शराब को प्रायः सभी जगह बुरा माना जाता है; पर क्या यह किसी की जरूरत भी हो सकती है ? शायद हां, शायद नहीं। अब तक तो मैं इसे खराब ही नहीं, बहुत खराब समझता था; पर कल जग्गू ने मुझे इसके दूसरे पक्ष पर सोचने को मजबूर कर दिया।
जग्गू यानि जगमोहन हमारे मोहल्ले का सफाई कर्मचारी है। मैंने उसे सिगरेट-बीड़ी पीते तो कभी नहीं देखा; पर कभी-कभी उसके मुंह से शराब की दुर्गन्ध जरूर आती है। मेरे घरेलू संस्कार कुछ ऐसे हैं कि मैं अपने आसपास वालों के दुख-सुख में जरूर शामिल होता हूं। पिछले दिनों जग्गू ने अपने पुत्र के नामकरण संस्कार पर उन सबको बुलाया, जिनके घर वह काम करता था; पर पहुंचा केवल मैं ही। अतः वह मेरा बहुत आदर करने लगा। अब वह कभी-कभी मेरे पास बैठकर घर-परिवार और इधर-उधर की बात भी कर लेता था। एक बार मां के आग्रह पर वह अपनी पत्नी शीला और बच्चों के साथ हमारे घर आया। मेरी मां छुआछूत आदि से मीलों दूर रहती हैं। उन्होंने बड़े प्रेम से उन्हें चाय पिलाई और शीला को एक साड़ी भेंट की। इससे वह भी कभी-कभी फुर्सत में मेरी मां के पास बैठकर अपने दुख-सुख बांटने लगी।
इतने अच्छे सम्बन्ध बनने पर मैंने सोचा कि किसी दिन जग्गू से उसकी शराब के बारे में बात करूंगा। यदि मेरे कारण वह सुधर जाए, तो इससे जहां उसके घर का वातावरण ठीक होगा, वहां मुझे भी आत्मिक संतोष होगा। इसलिए एक दिन मौका देखकर मैंने यह बात छेड़ ही दी।
drunkजग्गू बोला – बाबूजी, हमारे मोहल्ले और बिरादरी में कई लोग रोज शराब पीकर अपनी जिंदगी बरबाद कर रहे हैं; पर मैं तो बस तभी पीता हूं, जब इसकी जरूरत होती है।
– क्या मतलब; क्या शराब भी किसी की जरूरत हो सकती है ?
– हां बाबूजी, कभी-कभी इसके बिना हमारा काम नहीं चलता।
– वो कैसे ?
– बाबूजी, आप जब कूड़ेदान या बहते हुए सीवर के पास से निकलते हैं, तो क्या करते हैं ?
– करना क्या, नाक पर रूमाल रख लेते हैं।
– लेकिन हम उसी कूड़े और सीवर को अपने हाथों से साफ करते हैं। हम तो नाक पर रूमाल भी नहीं रख सकते। वहां की बदबू हमारे फेफड़ों में धंस जाती है। ये काम करने का बिल्कुल मन नहीं होता; पर काम न करें, तो घर कैसे चलेगा ? इसलिए काम पर जाने से पहले मैं शराब पी लेता हूं। फिर मुझे कोई बदबू महसूस नहीं होती। शराब से मेरी आत्मा मर जाती है। फिर कैसी भी गंदगी में हाथ डालना या सीवर के गढ्डे में घुसना बुरा नहीं लगता। बस, इसी ‘जरूरत’ के लिए मैं कभी-कभी पीता हूं।
मेरा सारा ज्ञान जग्गू की इस ‘जरूरत’ के सामने धरा रह गया। सुना है कि सम्पन्न देशों में सफाई का सारा काम मशीनें करती हैं। क्या भारत में भी कभी ऐसा समय आएगा, जिससे जग्गू को इस ‘जरूरत’ से छुटकारा मिल सके ?

1 thought on “जरूरत

  1. ह्रदय स्पर्शी लघुकथा.क्या हमारा समाज और राष्ट्र उस पीड़ा को कभी समझ सकेगा,जो रज्जु को दिन रात भुगतना पड़ता है?

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