व्यंग्य साहित्य आईपीएल, मनोरंजन और भारतीय दर्शन February 22, 2017 / February 22, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment आईपीएल की बोली लग चुकी है, खिलाडी बिक चुके है, बस अब खेल का बिकना बाकी है। मज़मा लग चुका हैै, खिलाडी मुजरा करने को तैयार है। बाज़ारीकरण के इस दौर में “आई-पिल” और “आईपीएल” दोनों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है क्योंकि दोनों ही कम समय में “सुरक्षित” मनोरंजन सुनिश्चित करते है। विकासशील […] Read more » Featured आईपीएल भारतीय दर्शन मनोरंजन
व्यंग्य “लांच” होने से ज़्यादा रूचि “लंच” करने में February 18, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment इसरो ने अंतरिक्ष में 104 उपग्रह एक साथ छोड़कर उन्हें सफलतापूर्वक अपनी कक्षा में स्थापित कर दिया है,ये पूरे देश के लिए तो गर्व की बात है ही लेकिन मेरे लिए यह गर्व के साथ -साथ प्रेरणास्पद बात भी है क्योंकि बचपन में अपने मम्मी-पापा के कई असफल प्रयासों के बाद भी मैं अपनी स्कूल […] Read more »
व्यंग्य नये इसरो की तलाश February 18, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment इन दिनों हर कोई ‘इसरो’ के गुण गा रहा है। सचमुच उसने काम ही ऐसा किया है। दुनिया में आज तक कोई देश एक साथ 104 उपग्रह सफलतापूर्वक प्रक्षेपित नहीं कर सका है। जो लोग वैज्ञानिक सफलता के नाम पर सुबह उठते ही अमरीका और रात में सोने से पहले रूस की माला जपते हैं, […] Read more » नये इसरो की तलाश
व्यंग्य साहित्य नेता जी के साथ एक दिन February 15, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment ये चुनाव के दिन हैं। जिसे देखो अपनी प्रशंसा और दूसरे की बुराई करने में दिन-रात एक कर रहा है। नेता लोग दूसरे की सबसे अधिक आलोचना जिस मुद्दे पर करते हैं, वह है भ्रष्टाचार। लेकिन चुनाव जीतते ही अधिकांश लोग उसी काम में लग जाते हैं, जिसकी आलोचना कर वे चुनाव जीतते हैं। कई […] Read more » Featured नेता जी के साथ एक दिन
व्यंग्य मफलर के मौसम में रेनकोट February 13, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment मफलर के मौसम में रेनकोट के चर्चे है। कपड़ो का उपयोग उनकी प्रवृति के हिसाब से अब किसी मौसम विशेष तक सीमित नहीं रह गया हैै वो अपनी सीमाए लांघकर हर मौसम में “सर्जिकल- स्ट्राइक” कर अपनी निर्भरता और उपयोगिता का लौहा मनवा रहे है। यह उल्लेखनीय है की ये लोहा , “लौहपुरुष” के मार्गदर्शक […] Read more » मफलर रेनकोट
व्यंग्य साहित्य वाद, विवाद और विकासवाद February 10, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment सिरदर्द के अनेक कारण होते हैं। कुछ आतंरिक होते हैं, तो कुछ बाहरी। पर मेरे सिरदर्द का एक कारण हमारे पड़ोस में रहने वाला एक चंचल और बुद्धिमान बालक चिंटू भी है। उसके मेरे घर आने का मतलब ही सिरदर्द है। कल शाम को मैं टी.वी. पर समाचार सुन रहा था कि वह आ धमका। […] Read more » Featured पूंजीवाद वाद विकासवाद विवाद विवाद और विकासवाद समाजवाद
राजनीति व्यंग्य मैं वोट जरूर दूंगा February 8, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment चुनाव के दिन जैसे-जैसे पास आ रहे हैं, हर कोई उसके रंग में रंगा दिख रहा है। किसी ने छत पर अपनी मनपंसद पार्टी का झंडा लगाया है, तो किसी ने सीने पर उसका बिल्ला। कुछ लोगों ने साइकिल, स्कूटर और कार पर ही अपने प्रिय प्रत्याशी को चिपका लिया है। पान की दुकान हो […] Read more » Featured मैं वोट जरूर दूंगा वोट वोट दूंगा
व्यंग्य साहित्य आलू और पनीर (सेल्वम्) February 7, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment दुनिया की हर भाषा में लोकजीवन में प्रचलित प्रतीकों और मुहावरों का बड़ा महत्व है। फल-सब्जी, पशु-पक्षी और व्यवहार या परम्पराओं से जुड़ी बातें साहित्य की हर विधा को समृद्ध करती दिखती हैं। अब आप आलू को ही लें। यह हर सब्जी में फिट हो जाता है। इससे नमकीन और मीठे, दोनों तरह के व्यंजन […] Read more » Featured आलू और पनीर (सेल्वम्)
व्यंग्य विवाद की आग जलती रहे, फिल्म वालों की तिजोरी भरती रहे…!! February 4, 2017 / February 4, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा अब स्वर्ग सिधार चुके एक ऐसे जनप्रतिनिधि को मैं जानता हूं जो युवावस्था में किसी तरह जनता द्वारा चुन लिए गए तो मृत्यु पर्यंत अपने पद पर कायम रहे। इसकी वजह उनकी लोकप्रियता व जनसमर्थन नहीं बल्कि एक अभूतपूर्व तिकड़म थी। जिसमें उनके परिवार के कुछ सदस्य शामिल हेोते थे। दरअसल […] Read more » फिल्म वालों की तिजोरी विवाद की आग जलती रहे
व्यंग्य साहब, आदमी अभी ओर कितना नीचे गिरेगा ? January 26, 2017 by मयंक चतुर्वेदी | Leave a Comment डॉ. मयंक चतुर्वेदी रामभुलावन आज सुबह बहुत गुस्से में आया था । गणतंत्र दिवस था, मैंने दरवाजा खोला तो उम्मीद नहीं थी अंदर आए वगैर ही रामभुलावन इस तरह से मन में दबी हुई अपनी किसी बात पर प्रतिक्रिया देगा । मैंने कहा… रामभुलावन आज खुशी का मौका है …देश को आज ही के दिन […] Read more » आदमी अभी ओर कितना नीचे गिरेगा
व्यंग्य ताजा दल बदलिए से संवाद January 23, 2017 / January 23, 2017 by अशोक गौतम | Leave a Comment वे नख से शिख तक अलग ही भाव भंगिमा में लचकते- मटकते आते दिखे पर फिर भी उन्हें पहचानते देर न लगी। सोचा, चुनाव के दिनों में ठूंठ भी लहलहाने लगते हैं और ये तो …… वे नजदीक आए तो वही निकले पर उनके सिर पर उस विरोधी दल की टोपी देख हैरत हुई जिसे […] Read more » ताजा दल बदलिए से संवाद
व्यंग्य साहित्य मारक होती ‘ माननीय ‘. बनने की मृगतृष्णा …!! January 23, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा … देश और जनता की हालत से मैं दुखी हूं। इसलिए आपके बीच आया हूं। अब बस मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं… राजनीति से अलग किसी दूसरे क्षेत्र के स्थापित शख्सियत को जब भी मैं ऐसा कहता सुुनता हूं तो उसका भविष्य मेरे सामने नाचने लगता है। मैं समझ जाता हूं […] Read more » ' माननीय '. बनने की मृगतृष्णा ...!! मृगतृष्णा