महत्वपूर्ण लेख

कितना असाधारण अब सौ फीसदी कुदरती हो जाना

परिस्थिति के हिसाब से किसानों के तर्क व्यावहारिक हैं। उनकी बातों से यह भी स्पष्ट हुआ कि वे केचुंआ खाद, कचरा कम्पोस्ट आदि से परिचित नहीं है। गोबर गैस प्लांट उनकी पकड़ में नहीं है। हरी खाद पैदा करने के लिए हर साल जो अतिरिक्त खेत चाहिए, उनके पास उतनी ज़मीन नहीं है। ज़िला कृषि कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी गांव में आते-जाते नहीं। सच यही है कि जैविक खेती के सफल प्रयोगों की भनक देश के ज्यादातर किसानों को अभी भी नहीं है।

जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों के छिपे समर्थक

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री जम्मू कश्मीर तीन दशकों से भी ज़्यादा समय से आतंकवादियों की…

लीला भंसाली की पदमावती को लेकर उठा विवाद

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिनकी निन्दा किया जाना…

भारतीय शिक्षाव्यवस्था का इतिहास करवट लेगा : निकट भविष्य में डॉक्टरी की पढ़ाई हिन्दी में कर पाएंगे भारतीय बच्चे

इसके पहले भी अटल बिहारी बाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल इंजीनियरिंग के कोर्स हिन्दी में शुरू करने की घोषणा कर चुका है और वहां इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल तथा सिविल के कोर्स हिन्दी में शुरू भी कर दिए गए हैं। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के चैयरमैन अनिल डी. सहस्रबुद्धे ने कहा था कि हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में इंजीनियरिंग की पढ़ाई हो सकती है। उनका कहना था कि कालेज को सिर्फ एआईसीटीई के मानक पूरे करने अनिवार्य हैं।

अर्थक्रांति और राष्ट्रवाद की और देश

अनेक उच्च वर्गीय लोगो का कहना था कि मोदी के नोट वापसी के फैसले के बाद वे निराश हें और या तो काम करना बंद कर देंगे अथवा विदेश चले जायेंगे। मेरा उनसे कहना है कि अगर वो ऐसा करते हें तो इस देश पर अहसान ही होगा क्योकि वो देश में कमाते भी हें तो टैक्स चोरी कर कालाधन विदेश भेज देते हें या विदेशो से नकद में आयात कर देश के उद्योगों की कमर तोड़कर युवा पीढ़ी को बेकार कर रहे हें। कृपया अपने साथ लंपट नेताओ और नोकरशाहों को भी ले जाइयेगा और जल्द हमें बताइये कि किस देश में आप बिना कानून माने और टैक्स दिए बिना अय्याशी कर रहें हें।

टेक्सास में हुई अद्भुत भ्रूण शल्यक्रिया का विश्लेषण

देखा जाए तो अतिप्राचीन युग में भी भारत की चिकित्सा प्रणाली का उद्देश्य वृहत रुप से व्यापक और सर्वज्ञान पद्धति से परिपूर्ण था। ‘चरक संहिता’ सिर्फ भारत में ही नहीं, अपितु विदेशों में भी इसका अध्ययन किया जा रहा है। इसी आधार पर आज भी पाश्चात्य चिकित्सक इस बात को सार्वजनिकतौर पर बोलने से भले ही कतराते हों, परन्तु आंतरिकरुप से स्वीकार करते हैं कि चरक-सुश्रुत के काल में भारतीय चिकित्सा विज्ञान आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान से कहीं अधिक आगे था।