हाथ पैर हमारे। Read more » poem by binu bhatnagar भ्रष्टाचार को रोके कैसे ?
कविता मजदूर May 4, 2013 / May 4, 2013 by मंजुल भटनागर | 1 Comment on मजदूर मंजुल भटनागर मजदूर कहाँ ढूंढ़ता हैं छत अपने लिए वो तो बनाता है मकान धूप में तप्त हो कर उसकी शिराओ में बहता है हिन्दुस्तान —- मजदूर न होता तो क्या कभी बनता मुमताज़ के लिए ताज महल सी शान और चीन की दिवार आश्चर्य, कहाती सीना तान —— मजदूर ने खडे किये गुम्बद मह्ल […] Read more » poem by manjul bhatnagar
कविता चंद शब्दों के अंश May 4, 2013 / May 4, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment कुछ कहानियां और किस्से गाँव से बाहर के हिस्से में पुरानें बड़े दरख्तों पर टंगे हुए. कुछ कानों और आँखों में कही बातें जो थी किसी प्रकार कोमल स्निग्ध पत्तों पर टिकी और चिपकी हुई और चंद शब्दों के अंश जो टहनियों पर बचा रहें थे अपना अस्तित्व. यही कुछ तो था जो […] Read more » poem by praveen gugnani चंद शब्दों के अंश
कविता अक्सर……………….!!! May 3, 2013 / May 3, 2013 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment अक्सर ज़िन्दगी की तन्हाईयो में जब पीछे मुड़कर देखता हूँ ; तो धुंध पर चलते हुए दो अजनबी से साये नज़र आते है .. एक तुम्हारा और दूसरा मेरा…..! पता नहीं क्यों एक अंधे मोड़ पर हम जुदा हो गए थे ; और मैं अब तलक उन गुमशुदा कदमो के निशान ढूंढ रहा हूँ. अपनी अजनबी ज़िन्दगी की जानी पहचानी राहो में ! कहीं […] Read more » poem by vijay kumar sappati
कविता आखिर क्यों ? May 3, 2013 by बीनू भटनागर | 8 Comments on आखिर क्यों ? हम कसाव को बिरयानी, खिलाते रहे- पूरी न्यायिक प्रकिया के बाद, लगाई फाँसी.. उन्होने सरबजीत को, पीट पीट कर मार डाला, मानवाधिकार, की बात करने वाले, सोते रहे। आखिर क्यों ? टाइम्स आफ इण्डिया , अमन की आशा जगाते रहे, अरनव गोस्वामी न्यूज आवर मे पाकिस्तानियों को, पैनल पर लाकर उनकी बकवास सुनते सुनाते […] Read more » poem by binu bhatnagar आखिर क्यों ?
कविता कविता : प्रशासन और दु:शासन May 3, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा जनता आज द्रौपदी बन गयी है पांडवों की ईमानदारी कल की बात हो गयी है कृष्ण का अता-पता नहीं गलत को ही लोग कह रहे हैं सही द्रौपदी का है बुरा हाल फैला है चारों ओर छल -प्रपंच का जाल प्रशासन के कारनामे हैं कमाल, बेमिसाल दु:शासन का बढ़ रहा अत्याचार जिधर देखो, […] Read more » कविता : प्रशासन और दु:शासन
कविता ज़िन्दगी May 3, 2013 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार “राघव” क्या सर्दी और क्या गर्मी, मुफ़लिसी तो मुफ़लिसी है । कांपती और झुलसती ज़िन्दगी चलती तो है , पर भूख की मंज़िल तो बस खुदकुशी है । गंदे चीथड़ों में खुद को बचाती , इंसानी भेड़ियों से इज्ज़त छिपाती । हर रोज जीती और मरती है […] Read more »