महिला-जगत बलात्कारियों से जूझें, भले ही जान चली जाए December 23, 2012 / December 23, 2012 by गिरीश पंकज | 6 Comments on बलात्कारियों से जूझें, भले ही जान चली जाए गिरीश पंकज दिल्ली में चलती बस में युवती से सामूहिक बलात्कार, छत्तीसगढ़ में एक पाँच साल की बच्ची से दुष्कर्म। ऐसी घटनाएँ समाज को दहला देती हैं, लोग गुस्से में भर कर सड़कों पर उतर आते हैं और धीरे-धीरे गुस्सा ‘बुद्धू बक्से’ (टीवी) के सम्मोहन में कहीं खो जाता है। दिल्ली के सामूहिक बलात्कारी पकड़े […] Read more » बलात्कार
महिला-जगत पुसंवाद को कितना डिस्टर्ब करता है स्त्रीवादी सोच – सारदा बनर्जी December 17, 2012 by सारदा बनर्जी | 9 Comments on पुसंवाद को कितना डिस्टर्ब करता है स्त्रीवादी सोच – सारदा बनर्जी क्या वजह है कि कोई स्त्री लेखिका जब पितृसत्ताक समाज के पुंसवादी रवैये की आलोचना करती हैं तो उन्हें पुरुषों की कटुक्ति का सामना करना पड़ता है? हमारा समाज अपने रवैये में बेहद पुंसवादी है और इस पुंसवाद के प्रभाव को स्त्रियां हर पल झेल रहीं हैं। लेकिन जब कोई स्त्री इन विषयों पर रौशनी […] Read more » स्त्री विमर्श
महिला-जगत तेजाब-पीड़िता सोनाली मुखर्जी और स्त्री-हिंसा – सारदा बनर्जी December 11, 2012 by सारदा बनर्जी | 3 Comments on तेजाब-पीड़िता सोनाली मुखर्जी और स्त्री-हिंसा – सारदा बनर्जी ऐसी वारदातें जो स्त्री के देह से होकर उसके मन तक को नारकीय यंत्रणा का नृशंस शिकार बना दे, देश के लिए शर्म हैं और ऐसे लोग जो इस तरह की गुनाहों के गुनहगार होते हैं , वे देश और समाज से बहिष्कृत किए जाने के योग्य हैं। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है तेजाब हमले […] Read more »
महिला-जगत एकल परिवार और स्त्री – सारदा बनर्जी December 4, 2012 by सारदा बनर्जी | 4 Comments on एकल परिवार और स्त्री – सारदा बनर्जी आज के ज़माने में स्त्रियों के लिए एकल परिवार एक अनिवार्य शर्त बन गया है। स्त्री की आत्मनिर्भरता और सामाजिक गतिशीलता के विकास के लिए एकल परिवार बेहद ज़रुरी है। संयुक्त परिवार में स्त्रियों के पास अपने लिए समय नहीं होता। अपने आप को समझने और अपनी प्रतिभाओं के विकास का उन्हें बिल्कुल ही मौका […] Read more » एकल परिवार
महिला-जगत पितृसत्ताक समाज में पुंसवादी पर्वों के चंगुल में फँसीं स्त्रियां – सारदा बनर्जी November 29, 2012 by सारदा बनर्जी | 3 Comments on पितृसत्ताक समाज में पुंसवादी पर्वों के चंगुल में फँसीं स्त्रियां – सारदा बनर्जी भारत का पितृसत्ताक ढांचे में बना समाज अपने उत्सवों में भी बेहद पुंसवादी है। देखा जाए तो त्योहारों का अपना एक आनंद होता है। लेकिन आनंद के उद्देश्य से जितने भी त्योहारों या व्रतों की सृष्टि की गई है वे सारे आयोजन कायदे से पितृसत्ताक मानसिकता का ज़बरदस्त परिचय देता है। यह एक आम बात […] Read more »
महिला-जगत स्त्री-आधुनिकता विचारों में है या ‘जीन्स’ में – सारदा बनर्जी November 29, 2012 by सारदा बनर्जी | 1 Comment on स्त्री-आधुनिकता विचारों में है या ‘जीन्स’ में – सारदा बनर्जी आज अधिकतर भारतीय स्त्रियां प्रचलित भारतीय वस्त्रों की जगह जीन्स को वरीयता दे रही हैं। इसकी वजह है मार्केट में जीन्स का व्यापक तौर पर उपलब्ध होना और जीन्स का कम्फर्ट-लेबल । इसके अतिरिक्त जीन्स स्टाइलिश ड्रेस के रुप में भी माना जाता है। साथ ही यह आधुनिकता का भी परिचायक है। यही वजह है […] Read more »
