कविता भजन: शोभा यात्रा June 25, 2025 / June 25, 2025 by नन्द किशोर पौरुष | Leave a Comment तर्ज: फूलों में सज रहे हैं मु: अवध में है निकली, राजा राम की सवारी।और साथ में हैं इनके, राजा जनक की दुलारी।।अवध में है निकली __ अंत १: भारत लक्ष्मण शस्त्रुधन, तीनों ही प्यारे भैया।चल रहे हैं निज अष्वों पर, साथ साथ तीनों मैया ।।मि: और नृत्य कर रहे हैं बजरंग गदा धारी।अवध में […] Read more » भजन: शोभा यात्रा
कविता भजन: शिव शंकर June 25, 2025 / June 25, 2025 by नन्द किशोर पौरुष | Leave a Comment तर्ज: छम छम नाचै वीर हनुमाना मु: झूम झूम नाचै भोला हमारा।कहते हैं इसको पारवती का प्यारा।।झूम झूम नाचे _ अंत १: कैलाश पर डमरू बजा कर नाचै।राम जी की मस्ती में मस्त हो कर नाचै।।मि : भांग के नशे में, लागै है सबसे न्यारा।झूम झूम नाचे _ अंत २ : अंग अंग पर भस्मी, […] Read more » शिव शंकर
कविता इस मोबाइल ने आदमी को अलग जीव जन्तु बना दिया June 24, 2025 / June 24, 2025 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकइस मोबाइल फोन ने आदमी कोकुछ अलग सा जीव जन्तु बना दियाघर बैठे दुनिया का एक प्राणी घुमंतू बना दिया! इस फोन ने अपने भाई बहन बहनोई साले रिश्तेएक झटके में खा पका कर सीधे-सीधे पचा दियाइस मोबाइल ने सच को मार झूठ को बचा लिया! जिससे उम्मीद नहीं की जानी चाहिए अपनेपन […] Read more » इस मोबाइल ने आदमी को अलग जीव जन्तु बना दिया
कविता योग साधना June 21, 2025 / June 22, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment योग भगाए रोग सब, करता हमें निरोग।तन-मन में हो ताजगी, सुखद बने संयोग।। योग साधना जो करे, भागे उसके भूत।आलस रहते दूर सब, तन रहता मजबूत।। खुश रहते हर पल सदा, जीवन में वो लोग।आत्म और परमात्म का, सदा कराते योग।। योग करें तो रोग सब, भागे कोसों दूर।जीवन सुखदाई बने, चमके खुशियां नूर।। योगासन […] Read more » योग साधना
कविता कर्म June 18, 2025 / August 25, 2025 by डॉ राजपाल शर्मा 'राज' | Leave a Comment सौ वर्षों की बातें सोचें,तब तो व्यर्थ आज की बारिश।आज धरा का रूप अलग है,कल सूरज सब जल हर लेगा।मिट्टी तो कल सूख जाएगी,मेघ आज का क्या कर लेगा। ये किसलय जो नव रंगों के,कल को पीले हो जाएंगे।अगले वर्ष तक ये घन गर्जन,हर स्मृति से खो जाएंगे।नव मेघों का जिक्र रहेगा,सब जोहेंगे उनकी राहें […] Read more » कर्म
कविता लोरी June 16, 2025 / August 25, 2025 by डॉ राजपाल शर्मा 'राज' | Leave a Comment आ जा ओ निंदिया रानी, तुझको बुलाऊं।काहे को रूठी मुझ से, लोरी सुनाऊं। माता अब बुढ़ी मेरी, गा नहीं पायेगी।अपने आंचल में मुझको, कैसे सुलाएगी।तन्हा-तन्हा-सा मैं, सोया घबराऊं।काहे को रूठी मुझ से, लोरी सुनाऊं। पहले तो निंदिया कितनी, अच्छी होती थी तू।मेरे नन्हें नैनों में, अच्छे से सोती थी तू।बचपन के प्यारे सपने ला मैं […] Read more » लोरी
