कविता हम जान बुझ कर फिसल गये July 12, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | Leave a Comment सभी मिट्टी के घरौंदे टूट गये हाथों से हाथ जब छुट गये तैरने लगे सपने बिखर के नैनों से जो सावन फ़ूट गये तरस गये शब नींद को तश्न्गी से लब तरश गये नाखुदा ने पुकार भी की कई अब्र फ़िर भी बरस गये सरगोशी से कुछ बात चली हम गिरते-गिरते संभल गये मुझे था […] Read more » Kanishka Kashyap Love Love Songs Poems
आलोचना राजनीति दलित -महादलित और चोरों के साधू सरदार नीतीश July 3, 2009 / December 27, 2011 by जयराम 'विप्लव' | 1 Comment on दलित -महादलित और चोरों के साधू सरदार नीतीश नीतीश के विकास रथ के पहिये तले बिहार का सामाजिक , राजनैतिक व आर्थिक तानाबाना लहुलुहान हो जान की भीख मांग रहा है । १५ वर्षों के लालूराज की मरुभूमि में नीतीश नाम का पौधा खिला तो लोगों को लगा विकास Read more » Dalit दलित महादलित
कविता विविधा कनिष्क कश्यप : अक्श बिखरा पड़ा है आईने में June 10, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | 3 Comments on कनिष्क कश्यप : अक्श बिखरा पड़ा है आईने में अक्श बिखरा पड़ा है आईने में मैं जुड़ने कि आस लिए फिरता हूँ कदम तलाशते कुछ जमीं हाथों पर आकाश लिए फिरता हूँ कठोर हकीक़त है है मेरा आज कल खोया विस्वास लिए फिरता हूँ कदम उठते पर पूछते कुछ सवाल क़दमों का उपहास लिए फिरता हूँ कामयाबियां खुशी नहीं दे पाती ऐसी कमी का […] Read more » Mirror आईने
गजल तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते June 5, 2009 / December 27, 2011 by कनिष्क कश्यप | 2 Comments on तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते Read more » Sorrows ग़म
व्यंग्य व्यंग/मुआ समय के फेर May 15, 2009 / December 27, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment इधर कम्बख्त चुनाव का दौर खत्म हुआ, उधर मेरे शहर में जूतों की दुकानों को ताले लगने की नौबत आ धमकी। कल तक जिन जूतों की दुकानों पर जूते खरीदने के लिए रेलमपेल हुई रहती थी... Read more » vyangya व्यंग
व्यंग्य व्यंग्य/ अपनी राय दीजिए!! May 12, 2009 / December 27, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment वे हाथ में कुछ लहराते हुए पटरी से उतरी रेल के डिब्बे की तरह मेरी ओर आ रहे थे। डर भी लगा, हैं तो मेरे ताऊ! पर इन दिनों ताऊ ही दुश्मनों से अधिक पगला रहे हैं। वैसे भी आज के दौर में दुश्मन कौन से माथे पर दुश्मन का लेबल लगाए आते हैं? सावधानी में ही सुरक्षा है सो मैं सावधान हो गया। असल में क्या है कि न पिछले दिनों मुझे मेरे उस पालतू कुत्ते ने काट दिया जिसे मैं अपने मुंह का भी कौर देता रहा था। Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग्य/शपथ खा, मौज़ मना May 8, 2009 / December 27, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment उसके बीसियों बार अपने बेटे के माध्यम से बुलाने पर मैं कुढ़ा, जला भुना उसके घर पहुंचा। हालांकि वह मेरा इमीजिएट पड़ोसी है। कहते हैं कि पेट और पड़ोस कभी खराब नहीं होने चाहिए। पर कहीं भी देख लो, आजकल और तो सब जगह सब ठीक है पर ये दो ही चीजें ठीक नहीं। Read more » vyangya व्यंग्य शपथ
व्यंग्य व्यंग्य/बुंदु उठ, लीडर बन April 27, 2009 / December 27, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment बुंदु उठ, घराट बंद कर। चुनाव आ गया। खड्ड सूख गई। सिर में हाथ मत दे। परेशान मत हो। घराट का स्यापा मत कर। वोटर ही मत रह। वोटर होकर बहुत जी लिया। अब लीडर बन। Read more » vyangya लीडर व्यंग्य
आलोचना काव्यपाठ और राजनीति – दीपक चौरसिया ‘मशाल’ April 18, 2009 / December 25, 2011 by दीपक चौरसिया ‘मशाल’ | 5 Comments on काव्यपाठ और राजनीति – दीपक चौरसिया ‘मशाल’ " ऐसी रचनाएँ तो सालों में, हजारों रचनाओं में से एक निकल के आती है. मेरी तो आँख भर आई" "ये ऐसी वैसी नहीं बल्कि आपको सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा जी की श्रेणी में पहुँचाने वाली कृति है" Read more » politics काव्यपाठ राजनीति
राजनीति व्यंग्य एक समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य – दीपक ‘मशाल’ April 15, 2009 / December 25, 2011 by दीपक चौरसिया ‘मशाल’ | 5 Comments on एक समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य – दीपक ‘मशाल’ आज की ताज़ा खबर, आज की ताज़ा खबर... 'कसाब की दाल में नमक ज्यादा', आज की ताज़ा खबर...चौंकिए मत, क्या मजाक है यार, आप चौंके भी नहीं होंगे क्योंकि हमारी महान मीडिया कुछ समय बाद ऐसी खबरें बनाने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं. Read more » political satire राजनीतिक व्यंग्य
व्यंग्य तीर ए नजर/ जा बेटा, कुर्सी तोड़!! April 14, 2009 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment इस स्कूल मास्टरी की वजह से कई बार घरवाली से जूते खा चुका हूं। बच्चे मुझे अपना बाप समझने में शरम समझते हैं। और वह अपनी बगल वाला माल मकहमे का चपड़ासी! उसके बच्चे भरे मुंह उसे बाप!बाप! कहते मुंह का थूक सुखाए रहते हैं। इधर-उधर के बच्चे भी जब उसे बाप-बाप कहते उसके पीछे दौड़ते हैं तो उसकी पत्नी का सीना फुट भर फुदकता है। Read more » satire by Ashok Gautam व्यंग
राजनीति व्यंग्य ‘जरनैलिज्म’ नहीं जर्नलिज्म April 14, 2009 / December 25, 2011 by आशुतोष | 2 Comments on ‘जरनैलिज्म’ नहीं जर्नलिज्म यह अघोरपंथी राजनीति का दौर है। या यूं कहें कि अघोरपंथी राजनीति पर भदेस किस्म की प्रतिक्रिया है। अघोरपंथ में सांसारिक बंधनों और लोक मर्यादाओं की परवाह नहीं की जाती। आज राजनीति भी... Read more » P. Chidambaram reporter Janrail Singh चिदंबरम जरनैल सिंह