लेख गुरु पूर्णिमा : गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते का पर्व July 10, 2025 / July 10, 2025 by प्रदीप कुमार वर्मा | Leave a Comment -प्रदीप कुमार वर्मा गुरु पूर्णिमा यानि आषाढ़ मास की पूर्णिमा। प्रसिद्ध ब्रज तीर्थ गोवर्धन में मुड़िया पूर्णिमा। श्रीमद्भभागवत और अट्ठारह पुराण आदि साहित्यों के रचियता महर्षि वेदव्यास का जन्म। और देश और दुनिया के लिए गुरु पद पूजन एवं वंदन का पर्व। हिंदू धार्मिक ग्रंथो में आषाढ़ मास की पूर्णिमा यानी गुरु पूर्णिमा का यही […] Read more » गुरु पूर्णिमा
लेख गुरु के अतिरिक्त कोई ब्रह्म नहीं है, यह सत्य है July 10, 2025 / July 10, 2025 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment 10 जुलाई 2025 को हम भारतीय संस्कृति का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शास्त्रीय पर्व गुरू पूर्णिमा मनाने जा रहे हैं। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार गुरु और शिष्य के रिश्ते के पवित्र संबंध का प्रतीक माना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस दिन शिष्य […] Read more » गुरु गुरू पूर्णिमा पूर्णिमा
लेख पूर्णता के बोध का अवसर है- गुरु पूर्णिमा July 10, 2025 / July 10, 2025 by डॉ.वेदप्रकाश | Leave a Comment डॉ.वेदप्रकाश गुरु और गोविंद दोनों पूर्ण हैं और ये दोनों एक दूसरे के पर्याय भी हैं। गुरु भी पूर्ण हैं और पूर्णिमा भी पूर्ण होती है इसलिए गुरु पूर्णिमा उत्सव बन जाता है। शिष्य अपूर्ण होता है और इसी अपूर्णता की पूर्ति हेतु वह गुरु के शरणागत होता है। गुरु इस अपूर्ण शिष्य को पूर्णता […] Read more » गुरु पूर्णिमा
लेख तस्मै श्री गुरुवे नमः: July 10, 2025 / July 10, 2025 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment गुरु की महिमा अपरंपार डॉ० घनश्याम बादल इस बार दस जुलाई को आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा है जिसे जिसे सनातन संस्कृति के अनुसार गुरु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा महाभारत रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास की जयंती भी है । वें संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे […] Read more » Tasmai Shri Guruve Namah: तस्मै श्री गुरुवे नमः:
लेख धर्मांतरण का धंधा: विदेशी फंडिंग और सामाजिक विघटन का षड्यंत्र July 10, 2025 / July 10, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment उत्तर प्रदेश में एटीएस ने एक बड़े धर्मांतरण रैकेट का खुलासा किया है, जिसमें विदेशी फंडिंग के जरिए करीब 100 करोड़ रुपये 40 खातों में भेजे गए। मुख्य आरोपी ‘छांगरू बाबा’ उर्फ जमशेदुद्दीन के नेतृत्व में यह गिरोह ऊंची जाति की लड़कियों के लिए 15-16 लाख रुपये की दर से धर्मांतरण कराता था। यह मामला […] Read more » Foreign funding and conspiracy of social disintegration The business of religious conversion धर्मांतरण का धंधा
कविता गुरुर्ब्रह्मा – एक स्तुति July 10, 2025 / July 10, 2025 by आलोक कौशिक | Leave a Comment गुरुर्ब्रह्मा जगत्पिता सदा,गुरुर्विष्णुः पथदर्शिता व्रता।गुरुर्देवो हरिः शिवो यथा,नमस्तस्मै गुरोः नमः सदा॥ ज्ञानदीपः तमोहरः प्रभुः,मौनवाणी रसाश्रु जलभरः।शिष्यजीवन दिगंतविस्तरः,प्रेमपाथेय धर्मचिन्मयः॥ शब्दसूत्रविवेचनैकधा,वेदमूलं समस्तशास्त्रधा।चित्तनिर्मल बनाय जो भला,वहै गुरुवर, समस्तभावला॥ न सखा, न पिता, न मातरः,गुरुवर्यं समं न चापरः।सत्पथं जो दिखाय संसृते,पूर्णिमा पर प्रणाम भावभरे॥ :- आलोक कौशिक Read more » गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्ब्रह्मा - एक स्तुति
लेख जनसंख्या नीति नहीं, जनजागरूकता है असली समाधान July 10, 2025 / July 10, 2025 by योगेश कुमार गोयल | Leave a Comment विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) पर विशेषबढ़ती आबादी के निरंतर बढ़ते खतरे– योगेश कुमार गोयलजनसंख्या संबंधित समस्याओं पर वैश्विक चेतना जागृत करने के लिए प्रतिवर्ष 11 जुलाई को ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाया जाता है। भारत के संदर्भ में देखें तो तेजी से बढ़ती आबादी के कारण ही हम सभी तक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी […] Read more » Public awareness is the real solution विश्व जनसंख्या दिवस
