लेख फुटपाथों और सड़कों पर अतिक्रमण, चलना हुआ मुश्किल। December 30, 2024 / December 30, 2024 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment -प्रियंका सौरभ मुख्य बाजारों, चौक-चौराहों, गलियों में दुकानदारों और रेहड़ी-फड़ी वालों की ओर से किया गया अतिक्रमण दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। परिणामस्वरूप शहर के बाजारों में वाहन चलाना तो दूर पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है। स्ट्रीट वेंडर्स, जो अपने जीवनयापन के लिए अपने व्यापार पर निर्भर हैं, ने हर एक व्यस्त […] Read more » Encroachment on footpaths and roads फुटपाथों और सड़कों पर अतिक्रमण
लेख उत्तरकालीन पेशवा : पेशवा नारायणराव December 27, 2024 / December 27, 2024 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment पेशवा रघुनाथराव उर्फ राघोबा एक छेद के कारनै डूब जात है नावअनेकों जिसमें छेद हों बचा न पावें राम ।। पेशवा माधवराव द्वितीय अब मराठा साम्राज्य पूर्णरूपेण सत्ता संघर्ष के दौर में प्रवेश कर चुका था। भीतरी कलह इतनी बढ़ गई थी कि थोड़ी-थोड़ी देर के लिए दुर्बल पेशवा नियुक्त हो रहे थे और वह […] Read more » Later Peshwa: Peshwa Narayanrao पेशवा नानासाहेब द्वितीय
लेख विविधा स्वास्थ्य-योग सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल या लूट का अड्डा December 26, 2024 / December 26, 2024 by निर्मल रानी | Leave a Comment निर्मल रानी वैसे तो 2012 में प्रसारित किये गये आमिर ख़ान के प्रसिद्ध व लोकप्रिय धारावाहिक ‘सत्यमेव जयते’ में भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं में व्याप्त धांधली व लूट जैसे अति गंभीर विषय को अत्यंत प्रभावी रूप से उठाया जा चुका है। इस में प्रमाणिक तरीक़े से यह बताया गया था कि किस प्रकार डॉक्टर्स द्वारा मरीज़ों […] Read more » Super Specialty Hospital or Robbery Den सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल लूट का अड्डा
लेख मिर्जा गालिब: शायरी और गजल के शिखर फनकार थे December 26, 2024 / December 26, 2024 by ललित गर्ग | Leave a Comment मिर्जा गालिब जयन्ती- 27 दिसम्बर, 2024 -ः ललित गर्ग:- मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान, जो अपने तख़ल्लुस ग़ालिब से जाने जाते हैं, उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के एक महान शायर थे। इनको उर्दू भाषा का सर्वकालिक एवं सार्वदैशिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय बनाने वाले वे एक महान् […] Read more » Mirza Ghalib मिर्जा गालिब
लेख प्रतिहार वंशी शासकों और भारतीय संस्कृति के बारे में विद्वानों के मत December 24, 2024 / December 24, 2024 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राणा अली हसन चौहान क्या कहते हैं ?राणा अली हसन चौहान पाकिस्तान के बहुत ही प्रतिष्ठित इंजीनियर, इतिहास लेखक और भाषाविद रहे हैं। वे उन कम पाकिस्तानियों में से हैं जो उर्दू, फारसी, अरबी के अलावा सिंधी, पंजाबी तथा हिंदी व संस्कृत में भी पारंगत थे। वे नागरी लिपि के एक बड़े प्रवर्तकों में से […] Read more » राणा अली हसन चौहान
