आलोचना उत्तर आधुनिकतावाद क्या है? July 1, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on उत्तर आधुनिकतावाद क्या है? -जगदीश्वर चतुर्वेदी उत्तर-आधुनिकतावाद को वृद्ध पूंजीवाद की सन्तान माना जाता है। पूंजीवाद के इजारेदाराना दौर में तकनीकी प्रोन्नति को इसका प्रमुख कारक माना जाता है। विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी दखलंदाजी के बढने के बाद से आर्थिकतौर पर अमरीकी प्रशासन की दुनिया में दादागिरी बढी है। इसके अलावा जनमाध्यमों; संस्कृति; सूचना प्रौद्योगिकी, और विज्ञापन की दुनिया […] Read more » North Modernism उत्तर आधुनिकतावाद
व्यंग्य व्यंग्य/ आमरण अनशन पर कुत्ते!! June 29, 2010 / December 23, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम मुहल्ले में कई दिनों से देख रहा था कि वहां के कुत्ते एकाएक गायब हो गए थे। मुहल्ला ही उजाड़ लग लग रहा था कुत्तों के बिना। लगा जैसे मेरा सबकुछ कहीं गुम हो गया हो। वैसे भी कुत्तों के साथ रहते आधी से अधिक जिंदगी तो कट ही गई। बाकी भी खुदा […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग्य/ छोड़ो सबकी बातें!! June 19, 2010 / December 23, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment साहब जी! जीव इस धरती पर आकर, जनसेवक हो अगर अपने मंदिर न बनवा पाए तो नरक को जाए, इसी डर से उन्होंने जनसेवा के सारे काम छोड़ जनता की पेट पर जन सेवा के बहाने लात मार गली-गली शौचालयों के बदले अपने मंदिर बनवा डाले तो स्वर्ग का रास्ता दिखा। उनको लगा कि उनका […] Read more » vyangya व्यंग्य
आलोचना फिनोमिना नामवर सिंह June 14, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 13 Comments on फिनोमिना नामवर सिंह -जगदीश्वर चतुर्वेदी वह साहित्य में जितना चर्चित है। नेट पाठकों में भी उतना ही चर्चित है। वह व्यक्ति नहीं फिनोमिना है। वह आलोचक है, शिक्षक है, श्रेष्ठतम वक्ता है, हिन्दी का प्रतीक पुरूष है, वह जितना जनप्रिय है उतना ही अलोकप्रिय भी है, वह सत्ता के साथ है तो प्रतिवादी ताकतों के भी साथ है। […] Read more » Namwar Singh नामवर सिंह
व्यंग्य व्यंग्य/ एक दुआ, सज्जनों के लिए June 14, 2010 / December 23, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम रोज की तरह खुजलाता हुआ दफ्तर के लिए बारह बजे बिना किसी टेंशन के गुनगुनाता निकला था, पर अचानक सड़क में कहीं भी जाम न दिखा तो मेरी तो जैसे सारी हवा ही निकल गई। खटारा ट्रांसपोर्ट की बस थी की हवाई जहाज की तरह उड़े जा रही थी। सच कहूं! उस वक्त […] Read more » vyangya
साहित्य शमशेर बहादुर सिंह की जन्मशती पर विशेष June 11, 2010 / December 23, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment अनकहे सत्य का कवि शमशेर -विजया सिंह कला विषेशकर कविता की कला कलाकार को, कवि को नितांत व्यक्तिगत, निजी मानवीय स्थितियों और संवेगों से परिचित कराती है। फिर भी कविता एकालाप नहीं अत्यंत अंतरंग किन्तु सक्रिय संवाद है। शमशेर का निजी उन्हें एकाकी नहीं बनाता। कविता के निजी पलों में कवि के साथ सम्पूर्ण संसार […] Read more » Shamsher Bahadur Singh शमशेर बहादुर सिंह