लेख आतंकवाद में डिजिटल तकनीकों का बढ़ता उपयोग चिन्ताजनक July 10, 2025 / July 10, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ललित गर्ग- टेरर फंडिंग पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) की नई रिपोर्ट में आतंकवादी गतिविधियों में डिजिटल तकनीकों के बढ़ते उपयोग पर चिंता जताई गई है। इस रिपोर्ट ने वैश्विक सुरक्षा के समक्ष एक नई और गहन चुनौती की ओर संकेत करते हुए आतंकवादी गतिविधियों में डिजिटल तकनीकों के […] Read more » आतंकवाद में डिजिटल तकनीकों का उपयोग
लेख समाज सार्थक पहल शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, और जागरूकता से ही होगा अंधविश्वासों का खात्मा ! July 10, 2025 / July 10, 2025 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment आज हम इक्कीसवीं सदी में सांस ले रहे हैं।यह युग विज्ञान और तकनीक का युग है जहां आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का प्रयोग किया जा रहा है। विज्ञान और तकनीक के इस दौर के बीच भारत आज भी एक बहुत ही धार्मिक देश है, जहां अलग-अलग धर्म, संप्रदायों, वर्गों के लोग आपसी सहयोग, सद्भावना से […] Read more » अंधविश्वासों का खात्मा
कहानी शिक्षक या सेल्समैन? July 7, 2025 / July 7, 2025 by आलोक कौशिक | Leave a Comment यह कहानी है अविनाश सर की—एक ईमानदार, आदर्शवादी और प्रतिभाशाली शिक्षक की, जो शिक्षा को अपने जीवन का धर्म समझते हैं और विद्यालय को मंदिर। लेकिन जब उनका सामना एक ऐसे विद्यालय से होता है, जिसका संचालन एक पूर्व अपराधी-राजनेता द्वारा किया जा रहा होता है, तो उन्हें अपने आदर्शों और व्यवहारिक यथार्थ के बीच […] Read more » Teacher or salesman?
पर्यावरण लेख बारिश का कहरः प्रकृति का विक्षोभ या विकास की विफलता? July 7, 2025 / July 7, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment ललित गर्ग बीते कुछ वर्षों में पहाड़ों में बारिश एवं बादल फटना अब डर, कहर और तबाही का पर्याय बन गई है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, और पूर्वाेत्तर के अन्य पहाड़ी राज्यों में हर वर्ष मानसून के साथ भयावह भूस्खलन, बादल फटना, पुल बहना और सड़कें टूटना एक आम दृश्य बन गया है। यह केवल […] Read more » बारिश का कहर
आलोचना साहित्य कहीं महंगा न पड़ जाये आस्था से मजाक July 7, 2025 / July 7, 2025 by सचिन त्रिपाठी | Leave a Comment सचिन त्रिपाठी भारत की सांस्कृतिक परंपरा पर्वों की उस रंग-बिरंगी माला के समान है जिसका प्रत्येक मनका किसी ऋतु, किसी फसल, किसी प्राकृतिक तत्व या किसी लौकिक सत्य से बंधा हुआ है। यहां उत्सव केवल उल्लास नहीं, ऋतुओं का स्वागत है, आकाश-पवन-नदी का वंदन है, और भूमि माता के चरणों में अर्पित श्रद्धा है। मकर संक्रांति के साथ जब सूर्य उत्तरायण होता है तो वह मात्र खगोल घटना नहीं होती, वह अन्नदाता के हृदय में नई आशा की किरण भी जगाता है। छठ पूजा में सूर्य को अर्घ्य देते समय केवल एक देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रकाश व्यवस्था के प्रति आभार प्रकट किया जाता है किंतु दुःख की बात यह है कि आज इन्हीं पर्वों को उपहास का विषय बना दिया गया है, कभी सोशल मीडिया की मीम संस्कृति के माध्यम से तो कभी तथाकथित बुद्धिजीविता के नाम पर। आश्चर्य होता है जब छठ पूजा जैसे विराट और श्रमसाध्य पर्व को ‘रिवर्स योगा’ कहा जाता है या होली जैसे रंगों के उत्सव को जल अपव्यय की उपमा देकर बदनाम किया जाता है। हास्य की यह धारा जब आस्था का उपहास बनने लगे, तब वह केवल मनोरंजन नहीं, सांस्कृतिक विघटन का औजार बन जाती है। कुछ वर्ष पूर्व एक वेब सीरीज में छठ व्रत करने वाली स्त्रियों को ‘गंवार और अंधविश्वासी’ कहकर चित्रित किया गया। यह कोई अलग घटना नहीं बल्कि एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति का उदाहरण था जहां पर्वों को ‘साइंटिफिक टेंपर’ की कसौटी पर कसा जाने लगा किंतु बिना यह समझे कि ये पर्व ही तो भारतीय मानस का विज्ञान हैं, हमारे शरीर, पर्यावरण और समाज के सामूहिक संतुलन का जीवंत उदाहरण हैं। दीपावली के आते ही शोर उठता है ‘पटाखे मत जलाओ, प्रदूषण होता है!’ मानो पूरे वर्ष का पर्यावरणीय संतुलन केवल एक रात के दीपोत्सव से डगमगाने लगे। क्या किसी ने होली के पूर्व गांवों में की जाने वाली तालाब सफाई देखी है? क्या किसी एनजीओ ने छठ पूजा से पूर्व गंगा घाटों की सामूहिक सफाई की सराहना की है? नहीं, क्योंकि अब आलोचना का उद्देश्य सुधार नहीं, अपमान है। भारतीयता को ‘पर्यावरण विरोधी’ दिखाकर, पश्चिमी मानकों की श्रेष्ठता स्थापित करना है। क्या आपने कभी देखा है कि ‘थैंक्स गिविंग’ पर टर्की की बलि का मज़ाक उड़ाया गया हो? क्या ‘ईस्टर’ पर अंडों और चॉकलेट्स की बर्बादी के खिलाफ कोई अभियान चला? लेकिन भारत में तो हर त्योहार के साथ एक झूठा अपराधबोध जोड़ दिया जाता है। गणेश चतुर्थी को ‘नदी प्रदूषण का पर्व’, होली को ‘जल बर्बादी का उत्सव’, और दीपावली को ‘ध्वनि और वायु प्रदूषण का महापर्व’ कहकर प्रस्तुत किया जाता है। पर्व केवल पूजा नहीं होते. वे समाज की चेतना होते हैं। होली, जहां रंगों में जाति-वर्ग-भेद मिट जाता है; छठ, जहां स्त्री प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती है; गणेश चतुर्थी, जहां बुद्धि और बाधाओं के बीच संवाद होता है, इन सभी को ‘जोक्स’ के जरिए तुच्छ बना देना किसी सभ्यता की जड़ों को काटने जैसा है। वर्तमान में सोशल मीडिया ने ‘मीम’ को संवाद का माध्यम बना दिया है लेकिन यह मीम, जहां किसी विदेशी प्रधानमंत्री की टोपी का मजाक हल्के हास्य में लिया जाता है, वहीं जब किसी भारतीय स्त्री की ‘करवा चौथ’ की तस्वीर आती है तो उसके साथ ‘पितृसत्ता की गुलामी’ जैसे कटाक्ष जोड़े जाते हैं। यह केवल मज़ाक नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक मानस को चुपचाप नष्ट करने की चेष्टा है। पर्वों के पीछे की वैज्ञानिकता को समझे बिना उन्हें ‘अंधविश्वास’ कहना उस दृष्टिहीन व्यक्ति जैसा है जो सूर्य की गर्मी से डरकर उसे नकारता है। छठ पूजा में जब स्त्रियां व्रत के माध्यम से सूर्य की सीधी किरणों को स्वयं पर लेती हैं तो वह केवल भक्ति नहीं, शरीर और प्रकाश विज्ञान का अनुप्रयोग भी है। दीपावली में जब घरों की सफाई होती है तो वह कीट नियंत्रण का पारंपरिक उपाय है। होलिका दहन कृषि अवशेषों के निपटान का स्थानीय तंत्र है जिसे अब ‘पर्यावरण खतरा’ कहा जाता है। यह आवश्यक है कि हम अपनी नई पीढ़ी को इन पर्वों के मूल तत्व से परिचित कराएं। उन्हें यह सिखाया जाए कि गणेश केवल मूर्ति नहीं, विघ्न-विनाशक ऊर्जा के प्रतीक हैं; कि दीपक केवल तेल और बाती नहीं, चेतना की लौ हैं; और कि छठ केवल सूर्य पूजन नहीं, जल-प्रकाश-व्रत और स्त्री चेतना का महायोग है। यदि हमने इन पर्वों को केवल ‘हास्य’ और ‘फॉरवर्ड्स’ की वस्तु बनने दिया, तो आने वाले समय में हमारी संतति इन्हें ‘संस्कृति’ नहीं, ‘कॉमेडी’ मानेगी। तब हम अपनी पहचान नहीं, अपनी जड़ों से दूर हो चुके होंगे। इसलिए, समय है कि हम अपने पर्वों का पुनर्पाठ करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, सांस्कृतिक श्रद्धा से, और सामाजिक चेतना से। उपहास का उत्तर उपदेश नहीं, ज्ञान है और यह ज्ञान हमें बताता है कि ये पर्व मात्र परंपरा नहीं, प्रकृति से एक सतत संवाद हैं। हंसी उचित है जब वह आदर के साथ हो लेकिन जब वह आस्था पर वज्र की तरह गिरे तो वह केवल व्यंग्य नहीं, आत्म-अपमान बन जाती है। स्मरण रखिए, पर्वों का उपहास प्रकृति के प्रति हमारी निष्ठा को भी खंडित करता है और जो समाज अपनी ऋतुओं, नदियों, और सूर्य की उपेक्षा करता है, वह धीरे-धीरे अपनी ही चेतना से कट जाता है। Read more » Let the joke with faith not prove costly आस्था से मजाक