कविता

पल्लवित प्रफुल्लित बगिया !

रचनाकार: गोपाल बघेल ‘मधु’ (मधुगीति १८०७१६ स) पल्लवित प्रफुल्लित बगिया, प्रभु की सदा ही रहती; पुष्प कंटक प्रचुर होते, दनुजता मनुजता होती ! हुए विकसित सभी चलते, प्रकाशित प्रकृति में रहते; विकृति अपनी मिटा पाते, वही करने यहाँ आते ! बिगड़ भी राह कुछ जाते, समय पर पर सुधर जाते; अधर जो कोई रह जाते, धरा पर लौट कर आते ! प्रवाहित समाहित होते,

उर की तरन में घूर्ण दिए !

गोपाल बघेल ‘मधु (मधुगीति १८०७०३ द) उर की तरन में घूर्ण दिए, वे ही तो रहे; सम-रस बनाना वे थे चहे, हम को विलोये ! हर तान में उड़ा के, तर्ज़ हर पे नचा के; तब्दील किए हमरा अहं, ‘सो’ से मिला के ! सुर दे के स्वर बदल के, कभी रौद्र दिखा के; पोंछे भी कभी अश्रु रहे, गोद बिठा के ! फेंके थे प्रचुर दूर कभी, निकट बुलाए; ढ़िंग पाए कभी रास, कभी रास न आए ! जो भी थे किए मन को लिये, हिय में वे भाए; ‘मधु’ समझे लीला प्रभु की, चरण उनके ज्यों गहे !’

वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं !

  (मधुगीति १८०७१२) गोपाल बघेल ‘मधु’ वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं, सत्ताएँ उनके संकल्प से सृजित व समन्वित हैं; संस्थिति प्रलय लय उनके भाव से बहती हैं, आनन्द की अजस्र धारा के वे प्रणेता हैं ! अहंकार उनके जागतिक खेत की फ़सल है, उसका बीज बो खाद दे बढ़ाना उनका काम है; उसी को देखते परखते व समय पर काटते हैं, वही उनके भोजन भजन व व्यापार की बस्तु है ! विश्व में सभी उनके अपने ही संजोये सपने हैं, उन्हीं के वात्सल्य रस प्रवाह से विहँसे सिहरे हैं; उन्हीं का अनन्त आशीष पा सृष्टि में बिखरे हैं, अस्तित्व हीन होते हुए भी मोह माया में अटके हैं !