कविता आती है बरसात June 29, 2011 / December 9, 2011 by श्यामल सुमन | Leave a Comment नव-जीवन का बोध कराने आती है बरसात कई आशियां संग बहाने आती है बरसात कुम्हलाये से लोग तपिश में घास-पात भी सूखे हरियाली को पुनः सजाने आती है बरसात जोश नदी में भर देती है खेतों में मुस्कान हर जीवों की प्यास बुझाने आती है बरसात नव-दम्पति से कोई पूछे कितना मीठा […] Read more » Rain बरसात
कविता गीत/ विजयी निश्चय बन जाओगे June 23, 2011 / December 11, 2011 by क्षेत्रपाल शर्मा | Leave a Comment कुछ आगजनी, कुछ राहजनी अब दिन में ये होते आएं यदि चमन बचाना है भाई, उल्लू न बसेरा कर पाएं कुछ शाखों की कच्ची कलियां- मंहगाई ने हैं कस डाली मासूम हंसी, आचारहीन नागिन ने ऐसी डस डालीं उनकी बीती का मैं श्रोता, बीते तो ऑंखें पथराएं है डाल डाल विष बेल व्याप्त रिश्वत, दल्ला […] Read more » song
कविता कविता/जनता सब जानती है June 23, 2011 / December 11, 2011 by शास्त्री नित्यगोपाल कटारे | 1 Comment on कविता/जनता सब जानती है जिसको पुलिस नहीं पहिचाने जिसको न्यायाधीश न जानें चोर लुटेरे भ्रष्टाचारी घूम रहे हैं सीना ताने गफलत में मत रहना ये सबकी रग रग पहिचानती है जनता है ये सब जानती है।। किसने है यह सड़क बनाई किसने कितनी करी कमाई किसने कितना डामर खाया किसने कितनी गिट्टी खायी किसको कितना मिला कमीशन किसने कैसे […] Read more » poem
कविता कविता/ पुष्प और इंसान June 22, 2011 / December 11, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment पुष्प शोभा है उपवन का. कली का जीवन है प्रस्फुटित होकर, पुष्प बनने में. खिल कर अपनी बहार लुटाने में. तुम बनने कहाँ देते हो पुष्प को, बहार उपवन का. खिलने कहाँ देते हो कली को? तुम तो तोड़ डालते हो पुष्प को शोभा बनने से पहले. मसल डालते हो कली को असमय ही. मत […] Read more » poem कविता
कविता कविता/फादर डे पर June 20, 2011 / December 11, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment पिता का प्यार मां के बाद ही आंका जाता है पिता का स्थान भी मां के बाद ही आता है। मां के पैरों तले ही तो जन्नत भी होती है बाप के दिल से होके उसका रस्ता जाता है। माना कि मां का प्यार सबसे उंचा होता है बाप का रिश्ता भी तो बेटे से […] Read more » poem बाबू जी
कविता ऐ लाला कुछ दे दे(कविता) June 6, 2011 / December 11, 2011 by शादाब जाफर 'शादाब' | 1 Comment on ऐ लाला कुछ दे दे(कविता) “समझौता’’ ऐ लाला कुछ दे दे मेरे बच्चे भूखे हैं, भिखारन ने लाला से सवाल किया लाला ने नोटों की गिनती बन्द कर नोट मुटठी में छुपा लिये और नजर उठाकर, भिखारन के शरीर पर गड़ा दी, उसके सोने जैसे तन को वो भूखे गिद्ध की तरह निहारने लगा ऐ लाला बच्चे भूखे हैं, कुछ […] Read more »
कविता पर्यावरण पर पाँच कविताएँ June 4, 2011 / December 11, 2011 by सतीश सिंह | 5 Comments on पर्यावरण पर पाँच कविताएँ 1. पेड़ फूलों को मत तोड़ो छिन जायेगी मेरी ममता हरियाली को मत हरो हो जायेंगे मेरे चेहरे स्याह मेरी बाहों को मत काटो बन जाऊँगा मैं अपंग कहने दो बाबा को नीम तले कथा-कहानी झूलने दो अमराई में बच्चों को झूला मत छांटो मेरे सपने मेरी खुशियाँ लुट जायेंगी। 2. नदियाँ हजार-हजार दु:ख उठाकर […] Read more » Atmosphere पर्यावरण
कविता कविता/ आचमन June 1, 2011 / December 12, 2011 by गंगानन्द झा | 1 Comment on कविता/ आचमन क्लास के बाद क्लास बीतता जाता है जिन्दगी के ग़ैरमामूली ब्लैकबोर्ड पर तीन अँगुलियों से पकड़े गए चॉक के जरिये केवल लफ़्जों की गिनती उसके बाद ढंग-ढंग घंटे का बज जाना उन तजुर्बेकार लिखावटों को नया डस्टर पोंछ लेता है । कुछ निशान रह जाते हैं, उस्ताद जिन्दगी गुजर जाती है । लम्बी से […] Read more »
कविता धारा के विरुद्ध May 27, 2011 / December 12, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment धारा के विरुद्ध यह कैसा मजाक है यार? तुम कहते हो मुझे, धारा के विरुद्ध तैरने को. वंधु, मुझे तो लगता है,दिमाग खराब है तुम्हारा. पर मैं तो पागल नहीं. मैं कहता हूँ, बहो तुम भी बहाव के के साथ, देखो कितनी हसीन है यह जिंदगी, कितना आनंद है इसमें? क्या कहा? बहना बहाव के […] Read more »
कविता बहुत याद आती है माँ…… May 23, 2011 / December 12, 2011 by तरुण राज गोस्वामी | Leave a Comment पथरीलेँ रास्तोँ पर जीवन के, घाव जलते हैँ जब तन मन के, बहुत याद आती है माँ।। याद आती है मेरे लिये आँखोँ मेँ कटती उसकी रातेँ, याद आती है हर कदम पर मुझे समझाती उसकी बातेँ, मेरी गलतियोँ पर मुझको डाँटती फिर दुलारती, मेरी बिखरी फैली चीजोँ को ध्यान से संभालती, अपने हाथोँ […] Read more » Maa
कविता मैं उजला ललित उजाला हूँ! May 23, 2011 / December 12, 2011 by ललित कुमार कुचालिया | Leave a Comment मैं उजला ललित उजाला हूँ! मैं हूँ तो फिर अंधकार नहीं है! तेरे मन के तम से लड़ता हूँ तेरी राहें उजागर करता हूँ आओ मुझे बाहों में भर लो! मुझ सा कोई प्यार नहीं है मैं हूँ तो फिर अंधकार नहीं है! तेरे रोम-रोम में भर जाता हूँ तेरे दर्द को […] Read more » Lalit उजला उजाला ललित
कविता कविता/ माँ…तेरी ऊँगली पकड़ के चला… May 19, 2011 / December 13, 2011 by ललित कुमार कुचालिया | 1 Comment on कविता/ माँ…तेरी ऊँगली पकड़ के चला… माँ…तेरी ऊँगली पकड़ कर चला… ममता के आँचल में पला… हँसने से रोने तक तेरे ही पीछे चला बचपन में माँ जब भी मुझे डाटती… में सिसक–सिसक कर घर के किसी कोने में जाकर रोने लगता फिर बड़े ही प्रेम से मुझे बुलाती… कहती, बेटा में तेरे ही फायदे के लिए तुझे […] Read more »