आलोचना श्रद्धालु आलोचना के प्रतिवाद में June 11, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment -जगदीश्वर चतुर्वेदी आधुनिक हिन्दी आलोचना इन दिनों ठहराव के दौर से गुजर रही है,आलोचना में यह गतिरोध क्यों आया? आलोचना में जब गतिरोध आता है तो उसे कैसे तोड़ा जाए? क्या गतिरोध से मुक्ति के काम में परंपरा हमारी मदद कर सकती है? क्या परंपरागत आलोचना के दायरे को तोड़ने की जरूरत है? ये कुछ […] Read more » Criticism आलोचना
आलोचना डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की चुनौतियां June 10, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की चुनौतियां -जगदीश्वर चतुर्वेदी डिजिटल की दुनिया ने हमारे रचना संसार के सभी उपकरणों पर कब्जा जमा लिया है। लघुपत्रिका अथवा साहित्यिक पत्रकारिता जब शुरू हुई थी तो हमने यह सोचा ही नहीं था कि ये पत्रिकाएं क्या करने जा रही हैं। हमारी पत्रकारिता और पत्रकारिता के इतिहासकारों ने कभी गंभीरता से मीडिया तकनीक के चरित्र की […] Read more » Small Magazine लघु पत्रिका
आलोचना रामचरितमानस की काव्यभाषा में रस का विवेचन June 9, 2010 / December 23, 2011 by वंदना शर्मा | 5 Comments on रामचरितमानस की काव्यभाषा में रस का विवेचन -वंदना शर्मा कविता भाषा की एक विधा है और यह एक विशिष्ट संरचना अर्थात् शब्दार्थ का विशिष्ट प्रयोग है। यह (काव्यभाषा) सर्जनात्मक एक सार्थक व्यवस्था होती है जिसके माध्यम से रचनाकार की संवदेना, अनुभव तथा भाव साहित्यिक स्वरूप निर्मित करने में कथ्य व रूप का विषिष्ट योग रहता है। अत: इन दोनों तत्त्वों का महत्त्व […] Read more » Ramcharitmanas रामचरितमानस
व्यंग्य व्यंग्य/ थ्रू प्रापर चैनल June 3, 2010 / December 23, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम अहा! हफ्ता पहले मेरा घोर अवसरवादी मित्र मर गया। बड़ी खुशी हुई मुझे उसके मरने पर। बहुत चालू बंदा था मित्रों! इससे पहले कि वह मरने के बाद भी किसी अवसर का लाभ उठा पाता, मैंने आव देखा न ताव और उसकी अस्थियां श्मशान से उठा सीधे हरिद्वार पहुंच ही पीछे मुड़ कर […] Read more » vyangya व्यंग
आलोचना अभिव्यक्ति का मतलब अश्लीलता तो नहीं… June 3, 2010 / December 23, 2011 by गिरीश पंकज | 7 Comments on अभिव्यक्ति का मतलब अश्लीलता तो नहीं… -गिरीश पंकज अपने देश में इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह की लंपटताई का खेल चल रहा है, उसे देख कर खीझ होती है। कुछ तथाकथित प्रगतिशील लोगों के कारण समाज का एक नया बौद्धिक वर्ग अश्लील अभिव्यक्तियों को ही आधुनिक होने की गारंटी समझ रहा है। आप अपनी तमाम काली […] Read more » Obscenity अभिव्यक्ति अश्लीलता
व्यंग्य व्यंग्य : भटके कस्तूरों के लाभार्थ May 20, 2010 / December 23, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम सभी वर्ग के कस्तूरों के लिए खुशखबरी- हमने तमाम कस्तूरों के हितार्थ टोटल संत चैनल शुरू किया है। यह चैनल फैशन चैनल की तरह चौबीसों घंटे भटके हुए कस्तूरों को मनचाही शांति मुहैया करवाएगा। वैसे भी आज के दौर में फैशन और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हैं। अर्थात् फैशन ही धर्म […] Read more » vyangya व्यंग्य