राजनीति क्या राजनीति विपक्ष विहीन हो रही है? October 17, 2019 / October 17, 2019 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ः ललित गर्ग :- महाराष्ट्र एवं हरियाणा के विधानसभा चुनाव के परिदृश्यों को देखते हुए एक ज्वलंत प्रश्न उभर के सामने आया है कि क्या भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन हो गई है? क्या विपक्ष राजनीति ही नहीं, नीति विहीन भी हो गया है? यही कारण है कि आजादी के बाद के राजनीतिक सफर में विपक्ष […] Read more » oppositionless politics in india राजनीति विपक्ष विहीन
राजनीति शख्सियत एकीकृत भारत की प्रबल आवाज़ थे ‘सीमांत गाँधी ‘ October 17, 2019 / October 17, 2019 by निर्मल रानी | Leave a Comment निर्मल रानी भारतवर्ष में आज़ादी के 72 वर्षों बाद आज एक बार फिर भारत के हिन्दू राष्ट्र होने और 1947 में मुहम्मद अली जिन्नाह की मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तुत ‘द्वि राष्ट्’ के सिद्धांत को अमल में लाए जाने की बात पुरज़ोर तरीक़े से की जाने लगी है। इस विभाजनकारी राजनैतिक वातावरण के मध्य एक बार फिर स्वतंत्रता आंदोलन के उन महान नेताओं को याद किया जाना ज़रूरी हो गया है जो जिन्नाह के धर्म आधारित द्वि राष्ट्र के सिद्धांत के विरुद्ध एकीकृत भारत अथवा अविभाजित भारत की अवधारणा के अलम्बरदार थे। निश्चित रूप से उन महापुरुषों में जहाँ पहला नाम महात्मा गाँधी का था वहीँ भारत के पश्चिमी भाग से दूसरा नाम ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ां का भी था। ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ां का जन्म 6 फ़रवरी 1890 को चरसद्दा, ख़ईबर, पख़्तूनख़्वा,पेशावर जो कि वर्तमान में पाकिस्तान क्षेत्र का हिस्सा है,में हुआ था। पख़्तूनी पठान परिवार के ग़फ़्फ़ार ख़ां पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ते थे,हर समय पाक-ो-पाकीज़ा रहते थे तथा क़ुरान शरीफ़ का नियमित अध्ययन भी करते थे। उनकी इसी सच्ची धार्मिक प्रवृति ने ही उन्हें सच्चा मानव प्रेमी,सच्चा देशभक्त तथा अहिंसा का पालन करने वाला बना दिया था। जबकि स्वभावतः पठान क़ौम की गिनती मार्शल व लड़ाकू क़ौमों में की जाती है। परन्तु ग़फ़्फ़ार ख़ां ने हमेशा सत्य व अहिंसा का परचम बुलंद रखा। महात्मा गाँधी से उनकी घनिष्ठ मित्रता का आधार ही दोनों की वैचारिक एकता ही थी। दोनों ही नेता अथवा महापुरुष अंग्रेज़ों से अहिंसक तरीक़े से लड़ाई लड़ने के पक्षधर थे यानि सत्य-अहिंसा ही दोनों का सर्वप्रिय ‘शस्त्र’ था। और दूसरे यह की दोनों ही नेता धर्म के नाम पर भारत के विभाजन के प्रबल विरोधी थे।अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान ने जिन्नाह की ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की अलग पाकिस्तान की मांग का विरोध किया था और जब कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मांग को स्वीकार कर लिया तो ग़फ़्फ़ार ख़ां ने दुख भरे लहजे में कहा था कि – ‘आपने तो हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया है। जब उन्होंने देखा कि अंग्रेज़ भारत को विभाजित करने की अपनी चाल में कामयाब हो ही जाएंगे तब उन्होंने ‘ जून 1947 में पख़्तूनी स्वयंसेवी संगठन