महिला-जगत विकास के नाम पर विस्थापन झेलती आदिवासी महिलाएं November 16, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 1 Comment on विकास के नाम पर विस्थापन झेलती आदिवासी महिलाएं अशोक सिंह आदिवासी विद्रोहों के इतिहास में भले ही स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है लेकिन आदिवासी औरतों के बलिदान की गाथाएं अब भी इतिहास की वस्तु नहीं बन पायी। पहले की तरह आज भी उनके सवाल, उनके मुद्दे हाशिए पर धकेले जाते रहे हैं। विकास विस्थापन और महिलाएँ एक ऐसा ही ज्वलंत और बुनियादी […] Read more » आदिवासी विस्थापन
महिला-जगत पुरुष प्रधान समाज के यह महिला विरोधी फ़ैसले November 14, 2012 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तनवीर जाफ़री विभिन्न राजनैतिक,धार्मिक व सामाजिक मंचों से हालाँकि प्राय: महिलाओं को लुभाने वाली इस प्रकार की भाषणबाज़ी सुनाई देती है कि महिलाओं को समाज में ‘देवी’ जैसा रुतबा व स्थान प्राप्त है। कभी महिलाओं को बराबर की हिस्सेदारी देने की बात भी की जाती है। भारत की राजनैतिक व्यवस्था में तो महिलाओं को 33 […] Read more »
महिला-जगत स्त्री और कृष्ण-चरित्र – सारदा बनर्जी November 11, 2012 by सारदा बनर्जी | 1 Comment on स्त्री और कृष्ण-चरित्र – सारदा बनर्जी क्या कारण है कि स्त्रियों में मिथकीय नायकों में राम की अपेक्षा कृष्ण ज़्यादा पॉप्यूलर हैं ? कृष्ण को लेकर स्त्रियों में जितनी फैंटेसी, प्रेम और उत्सुकता दिखाई देती है उतनी उत्सुकता राम को लेकर नहीं। कृष्ण को लेकर सुंदर कल्पनाएं करने, कथाएं रचने और चर्चा करने में स्त्रियां जितनी रुचि लेती हैं उतनी राम-कथा […] Read more » स्त्री और कृष्ण
महिला-जगत बिना हारे, स्त्री जीत नहीं सकती! November 7, 2012 / November 7, 2012 by डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' | 2 Comments on बिना हारे, स्त्री जीत नहीं सकती! यह अवस्था अर्थात् तृप्ति या ऑर्गेज्म तो स्त्री की पुरुष के समक्ष हार या समर्पण का स्वाभाविक प्रतिफल होता है, जबकि ऐसी आधुनिका नारियों का अवचेतन तो इतना रुग्ण हो चुका होता है कि वे पुरुष के समक्ष अपना सबकुछ समर्पित करके हार जाने के बजाय कुछ भी समर्पित नहीं करके सब कुछ पा लेने […] Read more »
महिला-जगत एसिड अटैक की शिकार होती महिलाएं October 29, 2012 by वंदना शर्मा (हिस) | Leave a Comment वन्दना शर्मा चेहरे पर एक दाग लग जाता है तो उसे हम जल्दी से जल्दी साफ करने को दौड़ते हैं और तब तक बेचैन रहते हैं जब तक चेहरा पहला-सा नहीं हो जाता। ऐसे में उन लोगों की बेचैनी का अंदाजा लगाया जा सकता है जो ‘एसिड अटैक‘ का शिकार हो रहे हैं। इन दिनों […] Read more »
महिला-जगत वह पैरों की धूल नहीं है October 20, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment ममता सिन्हा देश और विश्व में हो रही तमाम तरक्कियों के बावजूद औरतों को बराबरी का दर्जा तो दूर उन्हें जीने का अधिकार भी नसीब नहीं हुआ है। यह सही है कि साहस के साथ संगठित होकर समय समय पर महिलाओं ने आवाज बुलंद किया है और कुछ अधिकार हासिल किये हैं लेकिन साथ ही […] Read more »