राजनीति पश्चिम बंगाल में कम होती भाजपा की ताकत November 25, 2024 / November 25, 2024 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली “ पिछले दिनों हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव और विधान सभा उपचुनावों के नतीजें ने यह साबित कर दिया है कि आज भी भाजपा अपने घटक दलों के साथ शानदार प्रदर्शन करने में सक्षम है, चाहे वो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की प्रचंड जीत हो, बिहार के उपचुनाव के नतीजे […] Read more » BJP's strength is decreasing in West Bengal पश्चिम बंगाल में कम होती भाजपा की ताकत
राजनीति हेमंत के दूसरी बार सत्तासीन होने के मायने November 25, 2024 / November 25, 2024 by कुमार कृष्णन | Leave a Comment कुमार कृष्णन वनाच्छादित, खनिज संपदा से भरपूर और आदिवासी बहुल झारखंड विधानसभा चुनाव का परिणाम का संदेश यह रहा कि यहाँ के लोगों ने भाजपा की विभाजनकारी नीति को नकार दिया। इसके साथ ही झारखंड के अब तक के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी सरकार को लगातार दूसरी बार सत्तासीन होने […] Read more » Meaning of Hemant coming to power for the second time झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन झारखंड विधानसभा चुनाव का परिणाम हेमंत सोरेन
राजनीति सियासत की आखिरी बाजी में शरद पवार कैसे मात खा गए? November 25, 2024 / November 25, 2024 by रामस्वरूप रावतसरे | Leave a Comment रामस्वरूप रावतसरे महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के आखिरी दौर के वक्त राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के प्रमुख शरद पवार ने कहा था कि मुझसे पंगा लेना भारी पड़ सकता है। जिन लोगों ने मेरे साथ विश्वासघात किया है, उन्हें सबक सिखाना जरूरी है। आज जब महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे सामने आए तो शरद […] Read more » Sharad Pawar lose in the last game of politics सियासत की आखिरी बाजी में शरद पवार
महिला-जगत राजनीति क्या टेलरिंग शॉप और सैलून में पुरुषों पर रोक से महिलाएँ सुरक्षित हो पायेगी? November 25, 2024 / November 25, 2024 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment लिंग भेद का अर्थ है कि महिलाओं को निरंतर सुरक्षा की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी एजेंसी और व्यावसायिकता कमज़ोर होती है। पुरुष दर्जियों को महिलाओं के माप लेने से रोकना सुरक्षा के लिए महिलाओं की निर्भरता की धारणा को मज़बूत करता है। ऐसी नीतियाँ पुरुषों को संभावित खतरे के रूप में सामान्यीकृत करती हैं, […] Read more » banning men from tailoring shops and salons टेलरिंग शॉप और सैलून में पुरुषों पर रोक
राजनीति महाराष्ट्र-झारखंड में सियासी सूझबूझ मस्त, अहंकार पस्त November 25, 2024 / November 25, 2024 by कमलेश पांडेय | Leave a Comment कमलेश पांडेय महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनावों के साथ-साथ लोकसभा की दो सीटों और विभिन्न दर्जनाधिक राज्यों की 48 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणाम चौंकाने वाले हैं। ये चुनाव परिणाम इस बात का स्पष्ट इशारा कर रहे हैं कि मतदाताओं ने जहां सियासी सूझबूझ को ग्रेस देते हुए मस्त कर दिया है, वहीं […] Read more » महाराष्ट्र-झारखंड में सियासी सूझबूझ मस्त
राजनीति विश्व में भारत की साख बढ़ाने की मोदी प्रतिबद्धता November 25, 2024 / November 25, 2024 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ललित गर्ग-दुनिया में भारत एवं भारतीय लोकतंत्र का गौरव एवं सम्मान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, पिछले 10 साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक विश्व नेता बनकर उभरे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका रुतबा लगातार बढ़ा है। विदेशी धरती से मिलने वाले सर्वाेच्च नागरिक सम्मानों की एक लम्बी शृंखला इस बात का प्रमाण हैं कि […] Read more »