खुदाई ख़िदमतगार की ओर से एक ‘बन्नू रेजोल्यूशन’ पेश किया जिसमें मांग की गई कि पाकिस्तान के साथ मिलाए जाने के बजाय पख़तूनों के लिए अलग देश पख़तूनिस्तान बनाया जाए। हालांकि अंग्रेज़ों ने उनकी इस मांग को ख़ारिज कर दिया। इसी से ज़ाहिर होता है कि वे धर्म के नाम पर पाकिस्तान के गठन के कितने विरोधी थे। ग़फ़्फ़ार ख़ां को सीमांत गाँधी,फ़्रंटियर गांधी,बादशाह ख़ान और बाचा ख़ान जैसे कई नामों से याद किया गया। उनके नाम के साथ गांधी शब्द केवल इसलिए लगाया गया क्योंकि वे न केवल गांधीवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे बल्कि वे अपने जीवन में स्वयं गाँधी को ही आत्मसात भी करते थे। कहा जा सकता है कि वे गाँधी को केवल मानते ही नहीं बल्कि जीते भी थे। वर्ष 1987 में पहली बार भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्राप्त करने वाले शख़्स ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान,ही थे। बादशाह ख़ानहालाँकि दस्तावेज़ी तौर पर पाकिस्तानी नागरिक ज़रूर थे लेकिन भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान से इसीलिए नवाज़ा क्योंकि वे इसके वास्तविक हक़दार थे। दस्तावेज़ों में ग़ैर-हिंदुस्तानी होने के बावजूद वे दिल ो जान से सच्चे हिंदुस्तानी थे।अंग्रेज़ी हुकूमत महात्मा गांधीको ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को एक साथ नहीं देखना चाहती थी। इसी साज़िश के तहत अंग्रेज़ों ने ग़फ़्फ़ार ख़ान पर झूठे मुक़दमे लगाकर उन्हें कई बार जेल भेजने की साज़िशें कीं। परन्तु वे इतने लोकप्रिय थे कि अदालत में उनके विरुद्ध पेश होने के लिए कभी कोई गवाह न मिलता।1929 में ग़फ़्फ़ार ख़ां ने अपने चंद सहयोगियों को साथ लेकर एक संगठन तैय्यार किया जिसका नाम था खुदाई ख़िदमतगार। ’खुदाई ख़िदमतगारका अर्थ है ईश्वर की रची गई सृष्टि का सेवादार। खुदाई ख़िदमतगार भी गाँधी जी की ही तरह अंग्रेज़ों के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता और एकता के लिएअहिंसात्मक रूप से आंदोलनरत थे।दरअसल अंग्रेज़ हिंसक होने वाले स्वतंत्रता संबंधी आन्दोलनों को तो अपनी ताक़त से कुचल देते थे परन्तु वे सत्याग्रह,भूख हड़ताल,असहयोग जैसे शांतप्रिय व अहिंसक आन्दोलनों से घबरा जाते थे। सेवाग्राम में एक कार्यक्रम में 16 जुलाई, 1940 को महात्मा गांधी ने कहा था – ‘ख़ान साहब पठान हैं. पठानों के लिए तो कहा जा सकता है कि वे तलवार-बंदूक़ साथ ही लेकर जन्म लेते हैं….पठानों में दुश्मनी निकालने का रिवाज इतना कठोर है कि यदि किसी एक परिजन का ख़ून हुआ हो तो उसका बदला लेना अनिवार्य हो जाता है. एक बार बदला लिया कि फिर दूसरे पक्ष को उस ख़ून का बदला लेना पड़ता है. इस प्रकार बदला पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में मिलता है और बैर का अंत ही नहीं आता. यह हुई हिंसा की पराकाष्ठा, साथ ही हिंसा का दिवालियापन. क्योंकि इस प्रकार बदला लेते-लेते परिवारों का नाश हो जाता था।’ ख़ान साहब ने पठानों का ऐसा नाश होते देखा. इसलिए उन्होंने समझ लिया कि पठानों का उद्धार अहिंसा में ही है. उन्होंने सोचा ‘अगर मैं अपने लोगों को सिखा सकूं कि हमें ख़ून का बदला बिल्कुल नहीं लेना है, बल्कि ख़ून को भूल जाना है, तो बैर की यह परंपरा समाप्त हो जाएगी और हम जीवित रह सकेंगे.’ यह सौदा नक़द का था. उनके अनुयायियों ने उसे अंगीकार किया, और आज ऐसे ख़िदमतगार देखने में आते हैं जो बदला लेना भूल गए हैं. इसे कहते हैं बहादुर की अहिंसा या सच्ची अहिंसा.’। लेकिन इन सबके बावज़ूद ब्रिटिश सरकार पठानों से ही सबसे ज़्यादा भय खाती थी। ख़ुदाई ख़िदमतगार जैसे अहिंसक संगठनों पर भी अंग्रेज़ों ने कई बार क़हर बरपाया। ग़फ़्फ़ार ख़ान को अंग्रेज़ हमेशा संदेह की दृष्टि से देखते रहे. लेकिन 1939 में म्यूरियल लेस्टर नाम की एक ब्रिटिश शांतिवादी ने जब फ़्रंटियर का दौरा किया, तो वह बादशाह ख़ान के अहिंसक व्यक्तित्व से इस क़द्र प्रभावित हो गईं कि उन्होंने महात्मा गांधी को चिट्ठी में लिखा-‘ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को अब भली-भांति जान लेने के बाद मैं ऐसा महसूस करती हूं कि जहां तक दुनिया भर में अद्भुत व्यक्तियों से मिलने का सवाल है, इस तरह का सौभाग्य मुझे अपने जीवन में शायद कोई और नहीं मिलने वाला है. वे ‘न्यू टेस्टामेंट’ की सौम्यता से युक्त, ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ के राजकुमार हैं. वे कितने भगवत्परायण हैं! आपने उनसे हमारा परिचय कराया, इसके लिए मैं आपकी आभारी हूं.’ बाद में इस पत्र के हवाले से बादशाह ख़ान के प्रति ब्रिटिश हुकूमत के नज़रिए की आलोचना करते हुए 28 जनवरी, 1939 के ‘हरिजन’ में महात्मा गांधी ने लिखा – ‘…फिर भी अंग्रेज़ अधिकारियों के लिए इस व्यक्ति का कोई उपयोग नहीं है. वे इससे डरते हैं और इस पर अविश्वास करते हैं. यह अविश्वास वैसे मुझे बुरा न लगता, पर इससे प्रगति में बाधा पड़ती है. इससे भारत और इंग्लैंड की हानि होती है और इस तरह विश्व की भी होती है।’ दंगों के दौरान बिहार में जब गांधी घूम-घूमकर शांति स्थापित करने के प्रयासों में लगे थे, उस समय भी बादशाह ख़ान छाया की तरह गाँधी के साथ रहा करते थे। पटना में 12 मार्च, 1947 को एक सभा में गांधी ने ख़ान साहब की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘बादशाह ख़ान मेरे पीछे बैठे हैं. वे तबीयत से फ़क़ीर हैं, लेकिन लोग उन्हें मुहब्बत से बादशाह कहते हैं, क्योंकि वे सरहद के लोगों के दिलों पर अपनी मुहब्बत से हुकूमत करते हैं. वे उस कौम में पैदा हुए हैं जिसमें तलवार का जवाब तलवार से देने का रिवाज है. जहां ख़ानदानी लड़ाई और बदले का सिलसिला कई पुश्तों तक चलता है. लेकिन बादशाह ख़ान अहिंसा में पूरा विश्वास रखते हैं. मैंने उनसे पूछा कि आप तो तलवार के धनी हैं, आप यहां कैसे आए? उन्होंने बताया कि हमने देखा हम अहिंसा के ज़रिए ही अपने मुल्क को आज़ाद करा सकते हैं. और अगर पठानों ने ख़ून का बदला ख़ून की पॉलिसी को न छोड़ा और अहिंसा को न अपनाया तो वे ख़ुद आपस में लड़कर तबाह हो जाएंगे. जब उन्होंने अहिंसा की राह अपनाई, तब उन्होंने अनुभव किया कि पठान जनजातियों के जीवन में एक प्रकार का परिवर्तन हो रहा है।’