लेख विधि-कानून समाज उपभोक्ताओं को मिले त्वरित न्याय December 24, 2024 / December 23, 2024 by योगेश कुमार गोयल | Leave a Comment राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस (24 दिसम्बर) – योगेश कुमार गोयलदेश में प्रतिवर्ष 24 दिसम्बर को उपभोक्ताओं के विभिन्न हितों और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस’ मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, उनके हितों के लिए बनाए गए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियमों तथा उनके अंतर्गत आने […] Read more » राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस (24 दिसम्बर)
लेख बड़ा दिन, बड़े लोग, बड़ी बातें December 23, 2024 / December 23, 2024 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment डॉ घनश्याम बादल 25 दिसंबर यानी बड़ा दिन. दुनिया भर में ईसाई धर्म का सबसे बड़ा त्योहार क्रिसमस मनाया जाता है आज. अब जब दुनिया इसे बड़े दिन के नाम से जानती है तो फिर अवश्य ही दिन बड़े लोगों, बड़ी बातों एवं बड़े महत्व का होगा ही. दुनिया भर में सबसे ज्यादा आबादी यदि […] Read more » बड़ा दिन बड़ी बातें बड़े लोग
मीडिया लेख पत्रकारिता के अपराधीकरण का दौर December 23, 2024 / December 23, 2024 by कुमार कृष्णन | Leave a Comment कुमार कृष्णन राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण इस देश में विमर्श का बड़ा मुद्दा रहा है लेकिन पत्रकारिता के अपराधीकरण पर कभी कोई चर्चा नहीं होती। हां,शोर तब मचता है जब कोई पत्रकार वसूली या भयादोहन करते, अपराधियों या पुलिस के साथ मिलकर अपहरण,फिरौती या रंगदारी जैसे संगीन जुर्म मे पकड़ा अथवा शामिल […] Read more »
कला-संस्कृति लेख विविधा साड़ी: भारतीयता और परंपरा का विश्व प्रिय पोशाक December 23, 2024 / December 23, 2024 by सुरेश सिंह बैस शाश्वत | Leave a Comment 21 दिसंबर विश्व साड़ी दिवस के अवसर पर विशेष- – सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” महाभारत काल में हस्तिनापुर राज्य हस्तिनापुर के राज दरबार में पांडवों और कौरवों के बीच द्युतक्रीड़ा का आयोजन किया गया। यह क्रीड़ा और कुछ नहीं मामा शकुनी के कुटिल चाल में फंसाने के लिए पांडवों के विरुद्ध कौरवों द्वारा […] Read more » Saree: The world's favorite garment of Indianness and tradition
लेख विधि-कानून पति अनिश्चित काल तक पत्नी को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं December 23, 2024 / December 23, 2024 by रामस्वरूप रावतसरे | Leave a Comment रामस्वरूप रावतसरे सुप्रीम कोर्ट ने 19 दिसंबर 2024 को भरण-पोषण और गुजारा भत्ता को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि कुछ कानून महिला कल्याण के लिए बनाए गए हैं ना कि उनके पति एवं ससुराल के लोगों को दंडित करने के लिए। कोर्ट ने कहा कि इन कानूनों को पतियों के उत्पीड़न करने, धमकी देने […] Read more » Husband is not bound to pay maintenance to wife indefinitely
लेख भारत में बुज़ुर्ग आबादी की समस्याएँ December 23, 2024 / December 23, 2024 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment –डॉ. सत्यवान सौरभ भारत की आबादी में वरिष्ठ नागरिकों का प्रतिशत हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ रहा है और यह प्रवृत्ति जारी रहने की संभावना है, ऐसा संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव के अनुसार है। कम आय या ग़रीबी को बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार से जुड़ा पाया गया […] Read more » Problems of elderly population in India भारत में बुज़ुर्ग आबादी
