प्रवक्ता न्यूज़ ऋषि प्रसाद June 5, 2026 / June 5, 2026 by नन्द किशोर पौरुष | Leave a Comment हमारी प्यारी है ऋषि प्रसाद,जन जन का करती कल्याणभाव से जो इसको पढ़ते है,गुरुवर की कृपा वो पाते हैसत्य पथ के अनुगामी हो कर,माता पिता का करे सम्मानहमारी प्यारी है ऋषि प्रसाद जो पढता है ऋषि प्रसादउनके मिट जाएँ सभी विषादबापू को यह ह्रदय से प्यारीसत्संगो का भक्तो को दानहमारी प्यारी है ऋषि प्रसाद, आत्म […] Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ सोशल मीडिया, जेनजी क्रांति और “व्यवस्था परिवर्तन” का नया नैरेटिव June 1, 2026 / June 1, 2026 by गजेंद्र सिंह | Leave a Comment गजेंद्र सिंह भारत की राजनीति पिछले एक दशक में केवल चुनावी सभाओं और टीवी डिबेट तक सीमित नहीं रही। अब राजनीति का सबसे बड़ा मंच सोशल मीडिया बन चुका है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब पॉडकास्ट, वायरल क्लिप्स और डिजिटल अभियानों ने राजनीतिक संवाद की दिशा बदल दी है। आज लाखों फॉलोअर्स रखने वाले कुछ सोशल मीडिया चेहरे खुद को “नई राजनीति”, “व्यवस्था परिवर्तन” और “युवा क्रांति” का प्रतिनिधि बताने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें से कई लोग विदेशों में रहकर भारत की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं पर लगातार टिप्पणी करते हैं । वे पॉडकास्ट, वीडियो और ऑनलाइन अभियानों के माध्यम से भारत के जेन जी युवाओं को “सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने” और “सड़कों पर उतरने” के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं। लोकतंत्र में सवाल उठाना और व्यवस्था की आलोचना करना गलत नहीं है। बल्कि यह लोकतंत्र की शक्ति है लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब सामाजिक असंतोष को भावनात्मक नारों, डिजिटल ट्रेंड्स और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ मिलाकर प्रस्तुत किया जाने लगे। इनमें से कुछ चेहरे पहले भी राजनीतिक दलों के सोशल मीडिया और प्रचार अभियानों से जुड़े रहे हैं। आज वही लोग “क्रांति”, “सिस्टम परिवर्तन” और “युवा आंदोलन” के नाम पर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करते दिखाई देते हैं। विदेशी डिग्रियों, डिजिटल लोकप्रियता और लाखों फॉलोअर्स को राजनीतिक पूंजी में बदलने की यह नई शैली तेजी से बढ़ रही है। खुद को युवाओं का मार्गदर्शक, व्यवस्था परिवर्तन का नेता या सामाजिक न्याय का चेहरा बताने की कोशिश करते हैं। कभी वे खुद को पीड़ित बताते हैं, कभी दलित पहचान के माध्यम से सहानुभूति जुटाने का प्रयास करते हैं, तो कभी पूरे राजनीतिक ढांचे को भ्रष्ट और विफल घोषित कर देते हैं। यह पहली बार नहीं है जब भारत ने ऐसा नैरेटिव देखा हो। देश ने इससे पहले भी भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन का बड़ा दौर देखा था। जनलोकपाल, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, आम आदमी की राजनीति और व्यवस्था परिवर्तन जैसे नारों के साथ लाखों लोग सड़कों पर उतरे। युवाओं ने उम्मीद की कि राजनीति बदल जाएगी, शासन पारदर्शी होगा और आम नागरिक की आवाज मजबूत होगी। लेकिन समय के साथ वही आंदोलन राजनीति में बदल गया। उस आंदोलन और युवाओं की फ़ौज को राजनैतिक फायदे के लिए उपयोग लिया गया, राजनैतिक पार्टी का गठन हुआ , नेताओं पर भ्रष्टाचार, शराब नीति विवाद, आलीशान सरकारी आवास, सत्ता संघर्ष और राजनीतिक अवसरवाद जैसे आरोप लगे। कुछ नेता जेल तक पहुंचे और जो बचे, वे आपसी मतभेदों और शक्ति संघर्ष में उलझते दिखाई दिए । इस अनुभव ने देश के युवाओं के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया क्या हर आंदोलन वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन के लिए होता है, या फिर वह नई राजनीतिक जमीन तैयार करने का माध्यम बन जाता है? आज फिर सोशल मीडिया पर वही शैली नए चेहरों