कविता व्यंग्य प्रेमिका के साइड इफेक्ट्स December 19, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment प्रशांत मिश्रा ओ मेरी प्रिय संगिनी,अष्ट भुजंगिनी,लड़ाकू दंगिनी, नमन करता हूँ तुमको अपने ह्रदय के अंतर्मन से, और खुदको समर्पित करता हूँ तुम्हे अपने तन मन से, मत मारी गयी थी मेरी जब तुम्हे प्रेम का प्रस्ताव दिया था, और किस मनहूस घडी में तुमने वो स्वीकार किया था, मेरे दोस्त मुझे जोरू का […] Read more » Featured प्रेमिका के साइड इफेक्ट्स
कविता साहित्य मै एक महिला हूँ ?? December 19, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment बचपन की आनाकानी में, या हो बेबस जवानी में। लुटती हर वक्त है वो, कश्मीर चाहे कन्याकुमारी में। यूँ तो वह माँ होती हैं, या होती है बहन किसी की, निकलती है जब दुनिया देखने, बन जाती हैं हवस किसी की। पुरुष प्रधान इस देश की, बस इतनी यहीं कहानी हैं, लालन के लिये माँ […] Read more » Featured poem on women मै एक महिला हूँ ??
विविधा साहित्य हमारी शब्द रचना का समृद्ध आधार December 19, 2015 by डॉ. मधुसूदन | 9 Comments on हमारी शब्द रचना का समृद्ध आधार डॉ. मधुसूदन (एक)प्रवेश: २,३,४ अक्तुबर-२०१५ को वॉशिंग्टन डी. सी. में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के सम्मेलन में डॉ. मधुसूदन के प्रमुख वक्तव्य का पहला भाग। (दो) चिडिया की चीं-चीं और कौवे की का-का चीं-चीं करती चिडिया आप ने सुनी होगी; और का-का करता कौवा भी। वैसे कौआ काँव-काँव या काँय-काँय भी सुनाई दे सकता है। पर […] Read more » Featured शब्द रचना हमारी शब्द रचना का समृद्ध आधार
व्यंग्य साहित्य गम खा – खूब गा…!! December 16, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा कड़की के दिनों में मिठाई खाने की तीव्र इच्छा होने पर मैं चाय की फीकी चुस्कियां लेते हुए मिठाई की ओर निहारता रहता हूं। इससे मुझे लगता है मानो मेरे गले के नीचे चाय के घुंट नहीं बल्कि तर मिठाई उतर रही है।धन्ना सेठों के भोज में जीमने से ज्यादा आनंद […] Read more » गम खा - खूब गा...!!
व्यंग्य साहित्य क्यों रें अज्जू!!! December 15, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment क्यों रें अज्जू!!! क्या हो रिया हैं आजकल । अज्जू- कुछ नहीं हो रिया यार पीके,बस फेसबुकिया बन एक दुसरे को गरिया रहै हैं । पीके- गरिया रहै हो??किसे गरिया रहै हो बे! तुम कब से गरियाना शुरूकर दिये हो!! अरे कुछ नहीं भाई बस ऐसे ही अब जकरबर्ग ने फेसबुकिया बनाई है तो बकैती […] Read more » क्यों रें अज्जू!!!
कहानी जरूरत December 15, 2015 by विजय कुमार | 1 Comment on जरूरत शराब को प्रायः सभी जगह बुरा माना जाता है; पर क्या यह किसी की जरूरत भी हो सकती है ? शायद हां, शायद नहीं। अब तक तो मैं इसे खराब ही नहीं, बहुत खराब समझता था; पर कल जग्गू ने मुझे इसके दूसरे पक्ष पर सोचने को मजबूर कर दिया। जग्गू यानि जगमोहन हमारे मोहल्ले […] Read more » जरूरत
व्यंग्य साहित्य स्वर्ग लोग में आरक्षण की आग December 15, 2015 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment हे प्रभु विनती सुन लो. देश में सामान्य वर्ग के लोग अपनी अर्ज लेकर रोज मंदिर में जाते है. खूब पूजा अर्चना कर रहे हैं. कभी इस मंदिर तो कभी उस मंदिर. बात ही कुछ ऐसी है. आखिर पुत्र प्राप्ति की लालसा ही कुछ ऐसी है. जिसके लिए लोग कुछ भी करने को तैयार थे. […] Read more » स्वर्ग लोग में आरक्षण की आग
कविता क्यों खेलती है यह ज़िन्दगी December 14, 2015 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment कभी इन आँखों में नींद और सपने दोनों थे आज कुछ भी नहीं ज़िन्दगी ने करवट ऐसी ली कि पल में सब बदल गया। आँखों में नींद और सपने तो दूर की बात है अब शायद कोई एहसास भी नहीं बचा। बचा है तो सिर्फ दर्द कुछ उलझनें और एक सवाल कि आखिर क्यों खेलती […] Read more » क्यों खेलती है यह ज़िन्दगी
व्यंग्य साहित्य ग्लोबल वॉर्मिंग का स्थायी समाधान December 14, 2015 by अशोक मिश्र | Leave a Comment अशोक मिश्र आप लोग यह बताएं कि दुनिया भर के बुद्धिजीवियों का अपर चैंबर खाली है क्या? अगर खाली नहीं होता, तो इतनी मामूली-सी बात को लेकर पेरिस में काहे मगजमारी करते। फोकट में अपनी-अपनी सरकारों का इत्ता रुपया-पैसा और टाइम खोटा किया। पेरिस के निवासियों को परेशान किया सो अलग। वह भी ग्लोबल वॉर्मिंग […] Read more » ग्लोबल वॉर्मिंग का स्थायी समाधान
कहानी बच्चों का पन्ना साइकिल December 13, 2015 by विजय कुमार | Leave a Comment राजू कई दिन से साइकिल सीखने की जिद कर रहा था। उसके साथ के कई लड़के साइकिल चलाते थे; पर उसके घर वालों को लगता था कि वह अभी छोटा है, इसलिए चोट खा जाएगा। अतः वे हिचकिचा रहे थे। यों तो घर में एक साइकिल थी, जिसे पिताजी चलाते थे; पर वह बड़ी थी। […] Read more » साइकिल
व्यंग्य साहित्य मांगे दान, करै भोज…!! December 9, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | 1 Comment on मांगे दान, करै भोज…!! तारकेश कुमार ओझा पता नहीं अमीरों में गरीब बनने या दिखने की सनक सवार होती है या नहीं, लेकिन गरीबों पर यह धुन आजीवन बनी रहती है। बचपन में आना – पाई वाली किताबें हासिल करने में भी भले ही हमारे पसीन छूट जाते थे, लेकिन बुजुर्गों को दिवंगत आत्माओं की संतुष्टि पर दिल – […] Read more » करै भोज...!! मांगे दान
राजनीति व्यंग्य भुक्खड़ नहीं होते ईमानदार December 7, 2015 / December 7, 2015 by अशोक मिश्र | 2 Comments on भुक्खड़ नहीं होते ईमानदार अशोक मिश्र केजरी भाई लाख टके की बात कहते हैं। अगर आदमी भूखा रहेगा, तो ईमानदार कैसे रहेगा? भुक्खड़ आदमी ईमानदार हो सकता है भला। हो ही नहीं सकता। आप किसी तीन दिन के भूखे आदमी को जलेबी की रखवाली करने का जिम्मा सौंप दो। फिर देखो क्या होता है? पहले तो वह ईमानदार रहने […] Read more » Featured भुक्खड़ नहीं होते ईमानदार