लेख शख्सियत समाज साक्षात्कार स्वामी सत्यानंद ने साकार किया मानवता को योग की संस्कृति देने का स्वप्न December 23, 2024 / December 23, 2024 by कुमार कृष्णन | Leave a Comment (102वीं जयंती 25 दिसम्बर पर विशेष ) कुमार कृष्णन स्वामी सत्यानंद सरस्वती देश के ऐसे संत हुए, जिन्होंने न सिर्फ योग को पूरी दुनिया में फैलाया बल्कि सामाजिक चिंतन के जरिए विकास के मॉडल को पेश किया। वे विशुद्ध आत्मभाव से प्रेरित एवं ‘लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु’ के दिव्य भाव से संचालित थे।उनका वेदान्त शास्त्रीय अथवा किताबी नहीं , बिल्कुल व्यवहारिक, प्रयोगात्मक, उपयोगी एवं मानवतावादी है।उनका मानवतावाद आत्मभाव पर आधारित है।इसे उन्होंने आर्थिक, सामाजिक परिवर्तन की एक सशक्त विचारधारा, उत्तम साधन एवं सर्वोपयोगी उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया।स्वामी सत्यानंद का योग जहां व्यक्तित्व के शोधन-शुद्धिकरण-परिष्कार, उन्नयन- उत्थान विकास तथा ईश्वरीकरण की दिशा निश्चित करता है,उनका क्रांति दर्शन सामाजिक- आर्थिक परिवर्तन के सिद्धांत का प्रतिपादन एवं उसके क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त करता है। स्वामी सत्यानंद के अनुसार-‘ योग शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थय की एक सुव्यवस्थित प्रणाली है। योग दर्शन के अनुसार- मानव तीन आधारभूत तत्त्वों- जीवनी शक्ति, या प्राण, मानसिक चित्त शक्ति या चित्त और आध्यात्मिक शक्ति या आत्मा का सम्मिश्रण है।’ स्वामी सत्यानंदजी के जीवन प्रवाह में भी हम पाते हैं कि पढ़- लिख कर भरे-पूरे परिवार से आने वाला एक 20 वर्षीय युवक अध्यात्म की राह पर चल पड़ता है। वह गुरु सेवा में लीन होने के बाद नचिकेता का वैराग्य प्राप्त कर 12 वर्षों बाद एक परिव्राजक के रूप में देश दुनिया में योग के प्रसार में लग जाते हैं। याद करें 1960 के दशक में योग के यह भ्रामक धारणा प्रचलित थी कि यह साधु सन्यासियों का विषय है,गृहस्थों और महिलाओं को योग नहीं करना चाहिए। ऐसे समय में स्वामी सत्यानंद ने योग की उपयोगिता सिद्ध की।आज जहां मुंगेर में विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय है, वह स्थान कर्णचौरा के नाम से जाना जाता था। किंवदन्ती के अनुसार राजा कर्ण इसी चबूतरे पर बैठकर प्रतिदिन सवा मन सोना दान करता था।उसी चबूतरे पर कई बार शयनकर रातें काटीं थीं। उस चबूतरे पर स्वामी जी को कई दिब्य अनुभव हुए।उन्होंने यहीं पर बैठकर संकल्प लिया कि जहां राजा कर्ण बैठकर सोना दान करता था, वहां से मैं विश्व को शांति बांटूंगा और योग को भविष्य की संस्कृति के रूप में विकसित करूंगा। दुनिया के कई देशों में लाखों लोगों को भारत भूमि के प्राचीन योग विद्या से परिचित कराया, जिसका परिणाम है कि आज संयुक्त राष्ट्र ने योग को आधिकारिक मान्यता दी है। मुंगेर का गंगा दर्शन, पादुका दर्शन और देवघर के रिखियापीठ को देख यक्ष भाव मन में आता होगा कि परमहंस स्वामी सत्यानंद का जीवन वैभवपूर्ण रहा होगा, लेकिन स्वामी सत्यानंद ने अभावपूर्ण, कष्ट और विपन्नता का जीवन जीते हुए पुनः मानवता को योग की संस्कृति देने का स्वप्न साकार किया। पुनः 1988 में मुंगेर त्यागने के बाद रिखियापीठ में आकार 1991 से रिखिया के स्थानीय लोगों के शैक्षिक – सामाजिक -आर्थिक उत्थान के काम का बीड़ा उठाते है। एक ऐसी आर्थिक -सामाजिक व्यवस्था जो धारित विकास के मूल्यों का मॉडल विश्व के समक्ष प्रस्तुत करता हो। आत्मिक