व्यंग्य

जनकल्याणकारी क्रोध से रचनात्मक हवाई चिंतन पर बैन

बैन के दौरान, सांसद महोदय को जो मानसिक संताप झेलना पड़ा और कष्टपूर्ण रेल यात्रा करनी पड़ी उसकी ज़िम्मेदारी लोकतंत्र का कौनसा खंभा उठाएगा ? इस बैन की वजह से सांसद जी के रचनात्मक हवाई चिंतन में जो व्यवधान आया इसके लिए संसद के कौन से सदन में शून्यकाल के दौरान निंदा प्रस्ताव लाया जाएगा? क्या सबसे बड़े लोकतंत्र के जनप्रतिनिधि अब इतने निःसहाय कर दिए जाएंगे की उन्हें मूड फ्रेश करने के लिए की गई मारपीट और हाथापाई के बाद कानूनी कार्यवाही और प्रतिबंध झेलना पड़ेगा?

टांग खींचने की बीमारी

तभी साहब ने सचिव को बीच में रूकने का इशारा कर गंभीर हो कहा,‘ पर हां! एक बात का जयपुर से टांगें लाते हुए विशेश ख्याल रखा जाए। जो भी वहां टांगें खरीदने जाए वह असली का आभास देने वाली टांगें ही लाए ताकि सभी असली सी टांगें खींचने का समान रूप से मजा ले सकें। और हां! इसके बाद असली टांगें खींचना गैर कानूनी माना जाएगा। फिर मत कहना मैंने किसीकी एसीआर में रेड एंट्री कर दी । शर्मा जी! आपसे और आपके सहयोगियों से तब तक खास निवेदन है कि……’कह साहब ने उनकी ओर हाथ जोड़े।

हम और अहम

हम “अहम” के बिना अधूरे है। गुरुर का सुरूर बहुत मुश्किल से उतरता है। हम हिंदुस्तानी, “ज़िंदगी झंड बा, फिर भी घमंड बा” की सनातन परंपरा के वाहक है और इस परंपरा को हमने अनादिकाल से जीवित रखा है जो परंपराओ के प्रति हमारे समर्पण और बिना शोषित हुए उन्हें पोषित करने की कला को दर्शाती है।

आईने, चेहरे और चरित्र

आखिर मन मसोस कर सरकार ने जनहित में चेतावनी जारी की,’ देश के तमाम तबके के चेहरों को सूचित किया जाता है कि वे आईने के सामने आने से बचें। आईनों ने देश के तमाम चेहरों के विरूद्ध उनका चेहरा सजाने के बदले उनके चरित्र को दिखाने की जो मुहिम छेड़ी है ,वह राष्टर विरोधी है। सरकार अखिल समाज आईना संघ के इस निर्णय की हद से अधिक निंदा करती है।

मार्च एंडिंग की मार्च पास्ट

मार्च का महीना बैंक और कंपनियो के लिए वार्षिक खाताबंदी का भी होता है। वर्ष की शुरुवात में जो खाते शुरू किए जाते है, वो पर्याप्त समय और दिमाग खाने के बाद बंद कर दिए जाते है। खाताबंदी करते वक़्त बंदा या बंदी में फर्क नहीं किया जाता है और समान रूप से उनके पेशेंश का एंड कर मार्च एंडिंग करवाई जाती है। डेबिट-क्रेडिट कर खातो को बंद किया जाता है लेकिन इसका क्रेडिट हमेशा बॉस को मिलता है। खाताबंदी, नोटबंदी और नसबंदी से भी ज़्यादा तकलीफ देती है और ये दिल मांगे मोर (तकलीफ) कहते हुए हर साल मार्च में आ जाती है। खाताबंदी, नोटबंदी, नसबंदी और नशाबंदी, सरकार चाहे तो इन सारी “बंदियों” को “लिंगानुपात” संतुलित करने में भी उपयोग में ला सकती है।

बेवकूफी का तमाशा

अरे जमूरे ! आजकल के बुद्धिजीवी और लेखक भी तो लोगों का अप्रैल फूल बनाते हैं. ऐसे मुद्दों पर लिखते और ऐसे विषयों पर चर्चा करते हैं जिसका अवाम से कुछ भी लेना देना नहीं होता.लेकिन अपना स्वार्थ सिद्ध जरूर पूरा हो जाये अवाम पर लिखकर . अरे भाई अगर उनको अवाम के बारे में सोचना ही होता तो वो बुद्धिजीवी ही क्यों कहलाते, बुद्धिजीवी सिर्फ विमर्श करते, फर्श पर कुछ नहीं करते.’

घर की मुर्गी लेकिन उपचार बराबर

हर मर्ज़ का इलाज़ हम अपनी मर्ज़ी से करते है। अगर किसी बीमारी का कोई घरेलू इलाज़ हमारे पास उपलब्ध नहीं है तो मतलब वो बीमारी गैरसंवैधानिक है और वो बीमारी सभ्य समाज के लायक नहीं है। घरेलू उपचार अब घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह गए है वो रोज़ वाट्सएप और फेसबुक के ज़रिए लोगो के मोबाइल में अपनी जगह और पैठ बना चुके है। सोशल मीडिया पर ये उपचार “फॉरवर्ड” कर करके हम इतने ज़्यादा “फॉरवर्ड” हो चुके है अब बीमारी का आविष्कार होने से पहले ही उपचार की खोज कर लेते है ताकि बीमारी आने पर तुरंत उपचार को “केश” और “पेश” किया जा सके।

सोशल मीडिया के रास्ते प्रसिद्धी के वैकल्पिक सौपान

सिद्धी की इतनी सहज उपलब्धता ने कई लोगो को असहज बना दिया है । प्रसिद्ध लोग जब अपनी 1000-2000 लाइक वाली किसी पोस्ट पर किसी कमेंट का रिप्लाई करते है तो अपने शब्दों से ऐसा आभामंडल रचते है मानो कमेंट नहीं कर लाखो लोगो की सभा को संबोधित कर रहे हो। हालाँकि अपनी हर पोस्ट पर 1K/2K लाइक लेने वाले इन सेलिब्रिटीज के सारे पोस्ट्स चोरी “के” होते है।

सही गलत की नौकरी !

राजनीति और चुनाव मे नेताओं की क्रियाकलाप की आलोचना करना गलत नही है या यूँ कहे कि बिल्कुल भी गलत नही है और तो और ये तो आपका अधिकार भी है लेकिन ये गलत तब गलत हो जाता है जब अधिकार – अधिकार चिल्लाकर अधिकार के शोर मे कृत्वयों को धूमिल करने का प्रयास किया जाता है । घर के बाहर सही जगह पर कचरा न फेंकने वाले गन्दगी के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते है , ट्रैफिक पर सिंग्लन तोड़ कर जाने वाले दुर्घटना का शिकार होने पर सड़को की आड़ लेकर सरकार को कोसते है ।

आहत होने की चाहत

राजनीती, खेल, बॉलीवुड,धर्म या अन्य किसी भी क्षेत्र से जुडी कोई भी घटना हो या इन से जुड़े किसी भी सेलेब्रिटी या किसी व्यक्ति का कोई भी बयान हो वो रोज़ सोशल मीडिया की भट्टी में ईंधन रूपी कच्चे माल के रूप में झोंक दिया जाता है जो “ट्रेंड”की शक्ल में बाहर निकल कर लोगो को कोमल भावनाए आहत करने का अपना क़र्ज़ और फ़र्ज़ अदा करता है।