कविता योग साधना June 21, 2025 / June 22, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment योग भगाए रोग सब, करता हमें निरोग।तन-मन में हो ताजगी, सुखद बने संयोग।। योग साधना जो करे, भागे उसके भूत।आलस रहते दूर सब, तन रहता मजबूत।। खुश रहते हर पल सदा, जीवन में वो लोग।आत्म और परमात्म का, सदा कराते योग।। योग करें तो रोग सब, भागे कोसों दूर।जीवन सुखदाई बने, चमके खुशियां नूर।। योगासन […] Read more » योग साधना
कविता कर्म June 18, 2025 / August 25, 2025 by डॉ राजपाल शर्मा 'राज' | Leave a Comment सौ वर्षों की बातें सोचें,तब तो व्यर्थ आज की बारिश।आज धरा का रूप अलग है,कल सूरज सब जल हर लेगा।मिट्टी तो कल सूख जाएगी,मेघ आज का क्या कर लेगा। ये किसलय जो नव रंगों के,कल को पीले हो जाएंगे।अगले वर्ष तक ये घन गर्जन,हर स्मृति से खो जाएंगे।नव मेघों का जिक्र रहेगा,सब जोहेंगे उनकी राहें […] Read more » कर्म
कविता लोरी June 16, 2025 / August 25, 2025 by डॉ राजपाल शर्मा 'राज' | Leave a Comment आ जा ओ निंदिया रानी, तुझको बुलाऊं।काहे को रूठी मुझ से, लोरी सुनाऊं। माता अब बुढ़ी मेरी, गा नहीं पायेगी।अपने आंचल में मुझको, कैसे सुलाएगी।तन्हा-तन्हा-सा मैं, सोया घबराऊं।काहे को रूठी मुझ से, लोरी सुनाऊं। पहले तो निंदिया कितनी, अच्छी होती थी तू।मेरे नन्हें नैनों में, अच्छे से सोती थी तू।बचपन के प्यारे सपने ला मैं […] Read more » लोरी
कविता क्या हो गया है इन औरतों को? June 10, 2025 / June 10, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment क्या हो गया है इन औरतों को?अब ये आईना क्यों नहीं झुकातीं?क्यों चलती हैं तेज़ हवा सी,क्यों बातों में धार रखती हैं?कल तक जो आंचल से डर को ढँकती थीं,अब क्यों प्रश्नों की मशालें थामे हैं?क्या हो गया है इन औरतों को —जो रोटी से इंकलाब तक पहुंच गईं?कोमल थीं, हाँ, थीं नर्म हथेलियाँ,अब उनमें […] Read more »
कविता मैंl वह बड़ा बेटा हूँ June 8, 2025 / June 9, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment ✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ मैं वह बड़ा बेटा हूँ,जिसने हँसकर जीवन की आग पिया है।जिसने चुपचाप लुटा अपना यौवन,और घर का भाग्य सिया है। जो माँ की छाया बना रहा,पिता की लाठी बन कर चला,भाई की पढ़ाई में खो गया,बहन की शादी में गल गया। सपनों का शव ढोता रहा,अपनों का ऋण ढोता रहा।न मोल […] Read more » I am the elder son मैंl वह बड़ा बेटा हूँ
कविता जब आँसू अपने हो जाते हैं June 4, 2025 / June 4, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment डॉ सत्यवान सौरभ जीवन के इस सफ़र में,हर मोड़ पर कोई न कोई साथ छोड़ देता है,कभी उम्मीद, कभी लोग —तो कभी ख़ुद अपनी ही परछाईं पीछे रह जाती है। हर हार सिर्फ हार नहीं होती,वो एक आईना होती है —जिसमें हम देखते हैं अपना असली चेहरा,बिना मुखौटे, बिना तालियों के शोर के। जब आँखें […] Read more » When tears become your own जब आँसू अपने हो जाते हैं