के साथ दिखाई दे रही है । अचानक से 10 मिलियन फॉलोअर्स की एक फ़ौज खड़ी कर दी गई है, वायरल वीडियो और ऑनलाइन क्रांति के नारों के बीच विपक्ष के कुछ नेता भी सत्ता की उम्मीद में इस ऑनलाइन क्रांति के समर्थन में जुड़ गए है। पहले राजनीति सड़कों पर संघर्ष, मेहनत और जनसेवा से थी। लोग जनता की समस्याओं के लिए कोर्ट-कचहरी और सरकारी दफ्तरों की खाक छानते थे। आज राजनीति कई लोगों के लिए एक कैरियर विकल्प बन गई है ,अच्छी नौकरी नहीं मिली तो एल्गोरिद्म, वायरल वीडियो और सोशल मीडिया के जरिए राजनीति में जगह बनाने का प्रयास शुरू हो जाता है । पहले नेताओं के पास जनसमस्याओं का जमीनी अनुभव और संघर्ष होता था, अब वातानुकूलित कमरों, विदेशी डिग्रियों, रील्स और ट्रेंडिंग हैशटैग के जरिए “लोक कल्याण” और “व्यवस्था परिवर्तन” की बातें होती हैं। पहले लोगों के दुःख में कंधे से कंधा मिलाया जाता था, अब डिजिटल मीडिया के माध्यम से गुस्से को तीव्र और वायरल बनाया जाता है। और अंतत खुद को “कॉक्रोच” और “पैरासाइट” जैसे शब्दों का उपयोग कर “क्रांतिकारी”, “व्यवस्था परिवर्तन के सैनिक” या “सिस्टम के खिलाफ लड़ने वाली पीढ़ी” कहकर संबोधित करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हर बार आंदोलन की सबसे बड़ी कीमत युवा ही क्यों चुकाएं? जब सड़कों पर प्रदर्शन होते हैं, पुलिस कार्रवाई होती है, शैक्षणिक और पेशेवर जीवन प्रभावित होता है, तब सबसे ज्यादा असर आम युवाओं पर पड़ता है। लेकिन कई बार आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग सुरक्षित स्थानों पर रहते हैं, उनके पास संसाधन, राजनीतिक संपर्क और डिजिटल प्रचार की पूरी व्यवस्था होती है । आज राजनीति का एक नया मॉडल सामने आया है डिजिटल लोकप्रियता को राजनीतिक शक्ति में बदलना । लाखों फॉलोअर्स, वायरल वीडियो, भावनात्मक भाषण और ऑनलाइन अभियानों के जरिए राजनीतिक जमीन तैयार की जाती है। जेन जी की बेचैनी, बेरोजगारी, सामाजिक असंतोष और व्यवस्था के प्रति नाराजगी को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदला जाता है । यह भी सच है कि भारत का युवा आज कई वास्तविक समस्याओं का सामना कर रहा है रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता, अवसरों की असमानता, सामाजिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण। इसलिए जब कोई व्यक्ति “व्यवस्था परिवर्तन” की बात करता है तो युवाओं का आकर्षित होना स्वाभाविक है । लेकिन किसी भी आंदोलन या नेता को केवल भावनाओं के आधार पर स्वीकार करना लोकतांत्रिक परिपक्वता नहीं कहलाता । युवाओं को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल विरोध का नाम नहीं है बल्कि जिम्मेदारी, भागीदारी और जवाबदेही का भी नाम है। किसी भी नेता, आंदोलन या डिजिटल अभियान को उसके परिणामों, पारदर्शिता, नीतियों और वास्तविक कार्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए। सोशल मीडिया आज सूचना का सबसे बड़ा माध्यम है, लेकिन वही माध्यम भ्रम, अतिशयोक्ति और भावनात्मक ध्रुवीकरण का साधन भी बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि युवा हर वायरल वीडियो, हर क्रांतिकारी भाषण और हर ऑनलाइन आंदोलन को आलोचनात्मक दृष्टि से देखें। भारत को जागरूक, विचारशील और जिम्मेदार युवाओं की आवश्यकता है ऐसे युवा जो सवाल भी पूछें और समाधान भी खोजें। देश को केवल ट्रेंड करने वाले युवा नहीं, बल्कि सोचने, समझने और निर्माण करने वाले युवा चाहिए । लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति भीड़ में नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों में होती है। गजेंद्र सिंह Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ आखिर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की गम्भीर लापरवाहियों के लिए कौन होगा जिम्मेदार? बताइए सरकार! June 1, 2026 / June 1, 2026 by कमलेश पांडेय | Leave a Comment नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की गम्भीर लापरवाहियों के लिए कौन होगा जिम्मेदार Read more » नेशनल टेस्टिंग एजेंसी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की गम्भीर लापरवाहियों के लिए कौन होगा जिम्मेदार