बादशाह ख़ान का जीवन आतंकवाद व हिंसा में लिप्त उन मुसलमानों के लिए भी एक आदर्श है और उन हिंदूवादियों के लिए भी जो द्विराष्ट् के जिन्नाह के सिद्धांत के आधार पर समूचे भारतीय मुसलमानों पर सवाल खड़ा करते हैं। ‘बादशाह ख़ान,अबुल कलम आज़ाद,रफ़ी अहमद क़िदवई,तय्यब जी,आसिफ़ अली,मोहम्मद यूनुस,ज़ाकिर हुसैन,जैसे सैकड़ों वरिष्ठ मुस्लिम नेता थे जो पाकिस्तान के गठन का विरोध व संयुक्त भारत की कल्पना करते थे मगर अंग्रेज़ों ने कट्टरपंथियों के विचारों का साथ देकर बांटो और राज करो की अपनी चिर परिचित नीति अपनाकर भारत का विभाजन करा दिया। सीमान्त गाँधी किसी धर्म के नहीं बल्कि मानवता के सच्चे हितैषी व नायक थे और एकीकृत भारत की प्रबल आवाज़ भी थे। Read more » ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ां सीमांत गाँधी
राजनीति संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या पर बौद्धिक वर्ग मौन क्यों October 16, 2019 / October 16, 2019 by इंद्रभूषण मिश्र | Leave a Comment देश में आज बौद्धिक विमर्श घहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। अब सेलेक्टिव होकर मुद्दें और विमर्श के विषय तय किए जा रहे हैं। तरह- तरह के प्रायोजित शब्द और परिभाषाएं गढ़ी जा रही है। कभी असहिष्णुता तो कभी भय का वातावरण तैयार कर राजनीतिक प्रोपेगेंडा को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिन […] Read more » death of sangh karyakarta in bengal murshidabad death row संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या
राजनीति हिंसा से बढ़ता सामाजिक अलगाव एवं अकेलापन October 16, 2019 / October 16, 2019 by ललित गर्ग | Leave a Comment ललित गर्ग आज देश ही नहीं, दुनिया में हिंसा, युद्ध एवं आक्रामकता का बोलबाला है। जब इस तरह की अमानवीय एवं क्रूर स्थितियां समग्रता से होती है तो उसका समाधान भी समग्रता से ही खोजना पड़ता है। हिंसक परिस्थितियां एवं मानसिकताएं जब प्रबल हैं तो अहिंसा का मूल्य स्वयं बढ़ जाता है। हिंसा किसी भी […] Read more » अकेलापन हिंसा हिंसा से बढ़ता सामाजिक अलगाव
राजनीति शख्सियत समाज हिंदूराष्ट्र स्वप्नद्रष्टा : बंदा वीर बैरागी October 16, 2019 / October 16, 2019 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment अध्याय —– 5 बंदा वीर बैरागी के जन्म काल की परिस्थितियां आदि शंकराचार्य नित्य प्रति की भांति स्नान के लिए गंगा की ओर उस दिन भी जा रहे थे। रास्ते में एक चांडाल अपने चार कुत्तों के साथ उनका मार्ग घेरे हुए खड़ा था । उस चांडाल को देखते ही शंकराचार्य ने दूर से ही […] Read more » Banda veer bairagi बंदा वीर बैरागी
राजनीति महाराष्ट्र एवं हरियाणा में मतदाता जागे October 16, 2019 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ललित गर्ग-देेश में फिर चुनाव का माहौल है, दो राज्यों महाराष्ट्र व हरियाणा की विधानसभाओं लिए चुनाव होने वाले हैं। मतदान में ज्यादा समय नहीं बचा है। इस परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग से चुनावों की तैयारियों में जुट गये हैं। गठबंधनों की बातें भी हो रही, सत्ताधारी पार्टी भाजपा और विपक्षी पार्टी कांग्रेस […] Read more » assembly elections in Haryana and Maharashtra voters in haryana voters in maharashtra
