राजनीति संसदीय हंगामा-सबके लिए आत्मचिंतन का विषय February 16, 2026 / February 16, 2026 by राजेश कुमार पासी | Leave a Comment राजेश कुमार पासी 4 और 5 फरवरी को संसद में जो कुछ हुआ है, वो बहुत शर्मनाक है । ऐसा लगता है कि लगातार तीन लोकसभा चुनावों में हार के बाद विपक्ष बौखला गया है, इसलिए संसद में अराजकता पैदा करके सरकार को परेशान करना चाहता है । संसदीय लोकतंत्र में संसद चलाना सरकार की जिम्मेदारी मानी जाती है, लेकिन विपक्ष के सहयोग के बिना यह संभव नहीं है। विपक्ष पूरी जिम्मेदारी सरकार पर डालकर, संसद में अराजकता फैला रहा है। विपक्ष के हंगामे के कारण प्रधानमंत्री मोदी दूसरे दिन भी राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब नहीं दे सके, जिसके कारण यह प्रस्ताव उनके जवाब के बिना ही पास कर दिया गया । 2004 के बाद भारत के संसदीय इतिहास में यह दूसरी बार हुआ है कि भारत के प्रधानमंत्री को संसद में बोलने ही नहीं दिया गया । यह संसदीय परंपरा है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री के जवाब के बाद ही यह प्रस्ताव पारित किया जाता है । परंपरा का टूटना संसदीय गरिमा का गिरना है और इसके बाद सत्तापक्ष और विपक्ष में कटुता पैदा होने वाली है । इस घटना के बाद विपक्ष पर इसका कोई असर होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है । राज्यसभा में जब प्रधानमंत्री मोदी धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब दे रहे थे, तो विपक्षी दलों द्वारा हंगामा किया गया और इसके बाद विपक्ष ने प्रधानमंत्री के भाषण का बहिष्कार करते हुए संसद छोड़ दी । सवाल यह है कि इससे विपक्ष को क्या हासिल हुआ । जो बात प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कहनी थी, वो बात उन्होंने राज्यसभा में कह दी । प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लोकसभा में जवाब न देने पर विपक्ष ने कहा कि मोदी डरकर भाग गए हैं, लेकिन राज्यसभा में उनके भाषण के दौरान विपक्ष ही सदन छोड़कर भाग गया । विपक्ष को सदन में बैठकर प्रधानमंत्री के जवाब को सुनना चाहिए । इसके बाद ही विपक्ष का हक बनता है कि वो कहे कि मोदी ने उनके सवालों का जवाब नहीं दिया । इस बार सत्र की शुरूआत से ही संसद में जैसे दृश्य देखने को मिले हैं, उससे संसद की गरिमा के गिरते स्तर का अंदाजा लगाया जा सकता है । संसदीय इतिहास में पहली बार है कि लोकसभा स्पीकर द्वारा संसद में प्रधानमंत्री पर विपक्षी सांसदों के हमले की आशंका जताई गई है । स्पीकर ओम बिरला का यह कहना कि उन्हें सूचना मिली थी कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती है, बहुत गंभीर बात है। विपक्ष की महिलाओं का प्रधानमंत्री मोदी की सीट को घेर लेना बता रहा है कि लोकसभा अध्यक्ष की आशंका पूरी तरह गलत नहीं थी। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उनकी बात से पीएम मोदी सहमत हो गए और संसद में नहीं आये। सवाल यह है कि ये प्रत्याशित घटना क्या हो सकती थी और इससे भारतीय संसद पर कितना बड़ा कलंक लग सकता था। जो हो नहीं हो पाया, लेकिन करने की कोशिश की गई, उसे ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता। अगर किसी दुर्घटना को होने से रोक दिया जाए तो भी अपराधी को ऐसे ही नहीं छोड़ा जा सकता। लोकसभा में सबसे बड़ा नेता स्पीकर होता है और लोकसभा का पूरा प्रशासन उसके अधीन आता है । सवाल यह है कि स्पीकर महोदय ने प्रधानमंत्री को संसद में आने से क्यों रोक दिया । क्या वो इस हमले को रोकने का इंतजाम नहीं कर सकते