प्रवक्ता न्यूज़ मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग – 17 June 1, 2026 / June 1, 2026 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राज्य के नीति निदेशक तत्व और मनुस्मृति भारत के संविधान में अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक राज्य के नीति निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है। इन अनुच्छेदों के माध्यम से भारतीय संविधान में कुल 17 निदेशक तत्वों को स्थान दिया गया है। राज्य के नीति निदेशक तत्वों के विषय में हमको यह जानकारी […] Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ प्रधानमंत्री की अनुकरणीय पहल और देशवासी May 18, 2026 / May 30, 2026 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment पुरानी पीढ़ी के कितने ही लोग अभी हमारे बीच हैं जो यह भली प्रकार जानते हैं कि 1965 में पैदा हुए अन्न संकट के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने जब देश के स्वाभिमान की रक्षा के दृष्टिगत लोगों से अपील की कि वे सभी सप्ताह में एक दिन का व्रत रखें और […] Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ क्षत्रिय जिसने दुनिया को जागृति का मार्ग दिखाया May 4, 2026 / May 4, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment गजेंद्र सिंह सिद्धार्थ गौतम का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी (आज का नेपाल) में हुआ था। वे शाक्य कुल के क्षत्रिय थे। उनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के राजा थे। क्षत्रिय होने के नाते उनसे उम्मीद थी कि वे शासन करें, प्रजा की रक्षा करें और न्याय स्थापित करें। इसलिए बचपन से ही उन्हें एक महान राजा बनाने के लिए घुड़सवारी, धनुर्विद्या, शस्त्र चलाना और राजनीति की शिक्षा दी गई । कहा जाता है कि जन्म के समय ऋषि असित ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो महान सम्राट बनेगा या एक महान संत (बुद्ध)। राजा शुद्धोधन ने अपने पुत्र को हर तरह के दुःख से दूर रखने के लिए महल में सभी सुख-सुविधाएँ दीं । 29 वर्ष की आयु में जब सिद्धार्थ पहली बार नगर भ्रमण पर निकले, तो उन्होंने चार महत्वपूर्ण दृश्य देखे, एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगी, एक मृत शरीर और एक संन्यासी। इन दृश्यों ने उनके मन को गहराई से झकझोर दिया। एक योद्धा जो बाहरी शत्रुओं से लड़ना जानता था, अब जीवन के असली शत्रुओं, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु से परिचित हुआ। शांत और संतुष्ट संन्यासी को देखकर उनके मन में सवाल उठा कि क्या इन दुखों से मुक्ति का कोई रास्ता है? उन्होंने सोचा, यदि वे अपनी प्रजा को मृत्यु और दुख से नहीं बचा सकते, तो राजा बनने का क्या अर्थ है? यही सवाल आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला बना। उसी रात सिद्धार्थ ने चुपचाप महल छोड़ दिया। इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। एक क्षत्रिय के लिए मुकुट, तलवार और राज्य छोड़ना बहुत बड़ा त्याग था। लेकिन उन्होंने यह कदम हार मानकर नहीं, बल्कि जीवन के बड़े सत्य की खोज के लिए उठाया । इसके बाद उन्होंने छह वर्ष तक उरुवेला के जंगलों में कठोर तपस्या की। उन्होंने आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त से ध्यान की शिक्षा ली। फिर उन्होंने अपने शरीर को इतना कष्ट दिया कि वे दिन में केवल एक चावल के दाने पर ही रहने लगे। उनका संकल्प बहुत मजबूत था, या तो सत्य मिलेगा या मृत्यु। लेकिन अंत में उन्हें यह समझ आया कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देना सही मार्ग नहीं है। इससे सत्य की प्राप्ति नहीं होती। यही समझ आगे चलकर उनके जीवन में एक नया रास्ता खोलती है। सुजाता नाम की एक कन्या से खीर ग्रहण करने के बाद सिद्धार्थ ने एक नया मार्ग चुना मध्यम मार्ग। यह भोग और कठोर तपस्या, दोनों के बीच का संतुलित रास्ता था। उनका समझना था कि किसी भी अति से शक्ति कमजोर होती है, जबकि संतुलन से ही जीवन का संघर्ष जीता जा सकता है। इसके बाद वे बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक उन्हें सत्य का ज्ञान (बोध) नहीं मिलेगा, वे उठेंगे नहीं। तभी मार ने उन्हें डर, प्रलोभन और भ्रम से विचलित करने की कोशिश की। लेकिन सिद्धार्थ अडिग रहे। उन्होंने पृथ्वी को साक्षी मानते हुए भूमिस्पर्श मुद्रा धारण की, जैसे कह रहे हों कि उनका संकल्प सच्चा है। अंततः वैशाख पूर्णिमा की भोर में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई, और वे बुद्ध कहलाए—अर्थात जाग्रत व्यक्ति। ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने लगभग 45 वर्षों तक पैदल चलकर अपने धर्म का प्रचार किया। उन्होंने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया, जिसे धर्म चक्र प्रवर्तन कहा जाता है । इस उपदेश में उन्होंने जीवन के चार आर्य सत्य समझाए—इस संसार में दुःख है; दुःख का कारण तृष्णा (इच्छाएँ) हैं; दुःख का अंत संभव है; और इस अंत तक पहुँचने का मार्ग अष्टांगिक मार्ग है। इस मार्ग में सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि शामिल हैं। यही संतुलित, अनुशासित और व्यावहारिक जीवन-पथ बुद्धधर्म के रूप में जाना गया। भारत में जाति-व्यवस्था एक पुरानी सामाजिक संरचना रही है, लेकिन बुद्ध ने इसे स्पष्ट रूप से चुनौती दी। सिद्धार्थ, जो शाक्य कुल के क्षत्रिय राजकुमार थे, ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने कहा “मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म से महान बनता है।” उन्होंने अपने संघ में पूर्ण समानता स्थापित की। उदाहरण के लिए, नाई उपालि को भिक्षुओं में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। संघ में प्रवेश करते ही व्यक्ति को अपना पुराना नाम, गोत्र और जाति त्यागनी होती थी—बुद्ध केवल इतना पूछते थे, “क्या तुम मनुष्य हो?” उनका धम्म सभी के लिए था राजा हो या व्यापारी, वेश्या हो या चांडाल सबको समान स्थान और सम्मान मिला। उनके संघ में बिम्बिसार और प्रसेनजित जैसे राजा, अनाथपिण्डक जैसे सेठ, आम्रपाली जैसी गणिका, उपालि और सुनीत जैसे साधारण लोग सभी एक साथ थे। बुद्ध स्वयं क्षत्रिय थे, फिर भी उन्होंने जाति-अभिमान को सबसे बड़ा बंधन बताया। उन्होंने अपने पद और पहचान का उपयोग विशेषाधिकार बचाने में नहीं, बल्कि उसे समाप्त करने में किया। उनका संदेश स्पष्ट था सच्ची “आर्यता” जन्म या कुल से नहीं, बल्कि आचरण और कर्म से आती है। बुद्ध ने भिक्षु-भिक्षुणियों का संघ बनाया। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर चलता था। निर्णय बहुमत से होते थे। स्वयं बुद्ध भी संघ के नियमों (विनय) के नियमों से ऊपर नहीं थे। यहाँ उन्होंने क्षत्रिय के संगठन और अनुशासन कौशल को आध्यात्मिक क्षेत्र में लगाया। 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में अंतिम भोजन के बाद गौतम बुद्ध अस्वस्थ हो गए। साल वृक्षों के बीच विश्राम करते हुए उन्होंने अपने शिष्य आनंद से कहा “अत्त दीपो भव” (अपने दीपक स्वयं बनो, अपना उद्धार स्वयं करो)। उनका अंतिम संदेश था “अप्पमादेन सम्पादेथ”, अर्थात् प्रमाद रहित होकर अपना कार्य पूर्ण करो। मृत्यु के समय भी उन्होंने सजगता, अनुशासन और कर्म की महत्ता पर जोर दिया। बुद्ध ने कभी स्वयं को ईश्वर नहीं कहा; वे एक ऐसे मनुष्य थे जिन्होंने सत्य का मार्ग खोजा और दूसरों को दिखाया । बाद में सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद बुद्ध के धम्म