राजनीति महाराष्ट्र ने दिया है हिंदू राष्ट्रवाद का संदेश November 23, 2024 / December 13, 2024 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणामों ने केन्द्र की मोदी सरकार को नई ऊर्जा प्रदान की है। हरियाणा के बाद निरंतर दूसरे बड़े और एक महत्वपूर्ण राज्य में जिस प्रकार भाजपा नीत गठबंधन महायुति की सत्ता में फिर से वापसी हुई है , वह न केवल शानदार है बल्कि भाजपा के लिए जानदार भी है। लोकसभा चुनाव […] Read more » Maharashtra has given the message of Hindu nationalism हिंदू राष्ट्रवाद का संदेश
राजनीति समावेशी राष्ट्र बनाना है तो पसमांदा मुसलमानों की ताकत को पहचाने भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान November 22, 2024 / November 22, 2024 by गौतम चौधरी | Leave a Comment गौतम चौधरी वर्ण और जाति, पारंपरिक भारतीय समाज की नींव है। सामाजिक संरचना की यदि बात करें तो इसे आप किसी कीमत पर नजरअंदाज नहीं कर सकते । इस व्यवस्था की संरचना एक-दो वर्ष या फिर एक-दो सौ सालों में नहीं हुआ है। इसका लंबा इतिहास है। पक्ष-विपक्ष, हानी-लाभ की बात करें तो कई तर्क […] Read more » strength of Pasmanda Muslims. पसमांदा मुसलमानों की ताकत
राजनीति क्या एलन मस्क से सीधी टक्कर की तैयारी में है मुकेश अंबानी November 22, 2024 / November 22, 2024 by रामस्वरूप रावतसरे | Leave a Comment रामस्वरूप रावतसरे एआई के बाद भारत ने ह्यूमनॉइड के क्षेत्र में भी अपने पैर पसारने की दिशा में काम शुरू कर दिया है। मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस समर्थित रोबोटिक्स स्टार्ट-अप एडवर्ब ने ह्यूमनॉइड रोबोट बनाने की घोषणा की है इसे अलगे साल 2025 में लॉन्च किया जाएगा। इसका सीधा मुकाबला एलन मस्क की कंपनी टेस्ला, बोस्टन […] Read more »
राजनीति अमेरिका-अडानी घूसखोरी विवाद: रिश्वत बम नहीं, महज शिष्टाचार की फुलझड़ी समझिए November 22, 2024 / November 22, 2024 by कमलेश पांडेय | Leave a Comment कमलेश पांडेय जिस तरह से दुनिया के थानेदार अमेरिका में अदाणी ग्रुप के चेयरमैन उद्योगपति गौतम अदाणी समेत 8 लोगों पर अरबों रुपए की धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं, उसके दृष्टिगत यह सवाल मौजूं है कि जब रिश्वत का आरोप भारत में लगाया गया है तो फिर अमेरिका में जांच कैसे शुरू हो गई? उससे […] Read more » us-adani-bribery-controversy अमेरिका-अडानी घूसखोरी विवाद
राजनीति निज गौरव और निज देश का अभिमान November 22, 2024 / December 13, 2024 by राकेश कुमार आर्य | 1 Comment on निज गौरव और निज देश का अभिमान उनकी लिखी हुई कविता की ये पंक्तियाँ बहुत लोकप्रिय हुई थीं :- “यश वैभव सुख की चाह नहीं,परवाह नहीं जीवन न रहे;यदि इच्छा है तो यह है-जग में स्वेच्छाचार दमन न रहे।” हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि लेखनी प्रत्येक काल में समाज का मार्गदर्शन करती आई है। जब-जब समाज दिग्भ्रमित होता है, राजनीति […] Read more »
आर्थिकी राजनीति भारत में एकात्म मानववाद के सिद्धांत को अपना कर हो आर्थिक विकास November 22, 2024 / November 22, 2024 by प्रह्लाद सबनानी | Leave a Comment भारतीय संस्कृति के अनुसार ही भारतीय आर्थिक दर्शन में भी सृष्टि की समस्त इकाईयों, अर्थात व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं समष्टि को एक माला की कड़ी के रूप में देखा गया है। एकता की इस कड़ी को ही पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय ने ‘एकात्म मानववाद’ बताया है। एकात्म मानववाद वैदिक काल से चले आ रहे सनातन प्रवाह का ही युगानुरूप प्रकटीकरण है। सनातन हिंदू