विकास के साथ -साथ आर्थिक स्बाबलंबन के उनके प्रयास को वैश्विक अर्थव्यवस्था और ग्लोबल विलेज के परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा में 25 दिसंबर 1923 को जन्मे स्वामी सत्यानंद सरस्वती इस शताब्दी के महानतम संतों में से एक हैं, जिन्होंने समाज के हर क्षेत्र में योग को समाविष्ट कर, सभी वर्गों, राष्ट्रों और धर्मों के लोगों का आध्यात्मिक उत्थान सुनिश्चित कर दिया। योग का तात्पर्य होता है जोड़ना. परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योग का वैज्ञानिक रूप में पुनर्जीवन किया उस योग ने पूरी दुनिया को एक सूत्र में जोड़ कर रखा है।आज पूरब से लेकर पश्चिम तक जिस योगलहर में योगस्नान कर रहा है उसके मूल में स्वामी सत्यानंद सरस्वती का कर्म और उनके गुरु स्वामी शिवानंद सरस्वती का वह आदेश है जो उन्होंने सत्यानंद को दिया था। गुरु के आदेशानुसार उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था- योगविद्या का प्रचार-प्रसार, द्वारे-द्वारे तीरे-तीरे। दरअसल इस शताब्दी में योग की कहानी 1940 के दशक से आरंभ होती है। उस समय तक लोग योग से अनजान थे। योग का अस्तित्व तो था त्यागियों वैरागियों और साधु सन्यासियों के लिए 1943 में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने ऋषिकेश में शिवानंद आश्रम की स्थापना की।उन्होंने दिव्य जीवन का ज्ञान और अनुभव प्रदान करने के लिए दो विधियों का उपयोग किया योग और वेदांत। स्वामी शिवानंद के साथ वे निरंतर रहे। परिव्राजक के रूप में बिहार यात्रा के क्रम में छपरा के बाद 1956 में पहली बार मुंगेर आये. यहां की प्राकृतिक छटा उन्हें आकर्षित करती थी।यहां उन्होंने चातुर्मास भी व्यतीत किया। यहीं उन्हें दिव्य दृष्टि से यह पता चला कि यह स्थान योग का अधिष्ठान बनेगा और योग विश्व की भावी संस्कृति बनेगी। 1961 में अंतरराष्ट्रीय योग मित्र मंडल की स्थापना की तब तक योग निंद्रा और प्राणायाम विज्ञान पुस्तक प्रकाशित हो चुकी थी। ‘लेशन आॅन योग’ का अनुवाद योग साधना भाग-एक व दो आ चुके थे। सत्यानंद पब्लिकेशन सोसायटी नंदग्राम से- सत्यम स्पीक्स, वर्डस ऑफ सत्यम, प्रैक्टिस ऑफ त्राटक, योग चूड़ामणि उपनिषद, योगाशक्ति स्पीक्स, स्पेट्स टू योगा, योगा इनिसिएशन पेपर्स, पवनमुक्त आसन (अंगरेजी)में, अमरसंगीत, सूर्य नमस्कार, योगासन मुद्रावंध आदि पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 1963 से अंगरेजी में योगा और योगविद्या निकालना आरंभ किया। परिव्राजक जीवन की समाप्ति के बाद वसंत पंचमी के दिन 19 जनवरी 1964 को बिहार योग विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने पूरी दुनिया में योग को लोगों के बीच पहुंचाया। दुनिया के 48 देशों की सघन यात्राएं कीं। अमरीका के बाहर यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ग्रीस, कुवैत, ईरान, इराक से लेकर केन्या और घाना जैसे देशों में योग की आधारशिला रखी। फ्रांस, इंटली, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया में तो सत्यानंद योग के पर्याय ही हो गये। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा बोए गये योग बीज आज वटवृक्ष का रुप ले चुके हैं ,जिनकी छांव में समस्त विश्व का जनमानस स्वस्थ एवं शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है ।परमहंस जी ने योगरुपी ऐसी अनुपम भेंट दी है जिससे स्वस्थ जीवन के साथ आध्यात्मिक ऊंचाईयों तक पहुंचने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है ।