को अपनाया और उसे पूरे एशिया में फैलाया। आज श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, चीन, जापान, तिब्बत से लेकर अमेरिका तक बुद्ध के विचारों का प्रभाव देखा जा सकता है। अशोक के शिलालेख बताते हैं कि उन्होंने “धम्म” को जाति से ऊपर रखा। उन्होंने धम्म-महामात्र नामक अधिकारियों की नियुक्ति की, जो सभी वर्गों , श्रमण, निर्धन और अनाथ में बिना भेदभाव के नैतिकता का प्रचार करते थे। उनके 11वें शिलालेख में कहा गया कि “धम्म-दान सबसे श्रेष्ठ है”, जिसमें दासों और सेवकों के साथ उचित व्यवहार भी शामिल है। उन्होंने सभी जातियों को स्तूप और विहारों में जाने की स्वतंत्रता दी और यह भी कहा “सभी मनुष्य मेरी संतान हैं।” आज आधुनिक विज्ञान भी “माइंडफुलनेस” और करुणा जैसे विचारों पर शोध कर रहा है। सिद्धार्थ गौतम ने यह दिखाया कि एक क्षत्रिय का सर्वोच्च धर्म बाहरी शत्रुओं को हराना नहीं, बल्कि अपने भीतर के लोभ, द्वेष और मोह पर विजय पाना है। इस प्रकार एक बिना राज्य का क्षत्रिय पूरे विश्व का मार्गदर्शक बन गया। गजेंद्र सिंह Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ हिंदुस्तानियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भाजपा को दिलाई जीत May 4, 2026 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव पश्चिम बंगाल,असम, तमिलनाडु,केरल और पुडुचेरी के परिणाम आ गए हैं। बंगाल में भाजपा ने तृणमूल मुखिया ममता बनर्जी को बड़ा झटका देकर बंगाल को स्पष्ट बहुमत के साथ झटक लिया है। बंगाल का यह नतीजा उन पाखंडी बौद्धिकों को भी बड़ा सबक है,जो पूर्वाग्रही बने रहने के कारण निष्पक्ष नहीं रह पाते हैं। […] Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव॥ May 4, 2026 / May 4, 2026 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव,माली बाग़ उजाड़ते, मांझी खोए नाव॥ अपनों से अपने नहीं, रखते आज लगाव,रिश्तों की हर डाल पर, सूख गया अब भाव।विश्वासों की धूप में, जलते रहे अभाव—वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव॥ लोभ-लालसा की लहर, बहा रही सद्भाव,चौराहे पर सच खड़ा, ढूँढे अपना ठाव।झूठों की इस भीड़ में, खोता हर […] Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ नारी सशक्तिकरण का संकल्प April 28, 2026 / April 28, 2026 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार ने अनूठी पहल की है। विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर नारी शक्ति वंदन का संकल्प लिया है। इस संकल्प लेने का उद्देष्य है कि विधेयक को कानूनी रूप देते समय जो चूक हो गई थी, उसे संषोधित कर दिया जाए। Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ उज्ज्वला का उजाला या आपूर्ति का अंधेरा? April 1, 2026 / April 1, 2026 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment – डॉ. प्रियंका सौरभ हालिया एलपीजी संकट ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी महत्वाकांक्षी कल्याणकारी पहलों की चमक धूमिल कर दी है। मार्च 2026 में पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनावों से उत्पन्न यह संकट, जब ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर दिया, तब भारत की लगभग 60 प्रतिशत आयात निर्भरता पूरी तरह उजागर हो […] Read more »
प्रवक्ता न्यूज़ फॉलोअर्स की भूख और रिश्तों की नीलामी March 12, 2026 / March 12, 2026 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment फॉलोअर्स की भूख और रिश्तों की नीलामी Read more » फॉलोअर्स की भूख रिश्तों की नीलामी
प्रवक्ता न्यूज़ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का स्वर्णिम अध्याय: दांडी मार्च-12 मार्च 1930 March 12, 2026 / March 12, 2026 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment दांडी मार्च-12 मार्च 1930 Read more » दांडी मार्च-12 मार्च 1930