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आपातकाल के समय उत्तराखण्ड में पत्रकारिता

गढवाल टाईम्स नाम से  पाक्षिक पत्रिका प्रकाशित करते थे। वे बताते हैं कि ठभ्म्स् रानीपुर हरिद्वार में अस्सिटैंट इंजीनियर ए.के.सूरी के घर बैठक होती थी, समाचारों का संकलन किया जाता था। उनमें छपने लायक समाचार तय किये जाते कहां कितने लोग पकड़े गये, संघ, जनसंघ व अन्य कितने लोगों ने सत्याग्रह किया, क्या-क्या अत्याचार हुये। ए.के.सूरी अपने आॅफिस से साइक्लोस्टाइल मशीन मंगाकर घर पर ही पत्रिका छापते। एक-एक प्रति डाक द्वारा जिलाधिकारी, एस.पी. एवं शासन के लिये भेजी जाती, शेष थैले में भरकर क्षेत्र में अपने कार्यकर्ताओं को वितरित कर दी जाती। कार्यकर्ताओं द्वारा समाज में विचार प्रेषित किये जाते।

सीबीआई ने धोखाधड़ी के खिलाफ कार्रवाई की है या एनडीटीवी की स्वतंत्रता के खिलाफ? – एस. गुरुमूर्ति

पूरे यूपीए सरकार के कार्यकाल में, एनडीटीवी ने अपनी शेल सहायक कंपनियों में निवेशकों की

नकारात्मक व ओच्छी मानसिकता की पत्रकारिता

यह दुख का विषय है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कुछ ऐसे लोग प्रवेश कर गये हैं-जिनका खोजी पत्रकारिता से दूर दूर का भी संबंध नही है, उन्हें ना तो लोकतंत्र की परिभाषा ज्ञात है और ना ही धर्म की परिभाषा का ज्ञान है। वह उत्पीडऩ और भयादोहन कर लेखनी के साथ अन्याय करते हैं और समाज पर लेखनी का आतंक स्थापित करते हैं। ऐसी प्रवृत्ति निश्चय ही भयावह है।

एक अजूबा यह भी : शिलालेख में विज्ञापन

भारत में विज्ञापन संबंधी इतिहास खोजने वालों ने बताया है कि जहाँ तक उत्पादित माल बेचने के लिए विज्ञापन का संबंध है, संभवतः विश्व के सबसे पुराने विज्ञापन का श्रेय भारत को ही है । यह लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुरानी बात है । तब देश के एक बड़े भाग पर कुमार गुप्त -प्रथम (415–455 ई.) का शासन था (जिसे शक्रादित्य और महेंद्रादित्य भी कहते हैं ; पिता चन्द्रगुप्त द्वितीय और माँ ध्रुवदेवी थीं जिन्हें ध्रुवस्वामिनी भी कहते हैं; प्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर ‘प्रसाद’ के इसी नाम के नाटक से कुछ पाठक परिचित ही होंगे) । कुमारगुप्त का साम्राज्य बंगाल से काठियावाड़ और हिमालय से नर्मदा तक फैला हुआ था । दिल्ली में क़ुतुब मीनार के पास खुले आकाश में खड़ा वह लौह स्तंभ भी कुमारगुप्त का ही बनवाया हुआ है जिसमें आजतक जंक नहीं लगी ।