राजनीति

मनमोहनी बातें हैं, बातों का क्या

बार-बार ऐसी अच्छी, मीठी बातें हमारे शासक करते रहे हैं। कुछ अच्छी योजनाएं बनती भी हैं तो नेता, अफसर और ठेकेदारों की तिकड़ी उनके धन को बीच में ही निगल जाती है। भ्रष्टाचार की पतितसलिला बाकी बचा-खुचा अपने भीतर समा लेने को मुंह बाये खड़ी दिखती है। ऐसे में केवल भाषणों से आगे जाने की जरूरत है, सख्त पहल की आवश्यकता है। केवल बातों से बात बनने वाली नहीं है। ये सब अगर सिर्फ बातें हैं तो इन बातों का क्या?

राष्ट्रीय मीडिया में “देशद्रोही” भरे पड़े हैं… सन्दर्भ – कश्मीर स्वायत्तता प्रस्ताव

कैसी स्वायत्तता चाहिये उन्हें? क्या स्वायत्तता का मतलब यही है कि भारत उन लोगों को अपने आर्थिक संसाधनों से पाले-पोसे, वहाँ बिजली परियोजनाएं लगाये, बाँध बनाये… यहाँ तक कि डल झील की सफ़ाई भी केन्द्र सरकार करवाये? उनसे पूछना चाहिये कि 60 साल में भारत सरकार ने जो खरबों रुपया दिया, उसका क्या हुआ? उसके बदले में पत्थरबाजों और उनके आकाओं ने भारत को एक पैसा भी लौटाया? क्या वे सिर्फ़ फ़ोकट का खाना ही जानते हैं, चुकाना नहीं?