कविता सांस की कीमत पूछी गई June 3, 2025 / June 3, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment साँस-साँस को मोहताज किया,जीवन को नीलाम किया।मासूम थी, बस एक साल की,फिर भी व्यवस्था ने इनकार किया। “वेंटिलेटर चाहिए?” — पूछा गया,“सिफ़ारिश है?” — तौल कर कहा।दोपहर से लेकर रात तलक,बच्ची की साँसों ने दस्तक दी हर पल। कभी सिस्टम की फाइल में अटकी,कभी डॉक्टरों के मुँह के फेर में भटकी।कंधे पर बैठी थी ममता […] Read more »
कविता दर्द से लड़ते चलो June 3, 2025 / June 3, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment (आत्महत्या जैसे विचारों से जूझते मन के लिए) ज़िंदगी जब करे सवाल,और उत्तर न मिले हर हाल,तब भी तुम थक कर बैठो नहीं,आँखों में आँसू हो, पर बहो नहीं। देखा है मैंने अस्पतालों में,साँसों को बचाने की जंग में,कोई ज़मीन बेचता है,कोई गहने गिरवी रखता है।जीवन को जीने की कीमत,हर दिन वहाँ कोई चुकाता है। […] Read more » दर्द से लड़ते चलो
कविता कृषक की गाथा — मिट्टी से मन तक June 2, 2025 / June 2, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment मिट्टी की महक से है उसकी आराधना,खेत-खलिहान में वो करता नित नमन।धूप-छाँव में जो तपे, जो झूके न कभी,कृषक है धरती का सबसे बड़ा सजन। खून-पसीने से लिखी उसकी यह कहानी,संघर्ष की लौ में जलती है आह्वान।फसलें बोए, सपने रोपे, मन के वीर,हरियाली से भर दे वह वीरान मैदान। बूंद-बूंद में समेटे अमृत सावन के,हवा […] Read more » The story of a farmer - from soil to mind कृषक की गाथा
कविता स्त्रियाँ जो द्रौपदी नहीं बनना चाहतीं June 2, 2025 / June 2, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment वे स्त्रियाँअब चीरहरण नहीं चाहतीं,ना सभा की नपुंसक दृष्टि,ना कृष्ण का चमत्कारी वस्त्र-प्रदर्शन।वे अब प्रश्न नहीं करतीं —“सभागृह में धर्म कहाँ है?”वे खुद ही धर्म बन चुकी हैं।वे स्त्रियाँन तो द्रौपदी हैं,ना सीता,ना कुंती,वे अपना नाम खुद रखती हैं —कभी विद्रोह,कभी प्रेम,कभी ‘ना’।वे अब अग्निपरीक्षा नहीं देतीं,क्योंकि वे जान चुकी हैं —आग से नहीं,सवालों से […] Read more » स्त्रियाँ जो द्रौपदी नहीं बनना चाहतीं
कविता सात सन्नाटे, एक संसार May 28, 2025 / May 28, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment एक घर था कभी, जहाँ हँसी भी गूंजती थी,आज वहीं शून्य की चीत्कार सुनाई देती है।सात देहें, सात कहानियाँ, सात मौन प्रश्न,और हम सब — अब भी चुप हैं… केवल देखते हैं। कहते हैं — “क्यों नहीं बताया?”पर क्या कभी हमने पूछा था — “कैसे हो?”कभी चाय पर बैठकर पूछा होतातो शायद ज़हर के प्याले […] Read more » Seven silences आत्महत्या
कविता रिश्तों की रणभूमि May 27, 2025 / May 27, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment लहू बहाया मैदानों में,जीत के ताज सिर पर सजाए,हर युद्ध से निकला विजेता,पर अपनों में खुद को हारता पाए। कंधों पर था भार दुनिया का,पर घर की बातों ने झुका दिया,जिसे बाहरी शोर न तोड़ सका,उसी को अपनों के मौन ने रुला दिया। सम्मान मिला दरबारों में,पर अपमान मिला दालानों में,जहां प्यार होना चाहिए था,मिला […] Read more » The Battlefield of Relationships रिश्तों की रणभूमि