कविता क्या हो गया है इन औरतों को? June 10, 2025 / June 10, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment क्या हो गया है इन औरतों को?अब ये आईना क्यों नहीं झुकातीं?क्यों चलती हैं तेज़ हवा सी,क्यों बातों में धार रखती हैं?कल तक जो आंचल से डर को ढँकती थीं,अब क्यों प्रश्नों की मशालें थामे हैं?क्या हो गया है इन औरतों को —जो रोटी से इंकलाब तक पहुंच गईं?कोमल थीं, हाँ, थीं नर्म हथेलियाँ,अब उनमें […] Read more »
कविता मैंl वह बड़ा बेटा हूँ June 8, 2025 / June 9, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment ✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ मैं वह बड़ा बेटा हूँ,जिसने हँसकर जीवन की आग पिया है।जिसने चुपचाप लुटा अपना यौवन,और घर का भाग्य सिया है। जो माँ की छाया बना रहा,पिता की लाठी बन कर चला,भाई की पढ़ाई में खो गया,बहन की शादी में गल गया। सपनों का शव ढोता रहा,अपनों का ऋण ढोता रहा।न मोल […] Read more » I am the elder son मैंl वह बड़ा बेटा हूँ
कविता जब आँसू अपने हो जाते हैं June 4, 2025 / June 4, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment डॉ सत्यवान सौरभ जीवन के इस सफ़र में,हर मोड़ पर कोई न कोई साथ छोड़ देता है,कभी उम्मीद, कभी लोग —तो कभी ख़ुद अपनी ही परछाईं पीछे रह जाती है। हर हार सिर्फ हार नहीं होती,वो एक आईना होती है —जिसमें हम देखते हैं अपना असली चेहरा,बिना मुखौटे, बिना तालियों के शोर के। जब आँखें […] Read more » When tears become your own जब आँसू अपने हो जाते हैं
कविता सांस की कीमत पूछी गई June 3, 2025 / June 3, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment साँस-साँस को मोहताज किया,जीवन को नीलाम किया।मासूम थी, बस एक साल की,फिर भी व्यवस्था ने इनकार किया। “वेंटिलेटर चाहिए?” — पूछा गया,“सिफ़ारिश है?” — तौल कर कहा।दोपहर से लेकर रात तलक,बच्ची की साँसों ने दस्तक दी हर पल। कभी सिस्टम की फाइल में अटकी,कभी डॉक्टरों के मुँह के फेर में भटकी।कंधे पर बैठी थी ममता […] Read more »
कविता दर्द से लड़ते चलो June 3, 2025 / June 3, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment (आत्महत्या जैसे विचारों से जूझते मन के लिए) ज़िंदगी जब करे सवाल,और उत्तर न मिले हर हाल,तब भी तुम थक कर बैठो नहीं,आँखों में आँसू हो, पर बहो नहीं। देखा है मैंने अस्पतालों में,साँसों को बचाने की जंग में,कोई ज़मीन बेचता है,कोई गहने गिरवी रखता है।जीवन को जीने की कीमत,हर दिन वहाँ कोई चुकाता है। […] Read more » दर्द से लड़ते चलो
कविता कृषक की गाथा — मिट्टी से मन तक June 2, 2025 / June 2, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment मिट्टी की महक से है उसकी आराधना,खेत-खलिहान में वो करता नित नमन।धूप-छाँव में जो तपे, जो झूके न कभी,कृषक है धरती का सबसे बड़ा सजन। खून-पसीने से लिखी उसकी यह कहानी,संघर्ष की लौ में जलती है आह्वान।फसलें बोए, सपने रोपे, मन के वीर,हरियाली से भर दे वह वीरान मैदान। बूंद-बूंद में समेटे अमृत सावन के,हवा […] Read more » The story of a farmer - from soil to mind कृषक की गाथा