दर्शन आत्मवादी है। आत्मा ही परम चेतन का अंश है। पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय ने समाज और राष्ट्र में भी चित्त, आत्मा, मन, बुद्धि एवं शरीर आदि का समुच्चय देखा है। अतः इस एकात्म मानववादी दर्शन के उतने ही आयाम एवं विस्तार है, जितनी मनुष्य की आवश्यकताएं हैं। इन विभिन्न आवश्यकताओं का केंद्र बिंदु अर्थ को ही माना गया है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की परिभाषा में लिखा है कि अर्थशास्त्र का मुख्य अभिप्राय, अप्राप्ति की प्राप्ति; प्राप्ति का संरक्षण तथा संरक्षित का उपभोग है। एकात्म मानववाद में भी आर्थिक व्यवहार उक्त आधारों पर ही टिके होते हैं। इस प्रकार, अर्थशास्त्र की दिशा स्वतः ही विकासवादी हो जाती है। भारत के नागरिक पिछले लम्बे समय से पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था में पले बढ़े हैं अतः वे भारत की पौराणिक एवं वैदिक ज्ञान परम्परा से विमुख हो गए हैं। इसी प्रकार, प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र एवं आर्थिक चिंतन से भी हम भारतीय इतने अधिक दूर हो गए हैं कि प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र को सिर्फ उक्ति एवं सिद्धांत मानने के साथ साथ अव्यवहारिक भी मानने लगे हैं। जबकि, वैदिक साहित्य में धन के 22 से अधिक प्रकारों की स्पष्ट व्याख्या की गई है, जिसमें शेयर से लेकर आय एवं मूलधन भी सम्मिलित है। प्राचीन भारत के आर्थिक चिंतन को आज यदि लागू किया जाता है तो केवल भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता का कल्याण होगा, क्योंकि हिंदू अर्थशास्त्र एकात्म मानववाद पर आधारित है, जिसमें व्यक्ति अपने लिए नहीं, वरन समष्टि के लिए जीता है। इसे निम्नलिखित सूत्र के माध्यम से अधिक स्पष्ट किया जा सकता हैं – हिंदू अर्थशास्त्र = व्यक्ति x परमार्थ (एकात्म मानववाद एवं त्याग) पश्चिमी अर्थशास्त्र = व्यक्ति x स्वार्थ (आत्म केंद्रित एवं लाभ) एकात्म मानववादी अर्थशास्त्र में व्यक्ति अपने एवं अपनों के स्थान पर समष्टि तथा चराचर और परमार्थ के लिए जीता है। जिसमें स्वयं के लिए मुनाफा एवं लाभ के स्थान पर दूसरों की चिंता मुख्य होती है। परंतु, इसके ठीक विपरीत पश्चिम का अर्थशास्त्र आत्मकेंद्रित व्यवहार एवं स्वार्थ पर खड़ा है। पश्चिम के विकासवादी दर्शन का केंद्र मुनाफा, स्वार्थ एवं लाभ है। परंतु, हिंदू आर्थिक चिंतन के आधार पर खड़े एकात्म मानववाद का आधार अथवा केंद्र परमार्थ है। इसलिए एकात्म मानववादी आर्थिक विकास में विकास केवल अर्थ के लिए नहीं वरन परमार्थ के लिए है। हिंदू आर्थिक दर्शन परम्परा में विकास की अवधारणा को समग्रता में व्यक्त किया गया है। यह विकास त्रिगुण आधारित है। इस त्रिगुण में – सत, रज एवं तम सम्मिलित है। प्राचीन भारतीय चिंतन में सत्तवादी विकास श्रेष्ठ माना गया है। इस सत्तवादी विकास के तत्व हैं ज्ञान, तपस्या, सदकर्म, प्रेम एवं समत्वभाव तथा इसकी उपस्थिति सतयुग में मानी गई है। विकास का दूसरा स्वरूप रजस को माना गया। इस रजसवादी विकास के तत्व हैं अहंबुद्धि, प्रतिष्ठा, मानबढ़ाई, लौकिक, पारलौकिक सुखा मत्सर, दम्भ एवं लोभ तथा इसकी उपस्थिति त्रेतायुग में मानी गई है। इसे मानवीय और मध्यम माना गया है। इसी प्रकार, विकास का तीसरा स्वरूप तमस को माना गया है। इस तमसवादी विकास के तत्व हैं असत्य, माया, कपट, आलस्य, निंदा, हिंसा, विषाद, शोक, मोह, भय तथा इसकी उपस्थिति कलयुग में मानी गई है। इस प्रकार सत, रज एवं तम गुणों के आधार पर उक्त विकास के तीन रूपों के साथ एक मिश्रित विकास का भी मॉडल माना गया है, जिसमें रजस एवं तमस गुण मिले होते हैं और इस मॉडल की उपस्थिति द्वापर युग में मानी गई है। इस प्रकार भारतीय चिंतन परम्परा में विकास के उक्त चार प्रारूप माने गए हैं। इन चारों प्रारूपों का उपयोग चार युगों सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलियुग में होता पाया गया है। इसमें सबसे उत्तम सतयुगी विकास प्रारूप को माना गया है तथा सबसे अधम कलियुगी विकास प्रारूप को माना गया है। भारत में, वर्तमान खंडकाल में त्रेतायुग के रामराज्य को भी बहुत अच्छा माना गया है एवं इसके स्थापना की कल्पना की जाती रही है। पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय ने महात्मा गांधी जी के ट्रस्टी शिप एवं हिंद स्वराज्य के विवेचन को भी अपने विमर्श में स्थान दिया है। इस प्रकार भारतीय चिंतन परम्परा का आदर्श रामराज्य है, इसमें भरत जैसे राजा एवं जनक जैसे राजा तपस्वी के रूप में राज्य करते थे। स्वयं श्रीराम धर्म की मर्यादा को अपने लिए भी लागू करते थे एवं धर्म की मर्यादा का कभी भी उल्लंघन नहीं करते थे। सदैव प्रजा एवं प्रकृति की रक्षा एवं संवर्धन करते रहते हैं। यह एक ऐसा विकास का प्रारूप है जो आज भी आदर्श है। रामराज्य की अवधारणा भी एकात्म मानववाद के आधारों पर खड़ी थी। यह शासन तथा विकास एवं व्यवस्था में सब की भागीदारी तथा सब के लिए व्यवस्था थी, जो प्रकृति आधारित विकास पर बल देती थी। भारत में सबसे छोटी इकाई व्यक्ति पर बल दिया गया है और उसका संगठन किया गया है। भारत में व्यक्ति के स्वरूप को जिस प्रकार संगठित और एकात्म किया गया वैसा पश्चिम में नहीं हो सका है। पश्चिम में केवल भौतिक प्रगति पर ही बल दिया गया है। पूरे विश्व में आज सर्वाधिक विकसित राष्ट्र अमेरिका को माना जाता है। अमेरिका में नागरिकों की भौतिक प्रगति तो बहुत हो गई है, परंतु अमेरिका के नागरिकों में सुख, संतोष और समाधान का पूर्णतया अभाव है। अमेरिका में व्यक्ति के जीवन में परस्पर विरोध, असमाधान, असंतोष, सर्वाधिक अपराध और आत्महत्याएं बहुत बड़ी मात्रा में व्याप्त हैं। अमेरिकी नागरिकों में तीव्र रक्तचाप, हृदय रोग एवं अपराध की प्रवृत्ति बहुत अधिक मात्रा में पाई जा रही है। पूरे विश्व को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला अमेरिका अपने नागरिकों के लिए भौतिक समाधान से आगे बढ़कर मानसिक समाधान प्राप्त नहीं कर सका है। इस धरा पर जन्म लेने के बाद प्रत्येक व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य आखिर है क्या? सम्भवतः सुख जो चिरंतन एवं घनीभूत हो। इतनी भौतिक प्रगति करने के बाद भी अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के नागरिकों में समाधान व सुख का अभाव है। ईसा ने कहा था कि ‘सम्पूर्ण संसार का साम्राज्य भी प्राप्त कर लिया और यदि आत्मा का सुख खो दिया तो उससे क्या लाभ?’ भारत में छोटी से छोटी इकाई व्यक्ति संगठित और एकात्म है एवं व्यक्ति को खंडो में विभक्त समझने की बुद्धिमता प्रदर्शित नहीं की गई है। परंतु, अमेरिका के एक मनोवैज्ञानिक ने वर्णन किया है कि ‘सड़कों पर एक ऐसी बड़ी भीड़ हमेशा लगी रहती है जो आत्मविहीन, मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ, एक दूसरे से अपरिचित और निःसंग स्थिति में है। उनका अपने ही साथ समन्वय नहीं तो दुनिया के साथ क्या होगा? व्यक्ति का समाज के साथ समन्वय नहीं। व्यक्ति भी संगठित और एकात्म इकाई नहीं। केवल भौतिक स्तर पर विचार करने के कारण वहां व्यक्ति को भौतिक एवं आर्थिक प्राणी माना गया है। यदि भौतिक आर्थिक उत्कर्ष मानव को मिले तो उससे सुख की प्राप्ति होगी, यह माना गया। किंतु भौतिक आर्थिक उत्कर्ष की चरम सीमा होने पर भी सुख का अभाव है और इसका कारण यही है कि वहां खंड खंड में विचार करने की प्रणाली है, जिसमें व्यक्ति को केवल भौतिक आर्थिक प्राणी मान लिया गया है और व्यक्ति के सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर संगठित एवं एकात्म रूप में विचार नहीं किया गया है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में यह माना गया है कि मनुष्य एक आर्थिक प्राणी भी है एवं ‘आहार, निद्रा, भय, मैथुन, आर्थिक