व्यंग्य हिंदी साहित्य का अखाड़ा March 2, 2014 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on हिंदी साहित्य का अखाड़ा ::: भाग एक::: बहुत समय पहले की बात है। मुझे एक पागल कुत्ते ने काटा और मैंने हिंदी साहित्यकार बनने का फैसला कर लिया। ये दूसरी बार था कि मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा था और मैं अपनी ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ कोई महत्वपूर्ण फैसला कर रहा था। पहली बार जब एक महादुष्ट पागल […] Read more » हिंदी साहित्य का अखाड़ा
व्यंग्य अस्सी वाले स्वतंत्र बाबा कहीन “लोकतंत्र की फ्रीस्टाईल नूराकुश्ती” March 1, 2014 / March 1, 2014 by सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” | Leave a Comment – सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”- राजनीति एक बार दोबारा अपने चिर-परिचित स्वरूप की ओर बढ़ चली है। वही स्वरूप जिसमें पद पिपासा और अवसरवाद सर्वाधिक लोकप्रिय सिद्धांत है। इस बात को देखकर मेरे बाबा का एक पुराना शेर याद आ गया जो वे अक्सर ही कहा करते थे, सियासत नाम है जिसका वो कोठे की […] Read more » satire on democracy अस्सी वाले स्वतंत्र बाबा कहीन "लोकलंत्र की फ्रीस्टाईल नूराकुश्ती"
व्यंग्य जैसे कैसे हो गया बस ! February 27, 2014 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम- बरसों से महसूस होने का सारा सिस्टम खटारा होने के बाद भी कई दिनों से मैं महसूस कर रहा था कि जब-जब पत्नी की चिल्ल-पों बंद होती और अपने कानों को जरा चैन देने की कोशिश में होता तो उनके घर के भीतर से किसी चीज को ठोकने-बजाने की आवाजें आने […] Read more » satire on political system जैसे कैसे हो गया बस !
राजनीति व्यंग्य व्यंग्य बाण : कुर्सी की दौड़ में February 26, 2014 by विजय कुमार | 3 Comments on व्यंग्य बाण : कुर्सी की दौड़ में वैसे तो सभी बच्चे शरारती होते हैं, और जो शरारती न हो, वह बच्चा ही क्या ? पर शर्मा जी के मोहल्ले बच्चे, तौबा-तौबा। वे कब, क्या कर डालेंगे, भगवान को भी नहीं मालूम। शर्मा जी के घर के बरामदे में एक अति प्राचीन ऐतिहासिक कुर्सी रखी है। हम लोग हंसी में उसे महाभारतकालीन कहते […] Read more » व्यंग्य बाण : कुर्सी की दौड़ में
व्यंग्य पधारो म्हारी चौपाल! February 15, 2014 by अशोक गौतम | Leave a Comment हे चाय चौपाल के बहाने वोट की जुगाड़ करने वालो! बड़े फन्ने खां बने फिरते हो न! पर अब आपको यह जानकर जितना आप सहन कर सकते हो उससे भी कहीं अधिक दुख होगा कि हमने आपका पहले वाले दाव का तोड़ निकाला हो या न पर आपकी चाय चौपाल का तोड़ निकाल लिया है। […] Read more » satire on politics पधारो म्हारी चौपाल!