आज भारत ही नहीं समस्त विश्व में परमहंस जी की “योग-निद्रा “का डंका बज रहा है। अपने परमगुरुदेव के पदचिन्हों पर चलते हुए परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने उनकी योगविद्या को नई ऊंचाईयां प्रदान की । प्रधानमंत्री जी द्वारा प्रदान किया गया योग पुरस्कार यह सिद्ध करता है कि “सत्यानंद योग” भारतवर्ष ही नहीं विश्व में सर्वश्रेष्ठ है । योग के माध्यम से विश्व विजय प्राप्त करने के बाद जब रिखिया वाले बाबा बने तो आसपास के ग्रामीणों की दयनीय दशा ने सहज ही उनका ध्यान आकृष्ट किया।उनके अंदर के पूर्णतः जाग्रत ईश्वर ने उनसे कहा, ‘सत्यानंद,जो सुविधाएं मैंने तुम्हें प्रदान की,वे अपने पडो़सियों को भी उपलब्ध कराओ।’ इसी आदेश को पूरा करने के लिए सेवा, प्रेम और दान को व्यवहारिक रूप प्रदान करने के लिए देवघर के रिखिया में रिखियापीठ की स्थापना की। झारखंड के देवघर के निकट रिखिया नाम के इस गांव में योग गुरु सत्यानंद ने जो पर्णकुटीर बनाई थी, वह उनके तपोबल से इस पूरे क्षेत्र के कल्याण का माध्यम बन गई। सितंबर, 1989 जब सत्यानंद यहां पहुंचे तब चारों ओर घनघोर जंगल था। आस-पास थे आदिवासियों के बेहद पिछड़े गांव। न कोई सड़क थी और न बिजली। सत्यानंद दरअसल तप, साधना और सेवा के लिए इस दुर्गम स्थान में आए थे। स्वामी सत्यानंद सरस्वती के अनुग्रह, आशीर्वाद तथा परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती एवं स्वामी सत्यसंगानंद सरस्वती के मार्गदर्शन में संस्कार और मानव सेवा की तरंगों ने आश्रम के आसपास के इलाकों में बदलाव की बयार बहा दी। कभी गरीबी के कारण गांव के बच्चे पढ़ नहीं पाते थे। आज बालिकाओं को मुफ्त शिक्षा मिल रही है। परिवर्तन ऐसा हुआ कि इलाके की बच्चियां फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हैं। शास्त्रीय संगीत और भरतनाट्यम में पारंगत हैं। 1995 में स्वामी सत्यानंद ने रिखिया में सीता कल्याणम शंतचंडी महायज्ञ आरंभ किया। यहीं से इलाके में विकास की लौ जल उठी। आश्रम के सामने बने मिडिल स्कूल के बच्चों को किताब-कॉपी, जाड़े में गर्म कपड़े व जूते देने की शुरुआत हुई। हर पर्व पर गांव के बच्चों व महिलाओं को नये वस्त्र वितरित होते हैं। बेटियों के विवाह में आर्थिक सहयोग सहित उपहार स्वरूप गृहस्थी की जरूरतों का सामान आदि आश्रम की ओर से प्रदान किया जाता है। क्षेत्र की वृद्धाओं, विधवाओं को हर माह 1200 रुपये पेंशन आश्रम से मिलती है। उनका काम यही है कि वे आश्रम के कीर्तन में शामिल हों। पंचायत के गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आश्रम की ओर से रिक्शा, ठेला जैसे साजोसामान बांटे जाते हैं। क्षेत्र की लगभग हर बालिका के पास साइकिल है, जो आश्रम की ओर से दी जाती है जिन बच्चों, बालिकाओं को कंप्यूटर में रुचि थी, उनको कंप्यूटर व लैपटॉप दिए गए। ताकि वे बिना रुके आगे बढ़ते जाएं। सबसे बड़ी बात, यह आश्रम दान नहीं लेता बल्कि देता है। इसीलिए इसे दातव्य आश्रम कहा जाता है गरीबों के कल्याण को जो राशि खर्च की जाती है, वह योग विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं से प्राप्त होती है। 5 दिसंबर 2009 को शिष्यों की उपस्थिति में महासमाधि में लीन हो गए। भले ही वह आज नहीं हैं, लेकिन उनके योग आंदोलन का ही नतीजा है कि योग वैश्विक धरातल पर छाया हुआ है। कुमार कृष्णन Read more » लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु स्वामी सत्यानंद