आवश्यकताओं, आदि’ की तृप्ति की बात भारत में भी कही गई है। इन जरूरतों की पूर्ति होना चाहिए, इस तथ्य को भी स्वीकार किया गया है। किंतु भारत में मनुष्य को आर्थिक प्राणी से कुछ ऊपर भी माना गया है। मनुष्य आर्थिक प्राणी के साथ साथ वह एक शरीरधारी, मनोवौज्ञानिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक प्राणी भी है। भारतीय मनुष्य के व्यक्तित्व के अनेकानेक पहलू है। अतः यदि सम्पूर्ण व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का संगठित और एकात्म रूप से विचार नहीं हुआ तो उसको सुख समाधान की अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए भारत में इस दृष्टि से संगठित एवं एकात्म स्वरूप का विचार हुआ है। मनुष्य की आर्थिक एवं भौतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर यह कहा गया है कि इन वासनाओं की तृप्ति होनी चाहिए लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि इन आवश्यकताओं पर कुछ वांछनीय मर्यादा होना भी आवश्यक है। गीता के तृतीय अध्याय के 42वें श्लोक में कहा गया है कि इंद्रियां (विषयों से) ऊपर स्थित हैं, इंद्रियों से मन उत्कृष्ट है। बुद्धि मन से भी ऊपर अवस्थित है, जो बुद्धि की अपेक्षा भी उत्कृष्ट है और उससे भी अगम्य है – वही आत्मा है। अतः काम को स्वीकार करने के उपरांत भी उसे अनियत्रिंत नहीं रहने दिया गया है। काम की पूर्ति धर्म के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए, ऐसा भारतीय शास्त्रों में कहा गया है। प्राचीन भारत में अर्थ के महत्व को भी स्वीकार किया गया है एवं अर्थशास्त्र की रचना भी हुई है। यह माना जाता रहा है कि राज्य के समस्त नागरिकों की भौतिक आवश्यकताओं की पर्याप्त पूर्ति होनी चाहिए ताकि इसके अभाव में अपना पेट पालने के लिए व्यक्ति को 24 घंटे चिंता करने की आवश्यकता नहीं पड़े। राज्य के नागरिकों को पर्याप्त अवकाश मिल सके, जिससे वह संस्कृति, कला, साहित्य और भगवान आदि के बारे में चिन्तनशील हो सके। इस प्रकार अर्थ और काम को मान्यता देकर साथ ही यह भी कहा गया है कि एक व्यक्ति का अर्थ और काम उसके विनाश का अथवा समाज के विघटन का कारण न बने। इस दृष्टि से भारत के प्राचीन दृष्टाओं ने विशिष्ट दर्शन दिया था। उसमें विश्व की धारणा के लिए शाश्वत नियम और सार्वजनिक नियम देखे थे, उनका दर्शन किया था। व्यक्ति को विनाश से बचाने के लिए, समाज को विघटन से बचाने के लिए एवं व्यक्ति के परम उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक एवं सार्वदेशिक नियमों के प्रकाश में जो अवस्था उन्होंने बनायी उसके समुच्चय को धर्म कहा गया। इस धर्म के अंतर्गत अर्थ और काम की पूर्ति का भी विचार हुआ। साथ ही, प्रत्येक व्यक्ति परम सुख यानी मोक्ष प्राप्त कर सके, इसका चिंतन भी हुआ। इस प्रकार धर्म और मोक्ष के मध्य अर्थ और काम को रखते हुए चतुर्विध पुरुषार्थ की कल्पना भारत में ही की गई है। इस समन्वयात्मक, संगठित और एकात्मवादी कल्पना में व्यक्ति का व्यक्तित्व विभक्त्त नहीं हुआ। यह आत्मविहीन एवं मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ प्राणी न बन सका। इस चतुर्विध पुरुषार्थ ने प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक बौद्धिक क्षमताओं के अनुसार अपना जीवनादर्शन चुनने का अवसर दे दिया और साथ ही व्यक्तित्व को अखंड बनाए रखा। यह स्मरण रखना चाहिए कि जहां व्यक्ति के व्यक्तित्व रूपी विभिन्न पहलू संगठित नहीं है या व्यक्ति संगठित नहीं है, वहां समाज संगठित कैसे हो सकता है? इस संगठित आधार पर ही भारत में व्यक्ति से परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता और चराचर सृष्टि का विचार किया गया। एकात्म मानवदर्शन इसी का नाम है और आज भारत में आर्थिक विकास को एकात्म मानववाद के सिद्धांत का अनुपालन करते हुए ही गति दी जानी चाहिए। Read more » भारत में एकात्म मानववाद