थे । इस काम के लिए उनके पास कर्मचारी हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री की सुरक्षा में तैनात किया जा सकता था । दूसरी बात यह है कि जिन सांसदों द्वारा पीएम मोदी पर हमले की आशंका थी, उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की गई । कुछ सांसदों के हमले की आशंका के कारण प्रधानमंत्री का सदन में नहीं आना, बेहर गंभीर घटना है । पीएम मोदी को रोककर लोकसभा अध्यक्ष ने अपनी कमजोरी जाहिर की है, उन्हें पीएम को रोकने की जगह, आक्रमणकारी सांसदों का इंतजाम करना चाहिए था । संसद में इतनी बड़ी साजिश करने वाले सांसद खुलेआम घूम रहे हैं, ये लोकतंत्र और संविधान के लिए सही नहीं है । प्रधानमंत्री पर हमले के लिए महिला सांसदों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझ कर किया गया है । विशेष रूप से दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं का इस्तेमाल करने की कोशिश बताती है कि साजिश बहुत गहरी थी । यह साजिश देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान के खिलाफ है । ऐसा लगता है कि विपक्ष इस देश की संवैधानिक व्यवस्था से तंग आ गया है, क्योंकि वो अब अपने लिए बेहद सीमित अवसर देख रहा है । लगातार हार के बाद कांग्रेस केन्द्र की सत्ता में आने की उम्मीद खो चुकी है । राहुल गांधी के नेतृत्व में तो वो कभी पूर्ण बहुमत के साथ केन्द्र की सत्ता में आ भी नहीं सकती, इसलिए बौखलाहट में वो कुछ भी करने को तैयार दिखाई दे रही है । ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी पर हमले के बाद भाजपा सांसदों की प्रतिक्रिया को देखते हुए साजिश रची गई है । साजिशकर्ता जानते थे कि अगर विपक्षी सांसदों ने मोदी पर हमला किया तो भाजपा सांसद चुपचाप तमाशा नहीं देखेंगे, बल्कि बिना देर किए जवाबी हमला कर देंगे । इस हमले के बाद दोनों पक्षों के सांसदों में भंयकर हाथापाई हो सकती थी । सदन में भाजपा सांसदों की संख्या और प्रधानमंत्री की सीट से नजदीकी होने के कारण जवाबी हमला बहुत जल्दी और बड़ा हो सकता था । साजिशकर्ताओं द्वारा इस हमले के लिए दलित और पिछड़े वर्ग की महिला सांसदों का इस्तेमाल करने के पीछे की मंशा विक्टिम कार्ड खेलना हो सकता है । अगर महिला सांसदों को चोट लगती तो विपक्ष यह विमर्श चलाता कि भाजपा दलित और पिछड़ा विरोधी है, जो सांसदों तक को पीट देती है, आम लोगों का क्या होगा । कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री महिलाओं से डर गए और संसद में नहीं आए । उनके पास जेड प्लस सुरक्षा है, लेकिन वो महिला सांसदों से डर गए । ऐसा लगता है कि विपक्ष इस घटना की गंभीरता को समझ नहीं रहा है, लेकिन परेशानी यह है कि एनडीए सरकार भी इसे हल्के में ले रही है । यह बहुत गंभीर घटना है, लेकिन मीडिया ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया है । जिस साजिश के कारण प्रधानमंत्री मोदी सदन में नहीं आए, उस साजिश की गंभीरता कम कैसे हो सकती है । स्पीकर साजिश को जानते हुए भी साजिश को रोक नहीं पाए, बल्कि प्रधानमंत्री को ही रोक दिया, ये प्रशासन की नाकामी है । प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में उनकी सीट को घेरने वाली महिला सांसदों पर कोई कार्यवाही नहीं की गई, जबकि वो साजिश का अहम हिस्सा थीं । सवाल यह है कि क्या इन्हीं महिला सांसदों का इस्तेमाल मोदी पर हमले के लिए किया जाना था । संसद में दोनों पक्षों के बैठने की अलग-अलग व्यवस्था है, अपनी जगह से उठकर सत्ताधारी दल के हिस्से में पहुंचकर प्रधानमंत्री की सीट को घेरना