साहित्‍य

वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं !

  (मधुगीति १८०७१२) गोपाल बघेल ‘मधु’ वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं, सत्ताएँ उनके संकल्प से सृजित व समन्वित हैं; संस्थिति प्रलय लय उनके भाव से बहती हैं, आनन्द की अजस्र धारा के वे प्रणेता हैं ! अहंकार उनके जागतिक खेत की फ़सल है, उसका बीज बो खाद दे बढ़ाना उनका काम है; उसी को देखते परखते व समय पर काटते हैं, वही उनके भोजन भजन व व्यापार की बस्तु है ! विश्व में सभी उनके अपने ही संजोये सपने हैं, उन्हीं के वात्सल्य रस प्रवाह से विहँसे सिहरे हैं; उन्हीं का अनन्त आशीष पा सृष्टि में बिखरे हैं, अस्तित्व हीन होते हुए भी मोह माया में अटके हैं !

आए रहे थे कोई यहाँ !

(मधुगीति १८०७०३ स) आए रहे थे कोई यहाँ, पथिक अजाने; गाए रहे थे वे ही जहान, अजब तराने ! बूझे थे कुछ न समझे, भाव उनके जो रहे; त्रैलोक्य की तरज़ के, नज़ारे थे वे रहे ! हर हिय को हूक दिए हुए, प्राय वे रहे; थे खुले चक्र जिनके रहे, वे ही पर सुने ! टेरे वे हेरे सबको रहे, बुलाना चहे; सब आन पाए मिल न पाए, परेखे रहे ! जो भाए पाए भव्य हुए, भव को वे जाने; ‘मधु’ उनसे मिल के जाने रहे, कैसे अजाने ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’