व्यंग्य राजनैतिक दोहे February 13, 2014 by बीनू भटनागर | 11 Comments on राजनैतिक दोहे -बीनू भटनागर- दोहों के सारे नियमों को ताक पर रखकर ये 7 दोहे लिखे हैं, दोहे इसलिये हैं कि दो लाइन के हैं। छंदशास्त्र के विद्वानों की निगाह पड़ जाये तो कृपया आंख बन्द कर लें। कोई बॉलीवुड का प्राणी देख ले तो ध्यान दें, क्योंकि फिल्मों में जैसी तुकबन्दी होती है, वैसी हम […] Read more » satire on political party satire on politics राजनैतिक दोहे
व्यंग्य बैंगन का भुरता बनाम सत्ता का जहर February 9, 2014 by जगमोहन ठाकन | 1 Comment on बैंगन का भुरता बनाम सत्ता का जहर – जग मोहन ठाकन- गुरूजी प्रवचन करके जैसे ही घर पर लौटे तो देखा कि बाहर कचरादानी में ताज़ा बैंगन का भुरता मंद-मंद मुस्करा रहा है ! रसोई द्वार पर पत्नी को देखते ही गुरूजी ने पूछा – देवी जी , यह जायकेदार बैंगन की सब्जी और कचरा दान में ? क्या जल गई […] Read more » satire on indian politics बैंगन का भुरता बनाम सत्ता का जहर
व्यंग्य शराबी के मुंह की दुर्गन्ध मां और पत्नी को महसूस नहीं होती February 8, 2014 / February 8, 2014 by डॉ. भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी | Leave a Comment -डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी- हमारे खानदान के सभी ढाई, तीन, साढ़े तीन अक्षर नाम वाले लोग निवर्तमान नवयुवक हो चुके हैं, कुछ तो जीवन की अर्धशतकीय पारी खेल रहे हैं तो कई जीवन के आपा-धापी खेल से रिटायर भी हो चुके हैं। कुछ जो बचे हैं वे लोग अर्धशतकीय और उसके करीब की पारियां […] Read more » satire on indian soceity शराबी के मुंह की दुर्गन्ध मां और पत्नी को महसूस नहीं होती
व्यंग्य रोल मॉडल February 6, 2014 / February 6, 2014 by भगवंत अनमोल | Leave a Comment -भगवंत अनमोल- यह बात लगभग सभी को पता है कि किसी भी देश का भविष्य युवा निर्धारित करते हैं और युवा देश के रोल मॉडल्स को देख कर उनसे प्रेरणा लेते हैं। फिर वे उनके जैसा बनने का सपना लेकर देश की सेवा करने और खुद के भविष्य का निर्माण करने का संकल्प लेते […] Read more » satire on today's thought रोल मॉडल
व्यंग्य जाति तोड़कर फंस गया रे भाया…! February 6, 2014 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment -तारकेश कुमार ओझा- कोई यकीन करे या न करे, लेकिन यह सच है कि जाति तोड़ने का दुस्साहस कर मैं विकट दुष्चक्र में फंस चुका हूं। जिससे निकलने का कोई रास्ता मुझे फिलहाल नहीं सूझ रहा। पता नहीं क्यों मुझे यह डर लगातार सता रहा है कि मेरे इस दुस्साहस का बोझ मेरी […] Read more » satire on caste system जाति तोड़कर फंस गया रे भाया...!
व्यंग्य मुझको लाओ, देश बचाओ ! February 3, 2014 / February 4, 2014 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम- आजकल देश में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए मारो मारी चली है। जिसे घर तक में कोई नहीं पूछता वह भी प्रधानमंत्री के पद के लिए दावेदारी सीना ठोंक कर ठोंक रहा है, भले बंदे के पास सीना हो या न! मित्रों! दावेदारी के इस दौर में मैं भी देश की सेवा […] Read more » satire on politics देश बचाओ ! मुझको लाओ
व्यंग्य दयालु सरकार : नथ्थू खुश February 2, 2014 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment -जगमोहन ठाकन- जब से नमो ने बचपन में चाय की दुकान पर काम करने की बात स्वीकारी है तभी से नथ्थू की दुकान पर छुटभैये राजनितिक आशान्वितों की गर्मागर्म बैठकें बढ़ गयी हैं. हाल में सरकार द्वारा गैस सिलेंडर के दाम साढ़े बारह सौ रुपये तक बढ़ाकर पुनः एक सौ सात रुपए की कमी […] Read more » satire on government दयालु सरकार : नथ्थू खुश