क्या सामान्य घटना है । सवाल यह है कि अगर प्रधानमंत्री के आने के बाद यह घेराव किया जाता तो क्या होता । दूसरा सवाल यह है कि उनकी अनुपस्थिति में सीट घेरने की क्या जरूरत थी, ऐसा लगता है कि यह एक रिहर्सल थी । प्रियंका गांधी ने कहा कि अगर महिला सांसद प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गई तो क्या हो गया, इसमें डरने वाली क्या बात है । इसका मतलब है कि वो साजिश को जानती थी । इसके अलावा कौन-कौन जानता था कि ऐसी घटना होने वाली है। ये देश विधानसभाओं में ऐसे दृश्य देख चुका है, जिसमें विधायकों ने एक दूसरे पर हमले किये थे। इन घटनाओं में विधायकों की आपसी हाथापाई देखी गई है, इसके अलावा एक दूसरे पर कुर्सी, माइक, जूता-चप्पल और दूसरे सामान फेंकने की भी घटनाएं सामने आई हैं। हमने लहूलुहान विधायकों की तस्वीरें देखी हैं । प्रधानमंत्री पर विपक्षी सांसदों के हमले के बाद संसद से भी ऐसी शर्मनाक तस्वीरें सामने आ सकती थी। दुनिया की तीसरी आर्थिक और सैन्य शक्ति बनने की ओर अग्रसर लोकतांत्रिक भारत की ऐसी तस्वीरों की पूरी दुनिया में चर्चा होती । लोकतांत्रिक व्यवस्था का बड़ा सच यह है कि कोई भी दल हमेशा सत्ता में नहीं रहता, देर-सवेर विपक्ष को भी सरकार में आने का मौका मिल जाता है। जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई तो भाजपा भी एक दिन सत्ता से बाहर हो जाएगी। पीएम ने सदन में न आकर संभावित झगड़े से सदन को बचा लिया और देश शर्मिंदा होने से बच गया । अगर पीएम सदन में सुरक्षित नहीं है तो बेहद गंभीर बात है । सदन की सुरक्षा व्यवस्था स्पीकर के अधीन है, वो ही इसके लिए जिम्मेदार हैं । सांसद बेहद सम्मानित पद होता है, जो लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी सांसद को दलगत हित के साथ-साथ देशहित भी देखना चाहिए। संसद में हंगामा करना ही सांसदों का काम नहीं है, बल्कि अपने लोगों की समस्याओं को देश के सामने रखना है, ताकि सरकार उनका समाधान कर सके । संसद को युद्ध का मैदान नहीं बनाया जाना चाहिए । सांसद एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन एक दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। आज जिस घटना को रोक दिया गया है, उसके दोबारा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि अगली बार ऐसी साजिश नाकाम न की जा सके और ये महान देश पूरी दुनिया के सामने शर्मिंदा हो जाये। इस घटना को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि साजिश दोबारा हो सकती है। इस साजिश को रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इस घटना में शामिल सांसदों के खिलाफ कार्यवाही की जाए। पिछले कुछ सालों से हमारी संसद हंगामा करने की जगह बन गई है, जिसे सिर्फ स्थगित करने की खबर आती है। अब संसद में बिना चर्चा के कानून बन रहे हैं, क्योंकि सांसदों को चर्चा करने की जगह हंगामा करने में मजा आता है। विपक्ष को यह अहसास ही नहीं है कि संसद का चलना सरकार से ज्यादा उसके लिए जरूरी है। यही वो जगह है, जहां सरकार उसको जवाब देने के लिए मजबूर है। वर्तमान राजनीति की हकीकत यह है कि विपक्ष मीडिया में सरकार से सवाल करता है और सरकार मीडिया में ही उसको जवाब दे देती है। दोनों पक्षों को आत्मचिंतन की जरूरत है कि ऐसा कब तक चलता रहेगा, क्योंकि ये देश के लिए अच्छा नहीं है। संविधान और लोकतंत्र का शोर मचाने की जगह दिल से उसे मजबूत करने की कोशिश करनी चाहिए । राजेश कुमार पासी Read more » संसदीय हंगामा
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