राजनीति विकसित भारत का बीज बच्चों की बेहतर शिक्षा और सपने October 14, 2019 / October 14, 2019 by आनंद जोनवार | Leave a Comment आनंद जोनवार डॉक्टर कलाम जी भविष्य के नागरिकों के रूप में बच्चों से बहुत प्रेम करते। बच्चों तथा युवाओं से डॉक्टर कलाम की लय पूरी तरह मिलती । एक विकसित भारत का सपना डॉक्टर कलाम का पर्यायवाची बन गया जो गरीबी अशिक्षा तथा बेरोजगारी से मुक्त हो और आर्थिक समृद्धि राष्ट्र सुरक्षा तथा आंतरिक सद्भावना […] Read more » डॉक्टर कलाम
महत्वपूर्ण लेख राजनीति शख्सियत हिंदू राष्ट्र स्वप्नदृष्टा : बंदा वीर बैरागी October 14, 2019 / October 14, 2019 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment अध्याय —- 4 गुरु गोविंद सिंह जी और उनके सुपुत्रों का बलिदान पंजाब में सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के काल में ही हमारे चरितनायक बंदा वीर बैरागी जी का उद्भव हुआ । यही वह काल था जब परिस्थितियों ने एक संन्यासी को भी राष्ट्र के कार्य के लिए उठा लिया और उससे […] Read more » बंदा वीर बैरागी
राजनीति गौ रक्षा पर भारत के प्रधानमंत्री के नाम पत्र October 14, 2019 / October 14, 2019 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment प्रतिष्ठा मेंश्रीमान नरेंद्र मोदी जीप्रधानमंत्री भारत सरकार नई दिल्ली महोदय सादर प्रणाम ।एक समाचार के अनुसार राजस्थान की पथमेड़ा गौशाला में इस समय 135 से ₹140 किलो गौमूत्र बेचा जा रहा है । जिससे किसानों को बड़ा लाभ पहुंच रहा है और उनकी आर्थिक स्थिति सुधरती जा रही है। समाचार में कहा गया है कि […] Read more » गौ रक्षा पर भारत के प्रधानमंत्री के नाम पत्र
राजनीति शख्सियत महान कलाम तुझे सलाम October 14, 2019 / October 14, 2019 by सज्जाद हैदर | Leave a Comment भारत के इतिहास में सोने के अक्षरों में अंकित एक ऐसा व्यक्ति जन्म लेता है जोकि बेहद गरीब परिवार में अपनी आँखें खोलता है जिसे दो जून की रोटी भी खाने को नसीब नहीं होती। इस विक्राल परिस्थिति में जन्मे हुए बच्चे ने संघर्ष करना शुरू किया और कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक […] Read more » Kalam कलाम
राजनीति गुजरात का आदिवासी नाराज क्यों? October 14, 2019 / October 14, 2019 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ः ललित गर्ग:-प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आदिवासी एवं जनजातीय लोगों के कल्याण एवं उन्हें राष्ट्रीय मूलधारा से जोड़ने के अपने संकल्प को लेकर अपनी प्रतिबद्धता को बार-बार दोहराते रहते हैं, दूसरी ओर उन्हीं के गृहराज्य गुजरात के आदिवासी अपने अस्तित्व एवं अस्मिता को लेकर बार-बार आन्दोलनरत होने को विवश हो रहे हैं। जब तक यह […] Read more » aadiwasis of gujarat role of gujarati aadiwasi in pilitics गुजरात का आदिवासी
राजनीति राजमाता सिंधिया को सतही औऱ सरकारी आवरण से हटकर जानने की जरूरत है October 13, 2019 / October 13, 2019 by डॉ अजय खेमरिया | Leave a Comment जयविलास महल में भी विश्वविद्यालय खोलना चाहती थी राजमाता डॉ अजय खेमरिया ग्वालियर के जिस जयविलास पैलेस को लोग दुनियाभर से देखने आते है उसे राजमाता विजयाराजे सिंधिया जीवाजी विश्वविद्यालय को दान करना चाहती थी ताकि ग्वालियर रियासत के बच्चों को बेहतर उच्च शिक्षा मुहैया हो सके।जय विलास महल दुनिया के सबसे महंगे और आकर्षक […] Read more »